# कवि का दिल है मेरा#

 

 कुछ रिश्तों को छोड़ दिया जाएँ. तो ज्यादातर रिश्तों में इंसान अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही वह दुसरे के करीब आता है | अपने से ज्यादा अमीर, ताकतवर और बुद्धिमान लोगो की क़द्र करते है |

आज के परिवेश में हर इंसान अपने फायदे की बात सोचता है | इसके लिए अपने ही लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने से नहीं चुकते है |

अपने दिल की आहत भावनाओं को शब्दों में पिरोने का प्रयास है यह कविता | मुझे आशा है आप इसे पसंद करेंगे ….

कवि का दिल है मेरा   

भावनाओं के आँगन में

शब्दों के फूल खिलाता हूँ मैं,

ज़िन्दगी के  हसीन लम्हों के

नए  गीत गुनगुनाता हूँ मैं |

समय के साथ संघर्ष करना ,

तो  अपनी आदत है दोस्तों

अपने व्यस्त जीवन से भी

आराम के पल चुराता हूँ मैं |

लोगों की परवाह क्यों करूँ

वे तो ज़ख्म देते रहते है,

अपने हिस्से के दर्द से

बार बार आहत होता हूँ मैं |

कवि का दिल है मेरा

शब्दों को गुनगुनाता हूँ मैं,

मन में उठते भावनाओं से

शब्दों की माला बनाता हूँ मैं

ज़ख्मों की परवाह मैं करता नहीं

औरों को मरहम लगाता हूँ मैं |

             ( विजय वर्मा )

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# उम्र के इस पड़ाव में #

BE HAPPY….BE ACTIVE….BE FOCUSED….BE ALIVE…

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Categories: kavita

18 replies

  1. अच्छी कविता।

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  2. Acchi kavita.Pad kar accha laga.

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  3. Reblogged this on Retiredकलम and commented:

    Every season has a beautiful reason,
    every problem has a meaningful message.
    all we need is a fresh vision.

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