#सोच अपनी अपनी#

ठाकुर साहेब अपने घर के बरामदे में बैठ कर धुप सेंक रहे थे | जाड़े में सुबह की धुप बड़ी प्यारी होती है | ठकुराईन पास में ही बैठे मटर छिल रही थी | तभी एक फेरीवाला  घर के बाहर से चिल्लाता हुआ गुज़र रहा था — “पुराने कपड़े दे दो और बदले में बर्तन ले लो |

फेरीवाले की आवाज़ सुन कर ठकुराईन अपनी साड़ी के पल्लो संभालती हुई दरवाज़े पर आयी और जोर से आवाज़ लगाईं – ओ फेरीवाले, इधर तो आना |

फेरीवाला लौट कर ठकुराईन के दरवाज़े पर आया | उसने ठकुराईन को देखा तो उसके चेहरे ख़ुशी से खिल उठे | उसने सोचा, ठकुराइन बड़े घर की है  तो आज ढेर सारे कपडे मिलेंगे और अच्छी आमदनी हो जाएगी |

ऐसा सोच कर उसने माथे से भारी टोकरी को उतार कर ठकुराईन के घर के दरवाज़े के पास  रखा और  थोडा सुस्ताने लगा | इस बीच  ठाकुर साहब स्नान करने चले गए |

ठकुराईन अन्दर से दो पुरानी साड़ी लेकर आई और उसे देते हुए फेरीवाले के पास रखे  प्लास्टिक का एक बड़ा सा टब उठा लिया |

Pic: Google.com

इस पर फेरीवाले ने कहा – मालकिन , यह अच्छे quality का टब है | इसके लिए तो चार साड़ी देने पड़ेंगे | इतना कह कर वह ठकुराईन के हाथ से टब लेने लगा | लेकिन वो टब वापस लौटाना नहीं चाहती थी | ठकुराईन  ने उसे समझते हुए कहा — अरे फेरीवाले ! यह साड़ी सिर्फ  एक एक बार की पहनी हुई तो हैं |  बिल्कुल नई जैसी है | एक टब के बदले में तो ये दो भी ज्यादा हैं, मैं तो फिर भी दे रही हूँ  |

फेरीवाले ने तुरंत कहा – अच्छा चार नहीं तो तीन साड़ी तो देने ही पड़ेंगे |

इस तरह एक दूसरे को अपनी पसंद के सौदे पर मनाने की प्रक्रिया चलती रही | तभी उसी समय  घर के दरवाजे पर  अचानक अर्द्ध विक्षिप्त हालत में एक महिला  वहाँ आकर खाना मांगने लगी | चेहरे से वह भूख से व्याकुल नज़र आ रही थी |

आदतन हिकारत से उठी ठकुराईन की नजरें उस महिला के कपड़ों पर गयी | अलग अलग कतरनों को गाँठ बाँध कर बनायी गयी, उसकी साड़ी उसके शरीर को ढँकने का असफल प्रयास कर रही थी | 

अपने सौदेबाजी में बिघ्न पड़ता देख कर एक बार ठकुराईन के मन में आया कि उस औरत को वहाँ से भगा दे | तभी सुबह सुबह का समय है, ऐसा सोच कर वह अंदर से रात की बची रोटियों मगवायी | उसने उसे रोटी दिया और उसे चलता किया |

और फिर ठकुराईन पलटते हुए फेरीवाले से बोली – हाँ तो, तुमने  क्या सोचा ? दो साड़ियों में दे रहे हो या मैं वापस रख लूँ !

इस बार फेरी वाले ने बिना कुछ बोले ठकुराईन को  चुपचाप टब पकड़ाया और दोनों पुरानी साड़ियाँ अपने गठ्ठर में बाँध कर जल्दी से बाहर निकल गया | 

अपनी जीत पर मुस्कुराती हुई ठकुराईन ख़ुशी ख़ुशी टब को देख रही थी | इसी बीच  ठाकुर साहेब स्नान से निवृत हो, बालों में कंघी करते हुए  बरामदे में आये | उन्हें देखते ही ठकुराईन चहकते हुए ठाकुर साहब से बोल पड़ी – हमने यह नया टब उस फेरीवाले से अपनी वो दो पुरानी साड़ी  के बदले लिया है, हालाँकि वह तीन साड़ी पर अड़ा हुआ था | लेकिन हमारे जोर देने पर वह किसी तरह राज़ी हो गया |

इतना  कहते हुए उन दोनों की नज़र गली के मुहाने पर चली गयी | ठकुराईन ने देखा —  गली के मुहाने पर वही फेरीवाला अपना गठ्ठर खोलकर उसकी दी हुई दोनों साड़ियों में से एक साड़ी उस अर्ध विक्षिप्त महिला को तन ढँकने के लिए दे रहा था |

हाथ में पकड़ा हुआ टब अब ठकुराईन को चुभता हुआ सा महसूस हो रहा था | फेरीवाले के आगे अब वो खुद को हीन महसूस कर रही थी | उसकी कुछ भी हैसियत न होने के बावजूद  वो फेरीवाले ने ठकुराईन को परास्त कर दिया था | वह अब अच्छी तरह समझ चुकी थी कि बिना झिक-झिक किये उसने मात्र दो ही साड़ियों में टब क्यों दे दिया था ? 

सच, कुछ देने के लिए आदमी की हैसियत नहीं , दिल बड़ा होना चाहिए | ठाकुर साहब कभी अपनी ठकुराईन को तो कभी फेरीवाले को देख रहे थे |

यह घटना हमें यह सीख देती है कि हमारे  पास क्या है ? और कितना है ? यह कोई मायने नहीं रखता ! हमारा  सोच व नियत सही और दिल बड़ा होना चाहिए | 

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Categories: motivational

14 replies

  1. कहते हैं ना भगवान दिल सबको देता है पर दिलदार बहुत कम होते हैं ।इंसान धन से नहीं मन से बड़ा होता है ।

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  2. बेहतर शिक्षा प्रदायक लेखन। ✌️👏👏👏

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  3. बहुत सुंदर बहुत ही अच्छा लिखा है सर

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  4. प्रेरक व सुंदर रचना 👌🏼👌🏼
    कहानी वास्तविकता को दर्शाने वाली हैं ।

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  5. मार्मिक कहानी। पढ कर अच्छा लगा।

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  6. Heart touching story. Nice.

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