साझेदारी करो तो किसी के दर्द की करो,
क्योंकि खुशियों के तो दावेदार बहुत है ||

दोस्तों आज मैं एक ऐसी कहानी प्रस्तुत चाहता हूँ, जिसे पढ़ कर आपकी भी आत्मा रो देगी | वैसे तो क्राइम बहुत तरफ के होते है जिसे आये दिन समाचार के माध्यम से सुनते और पढ़ते रहते है |
लेकिन यह सिर्फ कहानी नहीं बल्कि सच्ची घटना है जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती है कि एक इंसान दुसरे इंसान के साथ ऐसा घिनौना जुर्म कैसे कर सकता है |
एक इंसान जो अगर किसी को ज़िन्दगी दे नहीं सकता तो वह किसी की ज़िन्दगी ले कैसे सकता है ?..यह एक प्रश्न चिन्ह हमारे मन में उभरता है |
आखिर इंसान के दिमाग में इस तरह से गुस्सा क्यों आता है कि वह किसी की हंसती खेलती ज़िन्दगी को अचानक वैसे मुकाम पर पहुँचा देता है कि वह अदालत के कटघरे में खड़े होकर कहती है .. जज साहिबा, मैं मरना चाहती हूँ, मुझे मरने की इज़ाज़त दी जाए…
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