वो अनजानी लड़की ..

आज के इस ब्लॉग की बात ही कुछ अलग है,  क्योकि इसमें मैं अपने एक सहपाठी के जीवन में घटी सच्ची  घटना का  वृत्तांत आप सबों  के समक्ष प्रस्तुत करने जा रहा हूँ …

आज की परिवेश में अगर  इस घटना के बारे में सोचा जाए  तो यह थोडा विचित्र और डरावना  सा लगता है |

पर जब यह घटना घटी उस समय  बिहार के कुछ  इलाकों  में इस तरह की घटना का घटित होना एक वास्तविकता थी |

इस संस्मरण के पात्र  ने उपरोक्त घटना का जिस बहादुरी से मुकाबला किया उसके लिए वे सचमुच में बधाई के पात्र  है | 

विमलेश  नाम था उसका,  देखने में बहुत ही शर्मीला लेकिन पढने में उतना ही तेज़ |

मुझे आज भी वह दिन याद है ..24 जुलाई 1977  जब हमलोगों ने रांची एग्रीकल्चर कॉलेज में एडमिशन लिया था और उसके बाद हमलोगों को जो हॉस्टल आवंटित किया गया था उसमे हम दोनों के रूम पास – पास थे |

वह बहुत ही शांत स्वभाव का था और हमेशा अपनी  पढाई  में व्यस्त रहता था |

सिर्फ खाना खाने के लिए ही रूम से निकलता था | उसे देख कर आस पास के रूम के लड़के ना चाहते हुए भी पढाई करने बैठ जाते थे,  क्यों कि trimester sysyem में हमेशा कोई ना कोई परीक्षा  लगा ही रहता था और हमलोगों को रोज़ पढाई करना आवश्यक होता था |

अगर अगले दिन कठिन पेपर की परीक्षा हुई तो सभी विद्यार्थी  सारी  रात पढाई करने में व्यस्त रह जाते  थे … अजीब सा माहौल होता था हॉस्टल का भी |

हम सब जितनी मिहनत से पढाई करते थे  उतना ही मस्ती भी किया करते थे |

वह कॉलेज के शुरुवाती दिन थे और उन दिनों में रैगिंग भी बड़े जोरो की हुआ करती थी |

सीनियर छात्रों  के आदेशानुसार फर्स्ट trimester के छात्रो को डिनर के बाद नौ बजे रात  में  कॉमन रूम में उपस्थित होना पड़ता था जहाँ हमलोगों की तरह तरह से रैगिंग किया जाता था |

कभी कभी तो रैगिंग से परेशान होकर महसूस होता था कि पढाई लिखाई सब छोड़ कर घर वापस चला जाऊँ | पर फिर अपने मन को समझाता …कुछ ही दिनों की तो बात है फिर हम भी आने वाले जूनियर्स का  रैगिंग कर मज़ा लेंगे |

एक दिन हम सभी लोग रैगिंग के लिए पहले से तय अपने उस कॉमन रूम में पहुँच गए | कॉमन रूम क्या था, यह तो बहुत बड़ा हॉल था और हम सभी छात्रों के एकत्र होने के बाद नियमतः रूप से रैगिंग लेने वाले सीनियर्स लोग हमलोगों का attendence लेते थे ताकि कोई चालाकी दिखा कर अपने रूम में  छुप ना जाये |

रात के दस बज रहे थे , हालाँकि हमलोग डिनर ले चुके थे और नींद भी आ रही थी | तभी  बॉस लोगों का हुक्म सुनाई पड़ा …. तुम लोग  सभी बारी बारी से अपने जीवन से घटी कोई ऐसी महत्वपूर्ण घटना को सुनाओ  जिसने तुम्हारे जीवन में गहरा प्रभाव डाला हो |

सब लोग अपने  जीवन से जुडी कोई ना कोई घंटना को सभी के समक्ष सुना  रहे थे | और उनकी सच्ची कहानियों को सुनकर बहुत मज़ा भी आ रहा था |

मैं भी मन ही मन सोच रहा था कि अपने जीवन से जुड़ी कौन सी घटना सुनाया जाये क्योकि अगला नंबर मेरा ही आने वाला था | तभी किसी ने विमलेश  का नाम ले लिया |

इसका मतलब  अब विमलेश को अपनी जीवन से जुडी ऐसी कोई कहानी सुनानी थी |

वैसे वह बहुत शर्मीला किस्म का था लेकिन वहाँ तो सब लोगों के सामने कहानी सुनाना मज़बूरी थी |

वह बेचारा शुरू शुरू में थोडा नर्भस हो रहा था, फिर भी हिम्मत जुटा कर अपने ज़िन्दगी में घटी   एक  महत्वपूर्ण घटना को सुनाना शुरू किया |

अब इस घटना की जानकारी विमलेश की ज़ुंबानी सुनिए ….

बात उन दिनों कि है जब मैं गया कॉलेज में पढता था |  वैसे आप सभी लोग को पता ही है कि मैं जहानाबाद के सूरजपुर गाँव का रहने वाला हूँ |

मेरे पिता जी गाँव के बड़े किसान है |  हमलोगों की गाँव में अच्छी इज्जत प्रतिष्ठा है  और उस पर कि  अगर इस पिछड़ा गाँव से कोई लड़का शहर में पढने चला जाये तो उस घर की इज्जत और भी बढ़ जाती है |

उन दिनों जे पी आन्दोलन बड़े जोरो पर थी और हम सब विद्यार्थी  अपने हॉस्टल में काफी सतर्क और चौकन्ने रहते थे |

दोपहर तीन बजे का समय रहा होगा और मैं खाना खाकर  हॉस्टल के अपने कमरे में आराम कर रहा था | तभी एक देहाती सा  आदमी जो  धोती कुरता पहने हुए था,  मुझे खोजते हुए मेरे रूम तक  पहुँच गया  और दरवाज़ा खटखटा दिया | मैं चौक कर उठा और फिर सोचा शायद कोई दोस्त आया होगा |

मैं उठ कर दरवाज़ा खोला तो देखा वह  ग्रामीण सामने खड़ा था |

मैंने  उससे पूछा …आप कौन है और क्या चाहते है ?

तो उसने ज़बाब दिया .. .हम आपके पिता के दोस्त है और उन्होंने यहाँ आपको बुलाने के लिए भेजा है |

मैंने फिर पूछा …लेकिन मेरे पिता जी कहाँ है और होस्टल में खुद क्यों नहीं आये ?

इसपर उस  आगंतुक ने कहा …वो किसी काम में उलझे  हुए  है इसलिए आप के लिए कार भेजा  है, आप चल कर वही मिल लें |

मुझे पता था कि पिता जी जब भी गाँव से गया शहर आते हैं तो बहुत सारी  पेंडिंग काम भी निपटाते थे |

शायद मेरे पिता जी काम में उलझे होने के कारण यहाँ तक नहीं आ सकें होंगे | ऐसा सोच कर मैं उनके साथ कार में बैठ कर चल दिया |

मैंने सोचा कुछ ही समय में  पिता जी के पास पहुँच जाऊंगा, और उनसे मिल कर उनका हाल समाचार जान लूँगा |

रास्ते  में एक जगह मेरी कार रुकी और देखा कि कार का दरवाजा खोल कर मेरे दोनों तरफ दो हट्ठा कट्ठा  आदमी बैठ गए हैं और फिर कार आगे चल दी |

मुझे उनलोगों को देख कर अजीब महसूस हुआ |  मुझे लगा कि पिता जी पहलवान टाइप आदमी को मेरे पास क्यों भेजेंगे ?

मैंने पूछा …पिता जी कहाँ है ?

मेरे पास बैठा आदमी ने कहा …वहीँ तो जा रहे है |

लेकिन थोड़ी देर के बाद मैंने देखा, मेरी कार तो शहर छोड़ चुकी है और अब हाईवे का रास्ता पकड़ लिया  है |

मुझे समझते देर ना लगी कि मैं किसी मुसीबत में फँस गया हूँ |

मैं काफी घबरा गया था | मुझे पता था कि उन दिनों आपसी रंजिश में बदला लेने के लिए परिवार के किसी सदस्य या उसके बच्चे को सुपारी देकर क़त्ल करा दिया जाता था |

जी हाँ , उन दिनों गया और आसपास के इलाकों में “छह इंच छोटा कर देना” एक मुहावरा  प्रचलित था …छोटा करना यानि गर्दन काट लेना |

हो सकता है मेरे पिता के कोई दुश्मन ने मुझे जान से मारने की सुपारी दी हो |

मेरे मन में ख्याल आया कि, कही सुनसान जगह पाकर मुझे भी मार कर झाड़ियों में फेक देगा |

मैं अपनी मौत को बहुत करीब से देख रहा था | फिर भी हिम्मत कर  मैं उनलोगों का विरोध करने लगा और कहा …मुझे यही उतार दो,  नहीं जाना मुझे अपने पिता जी से मिलने |

इतना सुनना था कि मेरे पास  बैठे एक पहलवान ने पिस्तौल निकाल ली और मुझे दिखाते हुए कहा …चुप चाप बैठे रहो और मेरे साथ चलो , वर्ना अभी  यहीं छह इंच छोटा कर दूंगा |

मैं बहुत डर गया,  जान किसको नहीं प्यारी लगती है | अनायास ही मेरा हाथ मेरी गर्दन पर चला गया और  मैं मन ही मन भगवान् को याद करने लगा और पभु से कहा …मेरी जान बचाओ प्रभु |

तभी अपनी कार हाईवे को छोड़  किसी गाँव की तरफ मुड़ गई |  मुझे तो यह पता था कि मैं किडनैप कर लिया गया हूँ लेकिन किस कारण से मेरा अपहरण हुआ है अभी तक पता नहीं चला था | शायद फिरौती की डिमांड करे |

फिर भी मैं लगातार विरोध  करता रहा,  लेकिन अकेला होने के कारण मैं उनलोगों के चंगुल से निकल नहीं पा रहा था |

मैंने उन लोगों को  डराने के लिए  कहा …  मेरे पिता जी को जैसे ही पता चलेगा , तो तुमलोगों की खैर नहीं |

लेकिन मेरे बातों का उनलोगों पर कोई असर नहीं हो रहा था | वो लोग चुप चाप बैठे थे और कार अपनी  रफ़्तार से भाग रही थी |

शाम बीत चुकी थी और अब अंधियारा घिर आया था |  कार अँधेरी रास्तों से गुजरता हुआ एक गाँव में पहुँचा और एक घर के सामने मेरी कार को  रोक कर मुझे उतरने को कहा गया |

 मैं कार के खिड़की से बाहर देखा …तो सामने एक घर दिखा | घर को रंगीन बल्ब और रौशनी से सजाया गया था और दरवाजे पर शहनाई  वाला शहनाई  बजा रहा था | जैसे लग रहा था  यहाँ कोई शादी होने वाली है |

अब मेरा दिमाग ठनका  | मुझे समझते देर ना लगी कि मुझे किडनैप कर लिया गया है, लेकिन फिरौती के लिए नहीं बल्कि ये लोग मेरी जबरदस्ती शादी कराने के लिए यहाँ लाये है |

अब मुझमे भी थोड़ी सी हिम्मत आ गई क्योकि मुझे महसूस हो रहा था कि ये लोग जान से तो नहीं मारने वाले है |

इसलिए मैंने अपना विरोध और तेज़ कर दिया |  लेकिन वो लोग ज़बरदस्ती मुझे पकड़ कर घर के अन्दर ले गए, जहाँ पहले से ही शादी की पूरी तैयारी कर रखी थी |

पंडित जी भी अपना स्थान ग्रहण किये हुए थे और एक दुल्हन भी मंडप में बैठी थी |

मुझे ज़बरदस्ती नए कपडे पहनाये गए |  माथे पर मौरी सजाया  गया और जबरदस्ती  मंडप में दुल्हन के बगल में बैठा दिया गया |

मेरे बैठते ही पंडित जी ने मंत्र उच्चारण शुरू कर किया  | मैंने  दुल्हन की तरफ एक बार देखने की कोशिश की पर मुँह पूरी तरह ढका हुआ था |

मेरा मन बहुत घबरा रहा था और मैं मंडप में बैठा सोच रहा था कि यह जबरदस्ती की शादी मेरे ज़िन्दगी और भविष्य को बर्बाद कर देगी और  इस घूँघट के पीछे पता नहीं यह “अनजाना लड़की” कौन है और कैसी है ?

 इसे मेरे पिता जी और परिवार वाले स्वीकार कर पाएंगे  या नहीं |  मैं जैसे ही वापस पिता के सामने जाऊंगा तो वो हमें  गुस्से में गोली ही मार देंगे | मेरे पिता जी इस तरह की शादी को अपनी सहमती नहीं दे सकते है  क्योंकि  यह उनके इज्जत प्रतिष्ठा से जुडी बात है |

मैं मन ही मन सोच रहा था कि किसी तरह मौका पाकर यहाँ से भाग जाऊं लेकिन उन लोगों का इंतज़ाम एक दम फुल- प्रूफ था |

मैं इन्ही बातों में उलझा हुआ था, तभी पंडित जी ने कहा …, अब विधि पूर्वक दूल्हा –दुल्हन की शादी संपन्न हुई |

मुझे वहाँ से उठा कर एक रूम में पलंग पर बैठा दिया गया और दुल्हन भी मेरे बगल में बैठी थी |

मैं अब तक उस दुल्हन के चेहरे को नहीं देख पाया था लेकिन मैंने अनुमान लगाया कि लड़की ज़रूर बदसूरत  होगी , इसीलिए तो मुझे किडनैप करके शादी किया जा रहा है |

मैं गुस्से में एक तरफ बैठा था और अपने पिता के गुस्से को याद कर रहा था |

तभी मेरी सास अर्थात दुल्हन की माँ प्रकट हुई और मुझसे कहा …मेहमान जी, आप अभी तक गुस्सा है ? आपने पानी तक नहीं पिया |

मेरे पिता जी मेरा खून पी जायेंगे …मैंने गुस्से में कहा |

सासु माँ हँसते हुए बोली  … हमलोग अनजान लोग नहीं है | आप तो इस लड़की को बचपन से ही जानते है |

क्या आप सुनीता को भूल गए ,? जब आप चाचा के यहाँ  पटना जाते थे तो हमलोग  उनके बगल में ही तो रहते थे | उसी समय आप को देखा तो मन ही मन फैसला कर लिया था कि इसकी शादी आप से ही करेगे | क्योकि इतना सुन्दर लड़का और भरा पूरा परिवार कहाँ मिलेगा ?

जैसे ही सुनीता का नाम मेरे कानो में पड़ा तो बचपन की वो याद ताज़ा हो गई | तब मैं कोई दस साल का था और यह शायद आठ साल की रही होगी |

अब तो बड़ी हो गई है और पता नहीं अब कैसी दिखती होगी |

मैं सोच तो रहा था लेकिन घूँघट उठा कर उसके चेहरे को देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी |

मुझे तो बस अपने पिता जी के गुस्से को याद कर दिल घबरा रहा था |

तभी लड़की की माँ ने कहा …, अरे बेटी,  तुम घूँघट तो उठाओ | मेहमान  तुम्हे देखेंगे तो ज़रूर पहचान लेंगे |

माँ के कहने पर सुनीता ने अपना घूँघट उठाया | मैं देख कर दंग रहा गया | आज वह दस साल पहले वाली सुनीता नहीं थी |  वह तो अब  सुन्दर और जवान युवती बन चुकी  थी |

उसे देख कर मन को तसल्ली हुई लेकिन फिर भी पिता जी का डर मन में घूम रहा था |

इसी तरह कुछ दिन वहाँ बीते और फिर उनलोगों ने विदाई का प्रोग्राम तय कर दिया |

इसके लिए गाडी की व्यवस्था की गई | लड़की को दिए जाने वाले सामान को भेजने हेतु एक अलग गाड़ी की व्यवस्था की गई | 

और फिर मुझे अपने गाँव दुल्हन के साथ रवाना  कर दिया गया | मैं जब अपनी पत्नी को लेकर घर पहुँचा तो जिस बात का डर था वही हुआ |

पिताजी गुस्से से आग बबूला थे और मुझे घर में घुसने ही नहीं दिया और कहा ….तुम वापस चले जाओ | अब तुमसे मेरा कोई नाता – रिश्ता नहीं रहा |

अजीब स्थिति थी | गाड़ी वाले सामान उतार  कर जा चुके थे ….और मैं अपनी पत्नी के साथ घर से बाहर  दलान  में बैठा हुआ था |  पत्नी रोये जा रही थी |

फिर गाँव कुछ बड़े बुजुर्ग और खलीफा लोग पिता जी के पास आये और उन्हें समझाया कि अब जो हो गया है उसे स्वीकार करने में ही भलाई है |

 …और इस तरह  से यूँ तो इस घटना का पटाक्षेप हो गया पर मैं इस घटना को आज तक भूल नहीं पाता  हूँ ….

हम कभी मिले नहीं, फिर भी मेरी खबर रखता था

अनजान राहे थी, फिर भी हमें साथ साथ चलना था …

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हर ब्लॉग कुछ कहता है –4

रिटायरमेंट के पहले दैनिक जीवन में बहुत सारे मित्र हुआ करते थे, चाहे वे सहकर्मी हो या और दुसरे लोग | दोस्तों का एक समूह होता है, जो हमारे जीवन में टॉनिक का काम करता  है | चाहे जब भी मन उदास हो बस दोस्तों के पास चले जाने से या मोबाइल पर उनसे बात कर लेने से ही  मन ठीक हो जाता है |

लोग ठीक ही कहते है दोस्तों की महफ़िल में हर बीमारी का इलाज है | दोस्त दवा देकर इलाज़ नहीं करते है बल्कि उनके अलफ़ाज़ ही दवा का काम करते है |

लेकिन रिटायरमेंट के बाद बहुत सारे परिवर्तन होते है हरेक की ज़िन्दगी में | वो दोस्तों का समूह छुट जाता  है और उनसे  मिलना – जुलना शायद ही हो पाता है |

मैं भी रिटायरमेंट के बाद ऐसे ही दौर  से गुज़र चूका हूँ | ऐसी अवस्था में दोस्तों और उसके समूह की कमी बहुत खलने लगती है |

लोगों ने कहा, सोशल मीडिया… ख़ास कर फेसबुक पर दोस्त बनाने की असीमित  संभावनाएं है |

मुझे उनका सलाह  भी ठीक  लगा और फिर क्या था | फेसबुक पर फ्रेंड्स बनाना शुरू कर दिया | विभिन्न तरह के फ्रेंड्स बनाने के मौके मिल रहे थे | मैं जब भी, फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजता तो  तुरंत उनका ज़बाब आता …,, फ्रेंडशिप एक्सेप्टेड |

लेकिन यह इन्टरनेट और सोशल मिडिया तो एक तरह का “काला जादू” है, मुझे तो खास कर तरह तरह के अनुभव हो रहे है |

एक विदेशी औरत का मेसेज आया …आई लव यू | मैं मेसेज पढ़ कर चौका |

सुबह का समय था और मैं उस समय एक पार्क में टहल रहा था | संयोग से वहाँ मेरे एक मित्र साथ ही टहल रहे थे | मैं उनसे इस बात को शेयर किया |

उन्होंने हँसते हुए मेरी ओर देखा और कहा …आप अपनी शक्ल  आईना में ज़रूर देखते होगे |

मैंने कहा …हां ज़रूर देखता हूँ |

तो भी आप कुछ नहीं समझे …उन्होंने पूंछा |

मैं उनकी ओर देख कर कहा …क्या मैं अब handsome नहीं लगता हूँ ?

इतना सुनना था कि इस पर उन्होंने जोर से ठहाका लगाया और फिर एक वाक्या सुनाया |

उनका कोई मित्र फेसबुक में इस तरह के फ्रेंड के जाल में फंस गया | उसे  भी एक सुन्दर सी स्मार्ट सी  दिखने वाली हसीन फ्रेंड ने भी “आई लव यू बोला” था, और वो बेचारे बुढ़ापे में इश्क के शिकार हो गए | इस छोटी सी मेसेज ने मानो  उनकी ज़िन्दगी ही बदल दी |

अब वे बन -ठन  कर रहने लगे,  अच्छे -अच्छे कपडे और बालों में डाई और आँखों पर सोने के फ्रेम वाला चश्मा  ….मानो  उनकी जवानी फिर से लौट आई हो |

 अब वो दिन रात मोबाइल पर अकेले में चैट करने लगे | जब बातों का सिलसिला शुरू होता तो ख़तम होने का नाम ही नहीं होता. …खूब मेसेज का आदान प्रदान होता रहा और उनको इसमें काफी मज़ा आने लगा |

और तो और वे इस बात को औरों से राज़ ही रखते थे और जब भी मौका मिलता बात करते और अपने को भाग्यशाली समझते कि इस उम्र में भी  कोई इतनी सुन्दर कन्या उनसे इतनी देर तक बातें करती है और कभी कभी …”आई लव यू”  भी बोल देती है  |

कुछ दिनों तक यह सिलसिला यूँही चला फिर अचानक एक दिन उस हसीन दोस्त की घबराई हुई आवाज़ आई |

उन्होंने पूछा…. क्या बात है ? इतनी घबराई हुई क्यों हो ?

तो उधर से आवाज़ आई …डिअर,  मुझे थोड़ी परेशानी हो गई है | क्या तुम मेरी मदद करोगे ?

उस पर उन्होंने रोमांटिक आवाज़ में कहा …यार तुम्हारे लिए तो जान भी हाज़िर है | बोलो मैं तुम्हारी क्या मदद करूँ. ?

उस पर उस हसीन  दोस्त ने कहा …नहीं –नहीं,  जान देने की ज़रुरत नहीं है,  बस मेरा फ़ोन का बैलेंस ख़तम हो गया है उसे रिचार्ज करवा दो |

इस पर इन्होने कहा …अरे बस,  इतनी सी बात पर परेशान हो रही हो  |  मैं  अभी अपने खाते से रिचार्ज करवा दे रहा हूँ |  

इतना कह कर उन्होंने खाते का डिटेल share कर दिया ..और उसकी मदद करके उसका विश्वास जितने की ख़ुशी में अपनी पीठ खुद थपथपाने लगे |

उनकी ख़ुशी थोड़ी देर में ही काफूर हो गई, जब उन्हें यह मेसेज मिला कि उनके बैंक खाते से मिहनत से कमाई सारी जमा पूंजी निकल चुकी है |

उन्हें यह मेसेज पढ़ कर विश्वास नहीं हो रहा था | इतना बड़ा धोखा खा के वह स्तब्ध थे |

यह बात शर्म के मारे ना तो किसी को बता सकते थे और ना ही किसी विभाग में  शिकायत ही कर सकते थे ..क्योकि अपने खाते का सारा डिटेल खुद ने शेयर किया था |

जो भी सुनता उनका ही मज़ाक उडाता,  अतः कडवी घूट पी कर चुप रह जाना ही उचित समझा  |

कहावत चरितार्थ हो रही थी कि “अब पछताए होत क्या.. जब चिडिया चुग गई खेत ” |

वाक्या तो मजेदार था और मेरा एक मन कर रहा था कि मैं भी इस खेल में  थोडा आगे बढ़ू और “ आई लव यू “ बोल कर देखू कि क्या होता है |  लेकिन तुरंत ही अपने कान को हाथ लगाया और मन ही मन बोला ….तौबा तौबा और तौबा |

अब तो आप समझ ही गए होंगे ….. मेरी ओर देख कर उन्होंने कहा और फिर भ्रामरी प्राणायाम करने लगे |

और मैं चुप चाप उनके पास ही बैठ कर वो सभी कनेक्शन डिलीट करने में मशगुल हो गया |  

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जय  माँ  काली

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सफलता का रहस्य

और वह समय भी आ गया जब तालियों के गडगडाहट के बीच मेरा नाम पुकारा गया ..स्टेज पर आ कर पुरस्कार स्वरुप ट्राफी ग्रहण करने के लिए |

अवसार था, दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में आयोजित बैंक के पुरस्कार वितरण समारोह का | जिसमे बैंक के मैनेजिंग- डायरेक्टर खुद उपस्थित थे अपने हाथो से पुरस्कार देने के लिए |

अंचल के महाप्रबंधक महोदय, जो कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे …उन्होंने मेरा परिचय देते हुए वहाँ उपस्थित लोगों को बता रहे थे कि यह वही  शख्स है जिनका शुरू के दिनों में इन्सुरेंस व्यवसाय का प्रदर्शन बहुत ही ख़राब था और इसके लिए हमने इन्हें डांट भी लगाई थी |

लेकिन बाद में कुछ जादू सा हुआ और ये महाशय लगातार तीन सालों से इन्सुरांस बिज़नस में टॉप का प्रदर्शन कर रहे है |

आखिर इनकी सफलता का क्या राज़ है या क्या जादू है, आप सब अवश्य जानना चाहेंगे, मैं भी जानना चाहता हूँ  |

तो आइये इन्ही से जानते है, इनके सफलता का राज़ …यह कह कर महाप्रबंधक महोदय ने माइक मेरे हाथो में थमा दिया |

मैं चूँकि  स्टेज पर बोलने से बहुत घबराता था, अतः शुरू में थोड़ी घबराहट सी हुई | फिर मैंने अपने आप को हिम्मत बंधाया और बोलना शुरू किया ….

आदमी किसी भी व्यवसाय में तभी सफल होता है जब उसे बेचने की कला आती हो | वैसे तो हर इन्सान हर समय कुछ ना कुछ बेच रहा होता है | कोई अपना समय, तो कोई अपना स्किल. या अपनी कला, या ज्ञान बेचता है |

अगर  कोई मेरा प्लान स्वीकृत कर देता है या मेरी बातो को मान कर उसे कार्यान्वित करता है तो यह भी एक प्रकार का सेल्स ही है | कहने का मतलब यह कि हर आदमी सेल्स से प्रत्येक्ष  या परोक्ष रूप से जुड़ा हुआ है | फिर भी जाने या अनजाने सेल्स के नाम से ही डरते है |

डर इस बात ही होती है कि मैं इसे कर पाउँगा या नहीं ? या अगर मेरी प्रोडक्ट को किसी ने नहीं खरीदी तो फिर क्या होगा ? तरह तरह के सवाल मन में उभरते है |

आप सब लोग यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि मैंने  बैंक का बिज़नेस को करते हुए बीमा व्यवसाय  में भी कैसे सफलता हासिल की |

आज  मैं उस घटना के बारे बताना चाहूँगा जिसके कारण मैं मोटीवेट हुआ और अंततः इस बीमा बिज़नेस में अपनी सफलता के झंडे गाड़े |

यह उन दिनों की बात है जब मैं कोलकाता के एक शाखा में शाखा प्रबंधक था |

रविवार का दिन, मैं अपने घर पर कमरे में बैठा चाय पी रहा था तभी मुझे एक फ़ोन कॉल आता है …बहुत ही सुरीली आवाज़ में एक महिला पूछ रही थी …. सर,  आप अगले रविवार  को क्या कर रहे है ?

मैंने कहा ….मतलब ?

मेरा मतलब है सर कि हमारी एक कंपनी है जिसमे एक लकी ड्रा  कल ही निकाला गया था | जिसमे आप का भी नाम टेलीफोन नंबर के आधार पर सेलेक्ट किया गया है | जिसमे आप और आपकी धर्म पत्नी को एक गिफ्ट दिया जायेगा,  बस आप को हमारे वेन्यू पर आने का कष्ट  करना होगा | यहाँ शाम ५ बजे का गेट टूगेदर का कार्यक्रम है और इसमें रिफ्रेशमेंट की भी व्यवस्था है |

आप ज़रूर आना पसंद करेगे | मैंने आप का नाम कन्फर्म कर दिया है …क्या मैं सही हूँ ?

अब उस सुरीली आवाज़ की मल्लिका को मना  करते नहीं बना | वो अगर फ्री में ही कुछ देना चाहती है तो मुझे एतराज क्यों होगा | और सन्डे को शाम में घूमना –फिरना और रिफ्रेशमेंट भी फ्री |

इसमें कुछ भी घाटा नज़र नहीं आता,  सो मैंने कन्फर्म कर दिया |

मैं तय शुदा जगह पर और सही समय पर अपनी पत्नी को ले कर पहुँच गया | एक बड़ा सा हॉल और राउंड कांफ्रेंस वाली टेबल लगी हुई थीं और सभी पर एक एक जोड़ा बैठा हुआ था |

सो मुझे भी एक टेबल ऑफर किया गया और बैठते ही पानी और चाय से स्वागत किया गया |

थोड़ी देर में एक स्मार्ट सी एक  18 -20 साल की एक लड़की आकर मेरे सामने बैठ गई और बातों का सिलसिला कुछ इस तरह शुरू हुआ |

आप अपनी पत्नी और बच्चो से बहुत प्यार करते है ?…क्या मैं  सही कह रही हूँ ना सर ?

मैंने कहा ..सही है |

आप खुद को और अपनी परिवार को आर्थिक रूप से सुरक्षित देखना चाहते है…. है ना सर ?

मैंने फिर कहा ….जी हाँ |

इस तरह  उसने वो सभी प्रश्न पूछ डाले जिसका उत्तर वही मिलता जैसा वह चाहती थी | यानि हाँ में ही ज़बाब बनता था |

थोड़ी ही देर में पता चल गया कि वह “इन्सुरेंस – पालिसी” बेच रही थी | मैं भी उसके स्किल का बारीकी से अध्ययन करने लगा | वह अपने “प्रोडक्ट | पालिसी” की सभी विशेषताएं गिनाने  लगी | मैं चुप- चाप सुनता रहा | चूँकि बैंक में मैं भी वही सब कर रहा था…. ,जी हाँ, बैंक में इन्सुरेंस पोलिसी भी बेचा करता था |

फिर करीब आधे घंटे तक बातचीत के बाद वह मेरे काम- काज के बारे में जानना चाही |

जैसे ही मैंने कहा ….मैं बैंक में हूँ और हमलोग भी आप ही की तरह पॉलिसी भी बेचते है |

सुन कर वो थोड़ी सी मायूस दिखी, फिर अगले ही पल अपने को संभाल लिया और पहले जैसी जोश के साथ पॉलिसी के बारे में समझाने लगी |

यह सिलसिला करीब ४५ मिनट तक चला, इस बीच चाय और नास्ता आते रहा |

इतनी देर तक उसकी  बक – बक सुनने के बाद, अब मेरी बारी थी |

मैंने उससे बस इतना पूछा …तुमको पता था कि तुम जो मुझे बतला रही थी मुझे सब पता है और यह भी पता था कि मैं कोई भी पालिसी तुमलोगों से नहीं लेने वाला हूँ | फिर मेरे पीछे इतना समय बर्बाद क्यों किया ?

इसपर उसका ज़बाब सुनकर मैं आश्चर्यचकित   रह गया |

वो बोली. ..सर, मुझे पता था कि आप पालिसी नहीं खरीदेगें | फिर भी मैं अपना काम उसी जोश से कर रही थी ,क्योंकि सेल्स में रिजेक्शन भी आते है उसके लिए मानसिक तौर पर हम सब  तैयार रहते है और इसीलिए मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा  |

फिर भी, क्योकि मैं तुम्हारी बात नहीं मान रहा हूँ…तो तुम्हे गुस्सा या दुःख तो होता ही होगा ?

इस पर उसने जो अपनी  कहानी सुनाई वो सुन कर मैं दंग रह गया |

उसने बताया …मैं घर में अपनी माँ और एक छोटे भाई के साथ एक किराये की मकान में रहती हूँ | कुछ दिनों पूर्व मेरे पिता जी की कैंसर से मृत्यु हो गई थी | उनके बिमारी में सारे पैसे ख़त्म हो गए और मज़बूरी में मुझे नौकरी करनी पड़ी |

मैंने अपना ग्रेजुएशन बीच में ही छोड़ दिया | किसी  भी काम का कोई अनुभव नहीं होने के कारण,  मुझे मज़बूरी में इस प्राइवेट कंपनी में इन्सुरेंस पालिसी बेचने का काम मिला |

शुरू शुरू में तो किसी को भी अपना प्लान दिखाओ तो मना ही कर देता था | मैं रोज सोचती कि यह नौकरी मेरे बस की बात नहीं है | फिर मेरे सहयोगी मुझे हिम्मत देते और तब मैंने सीखी कि इस बिज़नेस के कुछ बेसिक सिद्धांत है… उसका पालन करना होगा |

मैं रोज़ सुबह सात बजे घर से निकल जाती हूँ और पहले ऑफिस में आकर एक घंटे अपने को charged up करती हूँ | हमारे बॉस उस समय हमलोग को मोटिवेट करते है | फिर दिन भर उसी एनर्जी से अपने ग्राहकों को प्लान दिखाती रहती हूँ और अपने मन में सोचती रहती हूँ कि मुझे अपनी बेस्ट परफोर्मेंस देना है |

चाहे कितनी भी रिजेक्शन मिले, मैं अगला ग्राहक में एक नए जोश और उत्साह से लग जाती हूँ | अब तो मुझमे बहुत धैर्य भी आ गया है और समझदारी भी |

उसकी कहानी को सुनकर मैंने  मन में सोचा कि यह छोटी सी लड़की इस जोश और लगन से इस challengable काम को कर सकती है तो मैं अपने बैंक के लिए इन्सुरेंस पालिसी क्यों नहीं बेचने में सफल हो सकता हूँ |

मैं दुसरे दिन से ही उन्ही बेसिक सिद्धांत को फॉलो कर काम  शुरू कर दिया | बस मैं दो चीजों का ख्याल रखता था…रिजेक्शन  से  घबराना नहीं है और  किसी ग्राहक के सामने, चाहे वह कुछ भी बोले अपना धर्य खोना नहीं है |

शुरू में मुझे भी काफी रिजेक्शन  मिले | काफी उलटी सीधी बातें सुननी पड़ी पर मैंने हार नहीं मानी |

एक कहावत है कि “हार के बाद जीत” है ….तो मैंने हार को पीछे छोड़ दिया है और जीत के साथ आप सबों के सामने हाज़िर हूँ इस सुन्दर ट्राफी के साथ |

मेरी बात समाप्त हुई और हॉल तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा ………..

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मेरी आवाज़ सुनो

मैं दशरथ हूँ | मेरा एक भरा पूरा परिवार है | मेरे चार बेटे है | राम, लक्ष्मण भारत और शत्रुघ्न |

मैं एक कंपनी में नौकरी करता था और अब रिटायर हो कर घर परिवार के साथ जीवन व्यतीत कर रहा हूँ  |  चूँकि भरा पूरा परिवार था मेरा और आमदनी सिमित थी, अतः शुरू से ही पैसों की तंगी  झेलनी पड़ी |

 लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों के वाबजूद भी मैं ने कोई गलत रास्ते नहीं चुने  और इमानदारी के साथ कमाए गए पैसो से परिवार का भरण पोषण करता रहा |

मैंने बच्चो को अच्छी सिक्षा  और ऊँचे संस्कार दिए | फिजूल खर्ची तो शुरू से ही पसंद नहीं थी | अतः जीवन की  गाड़ी कभी पटरी से उतरी ही नहीं | आज धन सम्पति और बैंक बैलेंस भले ना हो, पर  संतुष्ट ज़िन्दगी बिता रहा हूँ और रात  को चैन से सोता हूँ |

मेरे सारे बच्चें  भी अपने अपने कामो में व्यस्त है और हमलोगों के  बीच का सम्बन्ध और संवाद भी बना हुआ है |

लेकिन , मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ,  ….यह एक अहम् प्रश्न है और आप भी शायद ऐसा ही सोच रहे होंगे |

दरअसल, आज मैंने YouTube  पर एक  विडियो  देखा तो मन ज़रा विचलित हो गया |

एक 87 वर्ष का बाप अपने बेटे के बारे में क्या कह रहा है जरा अप भी सुनिए ………..

मेरा नाम अजय कुमार श्रीवास्तव है | मैं बिहार सरकार  के कृषि विभाग में जॉइंट डायरेक्टर के पद से रिटायर किया हूँ | मेरी उम्र ८७ साल है | अब मैं काफी वृद्ध  हो चूका हूँ |

मेरा बेटा संजय श्रीवास्तव मणिपुर जागुआ कैडर का फारेस्ट ऑफिसर है | मैंने  अपने बच्चो के साथ दिल्ली में रहने के लिए  अपना कंकर बाग (बिहार) स्थित मकान  एक करोड़  १० लाख रूपये में बेचा था और मेरे पुत्र ने मुझसे कहा कि  आप दिल्ली  में बच्चो के आस पास रहना पसंद करेंगे |

इसलिए मैं दिल्ली में आप के लिए मकान का बंदोबस्त कर दूंगा | और इस प्रकार मेरा ड्राफ्ट एक करोड़ दस लाख रुपए का, मेरे पुत्र ने ले लिया |और उसने दिल्ली में मकान खरीदने के बजाये पूरा पैसे अपनी पत्नी गीता श्रीवास्तव के नाम ट्रान्सफर कर दिया |

ऐसी हालत में मुझे आम लोगों से निवेदन है कि मेरे उम्र को ध्यान देते हुए  मेरा पैसा वापस दिलाया जाए |

उसके इस ह्रदय विदारक निवेदन से मैं आज  सोचने पर मजबूर हो गया हूँ कि जिस बच्चे के जनम लेने पर गाँव – घर में मिठाइयाँ बंटवाते  है ..उसके परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ते है | खुद अभाव में ज़िन्दगी काट लेते है और उसे अपने सामर्थ से ज्यादा देने की कोशिश करते है |

वही सपूत एक दिन कपूत बन जाता है और पैदा करने वाले को ऐसी ज़िन्दगी जीने पर मजबूर कर देता है कि उसे यह समझ नहीं आता है कि उससे संस्कार देने में चुक हो गई या परवरिश में कोई कमी रह गई  |

कभी कभी गैर लोग अपनों सा व्यवहार करते है और अपने लोग भी  गैरों जैसा …|.

ऐसा क्यों होता है  ? एक मूलभूत प्रश्न है मेरा… 

हालाँकि इसके बहुत सारे उत्तर हो सकते है पर मेरी समझ में जो बात आ रही है उसे उद्धरित करना चाहता हूँ | आज ज़माना तेज़ी से बदल रहा है या यूँ कहें कि हम तेज़ी से तरक्की कर रहे है |

नए नए आविष्कार हो रहे है और आदमी, आदमी न रह कर मशीन बनता जा रहा है | आज बड़े मकान, बाग – बगीचे, सारे ऐशों – आराम की  चीज़ें उपलब्ध  है | इन्हें पैसों से ख़रीदा जा सक्र्ता है | बस इन्हें खरीदने के लिए आप के पास पैसा होना चाहिए |

तो आज तरक्की का नाम पैसा ही है | जिसके पास पैसा है वह आधुनिक है,  विचारवान है …समाज का सम्मानित प्राणी है |  लेकिन जिसके पास पैसा नहीं है, वह इस समाज का दोयम दर्जे का प्राणी है |

वह लाख सज्जन हो,  पढ़ा – लिखा हो,  पर ज़िन्दगी और रोटी के लिए संघर्षरत आदमी आपकी और हमारी नज़रों में इज्जत का हकदार नहीं होता बल्कि वह समाज पर बोझ एवं मुर्ख प्राणी मात्र होता है |

आज पैसो की माया ने सारे रिश्ते – नाते, सामाजिक ताने – बाने और इसकी पहचान को छिन्न भिन्न कर दिया है |  यह तो स्वाभाविक है कि  लोग पैसों के पीछे दौड़ेंगे और अपने रिश्ते नातों, अपने माँ – बाप को अपने पैरों से रौदेंगे ही |

आज हममें न तो संतोष रह गया है और ना ही मानवता | हम और कितना गिर सकते है इसका अनुमान लगाना मुश्किल है |

हम बस और पाना चाहते है …दुनिया को ही खरीद लेना चाहते है |

इसके लिए क्या हम दोषी नहीं हैं ? हमारी सामाजिक व्यवस्था ..शिक्षा – दीक्षा …आधुनिकता का माहौल और पैसों की भूख के  लिए हम सब भी जिम्मेवार है |

हम भी तो अपनी पत्नी और बच्चो के लिए …अपने माँ बाप की अवहेलना करते है और जब हमारे बच्चे हमारे साथ वही करते है तो हमें दर्द होता है | हम उन्हें कोसते है |

हम समाज में गरीब और ईमानदार, सीधे – साधे आदमी की क़द्र नहीं करते है लेकिन  धूर्त और बेईमान पैसे  वालों की बहुत इज्जत करते है |

तो समाज में जब तक रिश्तो से ज्यादा पैसो की अहमियत होगी तो यही सब होगा | जो इस विडियो में दिख रहा है |

हाँ, अगर बदलाव लाना है तो हमें पहले अपने आप को बदलना होगा, अपनी मानसिकता को बदलना होगा ….आप का ख्याल है ?……

मुझे अपने विचार  कमेंट के माध्यम से बताएं….|

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आप तो ऐसे ना थे

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ज़िन्दगी में कभी कभी ऐसे  लम्हे आते है  जब जो हम अपने आप को  तरो ताज़ा महसूस करते है | उन पलों  में हम अपने सभी तरह की परेशानी भूल जाते है |

सच्चा दोस्त और सच्चा प्यार में बहुत ताकत होती है | वो हर समस्याओं का मुकाबला कर सकती है कुछ घटनायें हो जाती है जिससे ग़लतफ़हमी  भी  पैदा हो जाती है  जिससे मन खिन्न रहने लगता है . हमें लगता था कि  पिंकी के साथ भी ऐसा हो रहा था | लेकिन कल रात की घटना ने वो सारी  गलतफमी दूर कर दी थी | यह सच है कि  यहाँ इस जगह मेरे लिए अकेले रहना और ज़िन्दगी में रोजमर्रा की समस्याओं से जूझते रहना कठिन हो रहा था और अगर कोई अपना बनकर आप का ख्याल रखे और आपको अकेलापन का भी  एहसास ना होने दे तो मन को ख़ुशी तो मिलती ही  है और  साथ ही आप को उसके प्रति एक अलग तरह का आकर्षण हो जाता है |

इसके पहले की घटना जानने के लिए नीचे दिए link को click करें ..

https://infotainmentbyvijay.data.blog/2020/05/18/%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b8/

मैं बिस्तर पर बैठा यह सब सोच ही रहा था कि  सुबह सुबह पिंकी अचानक छत पर आयी और जब बिस्तर  पर बैठे बैठे उससे मेरी  नज़र मिली तो मैंने  महसूस किया कि  वो कुछ कहना चाहती थी ..मैं इशारे से रात के खाने का धन्यवाद किया |  मैं कुछ बोलना चाह  रहा था कि  उससे पहले ही एक कागज़ का टुकड़ा मेरे आँगन में फेक कर जल्दी से सीढिया उतरती हुई अपने घर के अंदर चली गई |

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मैंने  घडी में देखा तो सुबह के सात बजने वाले थे | मैं जल्दी से बिस्तर  से उठा और उस  कागज़ के टुकड़े को उठा कर पढ़ा जिसमे लिखा था कि  आज शाम पांच बजे नदी पर मिलना चाहती थी  | कुछ दूर पर एक नदी है जहाँ कभी कभी घुमने जाया करता था .. शायद हमारे दिमाग में चल रहे सभी प्रश्नों का ज़बाब देना चाहती थी ,या वो अपने मन की बात कहना चाहती थी |

मैं उसके  पत्र को जेब में रखा ही था, तभी मनका छोरी आंधी तूफ़ान की तरह घर में प्रवेश की और जल्दी  से बोली कि  ..पैसे दो,  दही और सब्जी लानी है | तभी खाना बन पायेगा | मैं जबाब में बोला कि  तू पहले किचन में जाकर देख, मैं रात सब्जी लेता आया था और हाँ, तेरे लिए ड्रेस  भी ले आया  हूँ  | उसने  जल्दी से पैकेट को खोल कर देखा तो उसमे बहुत सुंदर “घगरा – चोली” देख वह तो जैसे ख़ुशी से पागल ही हो गई | शायद पहली बार किसी ने इस तरह का तोहफा दिया था | वह कपड़े का पैकेट ले कर तुरंत झुकी और मेरे पैर छू लिए | और वो बहुत ही बहुत भावुक हो गयी | उसके आँखों में आँसू देख मैं भी भावुक हो गया | शायद ख़ुशी के आँसू  थे  |

पैसो से ज्यादा रिश्तों की अहमियत होती है | कोई किसी चीज़ की चाहत करे और वह तुरंत कोई पूरी कर दे तो  उसकी नज़र में वह भगवान् का दर्ज़ा पा  लेता है | उसके चेहरे  की ख़ुशी को देख कर महसूस हुआ कि  छोटी छोटी लम्हों को सेलिब्रेट करना चाहिए | 

वह जल्दी जल्दी अपने काम में लग गई और सबसे पहले चाय बनाकर रोज़ की तरह  दो गिलास में ले कर आयी ..एक मुझे देते हुए मेरे सामने ही ज़मीं पर बैठ कर खुद भी पिने लगी | उसकी खुश चेहरे को देख मुझे भी खुश रहने की प्रेरणा मिलती थी |

आज शाम को पिंकी से भी मुलाकात  का समय तय हो चूका था | आज उसके दिल की बात सुनूंगा और कुछ अपने दिल की बात भी करूँगा | आज मैं थोडा ज्यादा ही भावुक हो गया था |

खैर, खाना खा कर बैंक रवाना हो गया | रोज़ की तरह आज भी बैंक में काफी भीड़ थी और तुरंत ही हमलोग अपने काम में व्यस्त हो गए | तभी मेनेजर साहेब के चैम्बर में फ़ोन की घंटी बजी | मेनेजर साहेब अभी तक बैंक नहीं आये थे, इसीलिए चपरासी, कालू राम दौड़ कर फ़ोन अटेंड करने गया ..और फ़ोन पर वार्तालाप करते करते जोर जोर से रोने लगा | चूँकि बैंक में काफी भीड़ थी और हमलोग काम में काफी व्यस्त थे तो उसकी रोने की आवाज़ सुनकर हम सब चौक गए और मैं तुरंत उसके पास पहुंचा और प्रश्न भरी  नज़रों से उसे देखा ..तो फ़ोन रखते हुए उसके बताया कि  हमारे मेनेजर साहेब अब नहीं रहे |

एक बार तो उसकी बातों पर हमलोग तो बिश्वास ही नहीं हुआ | मैं दुबारा  उससे प्रश्न किया तो पूरी बात बताई कि  मेनेजर साहेब के बड़े भाई का फ़ोन था और उन्होंने बताया कि  गाँव से मोटर साइकिल पर बैंक आ रहे थे तो रास्ते में उनकी मोटर साइकिल ट्रक  से टकरा गई और उनकी spot death हो गई | हमलोग सुन कर हक्का – बक्का हो गए और कुछ देर के लिए बैंक का काम ही बंद कर दिया और जो पुराने ग्राहक थे वो भी सुनते ही अफ़सोस जताने लगे |

मैं सर पकड़ कर अपने सीट पर बैठ सोचने लगा | कितना भला इंसान जो हर दम सभी को मदद को तैयार रहते थे | यहाँ तक कि  मुझे मकान  भी दिलाने में उनका ही योगदान था | कल तक सभी कुछ सामान्य गति से चल रहा था और अचानक सब कुछ समाप्त | मैं यही सोचता रहा कि  ज़िन्दगी की हकीकत बस यही है ….

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हमलोगों ने जल्दी से बैंक का काम समाप्त कर करीब चार बजे दिन में आबू रोड के पास स्थित उनके  गाँव “अम्बा” के लिए रवाना हो गया | और लौटते हुए रात के आठ बज चुके थे | हाथ मुँह धो कर बैठा ही था  कि  किसी ने दरवाज़ा पर दस्तक दी ..खोल कर देखा तो पिंकी दरवाजे पर खड़ी  थी …वो शिकायत भरे  लहजे में मुझे देखने लगी  तो मैं ने आज की सारी  घटना को बता दिया ..उसके चेहरे पर भी दुःख के भाव उभर आये | फिर वो बोली खाना लाती हूँ | मैंने उसे मना करते हुए कहा कि  मुझे भूख नहीं है ..

मन भी इस घटना के कारण  दुखी था ..अभी तुम जाओ …कल बात  करेंगे…    

ज़िन्दगी भी क्या चीज़ है …कब हंसाएगी कब रुलाएगी पता नहीं ,

भगवान् तुम भी ग्रेट हो …अच्छे लोगों को जल्दी बुला लेते हो…

  खैर ज़िन्दगी के इस सच को स्वीकार लेना ही समझदारी है ….

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# अलमारी से झांकती किताबें #

यूँ ना छोड़ ज़िन्दगी की किताब को खुला

बेवक्त की हवा ना जाने कौन सा पन्ना पलट दे ..

आज सुबह सुबह जब मैं पार्क में टहलने गया तो  कुछ दोस्त वहाँ  मिल गए , दुआ सलाम के बाद हमलोग एक साथ वाकिंग  ट्रैक पर टहल रहे थे, तो आपस में बात करना लाज़मी ही था /

शर्मा जी ने कहा … ज़माना बहुत बदल गया है | हम अपने ज़माने से आज के समय की तुलना करते है तो ज़मीन  – आसमान  का  फर्क पाते है, …. और आज लॉक डाउन  ने तो हमारी ज़िन्दगी  पूरी तरह बदल डाली है  | अब हर चीज़ ऑनलाइन हो गया  है ……… ऑनलाइन पढाई , ऑनलाइन खरीदारी,  ऑनलाइन मीटिंग . ऑनलाइन मनोरंजन , और तो और बहुत सारी किताबें भी अब ऑनलाइन हो गया है  |

वो भी क्या दिन थे जब किताबों की एक अलग ही दुनिया मौजूद रहा करती थी ……..हर उम्र,  हर पेशा और हर  विचार धारा,  के उपयुक्त ..भिन्न भिन्न तरह की किताबें |

जादू टोना, तंत्र मंत्र, साहित्यिक, जासूसी और रहस्य रोमांस, धार्मिक, संस्मरण और न  जाने कितने ही  तरह की पुस्तकें /

फूट-पाथ  पर बिकने वाली उन सस्ती पुस्तकों का भी  अपना अलग ही जलवा था …लोग उसे छुप कर पढ़ा करते थे ..चोरी..चोरी |

और बहुत सारी पत्र – पत्रिकाएं  भी थी |  हरेक पाठक वर्ग के लिए अलग अलग |

इंसान का सबसे बड़ा मित्र था तो किताब एवं पत्र पत्रिकाएं ही  | चाहे समय बिताने के लिए, चाहे सचमुच के ज्ञान प्राप्ति के  लिए या फिर यह  दिखाने  के लिए कि  मैं  बुद्धिजीवी वर्ग से हूँ,  लोग हांथो में हर समय कुछ न कुछ पुस्तकें रखते थे  | कभी कभी यह दिखाने के लिए  कि  मैं बहुत व्यस्त हूँ  लोग पुस्तक खोल कर बैठे रहते थे |

पहले पुस्तके पढना मज़बूरी भी थीं क्योंकि मनोरंजन के नाम पर बस पुस्तकें  ही थे | हाँ , मनोरंजन के नाम पर फिल्मे भी थी,  पर हर जगह हर आयु वर्ग के लिए वो  सुलभ  नहीं थे | फिल्म देखना.. खासकर बच्चो एवं युवाओं के लिए एक मुश्किल काम था |

एक तो घर वालों से छुप – छुप कर सिनेमा हॉल में जाना पड़ता था,  दुसरे पैसे भी खर्च करने पड़ते थे | अगर फिल्म नयी हो तो मत पूछिये  …धक्कम – धक्का ,भीड़-भाड़  और टिकट ब्लैक में खरीदना विरले ही कर पाते थे |

एक और साधन था मनोरंजन का …जी हाँ,  रेडियो |  लाख ..घडघडाता हो …आवाज़ कभी कभी धीमी हो जाती हो, ( रेडियो स्टेशन ठीक से नहीं पकड़ने के कारण ) पर उसका एक अलग ही क्रेज़ था |

बुधवार को रात आठ बजे से “बिनाका गीत माला”  रेडियो सिलोन से प्रसारित होता था | इसे प्रस्तुत करने वाले अमिन सयानी की खनकती आवाज़ ,घर घर में पहचानी जाती थी |  फिर विविध भारती , आकाशवाणी से …हर घंटे समाचार | अगर आप चौपाल (आकाशवाणी पटना) सुनते होंगे तो मुखिया जी और बुधन भाई ज़रूर याद होंगे | भोजपुरी नाटक  …लोहा सिंह (रामेश्वर सिंह कश्यप , प्राचार्य जैन कॉलेज ,आरा  द्वारा लिखित एंड मंचित ) को सुनने के लिए लोग हफ्तों इंतज़ार करते थे | याद कीजिये उसके पात्र …फाटक  बाबा, खदेरन की मदर,  बुलाकी सिंह ..क्या मज़ा आता था सुनकर | 

हाँ, उस समय टेलीविज़न का आगमन  तो हो चूका था  पर यह बड़े शहरों तक ही सिमित था | 

अब वापस पुस्तक  पर आते हैं |

जब भी लोग सफ़र पर निकलते थे.. .ट्रेन का सफ़र हो या बस का …पिकनिक हो  या सभा – सेमीनार,  पास में पुस्तकें और मैगज़ीन  ज़रूर रखते थे |  ज्ञान बढाने  के लिए या  पढने के लिए या फिर टाइम पास करने के लिए |

पुस्तकें या पत्रिकाएँ हर आयु वर्ग का लिए मौजूद रहता था | बच्चो की पत्रिकाएँ …चंदामामा , नंदन, बालक…लोटपोट. पराग, फैंटम  या मैड्रक की कार्टून वाली किताबें | बच्चे इनके  दीवाने  रहते थे |

भूत –प्रेत,  तिलस्म, ऐयारी, विक्रम -वेताल  की किताबें बहुत पॉपुलर थी उस समय | इस सब का एक विशेष पाठक वर्ग था  | मुझे याद है बाबु देवकी  नंदन खत्री की तिलस्म वाली पुस्तकें …”भूत नाथ”,  कुल १८ भाग में छपा था | लोग उसके छपने का इंतज़ार करते थे | बाद में उसपर  चंद्रकांता संतति नामक  मशहूर सीरियल भी बना था |

जासूसी किताबों का भी अलग क्रेज़ था |  इबने सफी (बी.ए .) की  जासूसी दुनिया , वेड प्रकाश कम्बोज एवं कर्नल रंजित की जासूसी वाली किताबें ,( हालाँकि उस समय हम बच्चो को पढने की मनाही थी पर अपनी  स्कूल की किताबों में छुपा कर घर लाते  और छुप छुप कर पढ़ा करते थे ) का भी काफी क्रेज़ था |

रूमानी एवं प्रेम से परिपूर्ण  कहानियों  एवं उपन्यासों का अलग संसार मौजूद था |

गुलशन नंदा , कुशवाहा कान्त,  रानू …कई मशहूर नाम थे | अगर सुखांत (happy ending ) वाले उपन्यास पढने हो तो फिर गुलशन नंदा , नहीं तो फिर कुशवाहा कान्त या रानू  तो थे ही |

गंभीर साहित्य और उपन्यास, कहानी या कविता – संग्रह इत्यादि तो पाठ्यक्रम में पढाये जाते थे | उनमे प्रेमचंद,  दिनकर,  महादेवी वर्मा , सुमित्रानंदन पन्त  और …अनगिनत नाम थे |

मुझे  अमृत लाल नागर की “अमृत और विष”  तथा कवियत्री अमृता प्रीतम की “रसीदी टिकट” बहुत पसंद थे | ये सब किताबें स्कूल की लाइब्रेरी में उपलब्ध रहते थे | इनका भी एक  विशेष पाठक  वर्ग था जो साहित्य चर्चाओं और कवि  सम्मेलनों का लुफ्त उठाता  था और अपने बुद्धिजीवी होने का दम भी भरता था …| 

धार्मिक पुस्तकों की बात की जाये और “गीता प्रेस” गोरखपुर की चर्चा न हो भला,  यह कैसे हो सकता है | रामायण, राम चरित मानस , महाभारत इत्यादि पुस्तकों को सस्ते दामों पर आम जनता में सुलभ तो कराया ही,  साथ ही साथ देश भक्ति एवं चरित्र निर्माण की पुस्तकों को भी छाप कर घर- घर पहुँचाने का श्रेय भी गीता प्रेस को ही जाता है |

बच्चो के लिए बाज़ार  में आई “कॉमिक्स” एवं “कार्टून”  की पुस्तकें बच्चों में तो काफी लोकप्रिय थे ही,  पर ये अन्य आयु वर्ग में भी पढ़े जाते थे | चाचा चौधरी को भला कौन भूल सकता है |

पहले हर चौक – चौराहे पर बुक स्टाल हुआ करते थे | कहीं भी  हाट  बाज़ार लगा हो या भीड़ – भाड़ वाले जगहों में ज़मीन  पर ही पुस्तकों की दूकान  सज जाती थी और लोग इन्हें देखते और ख़रीदा भी करते थे |

हमारे समय में पुस्तकों एवं पत्रिकाओं की चलती फिरती दूकान भी होती थी | बेचने वाले हाथो में, झोले में किताबों को लेकर ट्रेन में बस में या चौक – चौराहों पर पुस्तकें बेचा करते थे |

मनोहर पोथी से लेकर अंग्रेजी सिखाने वाली पुस्तकें  या देसी दवा या कढाई – बुनाई सिखाने वाली पुस्तके भी  उसके पास उपलब्ध होती थी | हाँ, जनरल नॉलेज सिखाने वाली किताबें भी वह रखता था |

हालाँकि आज भी किताब की दुकाने हैं, पुस्तके है  और  उसे पढने वाले लोग भी है पर उसे खरीदने वाले, पढने वाले और अपने बुक सेल्फ में सजा कर गर्व करने वाले लोगों की संख्या काफी कम हो गयी है ..|.

अब तो किताबें ऑनलाइन हो गई है,  google सर्च  करते है , और डाउनलोड कर पढ़ लेते है ..लेकिन मेरे समय में तो हमें याद है कि किताब को  हमेशा बगल में दबाए रखते थे या पढ़ते – पढ़ते छाती पर किताब रख कर ही सो जाते थे और फिर जब नींद खुलती थी तो फिर पढना चालू | अब तो सब कुछ ऑनलाइन हो गया है, लेकिन किताब के प्रति वो भावनाएं समाप्त हो गई है | अब तो ऑनलाइन स्कूल भी हो गया है , और सभी रिश्ते गौण हो गए है .||..

आप को क्या लगता है …मैं ठीक  कह रहा हूँ न  ?  

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# एक किताब का दर्द #

मैं एक किताब हूँ ..कोई मुझे  “दिल की किताब” कहता है तो कोई दिल से लगा कर रखता है / मैं हर तरह के लोगों के लिए बनी  हूँ / जो जैसा पसंद करे वैसा बनकर उसके दिल के  सेल्फ में सजा दी जाती हूँ /  मेरे चाहने वाले  तो अनगिनत  थे, लेकिन समय इतनी तेज़ी से बदल  रहा है  कि उतनी तेज़ी से मैं अपने को नहीं बदल सकी और मेरी चाहत अब धीरे धीरे कम होने लगी है / ऐसा लगता है आने वाले समय में मेरा अस्तित्व ही खतरे में ना पड़  जाये /  इस लिए अब “इ –बूक” के रूप में अपने को ढालने  लगी हूँ /

इस कंप्यूटर के युग  में मुझे भी एक मौका दिया गया है / हालाँकि  पहले जैसी बात  नहीं रह गई है  / पहले,  मुझे लिखने वाले  खुद  डूब कर लिखते थे  और पढने वाले भी उतनी तन्मयता से हमें  पढ़ते थे /  पहले तो लोगों के हाथो में मचलती रहती थी और अब लोगों के अलमीरा से झांकती  रहती हूँ / 

अब तो मेरे ऊपर धुल की मोटी  परत भी चढ़ जाती है फिर भी लोग मेरी ओर ध्यान नहीं देते है / मैं क्या करूँ कि लोग मुझे पहले की तरह प्यार करने लगे /

मुझे तो यह भी पता नहीं है कि मेरा जनम कब और कहाँ हुआ / इसीलिए अपना जन्मदिन भी नहीं मना  पाती  हूँ / आज कल तो मुझे लिखने में उतनी ख़ुशी भी महसूस नहीं करते / हमेशा  हमारे अस्तित्व को व्यवसायीक  दृष्टीकोण  से  देखा  जाता है .. /

सच तो यह है कि …मैं लोगों के दिलों का  सकून हूँ, …उनके दिल  का  चैन  हूँ / उनके लिए  खुशियों  का माहोल देती हूँ / लेकिन बदलते समय के साथ लोगों के पसंद भी बदल रहे है /

मेरे कितने अरमान थे कि मैं विश्वविद्यालयों में यूँ ही इठलाती टहलती पहुँच जाऊं,  वहाँ से किसी के बैग में बैठ कर इटली  की रंगीनियाँ में खो जाऊं , और वहाँ से फिर लन्दन  की बाहों में समां जाऊं / वहाँ के सभी बुध्धिजीवी  लोग  मेरा सम्मान करेंगे  / लेकिन मेरे अरमान यूँ ही  मचलते रह गए /

अब मैं थक गई हूँ , पक  गयी हूँ / ताज्जुब होता है  कि  इतने तकलीफों के बाबजूद,  जिन्दा कैसे हूँ  ?

 एक समय था … लोग मुझ पर आवरण चढ़ा कर रखते थे ताकि हमेशा मैं जवान दिख सकूँ  और कभी कभी मुझे कूट और कपड़ो की मदद से  मढ़ दी जाती थी ताकि मैं ज्यादा दिनों तक जिंदा रह सकूँ /

लेकिन आज तो ऐसा है कि लोग एक दो दिन में ही उब जाते है और रद्दी वालों के  हाथों  रद्दी पेपर से भी कम भाव पर ही बेच दी जाती हूँ / यहाँ तक कि लोग फुटपाथ पर नंगा कर यूँ ही बेचने लगे है जैसा मैं कोई वेश्या हूँ / और कितना दर्द  बयां करूँ मैं..

मुझे तो बस इंतज़ार है फिर से प्रेमचंद , दिनकर  और महादेवी वर्मा के पैदा होने की / या फिर अमृता प्रीतम , जय शंकर प्रसाद और नीरज सरीके लोगों  का  फिर से इस धरती पर आने की….

किताबें करती है बातें

बीते  ज़माने की ,

दुनिया की, इंसानों की

आज की, कल की

एक – एक पल की

खुशियों की,  ग़मों की

फूलों की, बमों की

जीत की, हार की

प्यार की, मार की

क्या तुम नहीं सुनोगे

इस किताबों की बातें ?  

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एक सवाल ..

(के. के.. की कहानी … के. के. की जुबानी )

दोस्तों,..तुम्हारा दोस्त कृष्णा कुमार उर्फ़ के. के. आज तुम सबों के बीच  हाज़िर है अपने संस्मरण के साथ,   जिसका शीर्षक है  “एक सवाल” ..

आजकल व्हाट्सअप पर vijay verma का संस्मरण पढ़ रहा हूँ…बड़ा मजा आ रहा है / क्या मस्त लिखता है, लगता है… बुढ़ापे में उसकी जवानी लौट आयी है /

मैं भी जब संस्मरण पढता हूँ या दोस्तों के द्वारा पोस्ट किया गया फोटो देखता हूँ तो मैं भी पुरानी यादों में खो जाता हूँ और मन करता है कि मैं भी पुराने दिनों में “रांची एग्रीकल्चर कॉलेज” के हॉस्टल में पहुँच जाऊँ  और वहाँ बिताये पलों को एक बार और जिऊं / पर ऐसा संभव है क्या ?  

हाँ, एक सवाल जो उस समय मेरे सामने आया था और जिसका जबाब आज तक मुझे नहीं मिला है ..मुझे अक्सर परेशान  करता रहता है / आज सोच रहा हूँ कि तुम दोस्तों से ही जबाब पूछ लूँ / शायद जबाब मिल जाये /   सवाल क्या है, बताने से पहले एक छोटी सी घटना या यूँ  कहो कि एक संस्मरण सुनाना चाहता हूँ …,क्योंकि सवाल उसी से जुड़ा हुआ है /

मुझे बचपन से दो चीजों का शौक रहा है / एक खाने का {तभी तो मेरे यार लोग मुझे “भोजन भट्ट” भी बुलाते हैं } और दूसरा फिल्म देखने का /

लगभग हर रविवार को मैं रांची जाता था पिक्चर देखने / एक हॉल से पिक्चर देख कर दुसरे और फिर दुसरे से निकल कर तीसरे हॉल में घुस जाता था / मुझे याद है इन्ही सब कारणों से मेरे साथी फिल्म देखने में मेरा साथ नहीं देते थे..या पहली फिल्म तो शायद मेरे साथ देख भी लेते थे लेकिन उसके बाद साथ छोड़ देते थे /

एक रविवार की बात है,  मैं  राँची में एक शो १२ से ३ बजे का देख कर हॉल से निकला था / मेरे कदम तेज़ी से दुसरे हॉल (शायद सुजाता) की तरफ बढ़ रहे थे / चूँकि दो हॉल के बीच  की दूरी  ज्यादा थी अतः टेंशन में था , कहीं फिल्म शुरू ना हो जाये / मैं ज़ल्दी से जल्दी हॉल पहुँचना चाहता था, वहाँ पंहुचा तो पिक्चर शुरू हो चुकी थी ज़ल्दी से टिकट लिया और लगभग दौड़ते हुए हॉल में दाखिल हुआ / लाइट ऑफ थी अतः भीतर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था ….

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तभी सीट पर बैठाने  वाला अटेंडेंट टोर्च की रौशनी में टिकट चेक किया और एक खाली कुर्सी की तरफ टोर्च की रौशनी से ईशारा  किया / मैं टोर्च की रौशनी में धीरे धीरे बढ़ा और अपनी सीट पर बैठ गया / अभी भी मुझे ठीक से  दिखाई नहीं दे  रहा था / मैंने रुमाल निकाल कर पसीना पोछा और रिलैक्स होने के लिए सीट पर अकड़  कर बैठा और पीठ को सीट के पिछले हिस्से पर टिकाया / तभी मेरा दाहिना कंधा  का किसी से स्पर्श हुआ,  लगा कोई लड़की बैठी है / अभी  भी मेरी आँखे अँधेरे में देखने को अभ्यस्त नहीं हुई थी पर नाक में भीनी भीनी खुशबू आ रही थी जो ये बता रही थी कि बगल में कोई लड़की बैठी है  / कौन ? पता नहीं,  पर दिल में हलचल तो मच ही गया था /

तभी देखा एक आदमी मेरे पैरों के पास से मुझे क्रॉस कर आगे की सीट पर जा रहा है / उससे बचने के लिए मज़बूरी वश मुझे पीछे होना पड़ा और शारीर को पीछे करना पड़ा / इस बार फिर मेरा  दाहिना  बांह उसके बाएँ  बांह से टकराई / यार गजब हो गया …लगा जैसे करेंट लग गया हो …सर घुमने लगा / मानो , मैं स्वर्ग में आ गया हूँ और अप्सरा मेरे बगल में बैठी हुई है  /

अब. पिक्चर क्या ख़ाक देखता / बस मेरी नज़रे तो सामने परदे पर ही थी  पर मैं कनखियों से उसे देखने की कोशिश कर रहा था / अब आँखे भी अँधेरे में देखने को कुछ अभ्यस्त हो गई थी और उसकी एक धुंधली सी आकृति अब नज़र आ रही थी /

मैं सोच रहा था फिल्म में कुछ ऐसे दृश्य आये जिससे हॉल में काफी प्रकाश हो जाये ताकि मैं बगल में बैठे हूर का  दीदार कर सकूँ  /

और तभी भगवान् ने मेरी मुराद पूरी कर दी / परदे पर ऐसा दृश्य आया जिससे हॉल में थोडा उजाला हो गया और मेरी आँखे उसे देख कर चुन्धियाँ गई / बगल में एक गजब की सुंदर लड़की सलवार सूट में बैठी थी / उम्र यही कोई १७ या १८ साल की रही होगी / उसके बगल में एक औरत बैठी थी / शायद उसकी माँ रही होगी / मैं और कुछ देखता की दृश्य बदल गए और हॉल में पहले की तरह रौशनी कम हो गई /

पर फिर भी आँखें बिना रौशनी के भी चीजों को ज्यादा अच्छे से देख पा रही थी /

यह एहसास तो गुदगुदा रही थी कि मेरे पहलु में एक हसीना बैठी है / गोरे गोरे मुखड़े और काले लम्बे बाल …गजब की ख़ूबसूरत लग रही थी वो /

मैं पिक्चर क्या खाक देखता / आँखे बंद कर बार बार पीछे होकर अपने दाहिने बांह को पीछे कर रहा था ताकि उसका स्पर्श हो / मैं थोडा डर  भी रहा था अतः शीघ्र ही अपने ओरिजिनल  पोजीशन में लौट आता था /      कुछ देर तक ऐसा ही चलता रहा / हाँ ये ज़रूर था कि जब भी मेरा कंधा  उसके कंधे से सटता  वो सिकुड़ जाती और दूर हटने का प्रयास करती /

मेरा दिल जोर से धड़क रहा था …सोच रहा था अब आगे क्या ..? डर  भी लग रहा था कि कहीं लड़की कुछ बोल न दे या फिर अपनी माँ को न बता दे /

कुछ देर तक तो ख़ामोशी रही , फिर एक आदमी  हमारी रो से बाहर निकल रहा था / जब मेरे पास से गुज़रा  तो बस इस बार जान बुझ कर अपने कंधे फैला कर पीछे को खिसका / मेरी दायीं बांह उसकी बायीं बांह से अच्छे से टकराई  / उसके नाज़ुक और गुलगुले बाहों को मैंने अच्छे से महसूस किया / इस बार उसकी बांह  मेरी बांह से सटी रही / उसने बांह को हटाया नहीं / मेरे लिए यह आश्चर्य की बात थी, क्योंकि पहले तो वह छुईमुई की तरह अपने में सिमटने की कोशिश करती थी /

तो क्या मामला कुछ आगे बढ़ रहा है ? मन ने कहा …बेटा,  ऐसा मौक़ा रोज़ रोज़ नहीं मिलता / थोडा आगे बढ़… बढ़ा हाथ और  रख उसके कंधे पर /

पर मुझे डर  भी लग रहा था / सोच रहा था ..कहीं ऐसा न हो कि मेरा हाथ उसके कंधे पर पड़े और उसका हाथ मेरे गाल पर / बड़ी बेइज्जती हो जाएगी /

मैंने सोचा …चलो देखते है …अभी तो इंटरवल होने वाला है / इंटरवल के बाद देखते है …उसके कंधे पर हाथ रखने की कोशिश तब करेंगे /

और तभी इंटरवल की घंटी बजी और हॉल में लाइट ऑन  हो गई /

मैंने तिरछी नज़र से बगल में देखा और लगा की ४४० वोल्ट का करंट लग गया हो / मैंने घूम कर बगल में देखा / बगल में उस लड़की की माँ बैठी थी और लड़की उसके बाद /

अरे. या कैसे और कब हुआ ? कब उन्होंने अपनी सीटें बदल ली और मुझे पता भी न चला /

ओह …तो ये बात थी ..मैं भी कहूँ की वह लड़की क्यों मुझसे सट रही है और अपने कंधे को नहीं हटाई / और बाद के स्पर्श में क्यों उसके कंधे कुछ भारी और गुलगुल लग रहे थे /

उफ़ ..अब आगे की क्या सुनाऊँ ?

पर तुम पूछोगे नहीं तो पर भी सुनाना तो पड़ेगा ही,  तभी तो कहानी ख़त्म होगी / मैं इंटरवल में ही पिक्चर छोड़ कर हॉल से बाहर आ गया और होस्टल लौट गया / दुसरे दिन यानी सोमवार को टेस्ट था / टेस्ट अच्छा गया और अच्छे नम्बर भी आये  / अब रही सवाल की बात तो आज  तक यह सवाल मेरे लिए उलझन बने हुए है  कि आखिर उन दोनों ने हॉल में अपनी सीटें कब बदली और मुझे पता क्यों नहीं चला ?

जबाब देने वाले को एक किलो गुलाब जामुन …एक किलो रसगुल्ला और एक मुर्ग मुस्सलम ईनाम मिलेगा/

और हाँ, यह बताना तो मैं भूल ही गया कि ईनाम लेने के लिए किशन गंज …के. के.  के पास आना होगा /

                                                                                            तुम्हारा दोस्त….कृष्ण कुमार ..

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इस रिश्ते को क्या नाम दूँ ….26

आज तीन दिनों की छुट्टी के बाद बैंक खुला, तो भीड़ होना स्वाभिक था | मैं कुछ परेशान सा ब्रांच को सामान्य करने की कोशिश कर रहा था | तभी मेरे चैम्बर में फ़ोन की घंटी बज उठी |  मैं दौड़ कर चैम्बर की ओर भागा  और जल्दी से फ़ोन को उठा लिया और कहा …हेल्लो, मैं वर्मा बोल रहा हूँ ..

उधर से आवाज़ आ रही थी..मैं भास्कर,  हेड ऑफिस से बोल रहा हूँ | पहचाना वर्मा जी मुझे ?

अरे भास्कर,  तुम्हारी आवाज़ ही काफी है | हमलोग कितने दिनों तक  कोलकाता में साथ थे |

तो सुनो वर्मा जी…तुम्हारा प्रमोशन स्केल फोर में हो गया है | मुबारक हो | अभी अभी हमारे विभाग ने प्रमोशन लिस्ट जारी किया है |

मैं खुश होकर उसको धन्यवाद कहा और फ़ोन रख दिया | मैं आँखे बंद कर भगवान् को याद करने लगा |

प्रभु इस “टपोरी”  को कितनी बड़ी सफलता दिला दी | मुझे याद है वो शुरुवाती दिन जब रेवदर ज्वाइन किया था और वो पिंकी से हमारी नजदीकियां | और फिर उस मेनेजर से लफड़ा के कारण हमारा ट्रान्सफर हुआ  और काफी बदनामी का सामना करना पड़ा था | एक “टपोरी” की छवि लिए शिवगंज शाखा ज्वाइन किया था |

मुझे पुरे चार साल काफी मेहनत  करना पड़ा था | मैं लोन और रिकवरी दोनों में अच्छा परफॉर्म किया था और उसका फल भी मिला | लोगों का प्यार और सम्मान मिला और टपोरी वाली इमेज भी चली गई | और फिर राजस्थान क्या छोड़ा वो सब यादें वहीँ छोड़ कर आ गया था |

हमारी प्रमोशन वाली बात को सुन कर सारे स्टाफ चैम्बर में आ गए औए बधाइयाँ देने लगे | मैं पॉकेट से ५०० का नोट निकाल कर राम बाबु जी को देते हुए कहा कि मिठाई लाकर सभी लोगों का मुहँ मीठा कराएँ / घर पहुँच कर सभी लोगों को भी यह खुश खबरी सुनाई /

दोस्तों और शुभ चिंतको की बधाइयाँ स्वीकार  करते दो दिन गुजर गए / तीसरे दिन जब बैंक पहुँच कर अपना स्थान ग्रहण कर ही रहा था कि संतोष आया और  बोल पड़ा ..अरे वाह, वर्मा सर, आप का प्रमोशन का लेटर भी आ गया, बधाई साहब जी |

और  मैं भी उस लेटर को लेकर पढने लगा | इस लेटर के अनुसार मुझे  परसों ही माउंट आबू जाना होगा,  वहाँ नए प्रोमोटी लोगों के लिए  दो दिन का स्पेशल ट्रेनिंग रखा गया है… | मैं मन में सोचा कि चलो,  इसी बहाने राजस्थान जाने का मौका मिल रहा है | ट्रेनिंग के साथ इस हिल स्टेशन पर घुमने का लुफ्त उठा सकते है /

माउंट आबू पहुँचा तो दोस्तों से मिल कर काफी ख़ुशी का अनुभव हो रहा था /

माउंट आबू का पहला दिन काफी बिजी रहा,  हेड ऑफिस से बड़े साहब लोग आये थे और बैंकिंग से सम्बंधित बहुत सारी बातें हुई | अब, कल का एक दिन शेष रह गया था, अतः रात में ही कल के घुमने का प्रोग्राम फाइनल कर लिया / वैसे कल तो सिर्फ एक घंटे का यहाँ सेशन होगा |

माउंट आबू में कुछ भी नहीं बदला,  जैसा मैं पहले देखा था बस वैसा ही लग रहा है.. सबसे पहले हमलोग देलवाड़ा जैन टेम्पल गए और देख कर मन खुश हो गया ..अंदर मंदिर में क्या कारीगरी के नमूने है, यहाँ तो मूर्तियों के  नाख़ून तक दीखते है | वाह, बनाने वाले ने क्या सुंदर कारीगरी की है /

इसके बाद हमलोग  घुमने के लिए  ब्रह्मकुमारी स्पिरिचुअल सेंटर गए  | पहले जब भी मैं माउंट आबू आता था तो यहाँ ज़रूर विजिट करता था | यहाँ की शाखा में ही इसका एकाउंट भी है | काफी खुबसूरत और प्रसिद्ध जगह है |

मैं घूमते हुए हॉल की तरफ गया तो यहाँ  के एक स्टाफ ने  बताया कि अंदर प्रवचन कार्यक्रम चल रहा है ,उसका आनंद ले सकते है | हमलोग अंदर चले गए | प्रोग्राम शुरू हो चूका था, वहाँ के स्टाफ ने आगे की रो में हमलोगों को बैठा दिया /

मैं सीट पर रखे हेड फ़ोन को पहन कर आँख बंद  कर आराम से स्पिरिचुअल धर्म गुरु की बाते सुन रहा था | तभी अगला प्रवचन एक महिला के द्वारा शुरू किया गया /  आवाज़ कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी |  मैं धीरे से आँखे  खोल कर स्टेज की तरफ देखने लगा, महिला का चेहरा साफ़ दिखाई पड़ रहा था | और मैं चौक गया /   

अरे, यह तो पिंकी की तरह लग रही है…. उसका चेहरा ,उसकी आँखे, बात करने की अदा , उसी तरह बोलना , कुछ भी तो नहीं बदला है | हाँ, एक चीज मैंने नोटिस किया …. उसके चेहरे पर पहले जैसी चंचलता ना होकर ख़ामोशी  और उदासी दिख रही थी |

वो सामने बैठी अपना प्रवचन दिए जा रही थी और मैं सिर्फ उसके चेहरे को निहारे जा रहा था |

वो क्या बोल रही थी उस पर ध्यान ही ना था / मैं तो बस पिंकी को  साक्षात् सामने देख रहा था लेकिन दिल को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह पिंकी ही है | यह कैसे  संभव है ? मैं ने तो सोचा था कि  अब तक वह शादी कर के अपना घर बसा ली होगी | बीस साल का समय कम थोड़े ही होता है |

अब तो मुझे उससे मिलने की तीब्र इच्छा हुई और  मैं अपने आप को कण्ट्रोल नहीं कर पा  रहा था | मुझे अभी भी उस पर वही अधिकार वाला भाव महसूस हो रहा था |  मैं सीट से उठकर बाहर आ गया और वहाँ के स्टाफ से पिंकी से  मिलने की इच्छा ज़ाहिर की |

 तब उन्होंने बताया कि उनका नाम पिंकी नहीं राधा है / और उनसे मिलने का समय शाम छह बजे होता है, तब तक आप को इंतज़ार करना होगा | मैं वही बैठ कर उसका इंतज़ार करता रहा /

शाम के छह बजे ही थे कि वो विसिटिंग हॉल में आकर बैठ गई ….

पिंकी,  ये मैं क्या देख रहा हूँ ?

माफ़ कीजिये,  मैं अब पिंकी नहीं बल्कि राधा हूँ | और आप वही देख रहे है जो सच है ..पिंकी ने जबाब दिया  /

ये सब कैसे हो गया ..मैंने आश्चर्य से पूछा |

ज़िन्दगी में कुछ चीज़े ऐसी होती है कि आप को पता ही नहीं चलता कि कैसे हो गया | कर्म करना आपके वश में होता है लेकिन परिणाम आपके वश में  नहीं होता ..वो बिलकुल शांत भाव से बोल रही थी |

मैं जब रेवदर छोड़ रहा था तो तुम्हारे घर गया था ..तुमसे मिलने | बहुत  देर तक इंतज़ार भी करता रहा, तभी तुम्हारे चाचा जी ने बताया कि तुम मिलना नहीं चाहती हो  और तब मैं वहाँ से चला आया |

मेरी बातें सुनकर उसके चेहरे पर एक पीड़ा  के भाव उभर आयी |

फिर अपने मन को शांत कर बोली ..मैं भी आप से मिलना चाहती थी | आपके बुलावे का इंतज़ार करती रही … फिर मैं खुद ही आप से मिलने हेतु घर से बाहर निकल रही थी कि चाचा जी ने बताया कि आप चले गए है और हमसे मिलना नहीं चाहते है | बाद में पता चला कि वह चाचा जी का ही षड्यंत्र  था .|

कुछ देर वह खामोश रही मानो वह विगत में कुछ तलाश रही हो |

फिर वो बोली ..उसी दिन शाम को गाँव में पंचायत बैठी थी …मुझे भी बुलाया गया था और मेरी काफी छीछालेदर की गई | एक पंच ने कहा कि प्रेम करना ही है तो ईश्वर से करो..तुम्हारा लोक – परलोक सब सुधर जायेगा | तुम्हारे घर परिवार का नाम भी समाज में रोशन हो जायेगा |

और तभी मैंने साध्वी बनने का और भौतिक सुखों का त्याग कर सारा जीवन परमात्मा और समाज की सेवा में लगाने का निर्णय ले लिया |

मैं हतप्रभ  हो कर सब सुन रहा था | वह आगे कह रही थी .. प्रेम मैं तब भी करती थी जब मुझे इसका ज्ञान नहीं था | प्रेम आज भी करती हूँ जब मुझे ज्ञान प्राप्त हो चूका है | अंतर बस इतना है कि तब मेरा प्रेम केवल मेरा था ..संकीर्ण दयारे में सिमटा हुआ |

और आज मेरा प्रेम सारे विश्व के लिए है ..सागर की तरह गहरा और आकाश की तरह ऊँचा, सारे ब्रह्माण्ड को अपने में समेटे हुए /

मेरी  जुबान को तो मानो लकवा मार गया था …कुछ बोल नहीं पा रहा था ,  

मैं बस, उसके चेहरे के भाव को पढने की कोशिश कर रह था / ना जाने कितनी पीड़ा अपने में समेट रखी थी /

तभी वह बोली ..माफ़ कीजिये,  पूजा का टाइम हो रहा है  | इज़ाज़त चाहूँगी |

और वो उठ कर जाने लगी / जाते जाते वो ठिठकी और बोली उठी … भगवान् करे आप सदा स्वस्थ और प्रसन्नचित रहें |

 उसको जाते हुए देखता रहा और सोच रहा था कि  ढाई अक्षर के इस शब्द “प्रेम” को  कैसे परिभाषित करूँ,  ………..और इस ”रिश्ते को क्या नाम दूँ”……

अगला कहानी पढने के लिए नीचे दिए link को click करे …

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सोचता हूँ ज़िन्दगी को बस यूँ ही गुज़र जाने दूँ

इजहारे मुहब्बत को अपने होंठो पे न आने दूँ

कल शायद नई  सुबह हो, और नए फूल खिले

आज तो बस आँसुओं को यूँ ही बिखर जाने दूँ …

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संघर्ष ही ज़िन्दगी है …25

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आज शिवगंज शाखा में मेरा पहला दिन / मैं अपनी सीट पर बैठने वाला था कि चपरासी “कालू राम” दौड़ता हुआ मेरे पास आया और बोला आप इस सीट पर बैठने के पहले हमलोगों का मुँह मीठा तो करा दीजिये /

मैं उसकी बातों पर सहमती जताते हुए पॉकेट से एक सौ का नोट निकाल कर दिया और कहा …मेरी भी यही इच्छा है /

और फिर मैं ब्रांच के फाइलों में खो गया / थोड़ी देर के बाद मीना जी नज़र आये और वो मेरे पास आते ही कहा कि मेरा तो आज इस शाखा में अंतिम दिन है /

 तुम तो मेरे अपने  हो, इसलिए तुम्हे बता दूँ  कि यहाँ ऋण देना कठिन है क्योंकि तीन  सालों से बारिस  नहीं हुई है और पुरे इलाके में अकाल की  स्थिति हो गई है / सभी फसल नष्ट हो गए है  और यहाँ के किसानो  की हालत बहुत ही ख़राब है /

यहाँ तो मैं मजे में था और किसी तरह का ऋण के झमेले में नहीं पड़ता था .क्योकि मेरा मानना है कि दिए गए ऋण की वापसी बहुत मुश्किल है / इसलिए मेनेजर के कहने के बाबजूद मैं कोई लोन नहीं करता था / तुम भी आराम से बैठे रहो और मस्ती करते रहो /

मुझे महसूस हुआ कि  इसकी इसी  सोच के कारण शायद मेनेजर साहब ने इसकी शिकायत बड़े साहब से की  होगी ,और इसे यहाँ से हटा कर मुझे एडजस्ट किया गया है

लेकिन मीणा जी का मानना था कि  रेवदर ब्रांच मैनेजर  और मेरे बीच  लफड़ा के कारण  उसे “बलि का बकरा” बना दिया गया है / और वो रेवदर मेनेजर को ही अपने ट्रान्सफर का दोषी मानता है /

वह आगे बोला … मैं सबसे पहले जाकर उसी से निपटता हूँ और  वहाँ से ट्रान्सफर की युक्ति लगाता हूँ  /

मैं उसकी बातों को ध्यान से सुनता रहा,  लेकिन बोला कुछ नहीं,  क्योंकि रेवदर की चर्चा चलते ही, मुझे उसकी याद आ जाती है और मन दुखी हो जाता है /

मैं जबाब में कुछ नहीं बोला… बस, उन मोटे मोटे लेज़रों  से कुछ किसानों  के नाम  को नोट करने लगा जिससे संपर्क करना ज़रूरी था क्योंकि उन्होंने ऋण की क़िस्त नहीं जमा कराई थी / उन दिनों बैंक के सभी कार्य मैन्युअल ही थे /

मीना जी की “फेयरवेल पार्टी” समाप्त  होते ही मैं मेनेजर साहेब के चैम्बर में गया और उनसे निवेदन किया कि मैं कुछ किसानो से मिलना चाहता  हूँ ताकि किस्तों की वसूली की जा सके /

उन्होंने हँसते हुए कहा कि मैं तो पहले ही आप को यह छुट दे रखी है / आप को जब इच्छा हो आप “फील्ड विजिट” कर सकते है और उन्होंने ड्राईवर बाबु लाल जी को बुलाया और बोला ..आप के साहब सोहन सिंह जी से मिलने  “जवाई बांध” जाना चाहते है /

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बाबु लाल जी फ़ौरन जीप लेकर आ गए औए हम दोनों निरिक्षण के लिए  निकल पड़े / रास्ते में जाते हुए बाबु लाल  जी से कुछ किसानो के बारे में संक्षिप्त जानकारी लेता रहा / वो यहाँ का बहुत पुराना ड्राईवर था और करीब  करीब सभी ऋणी  के बारे में जानता  था /

दस  किलोमीटर की दूरी  तीस मिनट  में तय करता हुआ  सोहन सिंह के फार्म हाउस में  हमलोग दाखिल हो गए / वो फार्म हाउस पर ही काम करते हुए मिल गए / मैंने देखा करीब दस बीघा में लगी सरसों की फसल पानी की कमी के कारण सुख रही थी /

सोहन सिंह जी,  बाबु लाल जी को देख कर समझ गए कि हम बैंक से आये  है /

उन्होंने एक घने पेड़ के नीचे खाट बिछा कर बैठने का आग्रह किया और जल्दी से  पानी का लोटा लाकर पीने को दिया /  जल पीने  के बाद मैं बातों  का सिलसिला शुरू किया और क़िस्त ना जमा होने का कारण जानना चाहा /

सोहन सिंह जी ने अपनी समस्या बतानी शुरू कर दी / अचानक कुआँ का पानी सुख गया है जिससे खड़ी फसल बर्बाद हो रही है और पिछली फसल भी अच्छी नहीं हुई  थी

 उन्होंने बताया कि यहाँ का पूरा एरिया पथरीला है और कुएं को  गहरा करने के लिए उसके  अंदर के पत्थर को तोड़ने के लिए भुटका (blasting ) करना होता है और फिर छोटे छोटे पत्थर के टुकड़े को बाहर  निकाला जाता है / काफी रिस्की होता है यह प्रक्रिया / इसीलिए काफी पैसो की ज़रुरत होती है /

मैं इसके लिए पहले वाले साहब से निवेदन भी किया था कि कुछ ऋण स्वीकृत कर दे ताकि  ठीक ढंग से खेती  कर सकूँ और अगला पिछला सब बकाया बैंक को चूका सकूँ  / लेकिन उन्होंने तो ऋण देने से साफ़ मना कर दिया ,  क्योंकि ट्रेक्टर की क़िस्त नहीं दे सका था /

मैंने महसूस किया कि  इस सुनसान जगह में अकेले झोपडी बनाकर परिवार के साथ रहना बहुत हिम्मत की बात थी /

 इस बीच चाय  भी आ गई / मैंने चाय पीते हुए  पूछ ही लिया …. ऐसी सुनसान जगह में फॅमिली को लेकर रहने में डर नहीं लगता है ?  आप गाँव में भी रह कर इस खेती को संभाल  सकते थे / इसके लिए आपको खतरा उठाने की क्या ज़रुरत थी /

उन्होंने जो जबाब  दिया, उसे सुनकर  मेरे रोंगटे खड़े हो गए / उन्होंने बताया …साहब, इस पहाड़ी पर तरह तरह के जानवर है,  जो रातों को आकर फसल बर्बाद कर देते है / कल ही की तो बात है… रात में एक तेंदुआ मेरी एक बकरी को ले भागा / मैं जब तक बन्दुक ले कर बाहर आता वो शिकार लेकर जा चूका था /

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मैं उत्सुकता पूर्वक पूछ लिया ..यहाँ किस तरह के जानवर है ? ..

साहब, यहाँ  तेंदुआ, काला हिरन,  नील गाय  और बहुत तरह के जानवर है / आप कभी रात में यहाँ रुको तो जंगली खरगोश के  शिकार का मजा ले सकते है / कभी भी मेहमानबाज़ी होती है तो खरगोश का शिकार कर उसी का मांस परोसा जाता है / आप भी कभी हमें मौका दें /

मैं मन ही मन सोचने लगा ..इतने खूंखार जानवरों के बीच  मुझे तो रात में नींद ही नहीं आ सकती है / इन लोगों को शायद इसकी  आदत पड़ गयी होगी .

शाम का वक़्त और  यहाँ की सुंदर प्राकृतिक छटा  को देख कर मैं  मंत्रमुग्ध हो गया / राजस्थान तो वैसे  ही रेगिस्तान के लिए जाना जाता है / लेकिन यहाँ  एक ऐसी जगह जहाँ एक तरफ हरे भरे  पेड़ पौधों से सुसज्जित पहाड़ बिलकुल हरियाली छटा बिखेर रही हो  और उसी के तल  में समतल भाग में लोग खेती कर रहे हो , सचमुच काबिले तारीफ था  /

चारो तरफ सरसों की फसल ऐसे लग रही थी मानो  पूरा खेत पिली चादर ओढ़ कर बैठी हो / और दूसरी तरफ से बाँध पर जाने का रास्ता था / शाम का समय  था और  दृश्य बड़ा मनोरम  था / लगा बस ऐसी जगह में रहने का मज़ा ही कुछ और है / …..

मुझे  उनके बारे में जान कर उत्सुकता बढ़ गई . मैंने कहा की आप की कहानी बड़ी दिलचस्प लगती है  इतना सुनना था कि  वो भावुक हो गए और अपने संघर्ष भरी ज़िन्दगी के बारे में बात करने लगे . …

मेरे बाप दादा  सियालकोट  में रहते थे, जो अब पाकिस्तान में है / विभाजन के बाद  वहाँ के कुछ हिन्दू भाई असुरक्षित  महसूस करने  के कारण वहाँ अपना सब कुछ छोड़ कर यहाँ शिफ्ट हो गए / क्योकि हमारे कुछ सगे सम्बन्धी  आस पास के गाँव में रहते थे  / उस समय  सरकार के तरफ से यही  बिलकुल बंजर और पथरीला ज़मीन  हमलोगों को बसने के लिए दिया गया था /

इस पर खेती करना बहुत मुश्किल था, सो मैं नौकरी करने “पूना” चला गया था / वहाँ मैं जॉकी था,  घोड़ो को ट्रेनिंग देता था / वहाँ जो कमाता था उसी से हम सब का गुज़ारा  चलता था / लेकिन अचानक एक दिन  पिता जी को दिल का दौरा पड़ा और वो चल बसे और मेरी माँ  भी बीमार रहने लगी थी /

इसलिए पूना वाली नौकरी छोड़ कर यहाँ आना पड़ा / उसी समय यहाँ डैम का निर्माण हुआ तो थोड़ी पानी की सुविधा हुई /

हमलोगों ने  रात दिन मेहनत  कर इस बंज़र भूमि को खेती के लायक बनाया है / लेकिन बारिस नहीं होने के कारण कुआँ का पानी भाग गया है और पानी के लिए कुआँ की खुदाई की ज़रुरत है जिसमे करीब चालीस हज़ार खर्च आएगा /

इनके  संघर्ष पूर्ण कहानी को सुनकर,  मैंने हर संभव मदद करने का मन बना लिया था / मुझे पता चला कि उनके कुएं का पानी लगातार बारिश नहीं होने के कारण सुख चले थे  जिसे और गहरा करने की ज़रुरत थी /

सचमुच ऐसे  संघर्षपूर्ण ज़िन्दगी की व्यथा सुन कर मुझे बहुत ही दुःख का अनुभव हुआ और मैंने साफ लहजो में उनको आश्वासन दे दिया कि चाहे जितना पैसा खर्च हो,  आप अपने फसल को पानी के बिना ना मरने दें / बैंक आप के साथ है ..

मैं वहाँ से उठ कर बस चलने ही वाला था कि उनकी पत्नी सिकंजी लेकर आयी और पीने का आग्रह करने लगी / ..

मैं सिकंजी का गिलास उठाते हुए उनकी ओर देखा …… उनके आँखों में एक चमक देखी , शायद यह आशा हो चली कि आने वाली दिनों में खेतो को भरपूर पानी  मिलेगा और उनके ज़िन्दगी का कष्ट  दूर हो सकेगा …….

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इससे आगे की घटना जानने हेतु नीचे दिए link को click करें..

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चढ़ते को सहारा लगा देते हैं कुछ लोग ।

बड़ते को रास्ता बता देते हैं कुछ लोग ।

गिराने वाले तो दुनियाँ में बहुत देखे मग़र , 

गिरते को थाम के उठा लेते हैं कुछ लोग

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