# महाभारत की बातें #..16

महाबली भीम

दोस्तों,

अब तक मैंने महाभारत से जुडी एक एक योद्धाओं के बारे में जानकारियां शेयर करता आया हूँ |  महाभारत की  कहानी को आगे बढ़ाते हुए आज हम जिस योद्धा के बारे में चर्चा करेंगे ,..उनका नाम है  भीमसेन

उम्र के क्रम में भीम  पांडवों में दूसरे स्थान पर थे । वे पवनदेव के वरदान स्वरूप कुंती से उत्पन्न हुए थे |  

सभी पाण्डवों में वे सर्वाधिक बलशाली और श्रेष्ठ कद-काठी के थे और युधिष्ठिर के सबसे प्रिय सहोदर थे।

 उनकी विशेषता थी  कि  वे  सभी गदाधारियों  में सर्वश्रेष्ठ थे  और  इनके जैसा और कोई नहीं था जो गज की सवारी करने में इनका मुकाबला कर सके | उनमें दस हज़ार हाथियों के समान बल था ।

 वे युद्ध कला में पारंगत तो थे ही, अगर उन्हें क्रोध दिलाया जाए तो वे  कई  धृतराष्ट्रों   जैसे ताकतवर योद्धा को भी समाप्त कर सकते थे |  

…वनवास काल में इन्होने अनेक राक्षसों का वध किया था,    जिसमें  बकासुर  एवं  हिडिंब  आदि प्रमुख हैं | इसके अलावा अज्ञातवास के दौरान  विराट नरेश के साले   कीचक  का वध करके द्रौपदी की रक्षा की थी ।

…भीम  गदा युद़्ध में बहुत ही प्रवीण थे एवं  द्रोणाचार्य और बलराम  के शिष़्य थे ।

एक बार, युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में राजाओं की कमी होने पर उन्होने मगध के शासक  जरासंध   को परास्त करके बहुत सारे  राजाओं को मुक्त कराया था ।

…द्रौपदी के चीरहरण का बदला लेने के लिए उन्होने दुःशासन की छाती फाड़ कर उसका रक्त पान किया था ।

…भीम ने   काम्यक वन  के राजा  हिदिम्बसुर  नामक राक्षस का वध कर उस वन का राजा बने थे | और उनकी बहन  हिडींब से उनकी शादी हुई थी | उनसे एक पुत्र हुआ  जिसे घटोत्कच के नाम से जानते है |

…महाभारत के युद्ध में भीम ने ही सारे कौरव भाइयों का वध किया था। इन्ही के द्वारा  दुर्योधन   के वध के साथ ही महाभारत के युद्ध का अंत हो गया था ।

कहा जाता है कि भीम बचपन में काफी बलशाली थे और  इसी कारण दुर्योधन उनसे  इर्ष्या करता था  और उन्हें हानि पहुचाने की जुगत में लगा रहता था |

एक बार की बात है कि पांडव और कौरव राज कुमार जल क्रीडा के लिए गंगा के तट पर इकट्ठे हुए |

दुर्योधन  वहाँ धोखे से भीम के भोजन में कालकूट विष  मिला कर खिला दिया और इस तरह उस बिष के प्रभाव से वे बेहोश हो  गए थे | उसके बाद,  दुर्योधन ने भीमसेन को  लताओं इत्यादि से बांधकर नदी में फेंक दिया था ।

अन्य पांडव भाई  थक कर सो गये थे, उन्हें  भीम के  मृत्यु का कोई आभाष  नहीं हो सका था |

 प्रात: काल में जब  भीम को वहाँ न देखा  तो पांडव भाई  समझे कि वह उनसे पहले ही घर वापस  चला गया है ।  

इधर  भीम जल में डूबकर नागलोक पहुंच गए । वहाँ नागों के दर्शन से उसका विष उतर गया | वासुकि तथा नागराज आर्यक (भीम के नाना के नाना) ने भीम को  देख कर पहचान गए और उन्हें  गले से लगा लिया |

नागराज आर्यक ने प्रसन्न होकर उसे उस कुण्ड का जल पीने का अवसर दिया जिसका पान करने से  उन्हें दस  हज़ार हाथियों का बल प्राप्त हो गया | भीम ने वैसे आठ कुण्डों का रसपान करके ही विश्राम लिया  । तदनंतर आठ दिनों  बाद  वह सकुशल घर वापस आ गए |

 दुर्योधन ने एक दिन  धोखे से पुन: उन्हें  कालकूट विष का पान करवाया था  किंतु भीम के पेट में वृक नामक अग्नि थी जिससे विष पच जाता था  तथा उसका कोई प्रभाव नहीं होता था।  इसी कारण  भीम को वृकोदर  भी कहते है |

महाभारत युद्ध में भीम ने घूंसों तथा थप्पड़ों से ही कलिंग राजकुमार का वध कर दिया था  और साथ ही धृतराष्ट्र- के  सारे  पुत्रों का भी वध भीम ने ही किया था |

ऐसा कहा जाता है कि  भीमसेन पवन देव का अंशावतार थे | कहते है कि  भीम बहुत खाते थे और दूसरों को अपने सामने कुछ भी न समझकर, अपने बल की डींग हाँका करते थे;  इसी कारण स्वर्ग जाते समय रास्ते में  उनकी मृत्यु हो गई थी ।

…द्रौपदी के अलावा भीम की पत्नी का नाम हिडिंबा था जिससे भीम का परमवीर पुत्र घटोत्कच था। घटोत्कच ने ही इन्द्र द्वारा कर्ण को दी गई अमोघ शक्ति वाण को अपने ऊपर चलवाकर अर्जुन के प्राणों की रक्षा की थी ।

…भीम बलशाली होने के साथ-साथ बहुत अच्छा रसोइया भी थे । विराट नगर में अज्ञातवास के समय जब द्रौपदी सैरंध्री बनकर रह रही थी, तब  द्रौपदी के शील की रक्षा करते हुए उन्होंने कीचक का वध किया था |

.. श्रीकृष्ण के परम शत्रु मगध नरेश जरासंध  को भी भीम ने ही मारा था।


बकासुर वध

वनवास के  समय पांडव और उनकी माता कुंती  जंगल में भटकते हुए एक ब्राह्मण के यहाँ शरण ली | एक दिन प्रातः उन्होंने देखा कि ब्राह्मण का  परिवार सुबह सुबह एक साथ बैठ कर रो रहा है | 

ब्राह्मण की पत्नी अपने पति से  बोल रही थी कि मुझे राक्षस के पास जाने दीजिये | मैं ही उसकी भोजन का नेवाला बन जाती हूँ,  क्योंकि  अगर आप गए तो आप के बिना हमलोग कैसे जीवित रहेंगे |

तभी उनका  पुत्र जो अभी बालक ही था बोल उठा….. नहीं नहीं माँ ,  मैं जाऊंगा उस राक्षस के पास | उनकी बातों  को सुन कर  उनकी पुत्री बोल उठी ….पिता जी,  मुझ्रे उस राक्षस   के पास जाने की आज्ञा दीजिये |

इस तरह उनके विलाप करते हुए बातों को कुछ देर यूँ ही सुनने के बाद, माता कुंती और भीम  उस ब्राह्मण के पास आए और उनलोगों से रोने का कारण पूछा |

इस पर ब्राह्मण ने बताया ..कि यहाँ कुछ ही दूर पर एक गुफा में विशालकाय राक्षस   रहता है और उसी के आतंक से पूरा गाँव परेशान है | नित दिन किसी ना किसी परिवार को उनके पास भोजन लेकर जाना पड़ता है | और वह राक्षस  इतना क्रूर है कि भोजन ले जाने वाले को भी खा जाता है | इस तरह आज हमारे परिवार की बारी है | हम में से किसी एक को भोजन लेकर उसकी गुफा में जाना है ..और उसका आहार बनना है |

इस पर माता कुंती ने कहा ….ब्राह्मण देवता, आप ने मुझे शरण दिया है, इसलिए  आप को चिंता करने की कोई  आवश्यकता नहीं है |

आज  भोजन ले कर आपके बदले मेरा बेटा भीम  उन राक्षस  के पास  गुफा में जायेगा |

इस पर ब्राह्मण ज़ल्दी से बोला…. नहीं नहीं माता,  आपके पुत्र के जीवन को खतरे में नहीं डाल सकता |

इस पर कुंती ने उसे आश्वासन देते हुए कहा …नहीं नहीं  ब्राह्मण  देवता, मेरा बेटा बहुत बलशाली है | ..आप को चिंता करने की ज़रुरत नहीं,  उसे कुछ नहीं होगा |

ब्राह्मण परिवार की ओर से भीम भोजन लेकर  उस गुफा की ओर चल दिया जहाँ बकासुर भूख से व्याकुल भोजन का इंतज़ार कर रहा था |

भीम जैसे ही गुफा में पँहुचा तो वह राक्षस  उसे देखते ही गुस्से में दहाड़ते हुए कहा….. तुम्हारे आने में इतनी देर क्यों हुई ? मेरा भूख से बुरा हाल है| कहाँ है मेरा भोजन ?

भीम ने उसे देखते हुए गुस्से से कहा …तुमने हमारे गाँव वाले को बहुत तकलीफ |दी है | आज मैं तुझे भोजन  नहीं  कराऊंगा  बल्कि तुझे मार कर तुम्हारे  आतंक से गाँव वालों को आज़ाद कर दूंगा |

इतना सुनते ही बकासुर गुस्से में भीम को खाने के लिए उस पर झपटा |

दोनों में युद्ध होने लगा और थोड़ी देर में ही भीम ने उस राक्षस  को भूमि पर पटक पटक कर मार डाला और इस तरह गाँव वालों को उसके  आतंक से मुक्ति दिलाई |

भीम की प्रतिज्ञा

बात उस समय कि है जब महाभारत युद्ध की नींव रखी जा रही थी।  एक बार कौरवों के मामाश्री शकुनि ने पांचों पांडवों को चौसर  खेलने के लिए बुलाया था | पांडव की ओर से युधिष्ठिर इस खेल में  प्रतिनिधित्व कर रहे थे और दूसरी तरफ कौरवों की ओर से दुर्योधन।

शकुनी मामा ने छल से पांसे बदल लिए और युधिष्ठिर जुए में सब कुछ हार गए | यहाँ तक कि उन्होंने स्वयं समेत चारों भाइयों  और पत्नी द्रोपदी  को भी दांव पर लगा दिया था ।

उनके सब कुछ हार जाने के बाद,  दुर्योधन ने भरी राजसभा में द्रोपदी का चीर-हरण करने के लिए अपने भाई दुःशासन को आज्ञा दी । उसने द्रोपदी का चीरहरण करना शुरु किया,  लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने द्रोपदी की मदद की।

दुशासन की इस  घिनौने  हरकत से भीमसेन को बहुत  गुस्सा आया और उन्होंने भरी सभा में प्रतिज्ञा ली  कि एक दिन मैं दुःशासन की छाती फाड़कर उसका खून पीयूंगा ।  और दूसरी ओर द्रौपदी ने  भी भीम से कहा कि जब तक उसकी छाती का खून नहीं लाओगे, तब तक मैं अपने बाल नहीं बांधूंगी ।

महाभारत युद्ध के 16वें दिन अंगराज कर्ण  को कौरव सेना का मुख्य सेनापति बनाया गया था |

फिर अर्जुन के साथ  कर्ण का भयंकर युद्ध  हुआ और उसी दिन भीम ने  दुःशासन का वध कर उसकी छाती चीर कर उसका रक्त पिया  और अपनी प्रतिज्ञा पूरी की |

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4 replies

  1. Nicely described the personality of Bhimsen and his role in Mahabharata.

    Liked by 1 person

  2. Bheem’s character and story well narrated. Bheem was definitely a great warrior and was responsible for killing 100s of Kaurav brothers along with the most important Duryodhan. However it is Arjun who outshined everyone with his devotion, dedication and perfection because Lord Krishna was by his side.

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