# मौन की ताकत #

लोग कहते है कि मौन में बहुत शक्ति  होती है | जब हम किसी परेशानी में होते है तो मौन धारण कर लेते है | या कभी – कभी लड़ाई झगडे से बचने  के लिए भी  मौन धारण कर लेते है |

हमने कहीं पढ़ा है कि मौन में बहुत शक्ति निहित होती है | लेकिन मौन का असली मतलब सिर्फ चुप रहना या अपने  कान बंद कर लेना नहीं है और ना ही बिलकुल शांत रहना है | 

ऐसा भी होता है  कि बाहर के शांत वातावरण में रहने के बाबजूद हमारे भीतर बहुत शोर होता रहता है | मन में उथल पुथल मची रहती है |

मैं अपने कॉलेज के दिनों में बहुत ज्यादा बोलता था और ऐसे में कभी कभी ज़ल्दबाजी  में कुछ ऐसी बातें बोल जाता था जिसके कारण मुझे   मुसीबत का सामना करना पड़ता था | मुझे अक्सर लोग समझाते थे कि कम बोलो | शांत रहना सीखो |

हमने महसूस किया है कि  हम जितने भी शब्द बोल रहे है, वही बातें हम  50 % कम शब्दों में कहने की कोशिश करें..तो अचानक हर चीज़ के प्रति हम  सचेत हो जाते है , और गलती करने की सम्भावना कम हो जाती है |

यह सच है कि वाणी की शक्ति मनुष्य को प्रभु का दिया हुआ सुंदर उपहार है | हमारी वाणी से अभिव्यक्त एक-एक शब्द को मोती की संज्ञा दी जा सकती है।

हमें उसी रूप में इसे खर्च करना चाहिए। हमारी वाणी मौन के अभ्यास से ही प्रखर तथा प्रभावोत्पादक बनती है। अन्य क्षमताओं की भांति हमें इस पर भी संयम का बांध लगाया चाहिए ।

Wise men speak when they have something to say. Fools speak because they have to say something — Plato.

संयम के अभाव में वाणी का उपयोग असंतुलित हो जाता है और भयंकरतम दुर्घटनाएं घटित होने की संभावनाए रहती हैं। हमारे शरीर के  पांच ज्ञानेन्द्रियों में जिह्वा ही एकल रूप में है जबकि बाकि सभी इंद्रियां दो की मात्रा में हैं।  

इससे भी यह मतलब निकलता है कि हमें अपनी वाणी का उपयोग कम से कम और संभलकर करना चाहिए ।

हमने देखा है कि वाणी के संयम के अभाव में इतिहास बदल गए। महारानी द्रौपदी के एक वाक्य “अंधे की औलाद अँधा ” ने इतना बड़ा महाभारत करवा डाला कि विनाश ही हो गया।

बड़े-बड़े महारथी धराशायी हो गए | प्रतिभा का इतना बड़ा नुकसान शायद ही पहले कभी हुआ हो ।

हम अपने दैनिक जीवन में भी महसूस करते  हैं कि वाणी के असंयमित उपयोग के कारण घर का वातावरण बिगड़ जाता है। परिवार के किसी अन्य सदस्य द्वारा क्रोध करते समय यदि हम मौन हो जाएं तो वातावरण असहनीय होने से बच जाता है और अनावश्यक तनाव की स्थिति से हम बच जाते हैं।

बेहतर यही रहता है कि यदि दस शब्द बोलकर काम चल सकता हो तो उसे सौ तक क्यों पहुंचाएं ?

यह अनुभव की बात है कि जब हम मौन की गहराई में उतरते हैं तो हमारी शेष इंद्रियां अधिक प्रभावी हो उठती हैं। हमारे आसपास का वातावरण अधिक जीवंत हो उठता है। पुष्प मुस्कराते दिखने लगते हैं और अपने आस पास की  प्रकृति की सुन्दरता हमें आनंदित करती है |

हम कोई भी काम करते है तो पुरे ध्यान से करते है और अच्छे परिणाम भी प्राप्त होते है |

मौन की यह अवस्था जब गहरी हो जाती है तो हम ईश्वर की रचना के अभूतपूर्व आनंद से भर जाते हैं। कविता का कोई शब्द, गीत का कोई स्वर और संगीत का कोई राग मौन से ही फूटता है।

मौन के उस क्षण में मानव जीवन अधिक अर्थपूर्ण लगने लगते हैं।  लिखे हुए शब्द भी जैसे जीवित हो जाते हैं।

इसके विपरीत जब हम बोल रहे होते हैं तो उस समय चिंतन की प्रक्रिया उस गति से गतिमान नहीं रहती , जिस गति से बोलने से पहले रहती है।

उस समय शेष इंद्रियों की गति वैसी नहीं रहती , जैसी पहले थी। इस कारण तू-तू , मैं-मैं हो जाती है और परिणाम होता है – तनाव।

जब हम मौन में उतरते हैं , तो ऐसा अनुभव होता है जैसे प्रभु हमसे  कुछ कहने लगते हैं । हमारा विवेक परामर्श देने लगता है कि यह करो …यह मत करो।

इसके विपरीत जब हम ज्यादा बोल रहे होते हैं तो हमारी सुनने की क्षमता कार्य करना बंद कर देती है। कान अगर सुन भी रहे हों, इसके बावजूद बुद्धि उसे समझने से इनकार कर देती है।

इसीलिए हमें कभी-कभी मौन का अभ्यास करते रहना चाहिए ।

हमें यह अहसास होना चाहिए कि हमारी वाणी की महत्ता बहुत अधिक है। जरा उन व्यक्तियों की कल्पना करें जो जन्म से ही मूक हैं।

वे सोचते भी हैं , देखते भी हैं , मगर अपने भावों को अभिव्यक्त नहीं कर पाते। अनेकों संकेतों द्वारा वे अपने भाव प्रकट करने के प्रयास करते हैं |,

परन्तु अत्यधिक प्रयास करने के बावजूद वे अपने भावों को पूरी तरह प्रकट नहीं कर पाते और मन ही मन छटपटाते रहते हैं।

प्रभु ने हमें यदि वाणी की पूर्ण क्षमता प्रदान की है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि क्षमता भर बोलते ही रहें , बल्कि आवश्यक है कि उस समय जितना बोलना जरूरी हो उतना ही बोलें ।

यदि ऐसा हो सके तो हमारी प्रतिभा अधिक जीवंत हो उठेगी। हमारी अनुभूति के लिए अधिक सार्थक शब्द मिलेंगे और हम अपने भीतर छिपी कलाओं से रूबरू हो सकते है |

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Categories: motivational

11 replies

  1. Sahi baat kahi Verma Ji😊👍

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  2. Silence and control on mouth are necessary for leading a peaceful life.Lot of tips are in your writing which inspire us.

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  3. शब्दो का चयन सही होना चाहिए, वरना बात का बतंगड़ होता है। आपने सही कहा जीभ एक है, किंतु कान दो। मतलब कम बोलो, सुनो ज्यादा।

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    • आज कल बात का बतंगड़ होना आम बात है | मधुर संबध के लिए शब्दों का सही चयन ज़रूरी है |
      आपके विचार साझा करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद |

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