आज सुबह सवेरे

रोज की तरह  सुबह ठीक पांच बजे मेरी नींद खुल गई  | सबसे पहले थोड़ी देर के लिए silence और  फिर Positive affirmation का अभ्यास किया |

मेरी यह कोशिश रहती है कि  मैं रोज सकारात्मक विचारों से अपने दिन की शुरुआत करूँ |

मोर्निंग – वाक से लौटने के बाद,  मैं अपने  रीडिंग टेबल पर बैठ गया | मेरे एक हाथ में चाय थी और दुसरे  हाथ में कलम था | मैं और दिनों की तरह आज भी कुछ न कुछ लिखने को बेचैन था |

   मैं बस कल्पनाओ की दुनिया में खो जाता हूँ और सोचने लगता हूँ कि मैं क्या लिखूँ ?

एक द्वंद मेरे दिल  और दिमाग के बीच  शुरू हो जाता है |

बहुत जद्दोजहद के बाद किसी विषय या घटना  के बारे में निश्चित कर पाता हूँ. .और फिर उसी के बारे में लिखना शुरू कर देता हूँ |

मेरी कलम खुद ब खुद चलती रहती है और दिमाग कल्पनाओं की दुनिया में विचरण करता रहता है |

टूटे फूटे  शब्द आपस में जुड़ते जाते है और इसी तरह से एक कविता का जन्म होता है | आज मैं  इसी तरह लिखी गई  अपनी एक कविता  प्रस्तुत कर रहा हूँ …|

एक कविता लिख रहा हूँ

तुम्हारी ज़िन्दगी में आज मैं एक अजनबी  दिख रहा हूँ

क्योंकि मन का कहा मान, एक कविता लिख रहा हूँ |

रात और दिन  हैं  हमारे काले सफ़ेद मोहरे  

ज़िन्दगी की बिसात पर सतरंज सीख रहा हूँ |

 शह और मात से बच – बच  कर चलता हूँ, मगर

ज़िन्दगी को अपनी मुट्ठी से  फिसलती रेत की तरह झेल रहा हूँ  |

ज़िन्दगी के दर्द को सहते हुए कुछ अजीब सा दिख रहा हूँ |

क्योंकि मन का कहा मान  एक कविता लिख रहा हूँ |

 ज़िन्दगी से  बहुत कुछ  मिला पर  कुछ छुटा भी है

मेरी  भावनाओं को इसने कई बार लूटा भी है |

ख़ुशी के पलों ने जहाँ मुझे जिने का मकसद दिया है

वहीँ   दुखों के आंसू  से कई बार दिल टुटा भी है  |

आज  उन सब लम्हों का जोड़ और घटाव सिख रहा हूँ,

क्योंकि मन का कहा मान   एक कविता लिख रहा हूँ |

कभी अपनों  ने जलाया तो कभी खुद भी जला हूँ

पर हर बार घावों में खुद मरहम लगा कर चला हूँ.. |

ख़ुशी और गम को अपने से लगाए संतुष्ट दिख रहा हूँ

क्योंकि मन का कहा मान  एक कविता लिख रहा हूँ |

 ( विजय वर्मा )

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Categories: kavita

6 replies

  1. Very nice your poem writing.

    Liked by 2 people

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