# नल और दमयंती की प्रेम कहानी # -2

एक जैसे दिख रहे उन पाँचो राजा नल में से दमयंती ने असली राजा नल को पहचान लिया और  बस ख़ुशी ख़ुशी  नल के गले में वरमाला डाल दी |

यह देख कर चारो देवता अपने असली रूप में आ गए और खुश होकर उन दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहा .. सचमुच तुम दोनों का प्यार सच्चा है |

अग्नि देवता ने नल को आशीर्वाद देते हुए कहा … तुम कभी अग्नि में जलोगे नहीं | अग्नि का तुम पर कोई असर नहीं होगा |

वरुण देवता ने कहा … तुम कभी जल में डूबोगे नहीं | तुन्हें जल कोई हानि नहीं पहुँचा सकता है |

यम  ने आशीर्वाद देते हुए कहा .. तुम भोजन बनाने के मामले में सबसे अव्वल होगे | जो भी तुम्हारे हाथ का खाना खायेगा,  बस तुम्हारा हो जायेगा |

इस तरह वे देवता लोग आशीर्वाद देकर जा रहे थे कि रास्ते में शनि देव  मिल गए |

इन्द्र देव ने पूछा …आप कहाँ जा रहे है ?

तो शनि देव ने  कहा …  दमयंती का आज स्वयंवर है, मैं  उसी में जा रहा हूँ |

लेकिन उसने तो नल को अपना वर चुन लिया है | आप को आने में देरी हो गई |

शनि देव  खुद ही दमयंती से विवाह करना चाहते थे । अपने आगमन पर,  वह इस बात से अनजान थे  कि उन्हें  स्वयंवर के लिए बहुत देर हो चुकी है।

नल के वर चुने जाने से क्रोधित हो कर शनि देव ने उन्होंने कहा … नल के राज्य के पतन का कारण बनने की कसम खाता हूँ । मैं उसे दर दर की ठोकरे खाने पर मजबूर कर दूंगा | 

लेकिन इसके लिए शनि देव को 12 वर्षों तक इंतज़ार करना पड़ा उनको अपने प्रभाव में लेने के लिए |

इधर विवाह के बाद, दमयंती और नल, दोनों ख़ुशी – ख़ुशी जीवन बिताने लगे | दमयन्ती पतिव्रताओं में शिरोमणि थी। अभिमान तो उसे कभी छू भी न सकता था।

समयानुसार दमयन्ती के गर्भ से एक पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ। दोनों बच्चे माता-पिता के अनुरूप ही सुन्दर रूप और गुण से सम्पन्न थे ।  इस तरह 12 वर्ष बीत गए |

लेकिन समय सदा एक-सा नहीं रहता, दुःख-सुख का चक्र निरन्तर चलता ही रहता है। वैसे ही एक दिन नल ने पूजा के लिए जाते हुए अशुद्ध पैर से मंदिर में प्रवेश कर गए और उस दिन शनि देव को उन्हें अपने चंगुल में लेने का मौका मिल गया | नल शनिचरा ग्रह से ग्रसित हो गए |

 वैसे तो महाराज नल गुणवान् ,  धर्मात्मा तथा पुण्य करने वाले  थे, किन्तु उनमें एक दोष था — जुए का व्यसन। 

नल के एक भाई का नाम पुष्कर था। वह नल से अलग रहता था।

शनि के प्रभाव में आकर नल एक दिन अपने भाई पुष्कर को  जुए के लिए आमन्त्रित किया।  खेल आरम्भ हुआ ।  शनि के प्रभाव में नल का भाग्य प्रतिकूल हो गया ।

उस जुए में नल हारने लगे, सोना, चाँदी, रथ, राजपाट सब हाथ से निकल गया। नतीजा यह हुआ कि उन्हें अपने राज्य से बाहर जाना पड़ा |

वे एक राजा से अब  भिक्षुक बन कर दर – दर की ठोकरे खाने लगे |

उन्होंने अपने शरीर के सारे वस्त्राभूषण उतार दिये थे । केवल एक वस्त्र पहनकर नगर से बाहर निकले । दमयन्ती ने भी मात्र एक साड़ी में पति का अनुसरण किया ।

ऐसे समय में दमयंती उनकी हमराही बनीं |  

लेकिन उन दोनों की स्थिति दयनीय थी |  वह यहां – वहां  रह कर अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे |

महारानी दमयन्ती ने प्रतिकूल समय जानकर अपने दोनों बच्चों को अपने पिता के पास विदर्भ देश की राजधानी कुण्डिनपुर भेज दिया था |

एक दिन राजा नल ने  जंगल में विचरते समय सोने के पंख वाले एक पक्षी को देखा । राजा नल ने सोचा, यदि इन्हें पकड़ लिया जाय तो इनको बेचकर निर्वाह करने के लिए कुछ धन कमाया जा सकता है।

ऐसा विचारकर उन्होंने अपने पहने  हुए वस्त्र को खोलकर उस पक्षी पर फेंका । लेकिन  पक्षी उनका वह वस्त्र लेकर उड़ गया ।

और उस पक्षी के जाते हुए कहा… अरे नल, पता है मैं  कौन हूँ ?

हम तो तेरे जुए में चलने वाले पासे है, जिसके कारण, बस तेरे शरीर  पर यही एक वस्त्र बचा था |  अब तेरा वह वस्त्र भी  मैं ले कर जा रहा हूँ |

राजा नल के पास तन ढकने के लिए भी कोई वस्त्र न रह गया। नल अपनी अपेक्षा दमयन्ती के दुःख से अधिक व्याकुल रहते थे, क्योंकि उसके दुःख का कारण स्वयं को ही  मानते थे ।

एक दिन दोनों जंगल में एक वृक्ष के नीचे एक ही वस्त्र से तन छिपाये पड़े थे। दमयन्ती को थकावट के कारण नींद आ गयी ।

राजा नल ने सोचा, दमयन्ती को मेरे कारण बड़ा दुःख सहन करना पड़ रहा है। यदि मैं इसे इसी अवस्था में यहीं छोड़कर चल दूँ तो यह किसी तरह अपने पिता के पास पहुँच जायगी।

यह विचार कर उन्होंने उसकी आधी साड़ी को काट लिया और उसी से अपना तन ढककर तथा दमयन्ती को उसी अवस्था में छोड़ कर वे चल दिये ।

जब दमयन्ती की नींद टूटी तो बेचारी अपने को अकेला पाकर करुण – विलाप करने लगी।

भूख और प्यास से  वह व्याकुल थी तभी वहाँ एक बड़ा सा अजगर  को अपने सामने पाया |

अजगर अपनी भूख मिटाने  के लिए दमयंती को  निगलने लगा।

दमयन्ती की चीख पुकार  सुनकर उधर से गुज़र रहे एक व्याध ने देखा और उसने अजगर को मार दिया |

और  दमयंती को  अजगर का ग्रास होने से बचाया।  किंतु व्याध स्वभाव से दुष्ट था। वह दमयन्ती के सौन्दर्य पर मुग्ध हो गया और उसे अर्धनग्न अवस्था में देख कर उसकी काम वासना जाग उठी |

 वह दमयंती  को  अपनी काम-पिपासा का शिकार बनाना चाहा।

दमयन्ती अकेला असहाय इस जंगल में उस व्याध के सामने थी | उसका कमजोर शरीर व्याध से बचने में असमर्थ पा रही थी | 

तभी दुखी होकर वह व्याध को  श्राप देते हुए बोली —‘यदि मैंने अपने पति राजा नल को छोड़कर किसी अन्य पुरुष का कभी चिन्तन न किया हो तो इस पापी व्याध के जीवन का अभी अन्त हो जाय।

दमयन्ती की बात पूरी होते ही व्याध के ऊपर एक बिजली गिरी और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।

परेशान दमयंती उस दुष्ट से बचकर नल को ढूँढने चल दी | तभी कुछ दूर चलने के बाद उसे कुछ लोगों का कारवां दिखा | वो उन्ही लोगों के साथ चलने लगी  |

वो सुन्दर दमयंती भूख और परेशानी  के कारण भिखारिन लग रही थी | उनलोगों ने उसे भिखारिन समझ कर खाना खिलाया और  फिर दमयंती भी उन लोगों के साथ चलते हुए छेदी नगर पहुँच गयी |

वहाँ की रानी की  नज़र दमयंती पर  पड़ी तो उसे लगा कि यह कोई राजसी परिवार की लगती है हालाँकि उसकी वेश भूषा भिखारिन जैसी थी |

रानी को उस पर दया आ गयी और उसे  अपने महल में रख लिया |

दूसरी तरफ , नल आधी साड़ी से अपने बदन को ढके जंगल में चलते जा रहे थे तभी उन्होंने देखा कि एक तरफ जंगल में आग लगा हुआ है और उसमे एक सांप जल रहा है |

नल को आग से न जलने का वरदान प्राप्त था इसलिए वे आग के अन्दर चले गए | उन्होंने वहाँ एक अजीब स्थिति देखा ..वो सांप का आधा  शरीर पुरुष का था | उन्होंने  उस सांप को आग से बचा लिया |

सांप ने कहा .. मैं  करकोटा  हूँ |  तुमने मुझे बचा लिया,  इसलिए मैं भी तुम्हारी   मदद करना चाहता हूँ | तुम मुझे गोद में उठा कर दस कदम चलो फिर मैं तुम्हे एक उपहार दूंगा |

नल ने ऐसा ही किया | लेकिन दस कदम पार करते ही उस सांप ने नल को डंस लिया |

उसके डसते ही नल का शरीर नीला पड़  गया और वे एक कुरूप बौना बन गए |

नल ने अपनी ऐसी हालत देख कर करकोटा  से कहा… मैंने तो आपकी मदद की थी लेकिन बदले में आप ने यह क्या कर दिया | .. मुझे बदसूरत बौना बना दिया |

मैं तो पहले से बहुत परेशान हूँ और ऐसे में तो मेरी दमयंती मिल भी गयी तो  मुझे पहचानने से इनकार कर देगी | नल  दुखी होकर वही बैठ कर विलाप करने लगा |

इस पर कारकोटा ने कहा …तुम दुखी मत हो | मैंने तुम्हारी  भलाई के लिए  ऐसा किया है | तुम्हारे अन्दर शनि का वास है इसलिए तुम्हारी यह दशा हो रही है | हमारे डसने से वह शनि  का प्रभाव समाप्त हो गया है |

अब  तुम्हारे  पुराने सभी गुण  सब वापस तुम्हारे पास आ जायेंगे |

तुम भोजन बनाने में माहिर हो जाओगे, तुम फिर से अच्छे घुड़सवार बन जाओगे और जिस जुआ के कारण  तुम्हारा यह हाल हुआ  है, अब उस जुआ में तुम्हे कोई भी नहीं हरा सकता है |

 वैसा तुम्हे आशीर्वाद देता हूँ  |  तुम यहाँ से सीधे अयोध्या के राजा के पास जाओ और उनका सेवा में लग जाओ |

आगे की घटना (भाग-3) हेतु नीचे link पर click करे..

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4 replies

  1. कहानी की प्रस्तुति रोचक एवं कौतुहल से भरा है। प्रयास जारी रखने की कोशिश करें।
    :-मोहन “मधुर “

    Liked by 1 person

    • हां डिअर , मैं प्रयास करता हूँ कि मनोरंजन के साथ साथ
      कुछ ज्ञानवर्धक बातें भी हो जाये | तुम्हारे साथ के लिए हम आभारी है |

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  2. Romantic story with beautiful pictures.

    Liked by 1 person

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