# दोस्तों की महफ़िल #

दोस्तों,

अपने बैंकिंग सर्विस में मुझे नयी नयी जगह को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ | कुछ लम्हे मीठे थे तो कुछ में कटु अनुभव भी हुए | आज जब उन पलों को याद करता हूँ, या हम उन्ही सहकर्मियों को  सोशल मीडिया पर देखता हूँ तो वो बीते पल अचानक ही याद आने लगते है | मन में एक अजीब सा  उत्साह का संचार होता  है |  इसलिए मैं उन बिताये पलों को इस ब्लॉग के माध्यम से शेयर करता रहता हूँ |

आज भी मुझे ऐसी ही बिताये गए पलों की याद आई है और मेरे चेहरे पर मुस्कराहट बिखर गयी है  | मैं चाहता हूँ कि वो पल आप सब लोगों के साथ शेयर करूँ ..

बात करीब 15  साल पुरानी है | तब हमारी पोस्टिंग कोलकाता में  थी | मैं इस जगह में  लिए बिलकुल नया था | .. मेट्रो शहर में रहने का कोई अनुभव नहीं था क्योंकि इससे पहले गाँव या छोटे शहरों की शाखा में काम करने का मौका मिला था |

लेकिन इस बार बड़ा शहर के साथ साथ बड़ी शाखा या यूँ कहें कि कोलकाता की मुख्य शाखा में पोस्टिंग मिली थी | गजब का अनुभव हो रहा था | अब तक की पोस्टिंग में  छोटी शाखा होने से अपना एक अलग पहचान और रुतबा रहता था | लेकिन इस शाखा में एक नहीं बल्कि पुरे 12 ऑफिसर थे जिन्हें अलग अलग विभाग के काम दिए हुए थे | मैं तो यहाँ एक जूनियर ऑफिसर था , इसलिए मैं सहमा सहमा सा  रहता था |

लेकिन कुछ ही दिनों में सभी लोगों का सहयोस प्राप्त होने पर  यह जगह मुझे अच्छी लगने लगी | यहाँ मेट्रो रेल का सफ़र , ट्राम का सफ़र और सबसे आश्चर्यचकित करने वाल हाथ गाडी था | मैं इन सभो तरह के गाड़ियों पर सफ़र कर रोमांचित हो जाता था |  समय बीतने लगा  | तभी यहाँ एक और  नया अनुभव  भी प्राप्त हुआ |

दरअसल शाखा में ज्यादा काम होने की वजह से हमलोग को खूब काम करना पड़ता था और यहाँ के प्रबंधक महोदय काफी सीनियर थे |

हर माह के अंतिम शनिवार को शाखा के सभी ऑफिसर को  हमारे प्रबंधक महोदय यहाँ के एक बड़े से होटल में ले जाते थे और वहाँ पार्टी होती थी | यह सिलसिला हमारे इस शाखा में ज्वाइन करने से पहले से चला आ रहा था | इसे मासिक पार्टी कहा जाए तो अतिश्योक्ति ना होगी |  इसलिए अगले पार्टी में हमें भी शरीक होने का मौका मिला |

मुझे आज भी याद है,  हमलोग सभी 12 ऑफिसर 2-3 टैक्सी में भर कर पार्क स्ट्रीट के एक  प्रसिद्ध होटल “ब्लू फॉक्स “ मैं पहुंचे | उन दिनों ब्लू फॉक्स काफी प्रसिद्ध था हालाँकि अब वह किसी कारण से  बंद हो चूका है | वहाँ बड़ा सा टेबल बुक किया गया और हमलोग सभी  एक बड़े ग्रुप में बैठे थे | फिर पता चला कि आप अपने पसंद का कुछ भी खाना पीना आर्डर कर सकते है, इसकी कोई सीमा नहीं थी |

मैंने देखा हमारे प्रबंधक महोदय के सामने ही लोग  व्हिस्की का आर्डर  कर रहे है | मुझे यह देख कर झिझक हो रही थी , तभी बड़े साहब ने मेरी ओर देख कर कहा – अभी यहाँ मैं आपका बॉस नहीं हूँ , आपका दोस्त हूँ | आप बेझिझक अपनी पसंद का आर्डर कर सकते है |

फिर क्या था , मैंने  सबसे मंहगा वाला  व्हिस्की  आर्डर कर दिया | हमारे कुछ साथी जो ड्रिंक्स नहीं लेते थे तो उन्होंने सिर्फ कोल्ड ड्रिंक्स का आर्डर किया | सभी आर्डर के सामान थोड़ी ही देर में हमारे सामने  बड़े टेबल पर सज गए |  ड्रिंक्स के आलावा चिकेन चिली  और बहुत सारे खाने के सामान टेबल पर सज चुके थे |

चियर्स का आह्वान के साथ ही मेरा व्हिस्की का दौर चल चूका था | लेकिन मेरी एक कमजोरी है,  जब भी  मैं दारु देखता हूँ तो अपने पीने  की सीमा पार कर जाता हूँ और वहाँ भी ऐसा ही हुआ |

चूँकि पीने  की पूरी छुट थी तो फिर मेरा कुछ ज्यादा ही हो गया | फिर मैंने देखा कि कुछ और लोग पर भी नशा हावी हो चला था और सभी बक बक कर के अपने मन की भडास निकाल रहे थे |  जिससे भी जिसको कोई शिकायत थी वह इस टेबल पर एक दुसरे को बोल कर अपना मन हल्का कर रहा था | इसमें एक बात मैंने गौर  किया  कि हमारे बड़े साहब शराब को हाथ तक नहीं लगाया , लेकिन वे हमलोगों के हरेक बातों को चुप चाप सुन रहे थे |

पार्टी समाप्त हुई और सभी को अपने अपने घर जाने की व्यवस्था की गयी थी | सचमुच ऐसी पार्टी पहली बार  देखी थी और मैंने खूब एन्जॉय किया |

बाद में पता चला इस पार्टी के पीछे क्या रहस्य है | जी हाँ, हमारे बड़े साहब बहुत ही अनुभवी थे और वे इस तरह की पार्टी महीने के अंतिम शनिवार को रखते थे | इसके दो कारण थे…एक  तो शनिवार को आधा  दिन की (half day) बैंकिंग होती थी इसलिए समय उपयुक्त होता था क्योंकि अगले दिन रविवार को शारीरिक रिपेयरिंग का समय मिल जाता था |

और दूसरी कारण मनोवैज्ञानिक था | जब लोग दारु पीते है तो  दिल से सच्ची सच्ची बातें करते है | और शाखा में काम के दौरान कोई किसी तरह की शिकायत होती थी तो इस टेबल पर वो सभी बाहर निकल जाते थे और हमारे बड़े साहब को अपने ऑफिसर की जो समस्याएं होती थी उसका  यहाँ पता चल जाता था |

इस तरह सभी ऑफिसर  अगले  दिन से फ्रेश मन से और अपनी पूरी क्षमता से काम में लग जाते थे |

और हाँ, शायद आप के मन में एक प्रश्न घूम रहा होगा कि इस पार्टी में बहुत पैसे खर्च होते थे तो वो पैसे कौन चुकाता  होगा  ?

 इसका उत्तर बहुत आसान है | सोमवार को हरेक ऑफिसर के पास एक स्लिप पहुँच जाता था जिसमे रकम लिखे होते थे जिसे आप को देना होता था | यानी कुल  खर्चे को जो उस समय एक ऑफिसर भुगतान  करता था , लेकिन अगले दिन उस रकम को सभी ऑफिसर में बराबर बाँट दिया जाता था |

सबसे बड़ी बात यह कि जो कोल्ड ड्रिंक्स पीया था और जो व्हिस्की  पीया  था,  सभी को एक बराबर टैक्स देना होता था …और हमलोग ख़ुशी ख़ुशी देते थे …  क्योंकि ….दोस्तों के संग ऐसे माहौल को एन्जॉय करने की  कोई कीमती  नहीं होती है, वह  बेशकीमती होती है |  जहाँ छोटा बड़ा सभी उस पल एक सामान हो जाता था … ना कोई ईगो ना कोई अहम का टकराव होता था |

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Categories: मेरे संस्मरण

6 replies

  1. बहुत अच्छा एवं मजेदार।

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  2. Interesting , sir nice mehfil with two optimum reasons and the monday tax😊

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  3. Enjoying life with friends and colleagues in Kolkata is different in compare to other parts of India which is called metro style. I had stayed in Kolkata from 1993 to 2000.Till now all my Bengali friends are sharing our old relationship and friendships with me.True confession.

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