ये कैसी मोहब्बत  ? ( 4 )

आधी रात का समय. चारो तरफ घोर अँधेरा और गजब की शांति थी | बस,  समुद्र तट पर उठ रही लहरों को टकराने से जो ध्वनि हो रही थी वह शांत वातावरण से छेड़ छाड़ कर रही थी |

जया अपने साथियों के साथ समुद्र के किनारे तय जगह पर उस स्टीमर के आने का इंतज़ार कर रही थी | सभी साथी गोली बन्दुक से लैस थे ताकि किसी अनहोनी घटना का सामना किया जा सके | थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद दूर से एक स्टीमर आता हुआ दिखाई दिया |

जया ने अनुमान  लगाया कि शायद यह वही स्टीमर है जिसमे कन्साइनमेंट का माल आ रहा होगा | सभी  लोग चौकन्ने हो गए और उस पर नज़र रख रहे थे | स्टीमर उन्ही लोगो की तरफ आ रही थी | अचानक  उस वीरान अँधेरी रात  में स्टीमर से किसी ने टोर्च जला कर सिग्नल दिया | इधर से भी सिग्नल भेजा गया  | इस तरह दोनों पार्टी आपस में आश्वस्त हो गए और फिर  स्टीमर किनारे पर आ कर लग गया |

कन्साइनमेंट देने वाला व्यक्ति अपनी मुँह पर नकाब चढ़ा रखा था , लेकिन कुछ secret code बोला और फिर इस तरह बैग जया के हांथो में थमा दिया | जया उस आदमी का चेहरा तो नहीं देख सकी लेकिन उसकी  आवाज़ जानी पहचाने लग रही थी | वह अपनी शंका के समाधान हेतु उससे कुछ पूछना चाह रही थी तभी उसके साथी ने जोर से चिल्लाया – पुलिस पुलिस |

 और पलक झपकते ही अँधेरे का फायदा उठा कर जया  और उसके लोग माल सुरक्षित लेकर वहाँ से निकल गए और स्टीमर भी वहाँ से निकल चूका था |

दुसरे दिन जया रात का खाना खा कर सोने जा रही थी तभी उसे उस शख्स की याद आ गयी | जया आंखे मूंदें अपने कमरे में बैठे सोच रही थी कि वह माल देने वाला व्यक्ति कोई जान पहचान वाला तो नहीं ? क्योंकि उसकी आवाज़ बिलकुल जानी पहचानी सी लग रही थी | अगर थोड़ी और बात हो जाती तो शायद वह जान पाती कि वह  जाना पहचाना इंसान कौन है ? लेकिन पुलिस ने आकर इस सम्भावना को समाप्त कर दिया था |

हालाँकि,  उस इंसान के सामने आते ही जया को एक अजीब सी बेचैनी महसूस हुई थी इसलिए जया उससे दुबारा मिलने की  जुगाड़ में लग गयी | उसने महसूस किया कि उससे उस आदमी का कोई न कोई सम्बन्ध ज़रूर है | हालाँकि इस धंधे में हजारों लोग मिलते है और सभी को याद रख पाना संभव नहीं होता |

आधी रात हो चुकी थी लेकिन जया इन्हीं सब बातों में  उलझी थी और  उसे नींद नहीं आ रही थी | तभी वह अपने कुर्सी से उठी और टेबल पर रखे मोबाइल को उठा कर उस स्मगलर को फ़ोन मिला दी जिसने उस माल को भेजा था |

जया ने संक्षेप में बात करते हुए उसे और ज्यादा माल भेजने को कहा |

जबाब में उस तस्कर ने कहा – माल तो मिल जायेगा  लेकिन पेमेंट पहले चाहिए |

इस पर जया तैयार हो गयी परन्तु एक  शर्त रखी कि पेमेंट लेने उसी को भेजना होगा जो कन्साइनमेंट ले कर आया था |

अच्छा वो, शान्तु भाई ! वह तो इस धंधे में मेरा दाहिना हाथ है | तुम अगर चाहती हो मैं उसे ही भेज दूंगा , वर्ना पैसों की  लेन देन मैं खुद ही करता हूँ |

ठीक है,  कल तुम अपने आदमी को मेरे पास भेज देना, जगह और समय मैं बाद में बताउंगी |

इतना कह कर वह अपना मोबाइल बंद कर देती है और वापस कुर्सी पर बैठ कर अपनी आँखें बंद कर लेती है | उसे अब समझ में आ चूका था कि जिसका आवाज़ उसे जाना पहचाना लग रहा था वह और कोई नहीं बल्कि उसका ही धोखेबाज़ आशिक शान्तु था | अगर पहले से पता होता तो मैं उसी समय उसे  ठोक देता और समुद्र को अर्पित कर देता | खैर, अब वह मेरे हांथों से बच नहीं सकता  | जया के चेहरे पर नफरत की रेखाएं खीच गयी |

दो दिन बीत गए लेकिन जया ने अभी तक उस तस्कर को फ़ोन नहीं किया था | रात के करीब  दस बज रहे थे और जया अपने साथियों के साथ कुछ ज़रूरी विचार विमर्श कर रही थी तभी उसके मोबाइल की घंटी बज उठी | उसने देखा तो वही तस्कर का कॉल था | वह तुरंत फ़ोन उठा कर उससे बात करने लगी | बातों बातों में उसे दो दिन आगे की तारीख दे दी और प्रोग्राम फाइनल हो गया |

लेकिन इसी बीच वह परेशान हो उठी , तो उसके साथी  ने कारण जानना चाहा |

जया ने कहा कि मालवीय नगर का मकान नंबर – ३५२ हमें एक दिन के लिए भाड़े पर चाहिए |

इस पर उसके साथी ने भरोषा दिलाया .. आपका काम हो जायेगा | और फिर सभों के साथ मिल कर जया ने उस शान्तु से मिलने  की अपनी रणनीति बना ली | अब तो उस शान्तु को सामने आने का इंतज़ार था |

दो दिन बाद का समय तय था लेकिन जया को एक एक पल काटना मुश्किल हो रहा था | वह ज़ल्द से ज़ल्द उससे मिलना चाहती थी ताकि वह जान सके कि  क्या उसकी मज़बूरी थी जिसके कारण उसने उसके साथ इतना बड़ा धोखा किया था ? उसके दिल से बस यही आवाज़ निकल रही थी कि … हमने तो वक़्त के साथ वक़्त से ही लड़ना सिखा है और वक़्त के इस खेल में हम वक़्त के आगे ज़रूर निकल जायेंगे | 

यह सही है कि समय गुज़रते देर नहीं लगती और देखते देखते दो दिन बीत गए और इंतज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हो गयी | जया ने उस भाड़े पर लिए हुए मकान को खूब अच्छी तरह सजा कर रखा था |  पहले जैसे ही पलंग और सोफा सेट  भी लगा रखे थे |  बिलकुल नया सा कमरा को सजा दिया गया था  मानो कोई इसमें  सुहागरात मनाने वाला हो |

सब काम योजनावद्ध तरीके से किया जा रह था क्योंकि जया को पता था कि शान्तु भी अपने आदमियों के साथ हथियारों से लैस होकर आएगा | यह धंधा ही कुछ ऐसा है | सभी का जान तो जोखिम से भरा होता है और कहते है न कि जो डर गया, समझो मर गया | या तो उसे मार देंगे या वो हमें मार देगा,  यह परिणाम तो वक़्त ही तय करेगा |

ये कैसी मोहब्बत – 5   हेतु  नीचे link पर click करे..

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7 replies

  1. बुरा का अंत तो बुरा ही होता है। अच्छी कहानी।

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  2. कहानी एक दिलचस्प मोड़ पे……!

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  3. Sundar Kahani. Kahani ka anta bura hai.

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  4. Reblogged this on Retiredकलम and commented:

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