# कैसी है ज़िन्दगी #

सच पूछा जाए तो हम अपनी ज़िंदगी को जीना ही भूल गए है । हम अपने रोजमर्रा के काम और दिन प्रतिदिन की भाग दौड़ में इतने व्यस्त हो गए है कि अपनी ज़िंदगी को ठीक से कैसे जिए ये ही भूल गए है |

ज़िन्दगी बहुत खुबसूरत है . बहुत कीमती भी है , इसे न  सिर्फ जीना चाहिए बल्कि  महसूस भी करना चाहिए …

यह कविता ज़िंदगी को सही ढंग से जीने और उसे समझने का एक प्रयास है।

मेरी ज़िन्दगी ..

जाने कैसी है ये ज़िन्दगी ,

एक इच्छा जब पूर्ण होती है ..

तो फिर नयी इच्छाएं जन्म लेती है

यही तो है ज़िन्दगी …|

सुख की चाह में

संघर्ष करती ये ज़िन्दगी

मात्र खुद के लिए

समय न निकाल पाती ये ज़िन्दगी

अटपटी है , अनोखी है

अनबुझ पहेली है ज़िन्दगी

जैसी भी है पर है तो    

मेरी अपनी दुलारी ये ज़िन्दगी |

             ( विजय वर्मा )

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Categories: kavita

13 replies

  1. अच्छी कविता।
    जैसी भी है पर है तो
    मेरी अपनी दुलारी ये जिंदगी।
    सचमुच अपनी जिंदगी चाहे जैसी भी हो पर है तो अपनी।

    Liked by 1 person

  2. Very nice poem.Enjoy the taste of life fruit at ripen stage.

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  3. अति सुन्दर रचना

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  4. Very well said. It is after all my life and we should remain positive whatever be the circumstances.

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