# बचपन की यादें #

हम सभी को  अपने बचपन के लम्हे याद रहते है | हम सबने अपने बचपन को जीया है। शायद ही कोई होगा, जिसे अपना बचपन याद न आता हो। | आज मुझे भी अपना  बचपन याद आ रहा है जिसे मैं एक कविता के माध्यम से अपने दिल के उद्गारों को प्रकट कर रहा हूँ ..

बचपन

शाम ढले आसमान के तले

मैं आँखे मूंद कर बैठा हूँ

  फुर्सत के इन  लम्हों में

 बचपन को ढूढने बैठा हूँ |

गम भी बहुत, तनहाइयाँ भी है

 वक़्त कि दी हुई. परेशानियाँ भी है

भींगी पलकें, ठहरे आँसू  

सबको  भुलाने बैठा हूँ

फुर्सत के  कुछ लम्हों में

 बचपन को  ढूढने  बैठा  हूँ |

यादें हैं कि रूकती ही नहीं

वादे सब तो धोखा है

चुपके चुपके ख्वाबों में

आने से किसने रोका है | ..

सब कुछ है पर तुम तो नहीं

मैं तुम्हे भुलाने बैठा हूँ ..

फुर्सत के इन लम्हों में

बचपन को ढूँढने बैठा हूँ  ||

          (विजय वर्मा)

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Categories: kavita

10 replies

  1. True portrayal of childhood
    Very nice

    Liked by 2 people

  2. Bahut khoob👌👌

    Liked by 1 person

  3. Childhood is memorable.
    Childhood was fantastic. No tension. Nice.

    Liked by 2 people

  4. Childhood memories very well expressed through this poem

    Liked by 1 person

  5. very good morning..
    How are you ?

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