नल और दमयंती की प्रेम कहानी – 1

हर शादीशुदा व्यक्ति की अपनी पत्नी से कुछ अपेक्षाएं होती हैं |  ठीक उसी तरह जिस तरह हर एक पत्नी की अपने पति से कुछ अपेक्षा होती है |  

लेकिन आज कोरोनाकाल के बदलते दौर में मधुर रिश्तों का आभाव हो गया है | अक्सर देखा जाता  है कि हम अपनी  गलतियाँ एक दूसरे पर थोपने  का प्रयास करते है |

आज रिश्तों का डोर तो  इतना कमजोर हो गया है  कि हल्की-फुल्की बात पर भी लोग अलग होने का फैसला लेने में संकोच नहीं करते है |

और यह भी सत्य है कि सब यही सोचते है कि हमारा दुःख दूसरों के दुःख से बड़ा है |

इसी के सन्दर्भ में मुझे एक प्रेम कहानी पढने का मौका मिला, जिसमे पत्नी पति के रिश्तो की अहमियत बताया गया है और जो हमारे लिए एक शिक्षा भी है |

आइए आज हम महाभारत से उद्धरित उस  नल – दमयंती की प्रेम कहानी की चर्चा करते है |

निषाद  देश में वीरसेन के पुत्र नल नाम के एक राजा थे.|  वे  बहुत सुन्दर, धार्मिक  और गुणवान थे | साथ ही सभी तरह की अस्त्र विद्या में भी बहुत निपुण थे |  लेकिन  उन्हें  पासा खेलने (जुआ) का भी बहुत शौक था, हालाँकि  वे उसमें माहिर नहीं थे ।

अपने समय के सबसे सुंदर पुरुषो में एक  होने के बावजूद , वह अभी भी वे अविवाहित थे | एक दिन वे जंगल में विचरण कर रहे थे तभी उन्होंने  एक बहुत सुन्दर हंस को देखा /  उसके पंख सुनहले थे |

उस सुन्दर हंस को  देखते ही उन्होंने उसे पकड़ लिया  और अपने राजमहल ले जाने को चल पड़े |

हंस ने सोचा कि मैं यहाँ प्रकृति में स्वछन्द विचरण करती हूँ और यह राजा मुझे अपने महल में कैद करके रखेगा |

उसके कैद से आजाद होने के लिए हंस के  मन में एक युक्ति सूझी |

उसने राजा नल से कहा .. हे राजा , अगर आप मुझे छोड़ दोगे  तो  आप के लायक एक बड़ी खबर सुनाउंगी |

राजा बोले .. ऐसी बात है तो मैं तुम्हे छोड़ सकता हूँ, लेकिन बताओ वो खबर क्या है ?

तब हंस ने कहा .. विदर्भ देश की एक बहुत ही सुन्दर और अतिगुण  राजकुमारी है | वो इतनी सुन्दर है  कि धरती के सभी राजा उससे ब्याह करने को लालायित रहते है |

यहाँ तक कि स्वर्ग के राजा भी उसकी चाहत रखते है | लेकिन उसकी शादी वही होगी जिससे वो चाहेगी |

अगर आप मुझे छोड़ देंगे तो मैं उसके पास जाकर आप के बारे में इतना गुणगान करुँगी कि वो आपको दिल दे बैठेगी |

नल  उस राजकुमारी की सुन्दरता और गुणों की बखान सुन कर मन ही मन उसे  दिल दे बैठा |

उन्होंने हंस से कहा…जा, अब तुझे मैं  आज़ाद करता हूँ |  लेकिन अपने वादे के अनुसार  मेरा काम करना और मेरे बारे में दमयंती को बताना |

ठीक है राजा साहब , मैं अभी जाती हूँ उसके पास |

और वो हंस उड़ते हुए दमयंती के वाटिका में पहुँच गई | उस समय दमयंती उस वाटिका में  विचरण कर रही थी |

वह  इस सुन्दर हंस को देख कर मंत्रमुग्ध हो गई और दौड़ कर उसे पकड़ लिया |

हंस प्यार  से और धीरे से उससे कहा …मुझे छोड़  दोगी … तो एक खुश खबरी तुम्हारे लिए लाई हूँ ,  उसे तुम्हे सुनाउंगी |

ऐसा  सुन कर दमयंती ने हंस को आजाद कर दिया और उसके उस खबर को जानने को उत्सुक हो गई |

तब हंस ने कहा.. निषाद  देश का राजा  नल बहुत ही सुन्दर, गुणवान  और साहसी राजा है | उसके जैसा सुन्दर नौजवान इस पृथ्वी पर कोई नहीं है |  ऐसा लगता है वो कोई देवता है जो पृथ्वी पर अवतार ले लिया हो | सचमुच वो तो आपके लिए बने है |

दमयंती ने जब नल के बारे में इतना गुणगान सुना तो उसका ह्रदय भी राजा नल पर आ गया |

वो  मन ही मन उसे  दिल दे बैठी और प्रण कर लिया कि अब वही मेरा जीवन साथी होगा |

अब  दमयंती  उसकी यादों में खोई – खोई सी और  उदास रहने लगी |

उसकी ऐसा स्थिति उसके पिता ने देखा तो सोचा कि पुत्री मन ही मन किसी को दिल दे बैठी है |

इसलिए उन्होंने उसका स्वयंवर  की  योजना बना डाली ताकि दमयंती अपने मन मर्ज़ी का वर चुन सके |

स्वयंबर  का आयोजन किया गया और सभी राजाओं को खबर भिजवाई गयी |  दमयंती के स्वयंवर की खबर सुनकर सभी राजा उससे शादी करने को बेचैन हो उठे |

इस बीच  नल को भी इस स्वयंवर  की खबर मिली तो वो भी वहाँ जाने को उत्सुक हो गया |

फिर क्या था,  राजा नल भी पूरी तैयारी  के साथ  स्वयंवर में भाग लेने हेतु चल दिए | वे  मन ही  मन सोच रहे थे कि मैंने दमयंती की  प्रशंसा हंस से सुनी थी , लेकिन अब उसे अपनी आँखों से भी देख पाउंगा |

 इधर दमयंती का भी यही हाल था  | वो मन ही मन सोच रही थी कि मेरे स्वयंवर की खबर राजा नल तक ज़रूर पहुँचा होगा और वे ज़रूर आयेगें  | उसके दीदार को दाम्यति व्याकुल हो उठी |

 मैं तो उसके अलावा किसी को देखूँगी भी नहीं, बस सीधे उसी के गले में वर माला डाल दूंगी .. वह मन ही मन सोच रही थी |

तभी एक और घटना घटी | स्वर्ग में भगवान् इन्द्र ने एक सभा का आयोजन किया था |  लेकिन उनकी सभा में कोई भी  देवता नहीं पहुंचे | वे सिर्फ चार देवता  पवन, यम  ,अग्नि और इन्द्र ही उस सभा  में थे |

यह देख कर  भगवान् इन्द्र को घोर आश्चर्य हुआ | तभी उन्हें पता चला कि सभी देवता गण  पृथ्वी लोक में दमयंती के स्वयंवर  में गए हुए है |

भगवान् इन्द्र ने अपनी शक्ति से  तुरंत ही  दंयंती के रूप और गुण के बारे पता लगा लिया | भगवान् इन्द्र ने सोचा, इतनी सुन्दर दमयंती को तो स्वर्ग लोक में होना चाहिए | ऐसा सोच कर वे चारो – अग्नि, वरुण , यम और स्वम इन्द्र भी स्वयंवर सभा में चल दिए |

तभी रास्ते में नल भी अपने घोड़े पर आता हुआ दिखाई दिया |  राजा नल सुन्दर और काफी आकर्षक लग रहे थे |  भगवान् इन्द्र ने सोचा अगर दमयंती  ने नल को देख लिया तो शायद  वो इसे ही अपना वर चुन लेगी |

वे नहीं चाहते थे कि नल उस स्वयंवर में  भाग ले | इसलिए वे चारो अचानक उसके  रास्ते के सामने प्रकट हो गए |

नल प्रभु को देख कर अपने घोड़े को रोका और सिर झुका कर प्रणाम किया |

इस पर इन्द्रे ने कहा …  तुम मेरा एक काम करोगे ?

अवश्य करूँगा प्रभु ..नल हाथ जोड़ कर कहा |

तुम दमयंती से जाकर कहो कि ..कल होने वाले स्वयंवर में मैं इन्द्र, वरुण, अग्नि, और यम  भी पधार रहे है | और  वो हम चारो में से किसी एक को  अपना वर चुन ले |

ऐसा आदेश सुन कर नल  को  ऐसा महसूस हुआ, मानो  उसके  शरीर पर किसी ने  घडा भर पानी डाल दिया हो |  वे दुःख और असमंजस में पड़ गए |

 वो तो स्वम उस स्वयंवर के लिए ही जा रहे थे |

लेकिन अब देवता के आदेश को तो टाला भी नहीं जा सकता था |

वे दुखी मन से कहा.. ठीक है प्रभु, लेकिन  मैं उसके घर में कैसे घुस पाउंगा ? वहाँ तो बहुत पहरा होगा |

वरुण देवता  ने कहा … उसकी तुम चिंता मत करो | तुम आराम से उनके  महल में घुसना, तुम्हे दमयंती के अलावा और कोई नहीं देख पायेगा |  

ठीक है प्रभु | ऐसा बोल कर नल उसके महल की ओर चल पड़े |

नल जैसे ही महल में घुस रहे थे तो  बहुत सारे सैनिक सामने मिल गए लेकिन किसी ने उन्हें टोका ही नहीं | शायद वरुण देव की कृपा से कोई भी नल को देख नहीं पा रहा था |  

इस तरह नल आराम से दमयंती के कमरे तक चले गए |  वे अपने सामने पहली बार दमयंती को देखा तो बस देखते ही रह गए |

उन्होंने जैसा सुना था , वैसा ही पाया | वे  उसकी  सुन्दरता को देख कर  मंत्र मुग्ध  हो गए | वे उसे एकटक देखते हुए उसके पास जा ही रहे थे कि वे टेबल पर रखे गुलदस्ता से टकरा गए | वह गुलदस्ता ज़मीन  पर गिर कर टूट गया |

गिरने की आवाज़ सुन कर वहाँ उपस्थित दास दासियाँ उधर देखने लगे लेकिन नल किसी को भी दिखाई नहीं दे रहा था |

तभी दमयंती की नज़र पड़ी और उसने नल को देख कर अनुमान लगा लिया कि यह तो नल है | क्योकि हंस ने जैसा कहा था वह वैसा ही दिख रहे थे |

दमयंती भाव विभोर हो  दौड़ कर नल के सामने आ गई और उनसे पूछा…आप नल है ?

हाँ , मैं नल हूँ और आप दमयंती हो ना ?

हाँ, मैं दमयंती हूँ | दोनों पहली बार एक दुसरे को देख रहे थे और वे एक दुसरे को बस निहारते रहे |

तभी  भावावेश में आकर नल ने  उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया और अपने प्यार का इज़हार करने ही वाला था कि उसे इन्द्र का दिया हुआ आदेश याद आ गया और फिर अचानक उसने दमयंती का हाथ तुरंत झटक दिया |

नल के हाथ छुड़ाने से आश्चर्य प्रकट करते हुई दमयंती  बोली .. क्या हुआ ? आपने मेरा हाथ पकड़ कर क्यों छोड़ दिया | मैं तो आप से प्रेम करती हूँ  और आप से विवाह करना चाहती हूँ |

नल ने हडबडा का कहा .. नहीं  नहीं, ऐसा नहीं हो सकता  | मैं तो सिर्फ एक सन्देश वाहक हूँ |

कैसा संदेशवाहक ? .. दमयंती ने आश्चर्य से पूछा|

इस पर नल ने रास्ते की पूरी घटना बताई और कहा .. प्रभु  इन्द्र ने मुझे आप तक सन्देश पहुँचाने को कहा है |

आप को कल होने वाले स्वम्वर में  उन चारो  में से किसी एक को चुनना है |

फिर भी आप को जो पसंद हो उसी को चुनियेगा, मेरी ऐसी इच्छा है |

इतना कह कर नल वहाँ से विदा ले लिया |

वो वापस इन्द्र  देवता के पास आये और कहा… प्रभु, मैंने आपका संदेश दमयंती तक पहुँचा दिया है |

ठीक है,  लेकिन तुम उदास क्यों दिख रहे हो ?  ऐसे शुभ घड़ी में ख़ुशी मनाने का समय है |

दुसरे दिन स्वयंवर के समय दमयंती माला लेकर वर चुनने को तैयार हुई | सभी उपस्थित राजा  लोग उत्सुकता से इंतज़ार कर रहे थे कि शायद वो उसे ही अपना वर चुन ले |

लेकिन दमयंती  सभी राजाओ को  पार करती हुई आगे बढ़ रही थी, उसकी तो आँखे सिर्फ नल को ढूंढ रही थी |

वे जब सबसे अंत छोर पर पहुँची,  तो ऐसा दृश्य देखा कि उसके हाथ से वरमाला गिरते गिरते बची |

दमयंती ने  अपने आप को संभाला और  उनलोगों को ध्यान से देखने लगी | उसके सामने पांच नल खड़े हुए थे |  लेकिन सवाल था कि असली नल कौन है |

सभी  बिलकुल एक जैसे दिख रहे थे |

वह असमंजस में कुछ देर खड़ी रही लेकिन  असली नल को नहीं पहचान सही |

 तो  फिर दमयंती ने देवतागण की अस्तुति कर बोली .. हे इन्द्र देव, हे वरुण देव, हे यम देव मैं तो सिर्फ नल से प्रेम करती हूँ और उसी से विवाह करना चाहती हूँ |

कृपया कर मेरी समस्या का समाधान करें | मुझे आशीर्वाद दें | मुझे पता है आप मेरी सभा में सुशोभित है | आप मेरी मनोकामना पूरी करें |

इतना कह कर अपनी आँखे खोली और फिर उन पाँचों  को गौर से देखने लगी |

उसे पता था कि देवता जब खड़े रहते है तो उनके पावं ज़मीन को नहीं छूते है,| देवता को पसीना नहीं आता है और  उनकी आँखों की पलकें नहीं झपकते है |  

यह सब लक्षण एक को छोड़ कर चारो खड़े नल में थे और उसे पहचानते देर न लगी कि वो पाचवां ही नल है , क्योंकि उसकी आँखे उदास थी और उसके पसीने आ रहे थे |

दमयंती बस ख़ुशी ख़ुशी नल के गले में वरमाला डाल दी | (क्रमशः )

इसके आगे की घटना (भाग-2 ) हेतु नीचे link पर click करे..

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4 replies

  1. Bahut sundar Kahani. Nicely written and described .

    Liked by 1 person

  2. वाह ! कहानी अच्छी लगी। नल और दमयन्ती की कोई कथा है ।बस इतना ही याद था मुझे।कथा पढ़ कर सुखद अनुभूति हुई। काश! स्वयंवर जैसे स्वयं कन्या का भी आयोजन हमारे जमाने में हुआ….. होता! हा ! हा! हा!🤣🤣

    Liked by 1 person

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