# एक बार फिर #

वो भी एक जमाना था जब वो दिल के बेहद करीब थी और आज वो आँखों से दूर ही सही लेकिन अब भी उसे अपने  दिल के करीब महसूस करता हूँ |

वह दिल बेचारा उसकी  रुसवाइयों के डर से अपनी भावनाओं को छुपाते छुपाते थक चूका है | इसलिए वह अब कागज़ और कलम के सहारे खुद को अभिव्यक्त करने का प्रयास  कर रहा है ….  

एक बार फिर

मैं फिर एक बार

मिलना चाहता हूँ तुझसे

पर कहाँ और कैसे ?

पता नहीं.,

सोचता हूँ

तुझे अपनी कैनवास पर उतार लूँ

लेकिन मुझे ,

डर तेरे रुसवा होने का है

ख्वाबों में तो मिल  सकता हूँ

पर कब और कैसे ?

पता नहीं ,

तुम ही बताओ

कैसे मिलोगी मुझसे ?

( विजय वर्मा )

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Categories: kavita

8 replies

  1. अच्छी एवं भावपूर्ण कविता।

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  2. Emotional poem. Nice.

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  3. भावनाओं का बहाव अच्छा है। अगर, इरादा सच्चा है।

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