
और घटोत्कच मारा गया
दोस्तों,
महाभारत में बहुत सारे वीर योद्धा थे | कुछ तो ऐसे थे कि अकेला ही महाभारत युद्ध को एक दिन में ही समाप्त करने की क्षमता रखते थे | फिर भी यह युद्ध अठारह दिनों तक चला |
इसका मुख्य कारण है कि उन वीर योद्धाओं को किसी ना किसी छल-बल का प्रयोग कर मार दिया गया | उसी में एक नाम है घटोत्कच का |
लाक्षा गृह के दहन के पश्चात सुरंग के रास्ते लाक्षागृह से सकुशल निकल कर पाण्डव अपनी माता के साथ काम्यक वन के अन्दर चले गये।
कई कोस पैदल चलने के कारण भीमसेन को छोड़ कर शेष सभी लोग थकान से बेहाल हो गये थे |
वे लोग आराम करने के ख्याल से एक वट वृक्ष के नीचे लेट गये । माता कुन्ती प्यास से व्याकुल थीं इसलिये भीमसेन किसी जलाशय की खोज में चले गये। उन्हें उस वन में एक जलाशय दृष्टिगत हुआ |

उन्होंने पहले स्वयं जल पीकर अपनी प्यास बुझाई और फिर माता तथा भाइयों के लिए ज़ल लेकर लौट आये।
वे सभी थकान के कारण तब तक गहरी निद्रा में निमग्न हो चुके थे | रात का प्रहार था, इसलिए भीम वहाँ पर पहरा देने लगे ।
उस वन का राजा हिडिंब नाम का एक भयानक असुर था । मानवों का गंध मिलने पर उसने पाण्डवों को पकड़ लाने के लिये अपनी बहन हिडिंबा को भेजा ताकि वह उन्हें अपना आहार बना कर अपनी क्षुधा पूर्ति कर सके।
जब हिडिम्बा वहाँ पर पहुँची तो भीमसेन को पहरा देते हुये देखा | उनके सुन्दर मुखारविन्द तथा बलिष्ठ शरीर को देख कर उन पर आसक्त हो गई ।
उसने अपनी राक्षसी माया से एक सुन्दर लावण्मयी सुन्दरी का रूप धारण कर लिया और भीमसेन के सामने जा पहुँची।
भीमसेन ने उससे पूछा,….. “हे सुन्दरी ! तुम कौन हो और रात्रि में इस भयानक वन में अकेली क्यों घूम रही हो ?
भीम के प्रश्न के उत्तर में हिडिम्बा ने कहा,… “हे नरश्रेष्ठ ! मैं हिडिम्बा नाम की राक्षसी हूँ । मेरे भाई ने मुझे आप लोगों को पकड़ कर लाने के लिये भेजा है , किन्तु मेरा हृदय आप पर आसक्त हो गया है | मैं आपको अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती हूँ।
मेरा भाई हिडिम्ब बहुत दुष्ट और क्रूर है किन्तु मैं इतना सामर्थ्य रखती हूँ कि आपको उसके चंगुल से बचा कर सुरक्षित स्थान तक पहुँचा सकूँ ।
इधर अपनी बहन को लौट कर आने में विलम्ब होता देख कर हिडिम्ब उस स्थान में जा पहुँचा जहाँ पर हिडिम्बा भीमसेन से वार्तालाप कर रही थी।

हिडिम्बा को भीमसेन के साथ प्रेमालाप करते देखकर वह क्रोधित हो उठा और हिडिम्बा को दण्ड देने के लिये उसकी ओर झपटा ।
यह देख कर भीम ने उसे रोकते हुये कहा …, “रे दुष्ट राक्षस ! तुझे स्त्री पर हाथ उठाते लज्जा नहीं आती ? यदि तू इतना ही वीर और पराक्रमी है तो मुझसे युद्ध कर | इतना कह कर भीमसेन ताल ठोंक कर उसके साथ मल्ल युद्ध करने लगे |
इसकी आहट पाकर कुंती तथा अन्य पाण्डव की भी नींद खुल गई । वहाँ पर भीम को एक राक्षस के साथ युद्ध करते तथा एक रूपवती कन्या को खड़ी देख कर कुंती ने उत्सुकता से पूछा, …”पुत्री ! तुम कौन हो ?“
हिडिम्बा ने माता कुंती को प्रणाम किया और सारी बातें उन्हें बता दी।
गुस्से में अर्जुन ने हिडिम्ब को मारने के लिये अपना धनुष उठा लिया | तभी भीम ने उन्हें बाण चलाने से मना करते हुये कहा ,… “अनुज ! तुम बाण मत छोडो़, यह मेरा शिकार है |

यह राक्षस मेरे ही हाथों मरेगा ।” इतना कह कर भीम ने हिडिम्ब को दोनों हाथों से पकड़ कर उठा लिया और उसे हवा में अनेक बार घुमा कर इतनी तीव्रता के साथ भूमि पर पटका कि उसके प्राण-पखेरू उड़ गये।
हिडिम्ब के मरने के बाद भीम उस काम्यक वन का राजा बनना स्वीकार कर लिया |
हिडिम्ब के मरने के बाद वे लोग वहाँ से प्रस्थान की तैयारी करने लगे | उनलोगों को जाता देख हिडिम्बा ने कुन्ती के चरणों में गिर कर प्रार्थना करने लगी और बोली…, “हे माता ! मैंने आपके पुत्र भीम को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया है ।
आप लोग मुझे कृपा करके स्वीकार कर लीजिये । यदि आप लोगों ने मझे स्वीकार नहीं किया तो मैं इसी क्षण अपने प्राणों का त्याग कर दूँगी ।
हिडिम्बा के हृदय में भीम के प्रति प्रबल प्रेम की भावना देख कर युधिष्ठिर बोले, …. “हिडिम्बे ! मैं तुम्हें अपने भाई को सौंपता हूँ , किन्तु यह केवल दिन में तुम्हारे साथ रहेगा और रात्रि को हम लोगों के साथ रहा करेगा ।” हिडिंबा इसके लिये तैयार हो गई |
वह भीमसेन के साथ आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगी । एक वर्ष व्यतीत होने पर हिडिम्बा का एक पुत्र उत्पन्न हुआ । उसका जन्म होते समय उसके सिर पर केश (उत्कच) न होने के कारण उसका नाम घटोत्कच रखा गया। वह अत्यन्त मायावी निकला और जन्म लेते ही बड़ा हो गया ।
हिडिम्बा ने अपने पुत्र को पाण्डवों के पास ले जा कर कहा,… “यह आपके भाई की सन्तान है अतः यह आप लोगों की सेवा में रहेगा ।” इतना कह कर हिडिम्बा वहाँ से चली गई ।
घटोत्कच श्रद्धा से पाण्डवों तथा माता कुन्ती के चरणों में प्रणाम कर बोला,… “अब मुझे मेरे योग्य सेवा बतायें |

उसकी यह बात सुन कर कुन्ती बोली ,… “तू मेरे वंश का सबसे बड़ा पौत्र है। समय आने पर तुम्हारी सेवा अवश्य ली जायेगी।
इस पर घटोत्कच ने कहा ,… “आप लोग जब भी मुझे स्मरण करेंगे, मैं आप लोगों की सेवा में उपस्थित हो जाउँगा । इतना कह कर घटोत्कच जंगल में लौट गया |
महाभारत में कौरव और पांडवों के बीच युद्ध चल रहा था । तभी कौरव की ओर से सेनापति भीष्म पितामह के मृत्यु सैया पर होने कारण गुरु द्रोणाचार्य ने सेनापति की कमान संभाली | उन्होंने तब कर्ण को महाभारत युद्ध में हिस्सा लेने की इज़ाज़त दी गयी |
कर्ण के युद्ध भूमि पर आने से अर्जुन के जान को खतरा था | क्योकि कर्ण के पास सिद्धि की हुई वाण, दिवायास्त्र थी, जिसे वह अर्जुन को मारने के लिए ही रखा था | इसके कारण कृष्ण को इस बात की चिंता सताए जा रही थी |
तभी श्रीकृष्ण के कहने पर भीम पुत्र घटोत्कच को कर्ण से युद्ध करने को भेजा गया था। घटोत्कच और कर्ण दोनों ही पराक्रमी योद्धा थे, इसलिए युद्ध के दौरान वे एक-दूसरे के प्रहारों को अपनी शक्तियों से काटने लगे।
यह देख घटोत्कच ने भी अपनी माया से राक्षसी सेना प्रकट कर दी । कर्ण ने अपने शस्त्रों से उसका अंत कर दिया।
साथ ही साथ घटोत्कच कौरवों की सेना का भी संहार करने लगा । घटोत्कच के हाथों अपनी सेना का संहार होता देखकर सभी कौरवों चिंतित हो गए |

तभी दुर्योधन ने चिंतित होते हुए कर्ण से कहा … इस तरह तो कल तक हमारी पूरी सेना को अकेले ही घटोत्कच समाप्त कर सकता है |
कुछ पल सोच कर उन्होंने कर्ण से कहा …. तुम इंद्र की दी हुई शक्ति दिव्यास्त्र से अभी इस घटोत्कच राक्षस का अंत कर दो, नहीं तो ये आज ही हमारी सेना को समाप्त कर देगा।
जब कर्ण ने देखा कि घटोत्कच को किसी प्रकार पराजित नहीं किया जा सकता है तो उसने अपने वो दिव्यास्त्र प्रकट कर दिए जो अर्जुन के वध करने हेतु रखे थे ।
इस प्रकार कर्ण ने भीम के पुत्र घटोत्कच का वध कर दिया था।
घटोत्कच के वध से पांडव बहुत दुखी थे, लेकिन अर्जुन ने श्रीकृष्ण को इस अवसर पर प्रसन्न होते हुए देखा ।
उसने श्रीकृष्ण से पूछा …. आप घटोत्कच की मृत्यु पर प्रसन्न क्यों दिख रहे हैं ?
श्रीकृष्ण ने कहा कि कर्ण के पास इंद्र के द्वारा दी गई दिव्य शक्ति थी, उस शक्ति को कोई भी पराजित नहीं कर सकता था ।
कर्ण ने वह शक्ति तुम्हारे लिए संभालकर रखी थी, लेकिन अब वह शक्ति उसके पास नहीं है। ऐसी स्थिति में तुम्हें अब उससे कोई खतरा नहीं है ।
वैसे भी अगर आज कर्ण घटोत्चक का वध नहीं करता तो एक दिन मुझे ही इसका वध करना पड़ता, क्योंकि वह ब्राह्मणों और यज्ञों से शत्रुता रखने वाला राक्षस था। तुम लोगों का प्रिय होने की वजह से ही मैंने अब तक इसका वध नहीं किया था।..(क्रमशः )
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Categories: story
Story of Ghotokatchya. In Mahabharata ,every thing is possible. Child became young suddenly. Above all, it was Lord Krishna ‘decision. Nice.
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Yes sir,
Story is surprising but interesting to read..
Thank you for supporting me always..
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Ghatokacha is an important character of Mahabharat and his story very well written in this blog
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Thank you sir,
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