#देवी अहिल्याबाई होलकर#

दोस्तों, हमारे भारत में बहुत सारे शख्स हुए है, जिन्होंने अपने कर्मो से इतिहास रचा है, कुछ को हम याद करते है लेकिन कुछ को भूल चुके है |

 ऐसी ही एक शख्सियत की चर्चा आज कर रहा हूँ,  जिनके जीवनी के बारे में जान कर हम सबों को प्रेरणा मिलेगी |

मालवा साम्राज्य की महारानी देवी अहिल्या बाई होल्कर ,  इनके द्वारा किये गए कार्यों से हमें  बहुत सारी सीखें  मिलती है |

इनका जन्म 1725 में महाराष्ट्र के अहमदनगर के छोनी गाँव में हुआ था | इनके पिता मनकोजी राव सिंधिया , गाँव के पाटिल थे | यह वो जमाना था जब महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था | इसके बाबजूद उनके पिता ने उन्हें पढ़ा लिखा कर अच्छे संस्कार दिए | बचपन से ही अहिल्या बाई में सेवा भाव कूट – कूट कर भरी थी |

ऐसा कहा जाता है कि एक दिन इंदौर के राजा होलकर साहब  छावनी गाँव से गुज़र रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक छोटी बच्ची मंदिर के सामने कुछ गरीबों को भोजन करा रही है |

इसे देख कर राजा साहब उस बच्ची से बहुत प्रभावित हुए | वो बच्ची और कोई नहीं बल्कि अहिल्या बाई थी | इस तरह  सिर्फ आठ साल की उम्र में उनका हाथ राजा ने अपने बेटे खंडेराव जी के लिए मांग लिया | इस तरह वह छोटी उम्र में ही ब्याह कर इंदौर के होलकर राजघराने की बहु बन गयी |

संयोग से उनके पति कम उम्र में ही कुम्हेर युद्ध में शहीद हो गए | इस तरह सिर्फ 21 वर्ष की उम्र में देवी अहिल्या बाई विधवा हो गयी | फिर 12 वर्षों के बाद उनके ससुर राजा  होलकर की भी मृत्यु हो गयी |

उसके एक साल के बाद उनके सिर ताज पहनाया गया और 1767 में अहिल्या बाई मालवा की महारानी बन गयी | तब से 1795 तक, जब तक वह जिन्दा रही , इन्होने ऐसा राज किया कि जो हमेशा के लिए मिशाल बन गया |

उनके ज़िन्दगी से जुडी कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं को देखने से पता चलता है कि वे कितनी महान थी और उनके कृत्य औरों के लिए प्रेरणा का  श्रोत बना |

आइये उन घटनाओं की चर्चा करें, जिससे हम शिक्षा प्राप्त कर सकते है |

उनके शासन की सबसे  बड़ी विशेषता यह थी कि वे कभी भेद भाव नहीं करती थी |  राज परिवार हो या राज्य की जनता हो उनकी नज़र में सभी लोग  बराबर थे |

अपने बेटे को मृत्युदण्ड दिया  

एक बार की घटना है कि महारानी अहिल्या बाई के बेटे मालू जी का रथ, बाज़ार से गुज़र रहा था तभी उस रथ से एक बछड़ा के टकरा जाने से उसकी मृत्यु हो गयी | उस समय बछड़े की माँ कुछ दुरी पर थी | अपने बछड़े की मृत्यु के बाद गाय अपने बछड़े के पास उदास होकर बैठ गयी |

कुछ समय बाद,  संयोग से उसी रास्ते से महारानी का रथ गुज़र रहा था |  तभी उन्होंने देखा कि गाय अपने मरे हुए बछड़े के पास उदास बैठी है | उन्हें समझते हुए देर न लगी कि किसी ने उसके बछड़े को मारा है | लोगों से यह भी पता चला कि इसका दोषी और कोई नहीं बल्कि उनका खुद का बेटा मालू जी है, जिनके रथ से टक्कर के कारण बछड़े की मृत्यु हो थी |

यह जान कर महारानी को बहुत गुस्सा आया | वो जब अपने दरबार में वापस आयी तो सबसे पहले मालू जी राव की पत्नी को बुलाया | उनसे पूछा कि तुम बताओ कि अगर एक बच्चे की जान उसकी माँ के सामने  ले ली जाए, तो जिसने जान ली है उसे क्या दंड मिलना चाहिए ?

उन्होंने तुरंत उत्तर दिया कि जान के बदले जान लिया जाना चाहिए |

इतना सुनना था कि महारानी ने अपना  फैसला सुनाते हुए यह ऐलान किया कि मालू जी के हाथ पैर बाँध कर, उसे बीच सड़क में रथ से कुचल कर उसे प्राण दण्ड दिया जाए |

लेकिन कहा जाता है कि इसके लिए कोई भी सारथि बनने को तैयार नहीं हुआ | लोगों  का कहना था कि एक जानवर के प्राण  के बदले राजकुमार को प्राण दंड न देकर, उसे  माफ़ कर दिया जाए | लेकिन महारानी इसके लिए तैयार नहीं थी | उनकी नज़र में सभी के जान की कीमत बराबर थी |

जब कोई सारथि नहीं मिला तो वह खुद ही रथ पर बैठ गयी और सारथि बन कर निकल पड़ी अपने ही बेटे के प्राण लेने | तभी एक विचित्र घटना देखने को मिली | जो एक कथा बन गयी |

यह एक लोक प्रचलित कथा है कि जब महारानी रथ पर सवार होकर अपने ही बेटे को कुचलने निकली तो वो गाय जिसका बछड़ा को मार दिया गया था वो बार बार रास्ता  रोक कर खड़ी हो जाती थी | वो हर बार आड़े आ जाती, और महारानी के रथ को आगे नहीं बढ़ने देती |

तभी उनके मंत्री जी ने महारानी जी से कहा — आप  मालू जी को माफ़ कर दीजिये |  गाय भी यही चाह रही है कि किसी और बच्चे की जान उसकी माँ के सामने न लिया जाए | अंततः महारानी को अपने बेटे को माफ़ करना पड़ा |

उस गाय के बार बार रास्ते में आड़े आने के कारण इंदौर के इस बाज़ार को “आड़ा बाज़ार” कहा जाने लगा |

कभी हार नहीं मानना चाहिए

एक दूसरी घटना से महारानी ने यह सन्देश देने की कोशिश की कि दुनिया में हर समस्या का समाधान है | और कभी भी हमें हार नहीं माननी  चाहिए |

1754 के युद्ध में जब उनके पति शहीद हो गए तो उन दिनों सती प्रथा बहुत प्रचलित थी | इसलिए अहिल्या बाई भी चाह रही थी कि वे अपने पति के साथ सती हो जाएँ |

लेकिन उनके ससुर ने इसकी इजाजत नहीं दी, क्योंकि आगे उन्हें ही साम्राज्य को संभालना था |

और सही है कि 12 साल बाद राजा की भी मृत्यु हो गयी | और उसके एक साल के बाद उनके बेटे की भी मृत्यु हो गयी | अंततः 1767 में उन्हें राज्य की बागडोर संभालनी पड़ी | जब वे इंदौर की महारानी बनी  तो आस पास के जो पेशवा थे, (राजा थे) उनको यह रास नहीं आया कि  राजगद्दी  पर कोई औरत बैठे  |  अतः  उनलोगों ने प्लान बनाया कि उस राज्य पर आक्रमण कर उसे अपने राज्य में मिला लिया जाए | वे समझते थे कि वहाँ की रानी तो कमजोर है |

ऐसा सोच कर पेशवा अपनी सेना लेकर इंदौर पहुँच गयी | इसकी सुचना महारानी को मिली, तब उन्होंने एक चाल चली | उन्होंने अपने सेनापति तुक्कू राव जी के हाथ सन्देश भिजवाया | उस सन्देश में उन्होंने लिखा था — पेशवा साहब, अगर आप युद्ध के लिए अमादा है तो आप आ जाइये, हम भी युद्ध के लिए तैयार है | मेरी अपनी महिला की सेना आप से लड़ने को तैयार है | सचमुच महारानी ने महिलाओं की एक  फौज तैयार कर रखी  थी |

लेकिन ज़रा सोचिये .. आपने हमें हरा दिया तो इतिहास क्या कहेगा ? लोग क्या कहेंगे, कि एक कमजोर स्त्री को जो अपने पति के मृत्यु के शोक में डूबी हुई थी, उसको हरा दिया और महान बन गए ?

और यह भी सोचिये कि अगर हमने आपको हरा दिया तो इतिहास क्या कहेगा कि एक नारी की सेना के सामने आप टिक नहीं सके |

जरा सोचियेगा, मुझे आप से बस इतना ही कहना है | वैसे,  हम युद्ध के लिए तैयार बैठे है |

महारानी की वह  चिट्ठी एक तीर की तरह पेशवा को चुभी थी | और वो सोचने पर मजबूर हो गए | अंततः उन्होंने उस चिट्ठी का जबाब कुछ इस तरह दिया … रानी साहिबा,  मुझे गलत ना समझे | हम तो युद्ध के इरादे से नहीं बल्कि शोक सभा में सम्मिलित होने के इरादे से आये है |

इस तरह से बिना जंग लड़ें ही महारानी ने वो युद्ध जीत लिया था |

आज ये दुनिया महारानी अहिल्या बाई होलकर को एक बुद्धिमान , दूरदर्शी सोच वाली शासक के रूप में याद करती है | महारानी  रोज़ अपने प्रजा से बात करती थी उनकी समस्याएं सुनती  थी और निष्पक्ष न्याय करती थी | सचमुच उनके जीवन से हम सभी बहुत सारी शिक्षा ग्रहण कर सकते है |

दोस्तों , हमें उम्मीद है कि यह ऐतिहासिक कहानी आपको पसंद आई होगी, | आप अपने विचार ज़रूर प्रकट करें |

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Categories: infotainment

9 replies

  1. Ahalyabai Holkar is an example of woman empowerment. She had done many social activities So That her name is in all history book.Nicely presented some facts of her.

    Liked by 1 person

  2. मां अहिल्या को शत शत नमन 🙏

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  3. Reblogged this on Retiredकलम and commented:

    रिश्तों में सदा प्यार की मिठास रहे ,
    कभी ना मिटने वाला एक एहसास रहे ,
    कहने को तो छोटी सी है यह ज़िन्दगी ,
    मगर दुआ है कि सदा आपका साथ रहे ….
    आप खुश रहे …स्वस्थ रहें |

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