# एक किताब का दर्द #

कलियुग की दुनिया है जनाब ,
कदर उसकी नहीं होती, जो सच में रिश्ता निभाता है,
कदर उसकी होती है, जो झूठा दिखावा करता है …

Retiredकलम

मैं एक किताब हूँ , .कोई मुझे  “दिल की किताब” कहता है तो कोई दिल से लगा कर रखता है | मैं हर तरह के लोगों के लिए बनी  हूँ |

जो जैसा पसंद करे वैसा बनकर उसके दिल के  सेल्फ में सजा दी जाती हूँ |   मेरे चाहने वाले  तो अनगिनत  थे, लेकिन समय इतनी तेज़ी से बदल  रहा है  कि उतनी तेज़ी से मैं अपने को नहीं बदल सकी और मेरी चाहत अब धीरे धीरे कम होने लगी है |

ऐसा लगता है आने वाले समय में मेरा अस्तित्व ही खतरे में ना पड़  जाये ,  इसलिए अब “इ –बूक” के रूप में अपने को ढालने  लगी हूँ |

इस कंप्यूटर के युग  में मुझे भी एक मौका दिया गया है | हालाँकि  पहले जैसी बात  नहीं रह गई है  | पहले,  मुझे लिखने वाले  खुद  डूब कर लिखते थे  और पढने वाले भी उतनी ही तन्मयता…

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