
यह एक आत्ममंथन से भरी कविता है, जो जीवन की उलझनों, सवालों, ठोकरों और रौशनी की तलाश को दर्शाती है। यह कविता उस काश की बात करती है जो समय रहते हमें खुद से जोड़ देती — एक पहचान, एक आत्मबल, और एक विश्वास।
यह रचना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं हम खुद से ही तो नहीं दूर हो गए हैं।
“ख़ुद से मुलाक़ात”
ये ज़िंदगी और भी आसान हो जाती,
अगर वक़्त पर ख़ुद से मुलाक़ात हो जाती।
अक्स जो धुंधला था आईने में,
उसकी गहराई से पहचान हो जाती।
हर किसी से शिकायत न होती कभी,
अगर सबके होंठों पर मुस्कान हो जाती।
हम जहाँ ढूंढ़ते रहे रौशनी को,
वहीं एक चुप सी जान हो जाती।
जो सवालों से डरकर बैठे रहे,
उन्हीं से शायद कोई पहचान हो जाती।
हर कदम पर जो ठोकरें खाते रहे,
अगर उठते, तो पैरों में जान हो जाती।
जो किताबों में खोजते रहे खुदा को,
कभी दिल से, उनसे बात हो जाती।
अब ये हाल है कि ख़ुद से डरते हैं,
काश वक़्त रहते ही ये रात हो जाती।
(विजय वर्मा)

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