#आईना झूठ नहीं बोलता#

मैं अकसर आईने की तरफ देख कर मुसकुराता हूँ तो मुझे लगता है कि आईना मुझसे कह रहा है कि  मैं मुसकुराता हुआ अच्छा लगता हूँ |

मैं उससे  जानना चाहता हूँ कि कितना ?  लेकिन आईना  कुछ बता नहीं पाता |  फिर मैं यह सोच कर आश्वस्त  हो जाता हूँ कि आईना कभी झूठ नहीं बोलता |

इसलिए तो मैंने लिखा है …

आईना झूठ नहीं बोलता

आईना आज फिर मुझे देख रहा है,

मेरे मुसकुराने का राज पूछ रहा है ।

दुख में भी मुसकुराने का राज क्या है ? 

जो दर्द को बढ़ा गया वो साज क्या है ?

यह सच है कि आईना झूठ नहीं बोलता है ,

हर बात को सच के तराजू पर तौलता है | 

लेकिन क्या वो मेरे दर्द को जानता है ?

क्या मेरे  जीवन के संघर्षों को पहचानता है ?

 मैं, बस मुसकुराता हूँ कुछ नहीं कह पाता हूँ ,

पर आईने से अपने दर्द को छिपा नहीं पाता हूँ |

पूछता है ये मैं क्यों दुखी हूँ आज

क्यों नहीं थिरकता ज़िंदगी के साथ |

यह सच है की आईना झूठ नहीं बोलता है 

न ही कभी किसी का राज़ खोलता है |

आसान नहीं है जीवन यह तो संघर्ष है,

मेरे अंदर और बाहर का द्वंद है

इसलिए जब मैं आईने को देखता हूँ,

अपने दर्द को अपने अंदर समेटता हूँ |

(विजय वर्मा)

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Categories: kavita

39 replies

  1. अच्छी कविता।

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  2. beautiful post sir. wonderful poem.

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  3. Good morning Sir! Have a great day!

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  4. आईना झूठ नहीं बोलती। सच ही है। 👏👏👍

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  5. Beautiful post sir. wonderful poem.

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  6. मोहन "मधुर"'s avatar

    यह सही है कि आईना झूठ नहीं बोलता। पर, आईना द्वारा उसके सामने खड़े मनुष्य के अन्दर चल रही भावनाओं की निष्पक्ष गवाही को उस व्यक्ति के बनावटीपन भरे मुखौटे से अक्सर झूठलाया भी जाता रहा है। यह भी एक सत्य है। शुभ संध्या भाई!

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  7. मोहन "मधुर"'s avatar

    अच्छी कविता

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