विक्टोरिया मेमोरियल की यादें

कोलकाता का विक्टोरिया मेमोरियल आज चार साल के बाद फिर देखने का मौका मिला | यह एक दर्शानिये स्थान है और पिछले 12 सालों से कोलकाता में रहते हुए बहुत बार यहाँ  घुमने का मौका मिला | यह कोरोना के कारण बंद कर दिया गया था जो अब चालू हो गया है |

आज सोमवार  का दिन, फिर भी काफी चहल पहल थी | मैं अपने एक मित्र के साथ यहाँ घुमने आया था | ठण्ड का मौसम और इसके गार्डन में धुप में बैठा बहुत अच्छा महसूस हो कर था |

अचानक यहाँ से जुड़े एक वाकया मुझे याद आ गयी जिसे मैं शेयर करना चाहता हूँ | हालाँकि बात १० साल पुरानी  है जब हमारी नयी नयी पोस्टिंग कोलकाता में हुई थी |

उन्ही दिनों हमारे एक करीबी मित्र अपने परिवार के साथ कोलकाता आये थे और संयोग से हमारे पास ही ठहरे थे | मैं उन दिनों बांसद्रोनी बैंक फ्लैट में यहाँ अकेला ही रहता था | मेरे दोस्त ने मुझसे कोलकाता घुमाने की फरमाइश की और मैं ने रविवार के दिन घुमने का प्रोग्राम बनाया | अपने एक बैंक के मित्र से उसकी कार उधार ली और निकल पड़े घुमने |

तभी उनके बच्चो ने बिरला तारामंडल ( प्लेनेटोरियम)  देखने की फरमाइश की | इसलिए हमलोग बिरला तारामंडल पहुँच गए | यह एशिया का सबसे बड़ा प्लेनेटोरियम है | हमलोगों ने वहाँ तारामंडल का शो देखा | यह शो खास कर बच्चो को बहुत पसंद आया |

उसके बाद हम सभी काली घाट के लिए रवाना हो गए | जो भी लोग कोलकाता आते है काली घाट ज़रूर जाते है |  काली माँ का दर्शन कर वापस आने लगे तब तक दिन के  चार पांच बज चुके थे | तभी बच्चो ने विक्टोरिया मेमोरियल घुमने की जिद करने लगे | हालाँकि हमलोग अब तक थक चुके थे फिर भी बच्चों के जिद करने पर हमने अपनी कार को  उस ओर मोड़  दिया  और कुछ ही देर में हमलोग वहाँ पहुँच गए |

हमने सोचा थोड़ी देर बच्चो के साथ यहाँ घूम कर वापस घर चल देंगे | ऐसा सोच कर हमने विक्टोरिया मेमोरियल के  आस पास  ही कुछ दुरी पर अपने कार खड़ी की और बच्चो के साथ टिकट लेकर अन्दर चले गए करीब एक घंटें वहाँ घूमते रहे | यह जगह मुझे बहुत पसंद है, जब भी मुझे मौका मिलता मैं यहाँ कुछ समय बिताने ज़रूर आता हूँ |

कोलकाता में यह  जगह  मेरे  घूमने के स्थानों की सूची में सबसे ऊपर है |  सचमुच यह वास्तुकला के बेहतरीन कलाकारी को प्रदर्शित करता है | सफेद संगमरमर का यह स्मारक भव्यता का एक आदर्श प्रतिनिधित्व करता है जिसकी सुन्दरता सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है | मेमोरियल गैलरी और इसके परिसर के आसपास के उद्यान करीब 64 एकड़ के क्षेत्र में फैले हुए हैं।

आज इसने सौ साल पुरे कर लिए है क्योंकि पहली बार  दिसंबर 1921 में विक्टोरिया मेमोरियल हॉल को जनता के लिए खोले गए थे |

हमलोगों को घूमते हुए करीब एक घंटा हो चुके थे तभी वहाँ के गार्ड घंटी बजा कर परिसर खाली कराने लगे | अब शाम ढल चुकी थी और चारो तरफ लाइटिंग हो गया था | इस तरह  लाइटिंग  में विक्टोरिया मेमोरियल की  खूबसूरती और भी बढ़ गयी थी | सचमुच बहुत  सुन्दर नज़ारा था | हम सभी को बहुत मज़ा आ रहा था, |  

तभी घर वापस जाने के ख्याल से हमलोग अपने गाडी के पास बढ़ रहे थे तो देखा मेरे गाडी के पास पुलिस खड़ी हैं और मेरी  कार  का मुआयना कर रही है | मुझे कुछ समझ में नहीं आया  तो मैं पास के चाय दूकान में चला गया और तीन चाय देने को कहा | फिर मैंने धीरे से चाय वाले से पूछा — यह पुलिस कार  का मुआयना क्यों कर रही है ?

उसने बताया कि किसी ने यहाँ कार  खड़ी कर दी है और यह नो पार्किंग जोन ( no Parking zone ) है , इसलिए अब इस गाड़ी का चालान कटेगा | उसकी बात सुन कर मैं घबरा गया | एक तो कार  मेरे एक दोस्त की थी और मेरे पास उस गाडी के  कागजात भी नहीं थे |

मैं उस मुसीबत  से निकलने का उपाय सोचने लगा | मैंने चाय ख़तम किया और थोड़ी देर वही चुप चाप खड़ा रहा | तभी मैंने देखा कि पुलिस वहाँ से कहीं चली गयी | मैंने अपने दोस्त से  कहा – ज़ल्दी से गाडी में बैठो , अभी पुलिस  वाला नहीं है |

हमलोग जल्दी से गाडी में बैठ गए और जैसे ही गाड़ी स्टार्ट करने वाले थे तभी वो पुलिस वाला दौड़ कर मेरे गाडी के सामने आ कर खड़ा हो गया | मैंने उससे पूछा — . क्या बात है ?

उसने कहा – आपकी गाडी नो पार्किंग में है |  साहब के पास चलिए, आपका चालान कटेगा |

 उसकी बातें सुन कर मैं  घबरा गया क्योंकि मेरे  साथ  मेरे दोस्त और उसकी फॅमिली भी थी |

तभी मुझे एक आईडिया सुझा  | मैंने  अपने पॉकेट में हाथ डाला तो  हाथ में पचास रूपये का नोट आया |  मैंने उस पुलिस  वाले को बोला — मेरे पास यही है,  इसे लीजिये और मुझे जाने दीजिये | पुलिस ने इधर उधर देखा और धीरे  से पैसा लेकर पॉकेट में रखते हुए जाने का इशारा किया |

मैं जल्दी से वहाँ से निकल जाना चाहता था ताकि उसका सीनियर पुलिस वाला नहीं आ जाये वर्ना मुसीबत में पड़  सकते थे |

लेकिन मैं इतना घबरा गया कि गाडी स्टार्ट ही नहीं कर पा रहा था, मैं कोशिश कर रहा था लेकिन अंततः गाड़ी स्टार्ट नहीं हो सका |

तभी वह पुलिस वाला मेरे पास आया और कहा — मैं पीछे से धक्का देता हूँ, आप गाड़ी स्टार्ट करना | और फिर उस बेचारे ने अपनी  पूरी ताकत से गाडी को ठेलते हुए कुछ दूर तक ले गया और इस तरह मैं गाडी स्टार्ट करने में सफल हो पाया और गाड़ी लेकर वहाँ से तेज़ गति से निकल गया |  तब मैंने  चैन की सांस ली |

मेरे दोस्त ने कहा — पुलिस का अच्छा सर्विस है |

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Categories: मेरे संस्मरण

12 replies

  1. I have visited this memorial several times, and every time it has fascinated me. You have given an interesting account, and bribing police!

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  2. An interesting story! I guess being corrupt (the policeman) is a public service. You avoided the challan, and he was able to give his family a little better quality of life.

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  3. पढ़ कर मजा आया।

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  4. I have visited Victoria memorial hall several times during my stay in Kolkata from 1993 to 2000.But your story ended with true picture of Kolkata police.Nicely written.

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  5. बहुत सुंदर और मजेदार संस्मरण।

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