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An Attitude of Gratitude in life

It is the time when giving thanks is top of our minds. In this stage of corona pandemic that causes us to think about all of the special things in our lives and express gratitude for them. We are safe and must be grateful to God..

An attitude of gratitude means making it a habit to express thankfulness and appreciation in all parts of your life, on regular basis for both the bigger and smaller things in our life.

When you concentrate on what you have, you will always have more. If you concentrate on what you don’t have, you will never have enough.

Life will be better if we develop an attitude of gratitude.

It is the fact that we all are receiving so many graces from the universe. The earth we walk upon, the air we breathe, the sunlight that falls on our skin creating vitamin D for us.

All of these are gifts of God. To be aware of the gift that we have received, this creates the attitude of gratitude.

There is a beautiful story…

One poet was sitting in his home, pondering over the deficiencies in his life,… not enough good clothes to wear, or delicious items to eat . 

When all of sudden he heard a knock on his door, he went up and opening it and his doorway he saw an astonishing sight,

There was a man with one leg missing.  He was holding himself up with the staff that he held in his arm. And the other arm was missing but this man had a string of toys hanging around his neck as a necklace. Actually he was selling toys.

The visitor said..  sir, I am a toy seller and  I am selling these wares , would you be interested in buying any item..

The poet moved to pity and with the utmost empathy for the perceive suffering of this toy sellers, he said …khilone-wala… don’t you feel bad about what you are missing in life..

The toy seller said..…sir, I just remember what I have leg and one arm. Also I have the opportunity  to sell these toys. I see them as object of happiness that brings the joys in the life of others.

So, I am perfectly happy in my life.

Is there something I can do for you?

The poet thought about it. Here am I, who has got a body that is completely intact. But I am repeatedly thinking about what I do not possess.

And here is someone with one arm and one leg missing and yet he is thanking god for his graces.

The lesson in the story is to remember the gift that we have received.

Everyday won’t be perfect, but focusing on what we are grateful for tends to wash away feelings of anger and negativity.

The recent studies show that feeling and expressing gratitude leads to better physical health. They  found that participants who kept a journal most days of the week, writing about 2-3 things they are grateful for had, reduced level of inflammation and improved heart rhythm compare to people who did not write in a journal.

And the journal keeper also showed a decrease risk of heart disease after only 2 months of this new routine.

Here is some tactics to develop this mindset…

  1. Wake up every day and express to yourself what you are grateful for..
  2. Tell whoever you are with right now the 3 things that you are most grateful for in this moments.
  3. Start gratitude journal – express gratitude in this journal every night by noting the things that you are grateful for in this moment,
  4. Acknowledge for what you have done and accomplished in the last day/week/month/year, instead of comparing yourself to others, give yourself credit for big or small things you have been doing.
  5. Acknowledge other people and thank them for inspiring/helping /supporting you. Often people wait their whole lives to be acknowledged  

So try adopting some of the above tactics even just one or two in order to develop an overall grateful mindset, it takes a bit of work but having an attitude of gratitude is one of the most impactful habits for fulfilling and healthy life.

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स्वस्थ रहना ज़रूरी है ….2

स्वस्थ रहना ज़रूरी है ….2

अच्छी सेहत का अर्थ है कि हम शारीरिक और मानसिक रूप से सेहतमंद है | हर कोई चाहता है स्वस्थ रहना क्योकि अच्छी सेहत किसी भी व्यक्ति के जीवन को व्यवस्थित रखती है |

आप  स्वयं  स्वस्थ रहेंगे तभी भौतिक वस्तुओं का उपभोग कर सकेंगे और ज़िन्दगी को आनंद के साथ जी सकेंगे |

जितना ज़रूरी अच्छी सेहत की आवश्यकता को जानना है उससे ज्यादा ज़रूरी है कि हम अपने को “स्वस्थ कैसे रख सकते है” | आइये कुछ बातों पर गौर करें जिसे अपना कर हम अपने जीवन को स्वस्थ और खुशहाल रख सकते है |

  • १. अच्छे स्वास्थ  के लिए सबसे आवश्यक है… रोज़ सुबह आप कम से कम ३० मिनट का नियमित व्यायाम करें, साथ साथ टहलना और थोड़ी योगा पर भी समय दे..

ऐसा करने से हम अपने को बहुत से शारीरिक समस्या से  दूर रह सकते है |

2. वैसे तो हर उम्र की अपनी समस्याएं होती है | लेकिन ४० वर्ष पश्चात् नियमित जांच साल में एक बार अवश्य कराएँ ताकि कोई भी बीमारी का प्रारंभिक अवस्था में ही पता लगाया जा सके  और उसका उचित इलाज किया जा सके |

 3. शुद्ध और पौष्टिक भोजन बहुत ज़रूरी है | इसके अलावा फल, सब्जी, दूध और  दही, का सेवन करे |

4. सुबह के कामो की आपाधापी में सुबह के नाश्ता को इगनोरे नहीं करे,  समय पर और संतुलित नाश्ता लें |

5. कोई बीमारी पता लगने पर तनाव लेने की बजाये नियमित दवाई ले, डॉक्टर के निर्देश का पालन करे  | मन को मजबूत बनायें व बीमारी को अपने पर हावी होने ना  दें |

6. तनाव लेना छोड़े | छोटी छोटी बातों पर तनाव लेने से बचें…चाहे नौकरी की समस्या हो या आर्थिक या फिर शारीरिक  …सबका कोई ना कोई हल है | समस्या सामने आने पर तनाव लेने के बजाए  समाधान ढूंढ कर उससे निपटने में अपनी उर्जा लगायें |

7. किसी भी तरह के दर्द या परेशानी को झेलते हुए सहनशीलता की मिसाल बनने की बजाए उसका डॉक्टर से निदान करवाएं |

8. अपनी भावनाओं को अपनों के साथ शेयर  करें | अगर कोई नहीं मिलता तो अपनी पर्सनल डायरी में लिख कर अभिव्यक्त करे | आप अपने को हल्का और प्रसन्न महसूस करेंगे |

9. दिमाग को शांत व चित को प्रसन्न रखने का प्रयास करें | इसके लिए मैडिटेशन और योगा को अपनाएँ |

10. मन को हमेशा सकारात्मक सोच व प्रसन्नता से भरा रखे तभी शारीर पूर्ण स्वस्थ रहेगा और दिमाग में व्यर्थ के नकारात्मक विचारों को न आने दें |

11. हर पल अपने आप को एक सन्देश देते रहें…. “मैं बिलकुल ठीक हूँ , मैं सब कुछ कर सकता हूँ, सब अच्छा होगा | आप सुबह सुबह affirmation और visualization का प्रैक्टिस करें |

12. नशीले पदार्थ का सेवन बिलकुल ना करें | और ऐसी कोई ऐसी आदत है तो धीरे धीरे कम करने का प्रयास करें |

12. सब कुछ ठीक होने पर भी कभी कभी स्वास्थ में विकार आ जाये तो परेशान, निराश, उदास नहीं होना चाहिए और ना ही हमेशा उसी के बारे में सोचना चाहिए बल्कि उसे जीवन का एक पड़ाव व हिस्सा मान  सहजता से स्वीकार करना चाहिए |

इसके आलावा भी आयुर्वेद के अनुसार बहुत सी खाने की चीज़ हमारे आस पास मौजूद है जिसको अपनी दिनचर्या में उपयोग कर हम अपने शारीर को निरोगी रख सकते है ..


किसी भी रूप में थोड़ा सा

आंवला हर रोज़ खाते रहे,

जीवन भर उच्च रक्तचाप

और हार्ट फेल नहीं होगा।

*मेथी *

मेथीदाना पीसकर रख ले।

एक चम्मच एक गिलास

पानी में उबाल कर नित्य पिए।

मीठा, नमक कुछ भी नहीं डाले।

इस से आंव नहीं बनेगी,

शुगर कंट्रोल रहेगी और

जोड़ो के दर्द नहीं होंगे

और पेट ठीक रहेगा।

 *नेत्र स्नान*

मुंह में पानी का कुल्ला भर कर

नेत्र धोये।

ऐसा दिन में तीन बार करे।

जब भी पानी के पास जाए

मुंह में पानी का कुल्ला भर ले

और नेत्रों पर पानी के छींटे मारे, धोये।

मुंह का पानी एक मिनट बाद

निकाल कर पुन: कुल्ला भर ले।

मुंह का पानी गर्म ना हो इसलिए

बार बार कुल्ला नया भरते रहे।

भोजन करने के बाद गीले हाथ

तौलिये से नहीं पोंछे।

आपस में दोनों हाथो को रगड़ कर

चेहरा व कानो तक मले।

इससे आरोग्य शक्ति बढ़ती हैं।

नेत्र ज्योति ठीक रहती हैं।


ऐसी आदत डाले के नित्य

शौच जाते समय दाँतो को

आपस में भींच कर रखे।

इस से दांत मज़बूत रहेंगे,

तथा लकवा नहीं होगा।


तेज और ओज बढ़ने के लिए

छाछ का निरंतर सेवन

बहुत हितकर हैं।

सुबह और दोपहर के भोजन में

नित्य छाछ का सेवन करे।

भोजन में पानी के स्थान पर

छाछ का उपयोग बहुत हितकर हैं।

*सरसों तेल*

सर्दियों में हल्का गर्म सरसों तेल

और गर्मियों में ठंडा सरसों तेल

तीन बूँद दोनों कान में

कभी कभी डालते रहे।

इस से कान स्वस्थ रहेंगे।


दिन में जब भी विश्राम करे तो

दाहिनी करवट ले कर सोएं। और

रात में बायीं करवट ले कर सोये।

दाहिनी करवट लेने से बायां स्वर

अर्थात चन्द्र नाड़ी चलेगी, और

बायीं करवट लेने से दाहिना स्वर

अर्थात सूर्य स्वर चलेगा।

*ताम्बे का पानी*

रात को ताम्बे के बर्तन में

रखा पानी सुबह उठते बिना

कुल्ला किये ही पिए,

निरंतर ऐसा करने से आप

कई रोगो से बचे रहेंगे।

ताम्बे के बर्तन में रखा जल

गंगा जल से भी अधिक

शक्तिशाली माना गया हैं।


सामान्य बुखार, फ्लू, जुकाम

और कफ से बचने के लिए

पीसी हुयी आधा चम्मच सौंठ

और ज़रा सा गुड एक गिलास पानी में

इतना उबाले के आधा पानी रह जाए।

रात को सोने से पहले यह पिए।

बदलते मौसम, सर्दी व वर्षा के

आरम्भ में यह पीना रोगो से बचाता हैं।

सौंठ नहीं हो तो अदरक का

इस्तेमाल कीजिये


चुटकी भर दालचीनी की फंकी

चाहे अकेले ही चाहे शहद के साथ

दिन में दो बार लेने से

टाइफाईड नहीं होता।


हर रोज़ कम से कम 15 से 20

मिनट मैडिटेशन ज़रूर करे।


रात को सोते समय नित्य

सरसों का तेल नाक में लगाये।

हर तीसरे दिन दो कली लहसुन

रात को भोजन के साथ ले।

प्रात: दस तुलसी के पत्ते और

पांच काली मिर्च नित्य चबाये।

सर्दी, बुखार, श्वांस रोग नहीं होगा।

नाक स्वस्थ रहेगी।


स्नान करने से आधा घंटा पहले

सर के ऊपरी हिस्से में

सरसों के तेल से मालिश करे।

इस से सर हल्का रहेगा,

मस्तिष्क ताज़ा रहेगा।

रात को सोने से पहले

पैर के तलवो, नाभि,

कान के पीछे और

गर्दन पर सरसों के तेल की

मालिश कर के सोएं।

निद्रा अच्छी आएगी,

मानसिक तनाव दूर होगा।

त्वचा मुलायम रहेगी।

सप्ताह में एक दिन पूरे शरीर में

मालिश ज़रूर करे।

 *योग और प्राणायाम*

नित्य कम से कम आधा घंटा

योग और प्राणायाम का

अभ्यास ज़रूर करे।


हर रोज़ एक छोटी हरड़

भोजन के बाद दाँतो तले रखे

और इसका रस धीरे धीरे

पेट में जाने दे।

जब काफी देर बाद ये हरड़

बिलकुल नरम पड़ जाए

तो चबा चबा कर निगल ले।

इस से आपके बाल कभी

सफ़ेद नहीं होंगे,

दांत 100 वर्ष तक निरोगी रहेंगे

और पेट के रोग नहीं होंगे।

 *सुबह की सैर*

सुबह सूर्य निकलने से पहले

पार्क या हरियाली वाली जगह पर

सैर करना सम्पूर्ण स्वस्थ्य के लिए

बहुत लाभदायक हैं।

इस समय हवा में प्राणवायु का

बहुत संचार रहता हैं।

जिसके सेवन से हमारा पूरा शरीर

रोग मुक्त रहता हैं और हमारी

रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती हैं।

 घी खाये मांस बढ़े,

अलसी खाये खोपड़ी,

दूध पिये शक्ति बढ़े,

भुला दे सबकी हेकड़ी।

तेल तड़का छोड़ कर

नित घूमन को जाय,

मधुमेह का नाश हो

जो जन अलसी खा |

इन सब बताये गए नियमों का पालन कर हम अपने शारीर और मन दोनों को स्वस्थ रख सकते है |

आप स्वस्थ रहे , प्रसन्नचित रहे , ऐसी कामना करता हूँ |

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तुम्हारा इंतज़ार है ….5

इश्क की उम्र नहीं होती …. ना ही दौर होता है

इश्क तो इश्क है …जब होता है बेहिसाब होता है

चाहे कितनी भी दुरी हो .. वो दिल के पास होता है

मिलने की कोई उम्मीद नहीं होती है ,  

फिर भी मिलने का इंतज़ार होता है …

अनामिका  अकेले में कुर्सी पर बैठ , अपनी आँखे मूंदें राजीव के बारे में सोच रही थी …तभी राजीव चुप – चाप सामने आकर खड़ा हो गया और अनामिका  के आँखे खुलने का इंतज़ार करने लगा |

तभी माँ ने आकर कहा …अनामिका  ! तुम कुर्सी पर बैठे – बैठे क्यों सो रही हो ?  अगर नींद आ रही है तो जाकर आराम से कमरे में सो जाओ |

अनामिका की तन्द्रा भंग हुई और चौक कर उसने  माँ की ओर देखा और सोचने लगी…क्या यह सपना था, जो मुझे महसूस हुआ था कि राजीव मेरे पास आ कर  खड़ा हो गया है  |

हाँ , यह सपना ही है | यह मुझे क्या हो गया है कि दिन में ही राजीव के सपने देखने लगी हूँ |

अनामिका के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई और वह अपने कुर्सी से उठी और  कमरे में सोने चली गई |

आज सुबह जब रश्मि  की नींद खुली तो देखी  कि अभी सुबह के पांच ही बज रहे है | उसे शायद ख़ुशी के कारण रात में ठीक से नींद नहीं आ सकी  |

एक अनजाना  सा डर  और दिल में ख़ुशी,  दोनों  का वह एक साथ अनुभव कर रही थी |

आज उसकी बरात आ रही थी …, उसका  होने वाला जीवन साथी आ रहा था | सच, घबराहट में रात में ठीक से नींद ही नहीं आयी |

रश्मि  कुछ सोचती हुई  अपने बिस्तर से उठी और सामने अलमीरा खोल कर स्नान के बाद पहनने के लिए कपडे  निकाल रही थी तभी उसकी नज़र अनामिका की लायी हुई गिफ्ट पर पड़ी |

वो ज़ल्दी से गिफ्ट को खोलकर उत्सुकता से  देखने लगी | गिफ्ट का पैकेट खोलते ही गिफ्ट देख कर वह उछल पड़ी… उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा |  

वो जिस गले की हार खरीदने के लिए पहले से तमन्ना की हुई थी ..वही हार आज अनामिका ने गिफ्ट किया था |

उसमे हीरे भी जड़ें हुए थे | वह उस हार को देख कर ख़ुशी से पागल हो गई और दौड़ कर अनामिका के कमरे में “थैंक यू”  कहने पहुँची |

लेकिन अनामिका उसे देख कर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी,  क्योकि डायरी वाली बात से अभी भी वह गुस्से में थी  | उसके रूखे व्यवहार से रश्मि को अजीब सा लगा | पहले तो कभी अनामिका उससे इस तरह पेश नहीं आयी थी |

तभी रश्मि की नज़र अपनी डायरी पर पड़ी जो अनामिका के तकिये के नीचे पड़ी थी |

रश्मि को यह समझते देर नहीं लगी कि  उसकी डायरी को अनामिका पढ़ चुकी है और सारी हकीकत पता चल चूका है |

अचानक वह अनामिका के पैर पकड़ ली और क्षमा मांगते हुए  कहा …मुझे माफ़ कर दो अनामिका | मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है | मैं  अपने प्यार में अंधी हो गई थी और अपने स्वार्थ के लिए तुम्हे बहुत दुःख पहुँचाया है |

अब बीती बातों को याद करने से क्या फायदा रश्मि | तुमने  जैसा चाहा वैसा कर दिया | जिसका परिणाम आज यह हुआ कि इससे ना तुम्हे कुछ हासिल हुआ ना मुझे  … .अनामिका ने  दुखी भरे स्वर में कहा |

ऐसा मत कहो अनामिका …, अगर मैंने तुम्हारा काम बिगाड़ा है तो मैं ही इसे सही करुँगी  | अब मैं किसी भी हालत में राजीव और तुम्हारे बीच की ग़लतफ़हमी को दूर करुँगी  |

अनामिका अपना पैर छुडा  रही थी लेकिन रश्मि छोड़ने का नाम नहीं ले रही थी ..बस एक ही बात कहे जा रही थी ….जब तक तुम मुझे माफ़ नहीं कर दोगी , मैं यहाँ से नहीं जाऊँगी |

सुबह सुबह घर के कुछ सदस्य भी जाग चुके थे, इसलिए अनामिका झमेला को आगे ना बढ़ाते हुए कहा …ठीक है रश्मि , मैं तुमको माफ़ करती हूँ और उसके माथे पर हाथ रख कर आशीर्वाद दी |

रश्मि के आँखों में आँसू छलक  आये और अनामिका के गले लग कर कुछ  देर यूँ ही रोती रही |

फिर दोनों अलग हुए तो रश्मि ने विनती भरे स्वर में कहा …..प्लीज  अनामिका,  इन सब बातों को राजीव  को मत बताना , वर्ना मैं उसकी नज़रों में हमेशा के लिए गिर जाउंगी और मैं उसका सामना भी नहीं कर पाऊँगी |

 तुम अपनी छोटी बहन की सभी गलतियों को माफ़ कर दो ….लड़की की बिदाई में तो सभी लोग आशीष देते है,  तुम बस मुझे  माफ़ कर दो |

रश्मि की भावपूर्ण बातें सुनकर अनामिका के आँखों में भी आँसू आ गए और उसकी सारी गलतियों को माफ़ कर उसे गले लगा लिया | सब कुछ सामान्य हो गया जैसे कुछ हुआ ही ना था |

घर में शादी का माहौल था | बहुत सारे सगे – सम्बन्धी एक जगह जमा हो तो मौज मस्ती अपने चरम सीमा  पर होती है |

सुबह से ही बड़े – बुजुर्ग, औरत – मर्द  विभिन्न तरह के रस्म निभाने में व्यस्त थे | तो वही जवान लड़के – लड़की अपने सबसे बेस्ट  ड्रेस का चुनाव  करने में बिजी थे ताकि आज बरात में  वो सबसे सुन्दर दिख सके |

लेकिन इसके विपरीत अनामिका को अपने कपड़ो का चुनाव करने और शादी के दिन क्या पहनना है इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी बल्कि उसके दिमाग में तो राजीव ने कब्ज़ा कर रखा था |

अनामिका ने तो मन ही मन पूरा प्लान सोच रखा था कि राजीव से जैसे ही सामना होगा , सबसे पहले उसे उसकी नौकरी के लिए बधाई दूंगी और फिर रश्मि द्वारा पैदा की गई ग़लतफ़हमी को दूर करुँगी |

शाम ढल चुकी थी और चारो तरफ अँधियारा घिर गया था |  तभी किसी ने आकर कहा …बाराती आ चुकी है, आप सभी लोग तैयार रहे …

राजीव अभी तक नहीं आया था और अनामिका की नज़रे राजीव को ही ढूंढ रही थी |

उसकी नज़रे दरवाजे पर गई और तभी उसके देखा …. बारातियों के स्वागत के लिए और  “समधी – मिलन” के लिए हाथो में माला लिए मामा, पिता जी और कुछ अन्य लोग खड़े थे |

अचानक अनामिका चौक पड़ी जब उसकी नज़र राजीव पर पड़ी …जो हाथ में माला लिए सभी लोगो के साथ बारातियों के स्वागत के लिए खड़ा था |

उसे देख कर अनामिका की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | तभी राजीव की नज़र उस पर पड़ी और  वह हाथ हिला कर इशारा किया |

चूँकि भीड़ ज्यादा थी और यह अवसर भी अलग था | इसलिए यहाँ राजीव से बात नहीं हो सकी |

तभी  बाजे – गाजे की आवाज़ सुनाई  दी  और फिर थोड़ी देर में  बारात आकर दरवाज़े पर लगी | पटाखों की गडगडाहट के बीच  में समधी मिलन का कार्यक्रम शुरू हुआ |

उसके बाद घर की औरतों ने रस्म के तहत दुल्हे का “गाल – सिकाई” और “चुमावन” किया | फिर उसने  देखा कि राजीव उस दुल्हे को उठा  कर मंडप तक ले आया | सभी लोग इस रस्म को देख कर आनंदित हो रहे थे |

उसके बाद बारातियों के स्वागत के लिए नास्ता और कोल्ड ड्रिंक्स सर्व किया जाने लगा |

अनामिका भी बारातियों के लिए नास्ता का पैकेट देने में सहयोग करने लगी |

इसी क्रम में राजीव का सामना अनामिका से हुआ और आपसी अभिवादन के साथ बातचीत शुरू हुई |

राजीव को अचानक सामने पाकर वह नर्वस हो गई और उसने जो प्लान बनाया था वो सब गड़बड़ हो गया और वो राजीव को बधाई देना ही भूल गई  |

तभी राजीव ने कहा …हेल्लो, कैसी हो अनामिका ?

मैं बिलकुल ठीक हूँ राजीव…..  अनामिका खुश होते हुए ज़बाब दिया |

तुम्हारी पढाई लिखाई कैसा चल रही  है ?…राजीव अनामिका से बातों के क्रम में पूछा |

मुझे  उम्मीद है कि फाइनल  की परीक्षा में  तुमसे ज्यादा अंक ला पाऊँगी ….बोल कर अनामिका हँसने लगी |

वैरी गुड़,  इंसान को ज़िन्दगी में तरक्की करने के लिए पढाई में स्पर्धा करना ज़रूरी है | मैं दुआ करता हूँ कि तुम जो चाहती हो वो सब तुमको मिले …राजीव ने कहा |

तुम बिलकुल गलत बोल रहे हो ? इसका मलतब मेरी इच्छा क्या है,  तुम्हे पता ही नहीं है ? …अनामिका ने राजीव कि तरफ देखते हुए कहा |

मुझे सब पता है अनामिका , लेकिन मुझे यह  मंज़ूर नहीं कि तुम अपने माँ बाप की इच्छा के विरूद्ध मेरी जीवन संगिनी बनो |

और अगर मैं अपने माता पिता को मना लूँ तो ? …अनामिका उसका मन टटोलने के लिए पूछा |

मैं तो पहले से ही तुम्हारा हूँ लेकिन शायद तुम्हे इसका अहसास नहीं है |   

ऐसा मत बोलो राजीव | कुछ परिस्थिति के कारण  हमारे बीच  गलफहमी पैदा हो गई थी और मैं तुम्हे आज तक गलत समझती रही |

आज सभी बातों का खुलासा हो गया और हमारे मन में तुम्हारे प्रति जो कटुता थी वह समाप्त हो चुकी है |

थैंक यू अनामिका …राजीव खुश होते हुए कहा |

मन के सारे भ्रम  और  गिले – शिकवे  अब दूर हो चुके थे |

आज शादी तो रश्मि की हो रही थी लेकिन सबसे ज्यादा खुश तो अनामिका थी |

ख़ुशी का कारण भी था …, जिसे वह अपना  सबसे बड़ा दुश्मन समझती थी,  राजीव मेरे मेडिकल में दाखिला लेने पर आज ख़ुशी ज़ाहिर की और उसने  एक सुन्दर सा ड्रेस भी मुझे गिफ्ट किया हैं …|  आज शादी के शुभ अवसर पर मैंने उसी ड्रेस को पहनने का फैसला किया है…..(.क्रमशः)

पलकों पे रूका है समंदर खुमार का

कितना अजीब नशा है तेरे इंतज़ार का

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तुम्हारा इंतज़ार है ….4

चाँद सितारों से तेरी ही बात करते हैं,
तनहाईयों में तुझे ही याद करते हैं,
तुम आओ या ना आओ मर्ज़ी तुम्हारी,
हम तो हर पल तुम्हारा इंतजार करते हैं। 

 शादी की तैयारी काफी जोरों से चल रही थी | आज  सुबह सुबह  अनामिका की माँ का फ़ोन आया |

माँ ने बताया कि शादी में शामिल होने के लिए वो पिता जी के साथ आज ही पटना मामा जी के घर  पहुँच रही है |  जब परिवार में शादी ब्याह का मौका होता है तो बहुत सारे रस्म –ओ –रिवाज़ निभाने पड़ते है  और कुछ रिवाज़ तो ऐसे होते है जिसमे ख़ास रिश्तेदार की अहम भूमिका होती है |

और फिर शादी तो लेने – देने और ख़ुशी मनाने का मौका होता है जिसमे अपने सामर्थ  के हिसाब से परिवार  वाले सहयोग करते है |

हमारे गाँव – घर में बेटी की शादी को एक यज्ञ के रूप में देखा जाता है जिसमे सभी लोग यथा – संभव अपना योगदान देकर पुण्य के भागी बनने का प्रयास करते है |

माँ से खबर पाकर अनामिका का मन ख़ुशी से झूम उठा | वह भी होस्टल से मामा के यहाँ जाने का निश्चय  कर ली ताकि माँ से भेट कर सके | माँ से अलग रह कर अनामिका को हमेशा माँ की चिंता लगी रहती है |

वैसे आज सोमवार का दिन था और लंच तक क्लास होना था | इसलिए उसके बाद ही जाना संभव हो सकेगा,  ऐसा सोच कर अनामिका सुबह सबसे पहले अपने कुछ कपडे  एक बैग में डाल ली  और साथ ही रश्मि के लिए जो एक गिफ्ट खरीद कर रखी  थी उसे भी अपने कपड़ो के साथ पैक कर ली | ताकि क्लास समाप्त होते ही तुरंत मामा के घर जाने को रवाना हो सके |

अनामिका कॉलेज चली गई और फिर पूर्व निर्धारित समय के अनुसार ठीक दो बजे कॉलेज की क्लास समाप्त होने पर अपने मामा के घर के लिए रवाना  हो गई |

अनामिका जैसे ही अपने मामा के घर में घुसी तो देखा…सामने आँगन में  कुछ औरतें बैठ कर शादी के गीत गा रही थी | माँ भी उनमे शामिल होकर साथ दे रही थी |

कुछ लड़कियां तो गीत की लय पर नाच रही थी,  आपस में हँसी – ठिठोली कर रही थी और एक दुसरे को छेड़ भी रही थी  |  पूरा माहौल मस्ती वाला था और  सभी औरतें इसका भरपूर मजे ले रही थी | यह सब देख कर अनामिका के चेहरे पर भी मुस्कान बिखर गई |

शादी ब्याह का माहौल ही ऐसा होता है कि सभी लोग अपनी अपनी परेशानियों को भूल कर सब के साथ ख़ुशी मनाते है और समय समय पर शादी के अवसर पर होने वाले विधि और रस्म पुरे उत्साह के साथ करते है | इसी तरह यह सिलसिला बारात के विदा होने तक चलता रहता है |

पिता जी ड्राइंग रूम में बैठ कर मामा जी से बातें कर रहे थे | पिता जी शायद कह रहे थे कि अगर अनामिका की मेडिकल की पढाई नहीं होती तो इसका ब्याह हम पहले ही कर चुके होते |

 जैसे ही अनामिका अपने पिता के सामने पहुँची , वे लोग चुप हो गए और अनामिका की ओर देखने लगे |

तभी अनामिका ने पिता और मामा जी के पैर छुए और पिता जी से पूछा …..आप कैसे है ?

मैं तो बिलकुल ठीक हूँ बेटी | लेकिन तुम्हारी माँ को यहाँ छोड़ कर आज ही लौट जाउँगा | अभी खेती – बारी का समय है इसलिए फिर बाद में आऊंगा …पिता जी ने ज़बाब दिया |

आज तो रुक जाइए… भले ही  कल चले जाइएगा | माँ तो कह रही थी कि आज रात में कोई ऐसा रस्म होना है , जिसके लिए माँ के साथ आप को भी रहना ज़रूरी …..अनामिका ने पिता जी को माँ द्वारा कही हुई बात को बता दी |

फिर तो पिता जी को अपनी सहमती देना ही था | पिता जी ने फिर पूछा …तुम्हारी पढाई कैसी चल रही है ?

बिलकुल ठीक पिता जी …अनामिका ने कहा |

पिता जी से बातें करने के बाद  अनामिका घर के भीतर गई तो देखा  कि रश्मि को हल्दी लगाने का रस्म चल रहा था और वह हल्दी से सराबोर थी | कुछ लोग जो रश्मि को हल्दी लगा रहे थे, वो आपस में एक दुसरे को भी  हल्दी लगा कर ठिठोली कर रहे थे |

उसी समय अनामिका रश्मि के पास जाकर शादी की बधाई देते हुए बोली….देख रश्मि,  तेरे लिए मैं क्या लाई हूँ | यह कहते हुए गिफ्ट उसकी  ओर बढाई  |

रश्मि अपने हल्दी से लथपथ हाथों को दिखाते  हुए बोली….अभी मेरे  हाथ गंदे है,  इसलिए तुम  ऐसा करो कि इसे मेरे अलमारी में रख दो ,मैं इधर से फ्री होकर तुम्हारे स्पेशल गिफ्ट को  देखूँगी |

ठीक है .., अनामिका ने कहा और कमरे में आकर अपने साथ लाए हुए गिफ्ट को उसके अलमारी में रखने लगी |

चूँकि गिफ्ट कीमती थी इसलिए अलमीरा के लॉकर में  रखना उचित होगा | ऐसा सोच कर अनामिका ने चाभी लगा कर लॉकर खोला, तभी उसमे से रश्मि की  पर्सनल डायरी सरक कर नीचे  गिर गई |

अनामिका ने वापस रखने के लिए वह डायरी उठाई तभी हवा से उसके कुछ पन्ने खुल गए और अनामिका ने सरसरी निगाह उस पर डाली तो देखा कि इसमें उसके और राजीव के बारे में कुछ बातें लिखी हुई है | उसकी उत्सुकता बढ़ गई | उसके मन में आया कि उसे भी पता हो कि रश्मि  उसके और मेरे बारे में क्या लिखी है |

अनामिका ने डायरी को छुप कर पढने का निर्णय किया और इसलिए डायरी को अपने पास  छुपा कर रख ली | अलमीरा को पहले की तरह बंद कर दिया और फिर वह कमरे से  बाहर  आ गई |

अनामिका एकांत जगह की तलाश  में अपनी नज़रे इधर उधर घुमाई | लेकिन ऐसे माहौल में कोई   शांत जगह नज़र नहीं आया तो धीरे से वह छत पर चली गई |

जब  डायरी पढना शुरू किया तो उसकी नज़रे फटी की फटी रह गई …उसे तो विश्वास नहीं हो रहा था कि वह रश्मि जिसे  वो  अपनी  छोटी बहन ही नहीं बल्कि अपनी राजदार समझती थी और अपने दिल की हर बात बताती थी वह उसके साथ इतना बड़ा धोखा कर सकती है |

उसे यह सोच कर और भी दुःख हुआ कि यह जानते हुए भी कि मैं राजीव से प्रेम करती हूँ और उसे हर हाल में पाना चाहती हूँ….वह खुद राजीव से मन ही मन प्यार करने लगी |

और तो और हमारे और राजीव के बीच  में गलफहमी और कटुता को बढाने  के लिए षड़यंत्र के तहत बहुत सारी झूठी बातें फैलाई ताकि हम दोनों के बीच में दुरी बढ़े और एक दुसरे से नफरत करने लगे |

उसी का यह परिणाम रहा कि आज तक मैं राजीव को गलत समझती रही,  जब कि डायरी पढने से यह राज़  उजागर हुआ कि उसने रश्मि के माध्यम से मेरी सफलता पर बधाई भी दी थी लेकिन रश्मि ने इस बात को भी छुपा लिया ..और मैं समझती रही कि जलन के कारण उसने मुझे बधाई नहीं दी  |

डायरी पढने से यह बात भी  साफ़ हो गया था कि राजीव तो उससे बहुत प्यार करता है |

….. लेकिन वह जानता था कि अगर बात शादी पर आयी तो उसके माँ बाप इसके लिए हरगिज़ राज़ी नहीं होंगे | एक तो जाति का बंधन और दुसरे, वो ठहरे गाँव के इज्जतदार और प्रतिष्ठित लोग….

वे कभी भी अपनी एकलौती बेटी के लिए यह  रिश्ता पसंद नहीं करेंगे ….तब ऐसी परिस्थिति में एक ही रास्ता बचता था और वो था … घर वालों के विरुद्ध शादी करना और घर परिवार और समाज से कट जाना |

और तब ऐसी परिस्थिति में ना सिर्फ उसका बल्कि अनामिका की भी  ज़िन्दगी कठिनाइयों और दुखो से भर जाता |

राजीव नहीं चाहता था कि अपने क्षणिक प्यार और स्वार्थ के लिए अनामिका के ज़िन्दगी को नरक बना दिया जाए ..और उसे ज़िन्दगी भर रोने के लिए मजबूर कर दिया जाए |

इन्ही सब भविष्य की बातों को सोच  कर राजीव इस  निष्कर्ष पर  पहुँचा कि अगर अनामिका पढ़ लिख कर अपने पैरो पर खड़ा हो जाए औए ऊँचे पद पर पहुँच जाए तो ऐसी स्थिति में घर परिवार और  समाज …शायद उसके निर्णय को स्वीकार कर लेंगे |

अतः यही सोच कर शुरू में उसने अनामिका के स्वाभिमान को जगाया था और उसके अनुमान के अनुसार ही अनामिका दिल पर चोट खाकर अपने दृढ इरादों से नई  उचाईयों को हासिल  करने में लग गई |

रश्मि के डायरी में वह लेटर भी मिला जिसमे मेडिकल में दाखिला के लिए बधाई दिया हुआ था | वह लेटर भी रश्मि ने छुपा ली और मुझे नहीं दी | ऐसे बहुत सारी बातों  का खुलासा इस डायरी से हो रहा था |

यह सब देख कर अनामिका को अपनी बहन पर बहुत गुस्सा आ रहा था लेकिन ऐसे शादी वाले माहौल में कुछ अपशब्द बोलना उचित नहीं था और बीती बातों को कुरेदने से कोई फायदा भी नहीं होने वाला था |

लेकिन इसका मतलब साफ़ है कि राजीव बेहद  संवेदनशील इंसान है और वह अब भी मुझे उतना ही प्यार करता है | ऐसा सोच कर अनामिका के मन में जो नफरत राजीव के विरूद्ध पनप रही थी उसे भी उसने ख़त्म कर दिया | अब अनामिका को राजीव से मिलने की तीव्र इच्छा हो रही थी |

ये कह कह के हम दिल को समझा रहे है
कि वो अब चल चुके, वो अब आ रहे है।

आज वो दिन आ ही गया जिसका अनामिका को बेसब्री  से इंतज़ार था | जी हाँ .. आज रश्मि की बरात आने वाली थी और सबसे बड़ी बात कि राजीव भी आज ही आ रहा था |

अनामिका ने तो पूरा प्लान सोच रखा था कि राजीव से जैसे ही सामना होगा , सबसे पहले उसे उसकी नौकरी के लिए बधाई दूंगी और फिर रश्मि द्वारा पैदा की गई ग़लतफ़हमी को दूर करुँगी |

अनामिका  अकेले में कुर्सी पर बैठे आँखे मूंदे यह सब सोच रही थी …तभी राजीव चुप चाप सामने आकर खड़ा हो गया और अनामिका के आँखे खुलने का इंतज़ार करने लगा ………(क्रमशः )

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तुम्हारा इंतज़ार है …3

पिता जी से अपनी आगे की पढाई जारी रखने की सहमती  मिलते ही अनामिका के चेहरे पर मुस्कान तो आई लेकिन उस मुस्कान के पीछे बहुत बड़ा राज़ छिपा था जिसे सिर्फ अनामिका का दिल ही जानता था |

वह पिता जी से आशीर्वाद प्राप्त कर अपने कमरे में आ गई और अपने कपडे और किताबें समेटने लगी | अब तो उसे पटना के किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन लेना ही था |

यह सत्य है कि राजीव के द्वारा जो मेरे दिल पर जख्म दिया गया है वह बराबर टीसता  रहता है  | शायद यह ज़ख्म तभी भरेगा जब ज़िन्दगी में मैं बड़ा मुकाम  हासिल ना कर लूँ…अनामिका मन ही मन सोच रही थी |

मुझे राजीव से भी पढाई में आगे निकलना  होगा तभी राजीव के सामने सिर उठा कर कह सकुंगी कि  देखो …जिसे तुम जाहिल – अनपढ़ समझ कर ठुकरा दिया था वह तुमसे भी आगे निकल चुकी है और समाज में इज्जत प्रतिष्ठा में तुमसे भी आगे है |

तुमने मेरे अंतरात्मा को ललकारा  है और जब एक औरत कुछ ठान लेती है तो उसे पूरा करने के लिए वह हर तरह की  मुसीबतों  का मुकाबला कर सकती है,  शायद मुझमे भी वो शक्ति मौजूद है |

तभी तो मैं राजीव के दुत्कार से रोने के बजाये मैं अपने जीवन में एक कड़ा  फैसला ले चुकी हूँ और वह यह कि अपने को इस समाज में उससे भी बड़ा बन कर दिखाना |  भगवान् मेरी  सहायता ज़रूर करेंगे |

वह अपने मन में पता नहीं और क्या क्या सोच  कर रही थी तभी माँ कमरे में आयी और कहा  …तुम पटना कब जाना चाहती हो बेटी  ?

मैं कल ही जाना चाहती हूँ माँ …अनामिका ने दृढ निश्चय से कहा |

तुम चली जाओगी तो मेरा मन नहीं लगेगा |  तुमसे बातें करके  मेरा दिन भर का थकान मिट जाता है …माँ  ने दुखी स्वर में  कहा |

पढाई करनी है तो जाना पड़ेगा ना माँ | वैसे बीच – बीच में तुमसे मिलने तो आती ही रहूंगी …अनामिका माँ के दुःख को महसूस कर रही थी |

तुम ठीक कहती हो, वैसे भी बच्चो की ख़ुशी से बढ़ कर माँ बाप के लिए कोई और ख़ुशी नहीं होती है | मैं चाहती हूँ .., तू जहाँ भी रहो,  खुश रहो  |

आज वो दिन भी आ गया |  पटना के साइंस कॉलेज में अनामिका को दाखिला मिल ही गया  | पटना के प्रतिष्ठित कॉलेज में  दाखिला  मिलने पर अनामिका बहुत खुश थी |

उसने सोचा था कि कॉलेज में दाखिला मिलने पर राजीव बधाई देने ज़रूर आएगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ | लगता है जैसे राजीव अपने होस्टल से घर आना ही छोड़ दिया है |

 अनामिका को अपना वह संकल्प सदा याद रहता  है और वह उसे पूरा करने की दिशा में आज {कॉलेज में दाखिला लेकर)  पहला कदम रख चुकी है | अब तो उसे मेडिकल कॉलेज में दाखिला के लिए तैयारी करनी है  और एक बड़ा डॉक्टर बनना है,  तभी तो समाज में एक इंजिनियर से ज्यादा नाम और प्रतिष्ठा उसे मिल  पायेगी |

अनामिका अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए  रात दिन मिहनत करने लगी | पढाई के अलावा उसने अपने सारे शौक और मौजमस्ती  छोड़ चुकी थी |

उसमे यह बदलाव देख कर  घर वाले तो चकित थे ही, खास कर पिता जी तो बातों बातों में अनामिका से कह भी दिया था …., इतनी सीरियस पढाई करने की क्या ज़रुरत है | कुछ दिनों के बाद तो शादी करके तुझे चूल्हा – चौकी ही संभालना है |

परन्तु अनामिका कुछ ज़बाब नहीं दे सकी बल्कि मन ही मन अपने संकल्प को दुहराती रहती, जो अपने पिता को भी नहीं बता पाती थी  |

 अनामिका की  ज़िन्दगी में शायद किसी ने पहली बार उसके दिल को ठेस पहुंचाई थी | राजीव को तो इसका उचित ज़बाब देना ही होगा |

    अनामिका के मिहनत में उसकी छोटी बहन रश्मि का भी बड़ा योगदान  रहता है,  वह हर कदम उसकी ज़रुरत के समय मदद करती है और रश्मि को  भी अनामिका के साथ रहने का एक फायदा हुआ है …उसकी पढाई भी सुधर गई है और वो भी अपने क्लास में अच्छे अंक लाने लगी है |

इससे मामा मामी भी बहुत खुश थे और अनामिका का विशेष ध्यान रखते थे |

समय भी कितनी तेज़ी गुजर जाती है | आज अनामिका का मेहनत  रंग लाई और पहले ही प्रयास में  वो मेडिकल में दाखिला के लिए क्वालीफाई कर गई |

घर में ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | गाँव में पहली बार कोई मेडिकल की पढाई करने जा रही थी | राजेश्वर सिंह जी ने इस ख़ुशी में पुरे गाँव में मिठाई बंटवाई | इस सफलता पर पूरा गाँव खुश था |

इस बार भी अनामिका ने सोचा था कि राजीव इतनी बड़ी सफलता पर तो ज़रूर बधाई देगा , परन्तु इस बार भी ऐसा कुछ नहीं हुआ |

अनामिका को बुरा तो लगा लेकिन उसके इरादे में रत्ती भर भी कमी नहीं आयी | और आगे भी उसने इसी तरह से मिहनत  जारी  रखने की ठान ली थी |

राजीव के बारे में जानकारी रश्मि से मिल जाया करती थी, लेकिन यह संयोग ही था कि इतने दिनों में एक बार भी राजीव से सामना नहीं हो सका  |

चाहे कितना भी कोशिश करती हूँ कि उसके बारे में नहीं सोचूं ..,लेकिन पता नहीं क्यों, ऐसा कोई दिन भी नहीं जाता जिस दिन उसे याद नहीं किया हो ..पता नहीं यह  कैसा  अनजाना  बंधन है…वह मन ही मन सोच रही थी और अपने सभी सामान बक्शे में पैक कर रही थी |

अनामिका को कॉलेज होस्टल मिल गया था और कल ही उसे शिफ्ट भी करना था |

 इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि अनामिका का भी पटना मेडिकल  कॉलेज में दाखिला मिला था जो राजीव के इंजीनियरिंग  कॉलेज से मात्र ५०० मीटर के फासले पर था | लेकिन दिलों की दुरी शायद इससे बहुत ज्यादा थी , इसीलिए तो पिछली घटना के बाद एक बार भी आपसी मुलाकात नहीं हो सकी  |

सच कहूँ तो ऊपर से चाहे कितना भी नफरत करूँ  लेकिन सच्चाई यही  है कि राजीव की सादगी आकर्षित करती थी मुझे |…लेकिन अब इन सब बातों से क्या फायदा | जो हकीकत है उसी का सामना करना होगा  मुझे |

मुझको जाहिल – अनपढ़ समझने वाले को यह बतलाना चाहती हूँ  कि जब मैं  कोई भी चीज़ ठान लेती हूँ तो उसे पूरा करके  ही छोडती हूँ |

समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहे थे  और देखते देखते राजीव की  इंजीनियरिंग की पढाई पूरी हो गई | वैसे पढने में तेज़ और मेहनती  तो था ही |  इसलिए तुरंत ही कैम्पस  सिलेक्शन भी हो गया |

पता चला है कि बोकारो स्टील प्लांट में ज्वाइन भी कर लिया है | चलो अच्छा हुआ | वो जो चाहता था उसे मिल गया है | अगर कभी मेरा उसका सामना हुआ तो बधाई ज़रूर दूंगी |  मैं उसकी तरह घमंडी नहीं हूँ |

समय तो जैसे तेज़ी से गतिमान है .. इसी बीच एक और ख़ुशी की बात हुई कि मेरी ममेरी बहन रश्मि की शादी भी तय हो गई और एक माह  के बाद ही शादी होनी है |

घर वाले तो सभी खुश थे लेकिन मुझे एक सहेली के दूर हो जाने का दुःख हो रहा था | लेकिन अगर किसी का घर बसता  है तो हमलोगों को ख़ुशी तो होनी ही चाहिए |

मैं आज ही  होस्टल से मामा जी के यहाँ आई थी  | शादी की तैयारी  जोरों से  चल रही थी  और ऐसे  मौके पर बहुत सारे काम होते है जिसमे सहयोग किया जा सकता है |

हालाँकि रश्मि शादी करने को तैयार नहीं हो रही थी |  पता नहीं उसके मन में क्या  चल रहा था | लेकिन माँ बाप की  इच्छा का विरोध नहीं कर सकी और दबाब के कारण  तैयार हुई थी |

राजीव के माता पिता लगभग रोज ही आते थे और घर के बहुत सारे कामो में अपना सहयोग देते | शादी में उनको निमंत्रण देना तो अनिवार्य था |

रश्मि से ही पता चला कि राजीव भी छुट्टी लेकर आ रहा है | आता क्यों नहीं, वह मामा – मामी की बहुत इज्जत करता है और रश्मि से भी उसकी दोस्ती है |

अब तो इंतज़ार है कब राजीव से सामना हो और  उसे उसकी उपलब्धि पर बधाई देकर उसे एहसास दिला सकूँ कि मेरी  सोच तुमसे बिलकुल अलग है |

तुमने तो कभी भी मुझे बधाई नहीं दी | लेकिन यह भी सच है कि आज जो कुछ  मैं बनने जा रही हूँ इसके जिम्मेवार भी तुम ही हो …(क्रमशः)

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तुम्हारा इंतज़ार है …2

आज सुबह जब अनामिका  सो कर उठी तो उसका मन यह सोच कर खुश हो रहा था  कि आज तो मामा के यहाँ पटना जाना है और वहाँ एक साल के अंतराल के बाद राजीव को  देख पाऊँगी |

कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब उसे मैं याद नहीं करती | पता नहीं यह क्या हो गाया है मुझे …. अनामिका  नास्ता करते हुए सोच रही थी |

कहीं मैंने  किताबों में पढ़ा था कि इंसान अपना  पहला प्यार भुलाये नहीं भूलता | ऐसा ही कुछ मेरा भी हाल हो गया है….वह नास्ता तो कर रही थी लेकिन उसका  ध्यान कही और था, जिसे माँ को भी महसूस हो रहा था और उसने टोकते हुए कहा ….तुम्हारा ध्यान कहाँ है बेटी |

तुम हमेशा खोई खोई क्यों रहती हो ?

अनामिका ने माँ के बात को टालते हुए कहा …कुछ भी नहीं माँ | मैं बिलकुल ठीक हूँ |

वह नास्ता कर ही रही थी कि पिता जी कि आवाज़ आयी |  ट्रेन का समय हो रहा है और स्टेशन पर गाड़ी सिर्फ पांच मिनट ठहरती है , इसलिए जल्दी तैयार हो जाओ ताकि समय पर स्टेशन पहुँच सके |

जी पिजा जी …, अनामिका जल्दी से नास्ता समाप्त कर पानी पीते हुए कहा |

ट्रेन सही समय पर थी और करीब एक बजे दिन में वे लोग पटना पहुँच गए  |

राजेश्वर सिंह को दरअसल खेती से फुर्सत नहीं था अतः वे अनामिका को यहाँ छोड़ कर तुरंत ही लौटती गाड़ी  से वापस चले आये |

अनामिका  यहाँ आकर बहुत खुश लग रही थी और उसकी नज़रे पडोस  के मकान में राजीव को ढूंढ  रही थी | लेकिन वह कही दिख नहीं रहा था |

जब अनामिका  लंच कर रही थी तो वह  सब से नज़रे बचा कर अपनी ममेरी बहन रश्मि  से पूछ ही  लिया ….राजीव कही नहीं दिख रहा है ?

वो तो आज कल होस्टल में रहते है | उनका  इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया है … रश्मि ने बताया |

इतना सुनना था कि अनामिका  का मन उसे एक नज़र देखने को बेचैन हो उठा |

रश्मि को पहले से ही पता था कि अनामिका के दिल में क्या चल रहा है | इसलिए उसके बेचैन मन को तसल्ली देने के लिए वह बोली …कल हमारे घर पूजा है और उसके परिवार वाले सभी आयेंगे |  शायद राजीव भैया भी कॉलेज से छुट्टी लेकर आयेंगे |

इतना सुनकर अनामिका के मन में  थोड़ी तसल्ली हुई और कल के दिन का बेसब्री से इंतज़ार करने लगी |

लगभग एक साल से अनामिका का यह एक तरफ़ा प्यार चल रहा था और एक साल के बाद आज मिलने का मौका भी मिल रहा था |

उसने तो मन ही मन सोच लिया था कि इस बार हिम्मत जुटा  कर उससे  कह दूंगी कि मैं तुमसे  प्यार करती हूँ और उम्र भर तुम्हारे  साथ रहना चाहती हूँ |

घर पर सत्यनारायण भगवान् की कथा चल रही थी | घर के सभी लोग पूजा में व्यस्त थे और अनामिका के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उसने राजीव को यहाँ  घर की तरफ  आते देखा |

राजीव उसको देख कर मुस्कुराया भी और आकर पूजा में सबों के साथ बैठ गया |

 सब लोग का ध्यान पूजा में था लेकिन अनामिका  बार बार राजीव को ही देखे जा रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि किसी ना किसी को तो इसकी पहल करनी ही पड़ेगी |

पूजा समाप्त होते ही वो राजीव को अकेला पाकर प्रसाद देने के बहाने उसके पास पहुँच गई |

राजीव को प्रसाद  दिया और खुद भी उसी  के पास बैठ कर प्रसाद खाने लगी |

बातों बातों में हिम्मत करके अनामिका ने अपने मन की बात कह दी …राजीव , मैं तुमसे प्यार करती हूँ  क्या तुम भी ….??

राजीव ने  पूरी बात सुनने से पहले ही कहा…तुम पागल हो क्या ? मैं तुमसे प्यार कैसे कर सकता हूँ …तुम कहाँ और मैं कहाँ |  ..तुम एक गाँव में पढने वाली लड़की और बहुत पढ़ोगी तो दसवीं कक्षा तक ही | तुम्हारे गाँव में तो कॉलेज भी नहीं है |

अपने आप को  इस काबिल  मत समझो तुम  | मुझे ज़िन्दगी में बहुत आगे जाना है | इन सब चक्करों में पड़ कर अपनी ज़िन्दगी ख़राब नहीं करनी मुझे |

तुमसे हंस कर दो बातें  क्या कर ली,  तुम तो इसे प्यार समझ बैठी | मैं जैसे तुमसे बात करता हूँ वैसे ही सब से करता हूँ |

अनामिका को जैसे लगा उसके चेहरे पर किसी ने तेजाब फेक दिया हो ……जिसमे उसका चेहरा ही नहीं झुलसा बल्कि सारे अरमान भी झुलस गए है |

उसे समझ में आ गया कि इन्जिनीरिंग कॉलेज में पढने  के बाद राजीव का इरादा बदल गया है |

 वहाँ इसकी पसंद की बहुत सारी ज्यादा पढ़ी लिखी लड़कियां मिल जाएँगी जिसे वह जीवन साथी बनाने की सोच सकता है |

राजीव के इनकार भरी बातें  सुनने के बाद उससे और आगे बात करने की उसकी हिम्मत नहीं हुई |

रात जागते हुए कैसे बीत गई उसे पता नहीं चला |

अगली सुबह अनामिका  उठी तो लगा एक साल पहले से जो सपना देख रही थी वो एक दम से अचानक टूट गई और अनामिका भी बिखर गयी थी उन टूटे हुए सपनो के साथ | भींगा हुआ तकिया भी इसकी पुष्टि कर रही थी |

अब तक तो जिस चीज़ पर वो  हाथ रख देती थी,   माँ – बाप पलक झपकते ही उसे लाकर देते थे लेकिन यह तो प्यार का सौदा था ,एक जिद का सौदा था ..जिसे खुद ही तय करना होगा |

मामा जी आज ही अनामिका को वापस गाँव छोड़ने जा रहे थे | अनामिका उनके साथ गाँव जा तो रही थी  लेकिन एक संकल्प के साथ ,… वह मन ही मन एक संकल्प ले चुकी थी  …यही राजीव एक दिन चल कर उसके पास आएगा और मेरा हाथ मुझसे ही मांगेगा….

ट्रेन अपनी तेज़ गति से गंतव्य स्थान की ओर बढ़ रही थी और अनामिका  आँखे बंद किये अपने संकल्प को बार बार याद कर रही थी |

अनामिका अपने घर जैसे ही पहुँची ,पिताजी उसके पास आये और सिर पर हाथ रखते हुए बोले …तुम्हारा स्कूल का रिजल्ट कल ही निकला है और तुम क्लास में सबसे ज्यादा अंक लाई  हो |

मास्टर साहब तुम्हारी खूब तारीफ कर रहे थे | तुमने तो घर का मान प्रतिष्ठा बढ़ा दिया है बेटी | तुमने बेटी होकर भी लड़कों से ज्यादा अंक प्राप्त किया है |

अनामिका पिता जी के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लिया और कहा …पिता जी आप से एक अनुरोध करना चाहती  हूँ .|

हाँ – हाँ, बोलो बेटी .., क्या कहना चाहती हो ?…राजेश्वर सिंह उसकी ओर देखते हुआ कहा |

पिता जी मैं आगे भी पढाई जारी रखना चाहती हूँ | अपने गाँव में तो कॉलेज नही है इसलिए मुझे पटना के किसी कॉलेज में दाखिला दिलवा दीजिये ….अनामिका अपना  सिर झुकाए पिता जी से अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रही थी |

लेकिन तुम्हे आगे पढाई करने की ज़रुरत क्या है बेटी , कौन सा तुम्हे नौकरी करनी है | घर गृहस्थी का काम सिख लो,  यही तुम्हारे काम आयेंगे ……पिता जी ने उसे समझाते हुए कहा |

नहीं पिता जी,  मुझे आगे पढने की इच्छा है और आप से सहयोग चाहती हूँ …अनामिका विनती भरे लहजे में कहा |

मैंने आज तक तेरी हर इच्छा पूरी की है |  वैसे हमारे पास धन दौलत की कोई कमी नहीं है |

तू तो अपना शादी करके घर बसा ले | तुम्हारे सिवा तो मेरा और कोई नहीं है | तुम्हारी ख़ुशी में ही हमारी ख़ुशी है |

इसीलिए तो कहती हूँ पिताजी, कि मेरी ख़ुशी के लिए मान जाइये ….अनामिका पिता की ओर दयनीय दृष्टी से देखते हुए कहा |

पिता जी बड़ी असमंजस में पड़  गए, और मन ही मन  बोलने लगे …मेरे गाँव की कोई लड़की कॉलेज नहीं गई  और इसीलिए तो यहाँ आज तक कॉलेज नहीं खुला है | शहर पढाई के लिए अकेला कैसे जाने दूँ |

उनकी मनःस्थिति को देख कर अनामिका के मामा  ने कहा …अनामिका चाहे तो मेरे घर पर रह कर कॉलेज की पढाई कर सकती है और वहाँ मन लगाने के लिए इसकी बहन रश्मि भी है | आप निश्चिन्त होकर पटना में दाखिला दिलवा दीजिये |

उनकी बात सुनकर राजेश्वर सिंह अंत में अनामिका की बात मान गए और पटना भेजने के लिए राज़ी हो गए |

पिता जी की सहमती देते ही अनामिका के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | अब उसको लग रहा था  कि  जो संकल्प  उसने लिया है उसे पूरा करने के लिए सही दिशा में कदम बढ़ा चुकी है .. /…(क्रमशः)   

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तुम्हारा इंतज़ार है ….1

अनामिका , एक खुशमिजाज जिंदादिल और चुलबुली लड़की थी | अपनी सहेलियों में काफी लोकप्रिय और सबके चेहरे पर मुस्कराहट लाने का हुनर था उसमे |  गाँव के माहौल में रहते हुए भी  खुले विचारो वाली थी इसीलिए उसके कुछ अलग तरह के शौक थे |

उसे दुसरे लड़कियों की तरह ,खाना बनाना या गुड्डे गुडियो का खेल और  घरौंदा बनाने में रूचि  नहीं थी  बल्कि उसे डांस करना , गाना गाना जैसे hobby पसंद थे |

वह हमेशा  खुश रहती थी और रहे भी क्यों नहीं,  माँ बाप की अकेली संतान |

उसके पिता राजेश्वर सिंह  गाँव के बड़े किसान, ऊँची जाती और धन की कोई कमी नहीं | जो कुछ भी फरमाईस करती पलक झपकते उसकी इच्छा को पूरा  कर दिया जाता | अनामिका को ऐसा लगता कि उसकी  जो भी  इच्छा हो  उसे वह पा सकती है |

समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहे थे,  अनामिका देखत देखते बचपन की यादों को संजोये जवानी की दहलीज़ पर कदम रख चुकी थी |

उसके पिता राजेश्वर सिंह सुखी संपन्न थे | उन्हें किसी चीज़ की कमी नहीं थी | भगवान् की दया से अच्छी खेती – बारी तो थी ही,  घर में फूल कुमारी जैसी सुन्दर बेटी भी भगवान् ने दी थी |

अगर कुछ कमी थी तो इस बात की  कि उनका गाँव भुसावल  हर मायनों में पिछड़ा होने के साथ साथ  बहुत ही खतरनाक इलाके में था |  इस क्षेत्र में नक्सलवाद पनप  रहा था |

गाँव कुछ इस तरह बदनाम था कि इस गाँव में कोई भी अपने बेटे या बेटी की शादी नहीं करना चाहता था |

कभी कभी इन्सान वक़्त के हाथो मजबूर  हो जाता है | सोचता कुछ है और हो कुछ और जाता है |

अनामिका के स्कूल की गर्मियों की छुट्टी हो गई थी और इस  साल अनामिका इन छुट्टियों  को अपने मामा के यहाँ पटना में बिताने का फैसला किया और पिता जी मान भी गए |

सचमुच पटना का माहौल उसके गाँव के माहौल से बिलकुल भिन्न था | यहाँ बड़े बड़े मॉल, मार्किट , सिनेमाघर और बहुत कुछ मनोरंजन के साधन थे |

गाँव के मुकाबले यहाँ इस शहर की चकाचौंध में  उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | घर में भी सभी लोग उसे बहुत प्यार करते थे | खासकर मामी तो माँ से भी ज्यादा ख्याल रखती थी |

और उससे भी बड़ी बात कि मामा की लड़की  रश्मि भी थी | वह उम्र में तो  छोटी थी परन्तु वह उसकी ख़ास सहेली थी |   दोनों का खेलना, खाना और मस्ती करना सब साथ साथ होता |

इसी तरह  छुट्टी का एक महिना कैसे बीत गया , उसे पता ही नहीं चला |

इन्ही एक महिना में  यहाँ रहने के दौरान अनामिका की मुलाकात  राजीव से हुई | राजीव के पिता एक  सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे और पडोस में ही किराये के मकान में रहते थे | राजीव उनका इकलौता संतान था और  उसके परिवार का इस घर में आना जाना था |

राजीव था तो बहुत ही शर्मीला परन्तु देखने में बहुत सुन्दर और पढने में भी तेज़ था |

अनामिका की  उम्र जवानी  में दस्तक दे चुकी थी और इस उम्र में किसी के प्रति आकर्षित हो जाना कोई अचरज की बात नहीं थी |

अनामिका छुट्टी बिता कर अपने मामा के पास से अपने गाँव आ गई , लेकिन वो  कुछ गुमसुम रहने लगी थी | उसे किसी काम में मन नहीं लगता था |

उसे राजीव भा गया था और वह उससे मन ही मन प्यार करने लगी थी | लेकिन मुसीबत यह थी  कि राजीव इन सब बातों से  अनभिज्ञ था और उसका ध्यान ज्यादातर पढाई पर ही लगा रहता |

आपस में बातचीत तो बहुत होती लेकिन अनामिका को अपने मन की बात कहने की कभी  हिम्मत ही नहीं हुई |

उस ज़माने में अगर किसी लड़की को  कोई लड़का भा गया तो वह मन ही मन प्यार तो कर सकती  थी परन्तु किसी को प्यार के बारे में बताने की हिम्मत नहीं कर पाती थी | क्योकि इसमें ना केवल उसका मजाक बनने का खतरा रहता था बल्कि उसके चरित्र  पर भी ऊँगली उठने  लगते थे |

और दूसरी बात कि पिता जी का भी डर मन में सदा बना रहता था |

तो बस प्यार को मन में रखो और बताओ भी मत | यह उम्र ही कुछ ऐसी थी  कि ज्यादा प्यार के बारे में उसे पता नहीं था, बस ये था कि उसे राजीव  पसंद है |

इधर राजीव इन सब बातों से अनभिज्ञ अपने पढाई पर ध्यान दे रहा था | वो तो बस अपने कैरियर  के प्रति काफी सजग था | उसे पढ़ लिख कर बड़ा इंजिनियर जो  बनना था और अपने माँ बाप के बुढ़ापे का सहारा भी |

वह अक्सर सोचा करता कि मैं ही अपने परिवार का एक मात्र सहारा हूँ और वैसे भी पिता जी बहुत जल्द  रिटायर होने वाले  है | पिता जी को पूरी ज़िन्दगी गरीबी से संघर्ष करते देखा था |  

इसलिए राजीव चाहता था कि अपने पिता को वो सभी सुख सुविधा दें ताकि उनका बुढापा  आराम से बीत सके |

राजीव की मेहनत  रंग लाई और संयोग  से राजीव को पटना में ही इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिल गया | और साथ ही साथ उसे  होस्टल में शिफ्ट होना पड़ा था  | होस्टल में रहना आवश्यक था क्योकि आगे की पढाई के लिए काफी मेहनत  करना पड़ेगा |

इधर अनामिका में काफी परिवर्तन आ गया था | अब वह गंभीर रहने लगी और पहले की तरह हंसना-बोलना,  सहेलियों के साथ खेलना कूदना सब कम हो गया था |

वो तो बस अकेले में चुप – चाप बैठ कर अपने किताबों में खोई रहती और उदास दिखती थी | उसका  पढाई में भी मन नहीं लगता था |

अनामिका के मन में बस एक  ही बात चल रही थी, मुझे राजीव बहुत पसंद है पर क्या वो भी मुझे पसंद करता है ? अगर उसने मुझे नापसंद कर दिया तो मैं यह सदमा बर्दास्त ही नहीं कर पाऊँगी | शायद पहला प्यार इसी को कहते है |

राजीव की  बातों से तो कभी भी ऐसा नहीं लगता था कि वो भी मुझे चाहता है | वह तो बहुत ही कम और रुखा रुखा सा बात किया करता है, जैसे उसे प्यार व्यार में कोई दिलचस्पी ही ना हो |

लेकिन मुझे कोशिश नहीं छोडनी चाहिए …, अनामिका स्टडी टेबल पर बैठी सोच रही  थी |

तभी उसके मन में इच्छा हुई कि ठीक है अगली  बार उससे मिलूंगी तो साफ़ साफ़ लफ्जो में उससे अपने मन की बात कह दूंगी |

इधर उसकी माँ अचानक अनामिका को  इस तरह गुम सुम रहते हुए देख कर चिंतित होने  लगी |

बहुत कोशिश करने के बाद भी इसका कारण उसे समझ में नहीं आ रहा था |

आज वह सुबह सुबह चाय लेकर अनामिका के पिता के पास आयी | दोनों चाय पी रहे थे तभी बातों बातों में अनामिका की माँ ने अपनी मन की बात बताते हुए कहा …आज कल पता नहीं क्यों, अनामिका कुछ गुम सुम रहती है | ना ठीक से खाती है  और ना उसमे पहले जैसी  चंचलता  है |

अरे भाग्यवान, अब वो बच्ची नहीं रही अब उसकी उम्र धीर – गंभीर रहने की है | यह तो अच्छी बात है |…….राजेश्वर सिंह ने अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा |

नहीं जी, मैं तो माँ हूँ | फिर भी उसके मन की बात नहीं जान पा रही हूँ ….अनामिका की माँ ने दुखी स्वर में कहा |

इसमें कौन सी बड़ी बात है | तुम  सीधा उसी से  पूछ लो …उन्होंने पत्नी की शंका का समाधान बताया |

आप ठीक कहते है,  मैं अनामिका से ही इस मामले में सीधे बात करती हूँ |  जब से वह मेरे भाई के घर से आई है  तब से उसमे  यह परिवर्तन देखने को मिल रहा है … वो  चाय पीते हुए बोल रही थी |

अनामिका आज सुबह जब सो कर उठी तो अपने पिता को कहते सुना कि पटना में मामा जी के यहाँ पूजा है और उन्होंने सब लोगों को बुलावा भेजा है |

यह सुनकर अनामिका मन ही मन  खुश हो गई क्यूंकि  वहाँ राजीव से फिर मिलने का मौका मिलेगा |

उसके चेहरे पर ख़ुशी के भाव देख कर माँ के दिल को तसल्ली हुई |

खेती के कामों में उलझे होने के कारण राजेश्वर सिंह को पूजा में शरीक होने की फुर्सत नहीं थी, इसलिए अनामिका को ही उसके मामा के यहाँ भेजने को पिता जी तैयार हो गए |

अनामिका तो यही चाहती थी | उसके ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | अचानक बुझी बुझी सी रहने वाली अनामिका के चेहरे पर रौनक आ गई ….क्रमशः |

इससे पहले की कहानी  हेतु नीचे link पर click करे..


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Creativity is the way of life


Art is not what you see,

but what others see in your work..

In the year 2017 VRS scheme was launched and at that time I was facing such problems that I had no option but to take VRS from the Bank..

After retirement from the Bank , three months passed doing my leftover pending work , but after that I was desperately in need of some work to spend my time, so that I could keep my mind  stable and keep myself mentally healthy.

Unfortunately I did not get the work of my choice. Hence I decided to revive my old and heart rending hobby and find my own happiness in it…

To my utter surprise I was feeling some of my talent which was hidden to myself, was identified. Yes I started drawing and painting which was new for me but I, in a span of days began to enjoy it ..

Along with this I started writing poems and short stories. Initially, I found it a bit difficult but soon I learned this Art .

And doing all these, my time was being utilize as I wished..

One day, a friend suggested that I should start Blogging as I had ample time and I can  enjoy it..

It was new for me as I did not know anything about the blogging at that time .

Then the question arose in my mind at that moment, “Should I start a blog?”

After enquiring about blogging …I came to know that Blogging is relevant more than ever, and it’s not too late to start a blog.

I have learned that 77% of all internet users read blogs regularly, and they are considered a trustworthy source of information online.

Also, the blogging community is still growing, in this way I also found it a good platform to connect with the social people as well as share my thought and experience of my life..

Perhaps I was at the right place. At the beginning of this year, finally started to write blog and also set a goal to write 365 blogs in this year under different categories such as stories, Poem , motivation , my Art and health.

 But at the same time I was thinking of how blogging can keep me happy and help to achieve my other goal in my life.

It is the fact that I can invest a significant amount of time into this new venture.  The question arose in my mind again …can I establish and find my place here?

I was finding many reasons why this creative medium could be right for me and the reasons that I find right now are …  

1. Express our feelings

Blogging allowed me to share my ideas, experiences, and expertise with the world, and the beauty is that I can tell my story, my experience in life just the way I want it to be told.

It seems to be the perfect outlet for self-expression without limits for our creativity. Because our blog is entirely  our own,

I can communicate what I have to say in any form – not only writing.

Drawing, Poems , Photography, Videos, and even a podcast can be part of my  blog, too. 

2. Work on self-development

Starting and growing a blog is a great challenge that will likely stretch  our abilities and help us  grow as a person.

We can  pick up some valuable web and marketing skills in addition to building the discipline to keep our blog going. Besides, we can also develop our expertise in the field we are writing about.

Every time we work on a new post, we are forced to organize our thoughts and fill any gaps in our knowledge. Writing not only helps to internalize what we have learned but also to refine our own ideas and opinions. 

3. Make the world a better place 

The most meaningful reason to blog is probably the ability to help others and have a positive impact on the world.

By generously sharing our expertise and experiences, it can make a difference to the people who are looking for the answers that we already have.

The blog has the power to inspire, educate, and even change someone’s life. Showing others that there’s someone who is on the same journey as they are and, can provide a much-needed sense of belonging.

There’s an audience out there that will respond to the particular way you shed light on a certain topic or issue. 

4. Build authority 

A blog is a great platform to gain exposure in the industry by showcasing our knowledge and expertise. Think about it as a modern version of the printed business card. Regularly publishing relevant, informative content will eventually draw the attention of people in our profession and can earn  the status of an expert and thought-leader.

5. Make new friends 

Blogging is much more than a solitary pursuit. It is a way to connect with like-minded people from all over the world who are passionate about the same topic.

We can build relationships with other bloggers in our  field, have riveting discussions with readers in the blog comments, .

The blog might open the door for new friendships, collaborations, and other opportunities. It’s a reassuring feeling to be part of this dynamic and supportive community. Often, we see people find a real sense of belonging here.  

6. Earn an income 

Besides enjoying our hobby  it is helpful becoming a self-employed blogger.

It may be the number one reason for many to follow this road.

 It is known that some bloggers have grown significant income streams from their blog.

While blogging might only replace a full-time salary for some people, it can be an additional source of income for many. 

We can monetize our blog; There are so many ways to make a profit:

With the great enthusiasm I have started Blogging. I believe that it is much more than a rewarding hobby, which brings new opportunities and even unexpected benefits.

By starting a blog this year, I realised my vision of helping the people through my Blog. Together, we can make a difference.

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Like What You See

There is always some chatter going on in our mind. If we pay attention to these thought of our mind, then we find that sometimes very good ideas continue to arise in our mind.

So I have decided to note down that ideas which are often crossing my mind.

Now I have been trying for a few days to write down those thoughts on paper that is going on in my brain.

I have found that such thoughts come to our mind only for a few moments and then disappear.

Yes, I am trying to note down whenever those new ideas come in our mind .

One day when I was taking my granddaughter in the drawing class. I saw her doing beautiful drawing. An idea came to my mind that why should not I too indulge myself in drawing and painting?

But I had no knowledge about painting, though I was very much interested. Thinking so, an idea came to my mind that I should take the help of that drawing teacher and I joined his drawing class accordingly.

Everything went well for a few days and I started to enjoying drawing and paintings. Seeing the intense desire of my drawing, my teacher advised me to continue it.

But suddenly due to corona epidemic,   our area got locked down and my drawing class was closed.

I got upset due to the incidence and my drawing practice stopped for few days . I was desperately searching for alternatives to start my drawing again .

Then one day I observed that many of the students are joining online drawing class . This idea got sparked in my mind that …why not join online drawing classes and  thinking  of this,

I contacted my drawing teacher over the phone and requested him to arrange online classes and they too agreed to start drawing classes online.

I became very happy to know that I can revive my beloved hobby again.

My drawing classes has not yet started however I am trying to do at least one drawing daily as advised by the teacher and my time is also being used well .

A lot of people love drawing and creativity; I am also fond of that. The best part of drawing and sketching is the beautiful picture on the paper and other material object that can be saved electronically.

It is a pleasure to see the drawing and painting made by self. Sometimes these sketch and drawing are used as wall paper on my laptop and sometimes published within my Blog because the drawing  and painting made by me is very pleasing to see time and  again .

But one drawing and sketch is never enough for the wall paper or publishing in the blog.

The picture and sketch need to be made daily to use and changing every day and I am doing the same on daily basis.

Sometimes I display beautiful landscape, sometimes drawing of animal or birds and other theme also.

since I am not contained with any particular theme of drawing and painting, so try to create many pictures with various ideas..

Looking to my passion, I started the feature like “what I create today” in my blog.

Anybody who wants to see my drawing and painting they can visit to my blog and see the categories section in the name of “me and my art” also.

I use to display my drawing and painting with the expression and my feeling in my Blog.

I request to all my friends to see my drawing s that is the expression of my feeling and visit my blog,, I am thinking of adding one more features in my blog such as ” spot sight quiz”.

This  will be one of interesting feature of my  blog and also you earn rewards for right answer and evaluate your Presence…of ….Mind…Please give your views through your comments..

इससे पहले की घटना जानने के लिए नीचे दिए link को click करें…


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वो अनजानी लड़की ..

आज के इस ब्लॉग की बात ही कुछ अलग है,  क्योकि इसमें मैं अपने एक सहपाठी के जीवन में घटी सच्ची  घटना का  वृत्तांत आप सबों  के समक्ष प्रस्तुत करने जा रहा हूँ …

आज की परिवेश में अगर  इस घटना के बारे में सोचा जाए  तो यह थोडा विचित्र और डरावना  सा लगता है |

पर जब यह घटना घटी उस समय  बिहार के कुछ  इलाकों  में इस तरह की घटना का घटित होना एक वास्तविकता थी |

इस संस्मरण के पात्र  ने उपरोक्त घटना का जिस बहादुरी से मुकाबला किया उसके लिए वे सचमुच में बधाई के पात्र  है | 

विमलेश  नाम था उसका,  देखने में बहुत ही शर्मीला लेकिन पढने में उतना ही तेज़ |

मुझे आज भी वह दिन याद है ..24 जुलाई 1977  जब हमलोगों ने रांची एग्रीकल्चर कॉलेज में एडमिशन लिया था और उसके बाद हमलोगों को जो हॉस्टल आवंटित किया गया था उसमे हम दोनों के रूम पास – पास थे |

वह बहुत ही शांत स्वभाव का था और हमेशा अपनी  पढाई  में व्यस्त रहता था |

सिर्फ खाना खाने के लिए ही रूम से निकलता था | उसे देख कर आस पास के रूम के लड़के ना चाहते हुए भी पढाई करने बैठ जाते थे,  क्यों कि trimester sysyem में हमेशा कोई ना कोई परीक्षा  लगा ही रहता था और हमलोगों को रोज़ पढाई करना आवश्यक होता था |

अगर अगले दिन कठिन पेपर की परीक्षा हुई तो सभी विद्यार्थी  सारी  रात पढाई करने में व्यस्त रह जाते  थे … अजीब सा माहौल होता था हॉस्टल का भी |

हम सब जितनी मिहनत से पढाई करते थे  उतना ही मस्ती भी किया करते थे |

वह कॉलेज के शुरुवाती दिन थे और उन दिनों में रैगिंग भी बड़े जोरो की हुआ करती थी |

सीनियर छात्रों  के आदेशानुसार फर्स्ट trimester के छात्रो को डिनर के बाद नौ बजे रात  में  कॉमन रूम में उपस्थित होना पड़ता था जहाँ हमलोगों की तरह तरह से रैगिंग किया जाता था |

कभी कभी तो रैगिंग से परेशान होकर महसूस होता था कि पढाई लिखाई सब छोड़ कर घर वापस चला जाऊँ | पर फिर अपने मन को समझाता …कुछ ही दिनों की तो बात है फिर हम भी आने वाले जूनियर्स का  रैगिंग कर मज़ा लेंगे |

एक दिन हम सभी लोग रैगिंग के लिए पहले से तय अपने उस कॉमन रूम में पहुँच गए | कॉमन रूम क्या था, यह तो बहुत बड़ा हॉल था और हम सभी छात्रों के एकत्र होने के बाद नियमतः रूप से रैगिंग लेने वाले सीनियर्स लोग हमलोगों का attendence लेते थे ताकि कोई चालाकी दिखा कर अपने रूम में  छुप ना जाये |

रात के दस बज रहे थे , हालाँकि हमलोग डिनर ले चुके थे और नींद भी आ रही थी | तभी  बॉस लोगों का हुक्म सुनाई पड़ा …. तुम लोग  सभी बारी बारी से अपने जीवन से घटी कोई ऐसी महत्वपूर्ण घटना को सुनाओ  जिसने तुम्हारे जीवन में गहरा प्रभाव डाला हो |

सब लोग अपने  जीवन से जुडी कोई ना कोई घंटना को सभी के समक्ष सुना  रहे थे | और उनकी सच्ची कहानियों को सुनकर बहुत मज़ा भी आ रहा था |

मैं भी मन ही मन सोच रहा था कि अपने जीवन से जुड़ी कौन सी घटना सुनाया जाये क्योकि अगला नंबर मेरा ही आने वाला था | तभी किसी ने विमलेश  का नाम ले लिया |

इसका मतलब  अब विमलेश को अपनी जीवन से जुडी ऐसी कोई कहानी सुनानी थी |

वैसे वह बहुत शर्मीला किस्म का था लेकिन वहाँ तो सब लोगों के सामने कहानी सुनाना मज़बूरी थी |

वह बेचारा शुरू शुरू में थोडा नर्भस हो रहा था, फिर भी हिम्मत जुटा कर अपने ज़िन्दगी में घटी   एक  महत्वपूर्ण घटना को सुनाना शुरू किया |

अब इस घटना की जानकारी विमलेश की ज़ुंबानी सुनिए ….

बात उन दिनों कि है जब मैं गया कॉलेज में पढता था |  वैसे आप सभी लोग को पता ही है कि मैं जहानाबाद के सूरजपुर गाँव का रहने वाला हूँ |

मेरे पिता जी गाँव के बड़े किसान है |  हमलोगों की गाँव में अच्छी इज्जत प्रतिष्ठा है  और उस पर कि  अगर इस पिछड़ा गाँव से कोई लड़का शहर में पढने चला जाये तो उस घर की इज्जत और भी बढ़ जाती है |

उन दिनों जे पी आन्दोलन बड़े जोरो पर थी और हम सब विद्यार्थी  अपने हॉस्टल में काफी सतर्क और चौकन्ने रहते थे |

दोपहर तीन बजे का समय रहा होगा और मैं खाना खाकर  हॉस्टल के अपने कमरे में आराम कर रहा था | तभी एक देहाती सा  आदमी जो  धोती कुरता पहने हुए था,  मुझे खोजते हुए मेरे रूम तक  पहुँच गया  और दरवाज़ा खटखटा दिया | मैं चौक कर उठा और फिर सोचा शायद कोई दोस्त आया होगा |

मैं उठ कर दरवाज़ा खोला तो देखा वह  ग्रामीण सामने खड़ा था |

मैंने  उससे पूछा …आप कौन है और क्या चाहते है ?

तो उसने ज़बाब दिया .. .हम आपके पिता के दोस्त है और उन्होंने यहाँ आपको बुलाने के लिए भेजा है |

मैंने फिर पूछा …लेकिन मेरे पिता जी कहाँ है और होस्टल में खुद क्यों नहीं आये ?

इसपर उस  आगंतुक ने कहा …वो किसी काम में उलझे  हुए  है इसलिए आप के लिए कार भेजा  है, आप चल कर वही मिल लें |

मुझे पता था कि पिता जी जब भी गाँव से गया शहर आते हैं तो बहुत सारी  पेंडिंग काम भी निपटाते थे |

शायद मेरे पिता जी काम में उलझे होने के कारण यहाँ तक नहीं आ सकें होंगे | ऐसा सोच कर मैं उनके साथ कार में बैठ कर चल दिया |

मैंने सोचा कुछ ही समय में  पिता जी के पास पहुँच जाऊंगा, और उनसे मिल कर उनका हाल समाचार जान लूँगा |

रास्ते  में एक जगह मेरी कार रुकी और देखा कि कार का दरवाजा खोल कर मेरे दोनों तरफ दो हट्ठा कट्ठा  आदमी बैठ गए हैं और फिर कार आगे चल दी |

मुझे उनलोगों को देख कर अजीब महसूस हुआ |  मुझे लगा कि पिता जी पहलवान टाइप आदमी को मेरे पास क्यों भेजेंगे ?

मैंने पूछा …पिता जी कहाँ है ?

मेरे पास बैठा आदमी ने कहा …वहीँ तो जा रहे है |

लेकिन थोड़ी देर के बाद मैंने देखा, मेरी कार तो शहर छोड़ चुकी है और अब हाईवे का रास्ता पकड़ लिया  है |

मुझे समझते देर ना लगी कि मैं किसी मुसीबत में फँस गया हूँ |

मैं काफी घबरा गया था | मुझे पता था कि उन दिनों आपसी रंजिश में बदला लेने के लिए परिवार के किसी सदस्य या उसके बच्चे को सुपारी देकर क़त्ल करा दिया जाता था |

जी हाँ , उन दिनों गया और आसपास के इलाकों में “छह इंच छोटा कर देना” एक मुहावरा  प्रचलित था …छोटा करना यानि गर्दन काट लेना |

हो सकता है मेरे पिता के कोई दुश्मन ने मुझे जान से मारने की सुपारी दी हो |

मेरे मन में ख्याल आया कि, कही सुनसान जगह पाकर मुझे भी मार कर झाड़ियों में फेक देगा |

मैं अपनी मौत को बहुत करीब से देख रहा था | फिर भी हिम्मत कर  मैं उनलोगों का विरोध करने लगा और कहा …मुझे यही उतार दो,  नहीं जाना मुझे अपने पिता जी से मिलने |

इतना सुनना था कि मेरे पास  बैठे एक पहलवान ने पिस्तौल निकाल ली और मुझे दिखाते हुए कहा …चुप चाप बैठे रहो और मेरे साथ चलो , वर्ना अभी  यहीं छह इंच छोटा कर दूंगा |

मैं बहुत डर गया,  जान किसको नहीं प्यारी लगती है | अनायास ही मेरा हाथ मेरी गर्दन पर चला गया और  मैं मन ही मन भगवान् को याद करने लगा और पभु से कहा …मेरी जान बचाओ प्रभु |

तभी अपनी कार हाईवे को छोड़  किसी गाँव की तरफ मुड़ गई |  मुझे तो यह पता था कि मैं किडनैप कर लिया गया हूँ लेकिन किस कारण से मेरा अपहरण हुआ है अभी तक पता नहीं चला था | शायद फिरौती की डिमांड करे |

फिर भी मैं लगातार विरोध  करता रहा,  लेकिन अकेला होने के कारण मैं उनलोगों के चंगुल से निकल नहीं पा रहा था |

मैंने उन लोगों को  डराने के लिए  कहा …  मेरे पिता जी को जैसे ही पता चलेगा , तो तुमलोगों की खैर नहीं |

लेकिन मेरे बातों का उनलोगों पर कोई असर नहीं हो रहा था | वो लोग चुप चाप बैठे थे और कार अपनी  रफ़्तार से भाग रही थी |

शाम बीत चुकी थी और अब अंधियारा घिर आया था |  कार अँधेरी रास्तों से गुजरता हुआ एक गाँव में पहुँचा और एक घर के सामने मेरी कार को  रोक कर मुझे उतरने को कहा गया |

 मैं कार के खिड़की से बाहर देखा …तो सामने एक घर दिखा | घर को रंगीन बल्ब और रौशनी से सजाया गया था और दरवाजे पर शहनाई  वाला शहनाई  बजा रहा था | जैसे लग रहा था  यहाँ कोई शादी होने वाली है |

अब मेरा दिमाग ठनका  | मुझे समझते देर ना लगी कि मुझे किडनैप कर लिया गया है, लेकिन फिरौती के लिए नहीं बल्कि ये लोग मेरी जबरदस्ती शादी कराने के लिए यहाँ लाये है |

अब मुझमे भी थोड़ी सी हिम्मत आ गई क्योकि मुझे महसूस हो रहा था कि ये लोग जान से तो नहीं मारने वाले है |

इसलिए मैंने अपना विरोध और तेज़ कर दिया |  लेकिन वो लोग ज़बरदस्ती मुझे पकड़ कर घर के अन्दर ले गए, जहाँ पहले से ही शादी की पूरी तैयारी कर रखी थी |

पंडित जी भी अपना स्थान ग्रहण किये हुए थे और एक दुल्हन भी मंडप में बैठी थी |

मुझे ज़बरदस्ती नए कपडे पहनाये गए |  माथे पर मौरी सजाया  गया और जबरदस्ती  मंडप में दुल्हन के बगल में बैठा दिया गया |

मेरे बैठते ही पंडित जी ने मंत्र उच्चारण शुरू कर किया  | मैंने  दुल्हन की तरफ एक बार देखने की कोशिश की पर मुँह पूरी तरह ढका हुआ था |

मेरा मन बहुत घबरा रहा था और मैं मंडप में बैठा सोच रहा था कि यह जबरदस्ती की शादी मेरे ज़िन्दगी और भविष्य को बर्बाद कर देगी और  इस घूँघट के पीछे पता नहीं यह “अनजाना लड़की” कौन है और कैसी है ?

 इसे मेरे पिता जी और परिवार वाले स्वीकार कर पाएंगे  या नहीं |  मैं जैसे ही वापस पिता के सामने जाऊंगा तो वो हमें  गुस्से में गोली ही मार देंगे | मेरे पिता जी इस तरह की शादी को अपनी सहमती नहीं दे सकते है  क्योंकि  यह उनके इज्जत प्रतिष्ठा से जुडी बात है |

मैं मन ही मन सोच रहा था कि किसी तरह मौका पाकर यहाँ से भाग जाऊं लेकिन उन लोगों का इंतज़ाम एक दम फुल- प्रूफ था |

मैं इन्ही बातों में उलझा हुआ था, तभी पंडित जी ने कहा …, अब विधि पूर्वक दूल्हा –दुल्हन की शादी संपन्न हुई |

मुझे वहाँ से उठा कर एक रूम में पलंग पर बैठा दिया गया और दुल्हन भी मेरे बगल में बैठी थी |

मैं अब तक उस दुल्हन के चेहरे को नहीं देख पाया था लेकिन मैंने अनुमान लगाया कि लड़की ज़रूर बदसूरत  होगी , इसीलिए तो मुझे किडनैप करके शादी किया जा रहा है |

मैं गुस्से में एक तरफ बैठा था और अपने पिता के गुस्से को याद कर रहा था |

तभी मेरी सास अर्थात दुल्हन की माँ प्रकट हुई और मुझसे कहा …मेहमान जी, आप अभी तक गुस्सा है ? आपने पानी तक नहीं पिया |

मेरे पिता जी मेरा खून पी जायेंगे …मैंने गुस्से में कहा |

सासु माँ हँसते हुए बोली  … हमलोग अनजान लोग नहीं है | आप तो इस लड़की को बचपन से ही जानते है |

क्या आप सुनीता को भूल गए ,? जब आप चाचा के यहाँ  पटना जाते थे तो हमलोग  उनके बगल में ही तो रहते थे | उसी समय आप को देखा तो मन ही मन फैसला कर लिया था कि इसकी शादी आप से ही करेगे | क्योकि इतना सुन्दर लड़का और भरा पूरा परिवार कहाँ मिलेगा ?

जैसे ही सुनीता का नाम मेरे कानो में पड़ा तो बचपन की वो याद ताज़ा हो गई | तब मैं कोई दस साल का था और यह शायद आठ साल की रही होगी |

अब तो बड़ी हो गई है और पता नहीं अब कैसी दिखती होगी |

मैं सोच तो रहा था लेकिन घूँघट उठा कर उसके चेहरे को देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी |

मुझे तो बस अपने पिता जी के गुस्से को याद कर दिल घबरा रहा था |

तभी लड़की की माँ ने कहा …, अरे बेटी,  तुम घूँघट तो उठाओ | मेहमान  तुम्हे देखेंगे तो ज़रूर पहचान लेंगे |

माँ के कहने पर सुनीता ने अपना घूँघट उठाया | मैं देख कर दंग रहा गया | आज वह दस साल पहले वाली सुनीता नहीं थी |  वह तो अब  सुन्दर और जवान युवती बन चुकी  थी |

उसे देख कर मन को तसल्ली हुई लेकिन फिर भी पिता जी का डर मन में घूम रहा था |

इसी तरह कुछ दिन वहाँ बीते और फिर उनलोगों ने विदाई का प्रोग्राम तय कर दिया |

इसके लिए गाडी की व्यवस्था की गई | लड़की को दिए जाने वाले सामान को भेजने हेतु एक अलग गाड़ी की व्यवस्था की गई | 

और फिर मुझे अपने गाँव दुल्हन के साथ रवाना  कर दिया गया | मैं जब अपनी पत्नी को लेकर घर पहुँचा तो जिस बात का डर था वही हुआ |

पिताजी गुस्से से आग बबूला थे और मुझे घर में घुसने ही नहीं दिया और कहा ….तुम वापस चले जाओ | अब तुमसे मेरा कोई नाता – रिश्ता नहीं रहा |

अजीब स्थिति थी | गाड़ी वाले सामान उतार  कर जा चुके थे ….और मैं अपनी पत्नी के साथ घर से बाहर  दलान  में बैठा हुआ था |  पत्नी रोये जा रही थी |

फिर गाँव कुछ बड़े बुजुर्ग और खलीफा लोग पिता जी के पास आये और उन्हें समझाया कि अब जो हो गया है उसे स्वीकार करने में ही भलाई है |

 …और इस तरह  से यूँ तो इस घटना का पटाक्षेप हो गया पर मैं इस घटना को आज तक भूल नहीं पाता  हूँ ….

हम कभी मिले नहीं, फिर भी मेरी खबर रखता था

अनजान राहे थी, फिर भी हमें साथ साथ चलना था …

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