# छठे दरवाजे का रहस्य #..1

भगवान विष्णु के दर्शन

कोई भी रहस्मय कहानी या हकीकत पढने और सुनने में बहुत मज़ा आता है | क्योंकि उसमे रहस्य और रोमांच होता है जो हमारे अन्दर न सिर्फ जिज्ञासा पैदा करता है बल्कि एक डर भी पैदा करता है |

और अगर मामला आस्था से जुड़ा  हो बात ही अलग है |

जी हाँ दोस्तों, आज मैं एक ऐसी  विषय  पर चर्चा करना चाहता हूँ जो मेरे जीवन में घटित हुआ है और उससे मेरी  भगवान् में आस्था और भी बढ़ गयी है |

मैं कल ही एक विडियो देख रहा था जिसमे एक मंदिर का ज़िक्र था और वो मंदिर है ..त्रिवेंद्रम  में स्थित पद्मनाभ मंदिर…, उसे देखते ही बरबस ही मेरी पुरानी  यादें  ताज़ा हो गयी |

यह आज से करीब 7- 8 साल पहले की बात है | मैं बैंक के तरफ से प्राप्त LFC के तहत केरल का टूर कर रहा था | यह टूर 15 दिनों का था |

मैं  मेरी पत्नी और मेरा एक बेटा साथ में था | मैं पटना से फ्लाइट के द्वारा केरल के कोच्चि एअरपोर्ट पर उतरा था और वहाँ से हमारी कार बुक थी | उसी से केरल राज्य के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करना था |

सचमुच केरल बहुत ही रमणीय जगह है |  कोची से मुन्नार , टेकडी ( tekkedy ) , कोवलम के विभिन्न जगहों को देखते हुए सातवें. दिन हमलोग. त्रिवेंद्रम (Trivandrum) पहुँचे |

रात्री विश्राम करने के पश्चात् सुबह में श्री पद्मनाभम स्वामी मंदिर (Shree Padmanabham swamy temple) के दर्शन का कार्यक्रम था |

आज हमारी यात्रा का आठवां दिन था और पहले की बनी योजना के अनुसार आज सबसे पहले पद्मनाभ स्वामी मंदिर में भगवान विष्णु के दर्शन करना और उसके बाद कोवलम बीच का मज़ा लेना था।

उसके बाद वापसी में समय बचने पर गणपति मंदिर में गणपति जी के दर्शन करना था।

हमलोग को सुबह तड़के उठाना पड़ा क्योंकि मंदिर के नियम के अनुसार ही  वहाँ समय पर पहुँचना था |

हालाँकि सात दिन से लगातार घुमने के कारण  थकान महसूस हो रही थी | वैसे भी इस टूर में रात को देर से सोना और सुबह ज़ल्दी उठा कर तैयार होकर फिर घुमने निकल जाना, थकान तो होनी ही थी |

यह सही है कि  घुम्मकड़ी में नींद और भूख दोनों को त्यागना पड़ता है तभी घुमक्कड़ी का मज़ा ले सकते है |  

हमारी योजना मंदिर परिसर में 9.00  बजे से पहले पहुंचने की थी , इसलिए हम सब जल्दी – जल्दी नहा धो कर निकलने की तैयारी करने लगे ।  

नहाने के बाद सारा सामान पैक कर लिया गया ताकि  वापस आने के बाद होटल छोड़ने में ज्यादा समय न लगे और गीले कपड़े सूखने के लिए कमरे में ही डाल दिया गया।

 नास्ता समाप्त कर हमलोग अपनी गाड़ी से मंदिर जाने के लिए निकल गए  | करीब आधे घंटे के सफ़र के बाद हमलोग मंदिर के पास पहुंच गए और अपने गाड़ी को पार्क करवा कर मंदिर की तरफ बढ़ गए।

Shree Padmanabham swamy temple

हमलोग समय से मंदिर तो पहुँच  चुके थे ।  मंदिर में पहुंचे तो पता चला कि यहां पुरुष केवल धोती पहन कर ही अन्दर जा सकते हैं। लेकिन मेरे पास तो धोती थी नहीं | ,

तभी मुझे पता चला कि पहनने के लिए धोती यहाँ खरीद सकते है या भाड़े पर ले सकते है | हमने तुरंत दो धोती खरीदी ….एक अपने लिए और एक मेरे बेटे के लिए |

हालाँकि धोती की कीमत थोड़ी ज्यादा थी  , लेकिन ऐसे मौकों पर पैसों की ज्यादा अहमियत नहीं रहती है |

वहीं पास  ही एक दुकान में  पुराने वस्त्र और सामान रखने की व्यवस्था थी |  सामान रखने की कीमत सामान की गिनती के हिसाब से तय था। जैसे पैंट के 3 रुपए, शर्ट के 2 रुपए, कैमरे और मोबाइल के 5 रुपए प्रति नग (वस्तु) के हिसाब आदि आदि।

मैं अपने और परिवार के वस्त्र और सामान जमा करने के लिए लाइन में खड़ा था, तभी मेरे मोबाइल की घंटी बज उठी | …

मैं लाइन में खड़ा ही खड़ा अपने मोबाइल  में देखा तो कॉल  मेरे बड़े बेटे ने किया था | मैं कॉल रिसीव किया और चौक उठा ?

उधर से मेरे बेटे की आवाज़ आ रही थी …पापा, रात में हमारे घर में डकैती हो गयी | दरअसल घर में मेरा भांजा सपरिवार रहता है और  बेटे की पोस्टिंग घर से दूर थी |

संयोग से मेरा भांजा दिन में गाँव गया था यह सोच कर कि शाम  तक वापस आ जाऊंगा , लेकिन कुछ विशेष कारण से रात में वापस नहीं आ सका और सुबह जब आया तो घर के सारे दरवाज़े को खुला पाया | सिर्फ  उस रात को घर अकेला छोड़ा और यह घटना घट  गई |

मैं फ़ोन पर सारी  बातें सुन रहा था ..सभी लोग फ़ोन पर बताते हुए काफी घबराए हुए थे , लेकिन मेरे मन में किसी तरह की बेचैनी नहीं थी | इतना कुछ सुनने के बाद भी  मेरा मन बिलकुल शांत था |

मैं फ़ोन पर बस इतना कहा कि कोई चिंता करने की ज़रुरत नहीं है , बस पुलिस रिपोर्ट कर formality पूरी करो  | मैं वापस आऊंगा तो फिर बात होगी |

मैं  खुद ही आश्चर्यचकित था कि  इतनी बुरी  खबर सुन कर भी हमारा मन बिलकुल शांत था जैसे कुछ हुआ ही न हो |

मैं अपने मोबाइल और हाथ के अन्य सामन को  जमा करवा दिए |

हमलोग दर्शन हेतु लाइन में लगे तो प्रवेश द्वार पर तैनात महिला सुरक्षा गार्ड ने बताया कि महिलाओं को मंदिर प्रवेश के लिए भी साड़ी अनिवार्य है। संयोग से मेरी पत्नी साड़ी में ही थी |

 सुरक्षा जांच के बाद मंदिर में प्रवेश किया।  इन्तजार के इस पल में जो हमने देखा वो भी एक अद्भुत दृश्य था। कुछ स्थानीय लोग भी मंदिर में आए हुए थे और उनके अनुसार इस दृश्य को देखने का सौभाग्य हर किसी को नहीं मिलता।

अगर कुछ बुरा होता है तो समझिए कुछ अच्छा भी होने वाला है और यही हमारे साथ भी हुआ।

इतनी बुरी खबर सुनने के बाद आगे जो अच्छा हुआ वो एक सुनहरे सपने जैसा था। मंदिर के पुजारी लोग ढोल-नगाड़ों के साथ गोविंदा (भगवान विष्णु) की प्रतिमा को सिर पर उठाकर परिक्रमा कर रहे थे और ऐसा ही तीन बार हुआ और हम उसके साक्षी बने।

दर्शनों के लिए लाइन में लगे लोगों को धीरे आगे भेजा जाने लगा और हम भी लाइन के साथ बढ़ने लगे । धीरे धीरे हम गर्भ गृह में पहुंच गए जहां हमने गोविंदा (भगवान विष्णु) के दर्शन किये ।

यहां  पहुँच कर मुझे बहुत शांति की अनुभूति हुई जिसके कारण मैं कुछ देर के लिए सारी  चिंताओं से मुक्त हो गया  | मैं कुछ पल के लिए अपने जीवन की सारी कष्टों को भूल चूका था |

सचमुच मुझे किसी चमत्कारिक शक्ति का अनुभव  हुआ  था |

यहां से दर्शन करके निकलने के बाद हम आगे बढ़े और आगे भी कुछ देवी देवताओं की प्रतिमाओं के  भी दर्शन किये ।  उसके बाद हम बाहर निकले तो मंदिर के प्रांगन में ही एक जगह खीर का प्रसाद बांटा जा रहा था। हमने भी उस  खीर प्रसाद  को खाया |

 उसके बाद कुछ और चीजें प्रसाद के रूप में खाने के लिए मिला जिसका नाम मुझे याद नहीं है, लेकिन वो भी बहुत ही स्वादिष्ट था।

एक बात और, जो मैंने मंदिर में देखा कि केवल वहां दर्शन के लिए आने वाले लोग ही नहीं  बल्कि मंदिर की सुरक्षा में लगे गार्ड भी केवल और केवल धोती में ही थे।

यहां तक कि वहां पुलिस के भी जो जवान थे उन सबका लिबास भी यहाँ आने वाले दर्शनार्थी के जैसा ही था।

यहां आकर सबका एक ही रूप था, न तो कोई बड़ा न ही कोई छोटा। प्रसाद ग्रहण करने के बाद हमने फिर एक बार  मंदिर की ओर मुख कर प्रणाम किया और मन में यही कहा……जो होगा , अच्छा ही होगा |

हमलोग  बाहर निकलने के बाद अपने कपड़े, मोबाइल और कैमरा लिए और उसका भुगतान करने के बाद कोवलम बीच जाने के लिए अपने कार में आकर बैठ गए ।

हमारी  कार कुछ दूर ही आगे गई तो देखा शहरी इलाके कम होने लगे और हरियाली ने उसकी जगह ले ली। सड़क के दोनों तरफ हरे हरे केले, नारियल और भी अन्य प्रकार के पेड़ों की भरमार थी।

देखकर ये महसूस नहीं हो रहा था कि हम किसी शहर में हैं।  सचमुच ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम किसी  घने जंगल के बीच बने सड़के से होकर गुजर रहे हैं ।

ऐसी ही मनोहारी दृश्यों के मज़ा लेते हुए करीब 25 मिनट के सफर के बाद हम कोवलम बीच पहुंच गए। शेष अगली कड़ी में… (क्रमशः)

आगे की घटना हेतु नीचे link पर click करे.

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Categories: Tour & Travel

3 replies

  1. Aastha hi Bhagawan hai. Jidhar aastha hai,udhar santi milati hai. Nice feeling.

    Liked by 1 person

  2. Reblogged this on Retiredकलम and commented:

    यादों के पन्नो से भरी है ज़िन्दगी,,
    सुख और दुःख की पहेली है ज़िन्दगी ,
    अकेले में बैठ विचार कर के तो देखो
    दोस्तों के बगैर ,,, अधूरी है ज़िन्दगी ..

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