महाभारत की बातें ..12

वैसे तो महाभारत का युद्ध न्याय-अन्याय,  धर्म-अधर्म के बीच हुआ था | लेकिन एक दूसरा युद्ध भी  इसमें शामिल होने वाले हर योद्धा के मन में भी चल रहा था |

ऐसे कई योद्धा थे जो सही-गलत के बीच का अंतर जानते हुए भी अधर्म के साथ खड़े थे |

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण था,…  राजधर्म का पालन करना |

भीष्म पितामहा सभी योद्धाओं में से सबसे ज्ञानी और अनुभवी माने जाते थे,  और इस नाते वो सब कुछ जानते थे | फिर भी उन्हें कौरवों का साथ देना पड़ा क्योकि उन्हें राज – धर्म का पालन करने की मज़बूरी थी |

विदुर धृतराष्ट्र के भाई थे लेकिन वे  दासी पुत्र थे । इसीलिए वे भीष्म पितामह ने  युद्ध कला सिखने की इज़ाज़त नहीं दी | लेकिन वे बहुत  बुद्धिमान और विद्वान थे,, इसलिए उन्हें कौरवो का महा मंत्री बनाया गया था |

चूँकि वे राज़ – काज चलाने में अपने बुद्धि और निति का समुचित प्रयोग करते थे, इसलिए वे प्रयास करते थे कि किसी के साथ अन्याय ना हो |

 उन्होंने अपने ज्ञान और राजनितिक कुशलता से कई बार हस्तिनापुर  को संकटों से बचाया था |

उनकी  नीति का  दोस्त और  दुश्मन सभी आदर करते थे और कालांतर में उनकी निति को विदुर की निति के नाम से जाना जाता है  |

विदुर अधर्म का साथ नहीं देना चाहते थे | इसलिए वे  महाभारत के इस युद्ध में  किसी के पक्ष में युद्ध का हिस्सा नहीं बने थे |  लेकिन इस  बात की उन्हें आत्मग्लानि महसूस होती थी कि अनुभवी और वरिष्ठ होने पर भी वो भाईयों के बीच युद्ध को रोक पाने में सफल नहीं हो सके |.

आइये अब विदुर निति की चर्चा करते है …

विदुर निति

  • विदुर कहते हैं कि जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को क्लेश हो,  धर्म का उल्लंघन करना पड़े,  शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो,  उसे प्राप्त करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।
  • पर स्त्री का स्पर्श,  पर धन का हरण,  और मित्रों का त्याग,  यह तीनों दोष क्रमशः काम,  लोभ,  और क्रोध से उत्पन्न होते हैं ।
  • जो विश्वास का पात्र नहीं है,  उसका तो कभी विश्वास किया ही नहीं जाना चाहिए । पर जो विश्वास के योग्य है,  उस पर भी अधिक विश्वास नहीं किया जाना चाहिए । विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है, वह मूल उद्देश्य का भी नाश कर डालता है।
  • संसार के छह सुख प्रमुख है- धन प्राप्ति,  हमेशा स्वस्थ रहना,  वश में रहने वाले पुत्र,   प्रिय भार्या,  प्रिय बोलने वाली भार्या और मनोरथ पूर्ण कराने वाली विद्या – अर्थात् इन छह से संसार में सुख उपलब्ध होता है।
  • बुद्धिमान व्यक्ति के प्रति अपराध कर कोई दूर भी चला जाए तो चैन से न बैठे, क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति की बाहें लंबी होती है और समय आने पर वह अपना बदला लेता है।
  • क्षमा को दोष नहीं मानना चाहिए,  निश्चय ही क्षमा परम बल है। क्षमा निर्बल मनुष्यों का गुण है और बलवानों का क्षमा आभूषण है।
  • काम,  क्रोध और लोभ यह तीन प्रकार के नरक यानी दुखों की ओर जाने के मार्ग है। यह तीनों आत्मा का नाश करने वाले हैं |  इसलिए इनसे हमेशा दूर रहना चाहिए।
  • ईर्ष्या,  दूसरों से घृणा करने वाला,  असंतुष्ट,  क्रोध करने वाला,  शंकालु और पराश्रित (दूसरों पर आश्रित रहने वाले) इन छह प्रकार के व्यक्ति सदा दुखी रहते हैं।
  • जो पुरुष अच्छे कर्मों और पुरुषों में विश्वास नहीं रखता,  गुरुजनों में भी स्वभाव से ही शंकित रहता है। किसी का विश्वास नहीं करता,  मित्रों का परित्याग करता है… वह पुरुष निश्चय ही अधर्मी होता है।
  • जो अच्छे कर्म करता है और बुरे कर्मों से दूर रहता है, |  साथ ही जो ईश्वर में भरोसा रखता है और श्रद्धालु है उसके ये सद्गुण पंडित होने के लक्षण हैं।
  • जो अपना आदर-सम्मान होने पर खुशी से फुला नहीं समता …फूल नहीं उठता और अनादर होने पर क्रोधित नहीं होता तथा गंगा जी के कुण्ड के समान जिसका मन अशांत नहीं होता, वह ज्ञानी कहलाता है।
  • मूढ़ चित वाला नीच व्यक्ति… बिना बुलाए ही अंदर चला आता है,,  बिना पूछे ही बोलने लगता है तथा जो विश्वास करने योग्य नहीं हैं उन पर भी विश्वास कर लेता है।
  • जो बहुत धन,  विद्या तथा ऐश्वर्य को पाकर भी इठलाता नहीं,  वह पंडित कहलाता है।
  • मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत से लोग उसका आनंद उठाते हैं। आनंद उठाने वाले तो बच जाते हैं पर पाप करने वाला दोष का भागी होता है।
  • किसी धनुर्धर वीर के द्वारा छोड़ा हुआ बाण संभव है किसी एक को भी मारे या न मारे,  | परन्तु  बुद्धिमान द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजा के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश कर सकती है ।
  • विदुर धृतराष्ट्र को समझाते हुए कहते हैं: राजन! जैसे समुद्र के पार जाने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है उसी प्रकार स्वर्ग के लिए सत्य ही एकमात्र सीढ़ी है, कुछ और नहीं, किन्तु आप इसे नहीं समझ रहे हैं।
  • केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है |,  एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देने वाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देने वाली है।
  • विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं : राजन! ये दो प्रकार के पुरुष स्वर्ग में  भी ऊपर स्थान पाते हैं- शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने वाला और निर्धन होने पर भी दान देने वाला।
  • काम, क्रोध और लोभ ये आत्मा का नाश करने वाले नरक के तीन दरवाजे हैं, अत: इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
  • पिता,  माता,  अग्नि,  आत्मा और गुरु…-मनुष्य को इन पांच की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए ।

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7 replies

  1. बहुत सुंदर लेख 👌🏼👌🏼🙏🏼

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    • जी, बहुत बहुत धन्यवाद ,

      नुझे ख़ुशी हुई कि मेरी लेखनी पसंद आती है …

      मेरी कोशिश ज़ारी है..

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      • आदरणीय चाचाजी सादर अभिवादन 🙏🏼
        आपकी लेखनी उत्कृष्ट श्रेणी की है, हमें
        आपकी रचनाएँ पढ़ने को मिल रही है,
        इसके लिए wordpress का भी बहुत आभार है ।
        आपकी लेखनी से सकारात्मक सोच व जीवन को
        उत्साहपूर्वक जीने की प्रेरणा मिलती है ।ईश्वर आपको व आपके परिजनों को स्वस्थ व प्रसन्न रखें 🙏🏼

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  2. Vidur niti, nice to understand.

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  3. Vidur is one of the central characters of Mahabharat and the dialogue that you have narrated in the blog between Vidur and Dhritrashtra is also known as Vidurniti and is considered in some ways as the precursor of Chanakyaniti.

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