मुर्ख कौन

दोस्तों,

आज कल हम बिहार दिवस पखवारा मना रहे है | हमारे मन में विचार आया कि आज एक लोक कथा  की चर्चा की जाए |

मुझे अपनी बचपन की याद आ रही  है जब  ऐसी लोक कथाएं  मेरी माँ  मुझे बचपन  में सुनाती थी.. जिसे सुनकर ही हमें  नींद आती थी | ऐसी ही एक कहानी है… जिसका शीर्षक है …. मुर्ख कौन ?

एक गांव में एक सेठ रहता था | उसका एक ही बेटा था, जो व्यापार के काम से परदेस गया हुआ था |

एक दिन की बात है कि उस सेठ की बहू कुएँ पर पानी भरने गई | पानी भरने के क्रम में उसके घड़ा से पानी छलक कर उसके बदन को भिगों दिया |

बहु ने किसी तरह दुबारा अपने घड़े को भरा  | घड़े को उसने  उठाकर कुएँ के मुंडेर पर रख दिया और अपना हाथ-मुँह धोने लगी |

तभी उधर से चार राहगीर गुजर रहे थे | उन्होंने घड़े का पानी देखा तो अपनी प्यास बुझाने के लिए बहु के पास आ पहुँचे. |

एक राहगीर बोला, “… बहन, मैं बहुत प्यासा हूँ,  क्या मुझे पानी पिला दोगी ?

सेठ की बहू को पानी पिलाने में थोड़ी झिझक महसूस हुई,  क्योंकि उस समय उसके कपडे भींगे  हुए थे और बदन पर कपडे भी कम पहनी हुई थी. |

उसके पास लोटा या गिलास भी नहीं था जिससे वह पानी पिला सके | इसी कारण वहाँ उन राहगीरों को पानी पिलाना उसे ठीक नहीं लगा |

इसलिए बहू ने उससे पूछा, “.. आप कौन हैं ?

राहगीर ने जबाब दिया … “मैं एक यात्री हूँ”

बहू बोली, “…यात्री तो संसार में केवल दो ही होते हैं | , आप उन दोनों में से कौन हैं ?

अगर आपने मेरे इस सवाल का सही जवाब दे दिया तो मैं आपको पानी पिला दूंगी., वरना मैं पानी नहीं पिलाऊंगी. |”

लेकिन बेचारा राहगीर उसकी बात का कोई सही जवाब नहीं दे पाया.

तभी दूसरे राहगीर ने पानी पिलाने की विनती की. |

बहू ने दूसरे राहगीर से भी पूछा, …“अच्छा तो आप बताइए कि आप कौन हैं ?”

दूसरा राहगीर तुरंत बोल उठा, …“मैं तो एक गरीब आदमी हूँ. ”

सेठ की बहू उससे बोली,….भइया, गरीब तो केवल दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं ??”

प्रश्न सुनकर दूसरा राहगीर चकरा गया. ..उसको कोई जवाब नहीं सूझा तो वह चुपचाप पीछे हट गया |.

तभी तीसरा राहगीर बोला  पड़ा …, “बहन, मुझे बहुत प्यास लगी है. ईश्वर के लिए तुम मुझे पानी पिला दो”

बहू ने उससे भी प्रश्न किया .., “अब आप कौन हैं ?

तीसरा राहगीर बोला, ….“बहन, , मैं तो एक अनपढ़ गंवार हूँ.”

यह सुनकर बहू बोली, …“अरे भई, अनपढ़ गंवार तो इस संसार में बस दो ही होते हैं.,,,आप उनमें से कौन हैं ??”

बेचारा तीसरा राहगीर भी कुछ बोल नहीं पाया.

अंत में चौथा राहगीह आगे आया और बोला, …“ बहन,,  मेहरबानी करके मुझे पानी पिला दें. | प्यासे को पानी पिलाना तो बड़े पुण्य का काम होता है.” |

सेठ की बहू बड़ी ही चतुर और होशियार थी |  

उसने चौथे राहगीर से भी वही प्रश्न किया … “आप कौन हैं ?

वह चौथा  राहगीर अपनी खीज छिपाते हुए बोला, …“.बहन, मैं तो  बड़ा ही मूर्ख  प्राणी हूँ.”

तब बहू ने उससे कहा …, मूर्ख तो संसार में केवल दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं ?

संयोग से वह बेचारा भी उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दे सका. और चारों राहगीर पानी पिए बगैर ही वहाँ से जाने लगे |

उनको जाते देख बहू ने कहा ….. “यहाँ से थोड़ी ही दूर पर मेरा घर है. | आप लोग कृपया वहीं चलिए. मैं आप लोगों को पानी पिला दूंगी”

उसकी बातों को सुन कर वे चारों राहगीर उसके घर की तरफ चल पड़े |

बहू ने इसी बीच पानी का घड़ा उठाया और छोटे रास्ते से अपने घर पहुँच गई.| उसने घड़ा रख दिया और अपने कपड़े ठीक तरह से पहन लिए |.

थोड़ी देर  में वे चारों राहगीर उसके घर पहुँच गए. | बहू ने उन सभी को गुड़ दिया और पानी पिलाया. | पानी पीने के बाद वे चारो राहगीर अपनी राह पर चल पड़े |.

सेठ  उस समय घर में एक तरफ बैठा यह सब देख रहा था.|  उसे यह देख कर बड़ा दुःख हुआ.| वह मन ही मन सोचने लगा,  कि  इसका पति तो व्यापार करने के लिए परदेस गया है, |

और यह उसकी गैर हाजिरी में पराए मर्दों को घर बुलाती है.| उनके साथ हँसती बोलती है.| इसे तो मेरा भी लिहाज नहीं है. |

यह सब देख अगर मैं चुप रह गया तो आगे से इसकी हिम्मत और बढ़ जाएगी. |

जब मेरे सामने इसे किसी से बोलते बतियाते शर्म नहीं आती तो मेरे पीछे न जाने क्या-क्या करती होगी.|

वह मन ही मन सोचने लगा …. बहु की इस बीमारी को ठीक करना ही होगा |  यह बिमारी अपने आप ठीक नहीं होने वाला है |

ऐसा सोच कर उसने निर्णय लिया कि राजा से इसकी शिकायत करेगा और इसका  फैसला राजा पर ही छोड़ दूंगा  |

यही सोचता वह सीधा राजा के पास जा पहुँचा और अपनी परेशानी बताई |

सेठ की सारी बातें सुनकर राजा ने उसी वक्त बहू को बुलाने के लिए सिपाही उसके घर भेजा  और उनसे कहा, ..“तुरंत सेठ की बहू को राज सभा में उपस्थित किया जाए.”

राजा के सिपाहियों को अपने घर पर आया देख उस सेठ की पत्नी ने अपनी बहू से पूछा, …“क्या बात है बहू रानी,   क्या तुम्हारी किसी से कहा-सुनी हो गई थी जो उसकी शिकायत पर राजा ने तुम्हें बुलाने के लिए सिपाही भेज दिए ?”

बहू ने सास की चिंता को दूर करते हुए कहा, …“नहीं सासू मां, , मेरी किसी से कोई कहा-सुनी नहीं हुई है | . आप जरा भी फिक्र न करें. |”

सास को आश्वस्त कर वह सिपाहियों से बोली, …“ तुम पहले अपने राजा से यह पूछकर आओ कि उन्होंने मुझे किस रूप में बुलाया है…. बहन,,  बेटी या फिर बहू के रुप में ?  किस रूप में  उनकी राजसभा में मैं आऊँ ?

बहू की बात सुन सिपाही वापस चले गए. | उन्होंने राजा को सारी बातें बताई.|

राजा ने तुरंत आदेश दिया कि पालकी लेकर जाओ और कहना कि उसे बहू के रूप में बुलाया गया है |

सिपाहियों ने राजा की आज्ञा का पालन करते हुए सेठ की बहू के पास आकर कहा,… “राजा ने आपको बहू के रूप में आने के लिए पालकी भेजी है.”

बहू उसी समय पालकी में बैठकर राज सभा में जा पहुँची.

राजा ने बहू से पूछा,…. “तुम दूसरे पुरूषों को घर क्यों बुला लाईं, ?  जबकि तुम्हारा पति घर पर नहीं है |

बहू ने जबाब दिया,  … महाराज,  मैंने तो केवल कर्तव्य का पालन किया | प्यासे पथिकों को पानी पिलाना कोई अपराध नहीं है.|  यह हर गृहिणी का कर्तव्य है.|  

जब मैं कुएँ पर पानी भरने गई थी, तब तन पर मेरे कपड़े अजनबियों के सम्मुख उपस्थित होने के अनुरूप नहीं थे. इसी कारण उन राहगीरों को कुएँ पर पानी नहीं पिलाया.|  

उन्हें बड़ी प्यास लगी थी और मैं उन्हें पानी पिलाना चाहती थी. इसीलिए उनसे मैंने मुश्किल प्रश्न पूछे और जब वे उनका उत्तर नहीं दे पाए तो उन्हें घर बुला लाई. |

घर पहुँचकर ही उन्हें पानी पिलाना उचित समझा  |”

राजा को बहू की बात ठीक लगी | लेकिन राजा को उन प्रश्नों के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता हुई जो उसने चारों राहगीरों से पूछे थे.|

राजा ने सेठ की बहू से कहा,…  “भला, मैं भी तो सुनूं कि वे कौन से प्रश्न थे जिनका उत्तर वे लोग नहीं दे पाए ?”

बहू ने तब वे सारे प्रश्न राजा के सामने दुहरा दिए |. .. बहू के प्रश्न सुन राजा और सभासद भी चकित रह गए |.

फिर राजा ने उससे कहा, .. “तुम खुद ही इन प्रश्नों के उत्तर दो… हम अब तुमसे ही यह जानना चाहते हैं. |”

इस पर बहू ने कहा …., “महाराज, , मेरी दृष्टि में पहले प्रश्न का उत्तर है कि संसार में सिर्फ दो ही यात्री हैं –.. सूर्य और चंद्रमा. |

मेरे दूसरे प्रश्न का उत्तर है कि बहू और गाय इस पृथ्वी पर ऐसे दो प्राणी हैं जो गरीब हैं. |

अब मैं तीसरे प्रश्न का उत्तर सुनाती हूं. महाराज,…. हर इंसान के साथ हमेशा अनपढ़ गंवारों की तरह जो हमेशा चलते रहते हैं वे हैं – भोजन और पानी. |

चौथे आदमी ने कहा था कि वह मूर्ख है, और जब मैंने उससे पूछा कि मूर्ख तो दो ही होते हैं, तुम उनमें से कौन से मूर्ख हो तो वह उत्तर नहीं दे पाया.” ….इतना कहकर वह चुप हो गई. |

राजा ने बड़े आश्चर्य से पूछा, “… क्या तुम्हारी नजर में इस संसार में सिर्फ दो ही मूर्ख हैं ?

हाँ, महाराज,….. इस घड़ी,.  इस समय मेरी नजर में सिर्फ दो ही मूर्ख हैं. |

राजा ने उत्सुकता से पूछा  …, “तुरंत बतलाओ कि वे दो मूर्ख कौन हैं. ?”

इस पर बहू बोली, “….महाराज,,  मेरी जान बख्श दी जाए तो मैं इसका उत्तर दूं |

राजा को बड़ी उत्सुकता थी यह जानने की कि वे दो मूर्ख कौन हैं. ?

इसलिए , उसने तुरंत बहू से कह दिया, …“ तुम निःसंकोच होकर कहो |. हम वचन देते हैं कि तुम्हें कोई सज़ा नहीं दी जाएगी. ”

बहू ने कहा .. …, “महाराज,  मेरे सामने इस वक्त बस दो ही मूर्ख हैं.”|  फिर अपने ससुर की ओर हाथ जोड़कर कहने लगी,… “पहले मूर्ख तो मेरे ससुर जी हैं जो पूरी बात जाने बिना ही अपनी बहू की शिकायत राजदरबार में की.|  

अगर इन्हें शक हुआ ही था तो यह पहले मुझसे पूछ तो लेते,|  मैं खुद ही इन्हें सारी बातें बता देती. इस तरह  घर-परिवार की बेइज्जती तो नहीं होती. |

ससुर को अपनी गलती का अहसास हुआ. उसने बहू से माफ़ी मांगी.|  बहू चुप रही.

राजा की  उत्सुकता अपने चरम सीमा पर थी …इसलिए ज़ल्दी से पूछा …, और दूसरा मूर्ख कौन है ?

बहू ने राजा की तरफ देखते हुए कहा, … महाराज, वो  दूसरा मूर्ख खुद इस राज्य का राजा है, जिसने अपनी बहू की मान-मर्यादा का जरा भी खयाल नहीं किया और सोचे-समझे बिना ही बहू को पालकी भेज कर भरी राजसभा में बुलवा लिया.”|

बहू की बात सुनकर राजा पहले तो क्रोध से आग बबूला हो गया, | परंतु तभी सारी बातें उसकी समझ में आ गईं. |

समझ में आने पर राजा ने बहू को उसकी समझदारी और चतुराई की सराहना करते हुए उसे ढेर सारे पुरस्कार देकर सम्मान सहित विदा किया. |

दोस्तों , यह सही है कि गुस्से में और बिना पूरी बातों की जानकारी प्राप्त किये हमें प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए |
(रचना .. महेश नारायण भारती)

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Published by vermavkv

I am Vijay Kumar Verma, residing in Kolkata, the city of joy. I was a Banker since December 1985 and retired in April 2017 from State Bank of India. After serving the Bank for 32 years as an officer holding different assignments from time to time, now I am currently enjoying the retired life. I would like to fulfil the duty of social service through this platform spreading aware about the health related problems and their remedies. I will also try to entertain my followers through knowledgeable information and motivate them to enjoy better and quality lifestyle. It is my endeavour to keep the post friendly and as informative as I can. I am willing to connect with my friends and followers, through my stories and drawings out of my passion to write and make sketches. I would like to create a trusted and joyful friend circle, and share tales from the past

6 thoughts on “मुर्ख कौन

    1. Thank you dear,
      These are the folk tales which is still interesting to hear or read ..
      we have enjoyed in our childhood and feel refreshed to hear again..
      Stay connected and stay happy…

      Like

    1. जी हाँ, , लोक कथा आज भी पढने और सुनने में अच्छी लगती है /.

      आप ने में हौसला बढाया इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद..

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