सकारात्मक विचार ….4

ह्रदय परिवर्तन

आज मैं जब समाचार पत्र पढ़ रहा था, तभी मेरी नज़र एक खबर पर आकर रुक गई | उसे पूरी पढने के बाद इतना प्रभावित हुआ कि इसे अपने ब्लॉग का हिस्सा बनाने से अपने को  रोक नहीं सका |

मेरे मन में विचार आया कि क्यों ना हम सभी इसके द्वारा दिए गए  सकारात्मक विचारों को महसूस करें |

जैसा कि हम सभी जानते है कि  माओवादी विचार धारा से प्रभावित एक संस्था जिसका नाम  “प्यूपिल  वार ग्रुप” था, वह अपने समय में हिंसक घटनाओं के चलते  काफी मशहूर था और जो चाहता था कि सता का परिवर्तन  बंदूक के बल पर हो / इन्हें आम भाषा में  नक्सालवादी भी कहते है |

इस संस्था के  सदस्य ज्यादातर गरीब और समाज के दबे कुचले लोग हुआ करते थे,  जो जंगलों में छिप कर रहते थे और सत्ताधारी  लोगों के खिलाफ हिंसक गतिविधियों में शामिल रहते थे  /

इनका मुख्य कार्य क्षेत्र आंध्र प्रदेश, ओड़िसा, बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ का कुछ भाग था जो पहाड़ और जंगलो में रह कर अपनी गतिविधियों का संचालन करते थे |

सन 2013  में सरकार ने 76 जिलों को नक्सल प्रभावित क्षेत्र घोषित किया था | क्योकि नक्सल लोग इस इलाके के पहाड़ी और जंगली क्षेत्र में अपना गतिविधियाँ चलाते थे |

आज मैं इसी के तहत  जिस गाँव की चर्चा कर रहा हूँ ..वह है “मासपारा” गाँव जो दांतेवाडा से करीब 10 किलोमीटर की दुरी पर है और काफी पिछड़ा इलाका है |

यहाँ की साक्षरता दर मात्र ४२% ही है और इस गाँव में स्कूल  होना  बड़े गर्व की बात समझी जाती थी |

लेकिन नक्सल लोगों ने इस स्कूल को 2008 में और फिर  प्रशासन द्वारा फिर शुरू होने पर दोबारा २०१२ उसे उड़ा दिया था और इसके अलावा इस क्षेत्र के रोड को भी काफी क्षति पहुंचाई ताकि पुलिस उन तक नहीं पहुँच सके |

उसी समय सरकार के प्रयास से कुछ माओवादियों ने सरेंडर कर दिया और समाज के मुख्य धारा में शामिल हो कर अपना जीवन यापन करने का फैसला लिया था |

आज समाचार पत्र में छपे खबर के अनुसार उनमे से एक   पूर्व नक्सल (ex-maoist) जिसने अपने को सरेंडर किया था उसने उस स्कूल को अपने हाथों से एक एक ईटा  जोड़ कर तीन महीने में पुनः तैयार कर दिया जिस स्कूल को उसने माओवादी गतिविधियों के तहत सन 2004 में उड़ा दिया था |

उसके बाद यह स्कूल बिलडिंग  जीर्ण शीर्ण हालत में एक खंडहर का रूप ले चूका था क्योकि उसके बाद यह स्कूल हमेशा के लिए बंद हो चूका था |.

मनुष्य का दिमाग अगर विध्वंश करने पर आ जाये तो बड़ी से बड़ी क्षति पहुँचा सकता है |

लेकिन दूसरी ओर, वह अपने सोच को सकारात्मक कर लेता है तो उन्ही गलतियों को दोबारा सुधार  करने की कोशिश करता है |

कुछ इसी तरह की कहानी उस माओवादी की है ..उसका नाम है सन्तु कुंजम (santu kunjam) है और उसने सरेंडर करने के बाद अपनी भूल सुधार  करते हुए सबसे पहले उस स्कूल की खुद  अपने हाथो से ना सिर्फ मरम्मत कर उसे खड़ा किया बल्कि गाँव के बच्चो को वहाँ लाकर फिर से स्कूल शुरू करने की कोशिश कर रहा है |

जैसा कि उसने बताया कि इसके बाद अब उसका अगला कदम है कि उन रोड का पुनः मरम्मत करना चाहता है, जिसे उसने पुलिस से मुठभेड़ के दौरान उड़ा  दिया था, बर्बाद कर दिया था |

इस तरह की माओवादी गतिविधियों से सबसे ज्यादा नुक्सान उन बच्चो को उठाना पड़ता है जो पढना चाहते तो है लेकिन हालात और संसाधनों के आभाव में अशिक्षित रह जाते है और गरीबी की जलालत से बाहर निकल नहीं पाते है |और फिर वही लोग एक दिन बन्दुक उठाकर नक्सल की राह पकड़ लेते है |

यह समाचार हमारे समाज के लिए शुभ संकेत है |

अगर इसी तरह मुख्य धारा  से भटके हुए लोगों में  सद्बुद्धि आये और वे हिंसा का मार्ग छोड़ कर शांति और भाई चारे के साथ देश और समाज के विकास में अपना योगदान दे तो हमारा देश तरक्की करेगा और सब का कल्याण होगा |

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तांगेवाले से मसाला किंग तक का सफ़र

अपने परिश्रम और लगन से सफलता के नए मापदंड स्थापित करने वाले मसालों के मशहूर  कारोबारी, और पद्मभूषण से सम्मानित श्री धर्मपाल गुलाटी जी का  निधन ९८ साल की उम्र में दिनांक  3 दिसम्बर २०२० को हो गया।

उनकी ज़िन्दगी की कहानी बेहद दिलचस्प है  | एक ज़माने में तांगा चला कर अपने परिवार का भरण पोषण करने से लेकर मसाला किंग के नाम से मशहूर उनका जीवन सफ़र संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक है |

यही कारण है कि आज उनके निधन पर हम सब शोकाकुल हो कर उन्हें सच्ची श्रधान्ज़ली अर्पित कर रहे है |

कहते है कि समय बड़ा बलवान होता है, क्योकि जब वक़्त का पहिया  घूमता है तो राजा  को रंक और रंक को राजा  बनते देर नहीं लगती |

 ऐसी ही जीवन का सफ़र एक तांगा चलाने वाले की है  | वक़्त ने जब करवट  ली तो देखते ही देखते वो तांगा वाला मुकद्दर का सिकंदर बन गया  और उनकी ज़िन्दगी की कहानी हम सबों  के लिए प्रेरणाश्रोत और एक मिसाल बन  गया है |

भारत के विभाजन के पहले उनके पिता जी की मसालों की अच्छी कारोबार  सियाल कोट में थी, लेकिन भारत विभाजन के बाद उनका परिवार वहाँ से भाग कर अमृतसर में रिफुस्ज़ी कैंप में शरण लिया और कुछ दिनों के बाद फिर काम काज के चक्कर में दिल्ली के चांदनी चौक में अपना आशियाना बनाया |

 बीच में ही छोड़ी स्कूल

महाशय धर्मपाल गुलाटी (Dharampal Gulati) का जन्म 27 मार्च 1923 में पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था। 1933 में 5 वी कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने पढाई छोड़ दी क्योकि उन्हें पढाई में दिल कम और पतंगबाजी और कबूतर बाजी में ज्यादा लगता था | इसके अलावा उन्हें  पहलवानी का भी शौक था |

लेकिन  वे बचपन से ही बड़ा आदमी बनने का ख्वाब देखा करते थे क्योकि बचपन में अपने पिता से बड़े लोगों के जीवन यात्रा की कहानियाँ सुना करते  थे |

 पढाई में मन ना लगता देख पिता जी ने लकड़ी के दुकान में  नौकरी लगवा दी | इसके अलावा उन्होंने साबुन का कारोबार भी किया और दूसरी  नौकरी भी की, और  इस दौरान कपड़े, चावल आदि का भी कारोबार किया लेकिन कोई कारोबार नहीं चल सका |

इसी बीच  18 वर्ष की आयु में उनका विवाह लीलावती से हो गया | अब उनकी  जिम्मेवारी बढ़ गई तो फिर अंत में उन्होने अपने पारिवारिक मसालों का कारोबार में ही लग गए और फिर उसी में रम गए |

पाकिस्तान से शुरू हुआ कारोबार

महाशियां दी हट्टी (एमडीएच) देश में मसालों का बड़ा ब्रांड है। वह मसालों के मैन्युफैक्चर, डिस्ट्रिब्यूटर और एक्सपोर्टर हैं।

जैसा कि सभी जानते है कि एमडीएच ब्रांड  की स्थापना साल 1919 में सियालकोट (पाकिस्तान) में उनके पिता महाशय चुन्नी लाल ने की थी। लेकिन भारत के बंटवारा के बाद अपनी ज़मीन और  धंधे को छोड़ कर सियाल कोट से भाग कर परिवार के साथ  अमृतसर के रिफुज़ी कैंप में शरण  ली |

उसके बाद धर्मपाल गुलाटी ने  काम धंधे  की तलाश में दिल्ली आ गए |  उस समय उनके पॉकेट में सिर्फ १५०० रूपये थे |

विभाजन के बाद आए भारत- 1500 रुपये थे जेब में, चलाते थे टांगा


उनकी ज़िन्दगी के सफ़र की कहानी काफी संघर्षपूर्ण है | जब देश का बंटवारा किया गया तो वह सियाल कोट से  भारत चले  आये और 27 सितम्बर 1947 को वह दिल्ली पहुँचे। उन दिनों उनके जेब में महज 1500 रुपये ही थे।

इन पैसों से उन्होंने 650 रुपये का टांगा खरीद लिया। जिसे वह न्यू दिल्ली स्टेशन से लेकर कुतब रोड और उसके आस पास के इलाकों में चलाते थे | लेकिन  मन में पारिवारिक व्यवसाय (मसाला) को प्रारंभ करने का जूनून ख़त्म नहीं हुआ था। 

अपने पिता के कारोबार को आगे बढ़ाने के बारे में सोचते रहे । और एक दिन व्यवसाय को प्रारम्भ करने के लिए छोटे लकड़ी के एक खोके ख़रीद कर उन्होंने इस व्यवसाय को प्रारम्भ किया।

करोल बाग में ली दुकान

उन्होंने बाद में करोल बाग के अजमल खां रोड पर ‘महाशियां दी हट्टी ऑफ सियालकोट (डेगी मिर्च वाले)’ के नाम से दुकान खोल ली।  आज जो मसालों  का जो साम्राज्य स्थापित हुआ है वह इसी छोटी सी दूकान से ही शुरू की गई  थी |  

इसके बाद उन्हें कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा । आज महाशियां दी हट्टी (एमडीएच) देश में मसालों का बड़ा ब्रांड है। वह मसालों के मैन्युफैक्चर, डिस्ट्रिब्यूटर और एक्सपोर्टर हैं।

आज के दिनों में उनके मसाले १०० से अधिक देशों में एक्सपोर्ट किया जाता है | और उनके व्यवसाय का  सालाना टर्न ओवर 2000 करोड़ रूपये से अधिक का है  जो अपने आप में एक मिसाल है |

वे खुद तो पांचवी तक ही पढाई की, लेकिन उनके नेतृत्व में  काफी पढ़े लिखे लोग काम करते थे | उनका मानना  था कि किसी भी व्यावसायिक सफलता के लिए गुडविल.,  इमानदारी और मेहनत  का होना अतिअवाश्यक है |

पद्मभूषण से हो चुके हैं सम्मानित

कारोबार के अलावा इन्होने चैरिटी के काम भी बहुत सारे करते थे | उन्होंने “महाशय चुन्नी लाल चैरिटेबल ट्रस्ट”  खोल रखा है जिसके तहत गरीबों के बच्चो के लिए स्कूल  और हॉस्पिटल भी खोल रखी थी |

फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिटके तहत  मसाला उद्योग को नयी उचाईयों पर ले जाने के लिए और समाज में विभिन्न  धरमार्थ कार्यो में योगदान देने के लिए  उन्हें राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद  ने पिछले साल पद्मभूषण से सम्मानित किया था।

जब तक वे जिंदा रहे समाज की भलाई के लिए काम करते रहे | आज वो हमारे बीच  नहीं है पर उनके सुझाए रास्ते और उनके उसूल  हमारे सामने है जो हमारी युवा पीढ़ी को आगे भी मार्ग दर्शन करती रहेगी |

हम सबों की प्रार्थना है कि ईश्वर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें व परिवार को दुख सहने की शक्ति प्रदान करें।

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कोरोना के साइड इफ़ेक्ट

  आज मैंने पढ़ा

आज के इस ब्लॉग को लिखने का कारण ही कुछ अलग है |…कभी कभी हम कुछ ऐसी घटनाओ के बारे में पढ़ते है जो हमारे दिलो दिमाग पर छा जाता है और हम मन ही मन सोचने लगते है कि क्या ऐसा भी होता है ?

ऐसी ही एक घटना से रु ब रु हुआ, जब मैं शनिवार का समाचार पत्र पढ़ रहा था |

घटना कुछ यूँ है कि एक 75 साल के बुजुर्ग को मरा घोषित कर दिया गया और उसके डेड बॉडी को अच्छी तरह पुरे सावधानी से पैक कर के उनके घर वालों को सौप दिया गया |

चूँकि कोरोना के कारण उनकी  मौत हुई थी इसलिए घरवाले उस मरने वाले का मुँह भी नहीं देख सकते थे | मज़बूरी में  दुखी मन से जाकर जला  आये |

यह कैसा समय आ गया है कि मरने वाले का अंतिम क्षण भी दर्शन  नहीं कर सकते है |

फिर भी यह संतोष था कि लाश को तो उन्हें सौप दिया गया था, वरना करोना  से मरे व्यक्ति की लाश भी नहीं देते है सिर्फ उन्हें बताया जाता है कि आप के सम्बन्धी की मृत्यु हो गई है और सरकारी नियमानुसार उनकी अंतिम क्रिया कर दिया गया है |

श्री मुख़र्जी  बहुत भले इंसान थे | ज़िन्दगी में बहुत संघर्ष किया था और अपनी मेहनत  और लगन से अपने परिवार की जिम्मेवारी निभाते हुए अपने दोनों बच्चो को उच्च शिक्षा दी थी और उनके  दोनों बेटे अमेरिका में जॉब करने चले गए और करीब करीब वही सेटल कर गए थे |

बस साल में एक बार अपने वतन आते थे अपने पिता जी को देखने | माँ तो पहले ही गुज़र गई थी |

सिर्फ पिता जी थे, अपना मकान था जिसे बड़े अरमान से उन्होंने बनवाया था और उसे छोड़ कर बेटों के साथ जाने को तैयार नहीं थे |

घर में सभी सगे सम्बन्धी जमा हो चुके थे और श्राद्ध का काम चल रहा था | इस बीच उनके बेटों ने घर का भी सौदा कर लिया | अब जब अमेरिका में ही रहना है तो यहाँ पिता जी  के मरने के बाद इस घर को रखने का कोई मतलब नहीं था |

पंडित जी भी आ चुके थे और दशकर्म का काम चल रहा था | दान दक्षिणा भी मन से दिया जा रहा था |

बेटों  ने सोचा कि पिता जी की अंतिम क्रिया- कर्म खूब अच्छे से करेंगे ताकि लोग यह नहीं कह सके कि जिस बेटे को पढ़ा लिखा कर उच्च  सिक्षा दिलाई,  आज अपने पिता की क्रिया क्रम में कंजूसी कर दिया और अच्छे ढंग  से नहीं किया गया |

सच तो यह है कि आज चाहे जितना भी दिखावा कर ले,  ..लेकिनं सच्चाई यही थी कि जब बुढ़ापे में उनको इन बेटों की ज़रुरत थी तो करोना  से संक्रमित होने पर पड़ोसियों ने उन्हें हॉस्पिटल पहुँचाया था और सही देख भाल नहीं होने कारण वे चल बसे |

अपने मन में द्वंद लिए बच्चे एक तरफ आग में हवन  कर रहे थे तो दूसरी तरफ घर बिकवाने के लिए  दलाल भी पहुंचे हुए  थे |

तभी सामने गेट के खुलने की आवाज़ आयी और सभी लोगों की नज़र १०० गज दूर स्थित गेट पर पड़ी | उनलोगों ने देखा मुख़र्जी साहब गेट खोल कर अंदर चले आ रहे है |

देखने वाले को समझ नहीं आ रहा था कि यह हकीकत है या सपना | कुछ लोग अपने हाथों में चिकोटी  काट कर देखा कि वे सपना तो नहीं देख रहे है |

उनके खुद के बेटे को भी शंका हो रही थी कि उनके पिता जी जैसा दिखने वाका कोई और इंसान है , लेकिन यह पिता जी नहीं हो सकते है |

सभी लोग अपने अपने मन में सोच ही रहे थे तभी  पिताजी बिलकुल पास आ गए  | सब लोग अवाक होकर उनकी ओर शंशय की नज़र से देखे जा रहे थे |

तभी पिताजी ने कड़क आवाज़ में कहा…यहाँ  क्या हो रहा है ? और तुमलोग इस तरह मुझे घुर घुर कर क्यों देख रहे हो | तुमने तो हमें मरने के लिए हॉस्पिटल में छोड़ दिया था और कोई खोज खबर ही नहीं लिया |

वैसे मुझे अकेले रहने की आदत तो पड़  ही चुकी है इसलिए तुम्हारे हॉस्पिटल में नहीं आने पर मुझे कोई दुःख नहीं हुआ |

अब बेटे और दुसरे सम्बन्धी एक दुसरे की ओर देखते हुए बोल रहे थे कि जिसको हमने जलाया  था वह किसकी लाश थी |

बड़ा विकट  प्रश्न था,  कोई कैसे सोच सकता है कि  जिसके पिता जी जिंदा हो उसके बेटे अपने बाल  मुडवा कर उनका श्राद्ध कर्म उनके सामने ही कर रहा हो |

 अब इसके आगे जो कुछ भी उस परिवार और समाज में  घटित हुआ होगा उसके बारे में बस अनुमान ही लगाया जा सकता है ….

है न यह विचित्र बात …अजीबो गरीब घटना, मगर सत्य है !!!..आप की  क्या राय है .?  

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निर्भया कांड

समाचार में  मैंने पढ़ा कि .. ..निर्भया को मिलेगा न्याय,… 22 जनवरी को फांसी पर लटकाए जाएंगे चारों दोषी…. यह घटना, जिसने सात साल पहले पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था, दिनांक सात  जनवरी  2020 को कोर्ट का एक  बड़ा फैसला आ गया /
निर्भया कांड  के दोषियों का डेथ वारंट जारी कर दिया गया है. निर्भया  कांड के चारों दोषियों को 22 जनवरी को फांसी होगी. देश की राजधानी दिल्ली में साल 2012 में हुए रेप कांड को लेकर मंगलवार को पटियाला हाउस कोर्ट में सुनवाई हुई. पटियाला हाउस कोर्ट के जज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए चारों दोषियों से बात की. बातचीत के दौरान कोर्ट ने मीडिया की एंट्री पर रोक  लगा दी थी|

सुनवाई के दौरान निर्भया की मां और दोषी मुकेश की मां कोर्ट में ही रो पड़ीं. दोषियों को सुबह 7 बजे फांसी पर लटकाया जाएगा. |

और अंततः २० मार्च २०२० को उन चार अभयुक्तों को फांसी दे दी गई /

ज्ञात हो कि निर्भया मामले में चारों दोषियों अक्षय, मुकेश, विनय और पवन को पहले ही फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है. लेकिन अब जारी हुआ डेथ वारंट..  निर्भया के दोषियों के  डेथ वारंट में लिखा है, ‘एग्जीक्यूशन ऑफ अ सेंटेंस ऑफ डेथ.’ इसे ब्लैक वारंट के नाम से भी जाना जाता है. ब्लैक वॉरंट पर जारी करने वाले जज के साइन होते हैं. उसके बाद ये डेथ वॉरंट जेल प्रशासन के पास पहुंचता है, फिर जेल सुप्रीटेंडेंट समय तय करता है उसके बाद फांसी की जो प्रक्रिया जेल मैनुएल में तय होती है, उस हिसाब से फांसी दी जाती है.

निर्भया के माता-पिता क्या बोले?

कोर्ट के फैसले के बाद निर्भया की मां आशा देवी ने प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि दोषियों को फांसी से न्याय व्यवस्था में भरोसा बढ़ेगा. मेरी बेटी को न्याय मिला है. 4 दोषियों की सजा से देश की महिलाओं को सशक्त बनाएगी. वहीं निर्भया के पिता बदरीनाथ सिंह ने भी कोर्ट के फैसले पर खुशी जताई है. उन्होंने कहा कि कोर्ट के फैसले से हम खुश हैं.  इस फैसले से ऐसे अपराध करने वाले लोगों के मन  में डर पैदा होगा.  .

क्या है निर्भया केस का घटनाक्रम?

निर्भया पीड़िता को समाज व मीडिया द्वारा दिया गया नाम है। भारतीय कानून व मानवीय सद्भावना के अनुसार ऐसे मामले में पीड़ित की पहचान को उजागर नहीं किया जाता। नई दिल्ली में अपने पुरुष मित्र के साथ बस में सफर कर रही निर्भया के साथ 16 दिसम्बर 2012 की रात में बस के निर्वाहक, मार्जक व उसके अन्य साथियों द्वारा पहले भद्दी-भद्दी फब्तियाँ कसी गयीं और जब उन दोनों ने इसका विरोध किया तो उन्हें बुरी तरह पीटा गया।

जब उसका पुरुष दोस्त बेहोश हो गया तो उस युवती के साथ उन ने बलात्कार करने की कोशिश की। उस युवती ने उनका विरोध किया परन्तु जब वह संघर्ष करते-करते थक गयी तो उन्होंने पहले तो उससे बेहोशी की हालत में बलात्कार करने की कोशिश की परन्तु सफल न होने पर उसके यौनांग में व्हील जैक की रॉड घुसाकर बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया।

बाद में वे सभी उन दोनों को एक निर्जन स्थान पर बस से नीचे फेंककर भाग गये। किसी तरह उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया। वहाँ बलात्कृत युवती की शल्य चिकित्सा की गयी। परन्तु हालत में कोई सुधार न होता देख उसे 26 दिसम्बर 2012 को सिंगापुर के माउन्ट एलिजाबेथ अस्पताल ले जाया गया जहाँ उस युवती की 29 दिसम्बर 2012 को मौत हो गई। 30 दिसम्बर 2012 को दिल्ली लाकर पुलिस की सुरक्षा में उसके शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

निर्भया ने 29 दिसंबर को आखिरी सांस ली थी. दिल्ली के मुनिरका इलाके में निर्भया के साथ गैंगरेप हुआ था. घटना वाले दिन निर्भया अपने एक दोस्त के साथ साकेत स्थित सेलेक्ट सिटी मॉल में ‘लाइफ ऑफ पाई’ मूवी देखने गई थी. लौटते वक्त दोनों एक बस में सवार हुए जिसके बाद उनके साथ दरिंदगी हुई.

एक आरोपी ने की थी खुदकुशी

18 दिसंबर 2012 को  घटना के दो दिन बाद दिल्ली पुलिस ने छह में से चार आरोपियों राम सिंह, मुकेश, विनय शर्मा और पवन गुप्ता को गिरफ्तार किया. वहीं 21 दिसंबर 2012- दिल्ली पुलिस ने पांचवां आरोपी जो नबालिग था उसे दिल्ली से और छठे आरोपी अक्षय ठाकुर को बिहार से गिरफ्तार किया था. सुनवाई के दौरान 11 मार्च, 2013 को आरोपी बस चालक राम सिंह ने तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली थी.

निर्भया केस: जब निर्भया का इलाज करने वाले डॉक्टर डॉ. कंडवाल  ने बताई दर्दनाक दास्तां, ‘कोई इतना क्रूर कैसे…?’

 हम बात कर रहे हैं निर्भया गैंगरेप केस की जिसमें 6 दरिंदों ने पैरामेडिकल की छात्रा निर्भया का न सिर्फ सामूहिक दुष्कर्म किया बल्कि उसके साथ बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं।  आज भी जब निर्भया के जख्मों और उसके दर्द की बात आती है तो उसका इलाज करने वाले डॉक्टर सहम जाते हैं। वह आज भी निर्भया की चीखों और हिम्मत को याद कर रुआंसे हो जाते हैं। एक बार उन्होंने अमर उजाला से बातचीत में निर्भया के इलाज के दौरान हुई पूरी दास्तां सुनाई थी, जिसे सुनकर आप भी सिहर जाएंगे….


16 दिसंबर 2012 की रात तकरीबन डेढ़ बजे जब निर्भया को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया गया था। वहां सबसे पहले देहरादून के डॉ. विपुल कंडवाल ने निर्भया का इलाज किया था। विपुल कंडवाल इस वक्त दून अस्पताल में कार्यरत हैं। लेकिन, उन दिनों वे सफदरजंग अस्पताल में कार्य कर रहे थे। आइए जानते हैं विपुल कंडवाल की जुबानी, एक निजी अखबार को दिए अपने इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि निर्भया की हालत देख वे अंदर से दहल गए थे। जिदंगी में पहले कभी ऐसा केस नहीं देखा था।


मैंने खून रोकने के लिए प्रारंभिक सर्जरी शुरू की। खून नहीं रुक रहा था। क्योंकि रॉड से किए गए जख्म इतने गहरे थे कि उसे बड़ी सर्जरी की जरूरत थी।

आंत भी गहरी कटी हुई थी। मुझे नहीं पता था कि ये युवती कौन है। इतने में पुलिस और मीडिया के कई वाहन भी अस्पताल पहुंचने लगे। 

डॉ. कंडवाल हालांकि इन यादों को शेयर नहीं करना चाहते। वे कहते हैं कि वे पल मेरे लिए बहुत ही इमोशनल थे । हां अगर हम निर्भया की जान बचा पाते तो उसके साथ फोटो जरूर खिंचाता। उस रात ही नहीं दो-तीन हप्तों तक हम दिन-रात निर्भया की स्थिति ठीक करने में जुटे रहे |


डॉ. कंडवाल कहते हैं, रात डेढ़ बजे का वक्त रहा होगा। मैं अस्पताल में नाइट ड्यूटी पर था। तभी रोज की तरह सायरन बजाती तेज रफ्तार एंबुलेंस अस्पताल की इमरजेंसी के बाहर आकर रुकी। तत्काल ही घायल को इमरजेंसी में इलाज के लिए पहुंचाया गया। कंडवाल बताते हैं कि मेरे सामने 21 साल की एक युवती थी। उसके शरीर के फटे कपड़े हटाए, अंदर की जांच की तो दिल मानों थम सा गया। ऐसा केस मैंने अपनी जिदंगी में पहले कभी नहीं देखा। मन में सवाल बार-बार उठ रहा था कि कोई इतना क्रूर कैसे हो सकता है?


उपचार के लिए विशेषज्ञ डाक्टरों का एक पैनल बनाया गया। इसमें मैं भी था। बाद में हालत बिगड़ने पर उसे हायर सेंटर रेफर किया गया, जहां से एयर एम्बुलेंस के जरिए सिंगापुर भी भेजा गया। लेकिन तमाम कोशिश के बावजूद निर्भया को बचाया नहीं जा सका।        

दोस्तों, ये दुखद घटना से पता चलता है कि वाकई ऐसे लोगों में डर या खौफ नहीं है | यह ऐसी घटना नहीं है जिसे हम पढ़ ले और  भूल जाएँ, हमें यह सोचना होगा कि कैसे ऐसी समस्यों का समाधान किया जाए ताकि दूसरा इस तरह की खबर पढ़ने को ना मिले |                                               

यह  एक अमानवीय घटना है और सुन कर  हमारा सिर शर्म से झुक जाता है ,क्या यही हमारा विकास है, क्या हमारी नजरो में एक युवती एक बेजान खिलौना है जिसे जब चाहे हवस का शिकार बनाया जाए | अब तो हद हो गई है आए दिन अभी भी ऐसी घटनाये हो रही है | ज़रुरत है एक व्यवस्था की ताकि लोगो के मन में डर पैदा हो और हमारी लड़कियां खुद को सुरखित महसूस कर सके ….

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