# महाभारत की बातें #..10

महारथी कर्ण

धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के लालन पालन का जिम्मा  भीष्म के ऊपर था। तीनों राजकुमारों के विद्या अध्ययन के लिए भीष्म पितामह ने समुचित व्यस्था की   और सभी को अध्ययन के साथ  युद्ध कला की  भी विधिवत शिक्षा दी गयी थी  |

धृतराष्ट्र बल विद्या में, पाण्डु धनुर्विद्या में तथा विदुर धर्म और नीति में निपुण हुए । युवा होने पर धृतराष्ट्र  अंधे होने के कारण राज्य के उत्तराधिकारी न बन सके । विदुर दासी पुत्र थे इसलिये पाण्डु को ही हस्तिनापुर का राजा घोषित कर दिया गया।

भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधार की राजकुमारी गांधारी से कर दिया। गांधारी को जब ज्ञात हुआ कि उसका पति अन्धा है तो उसने भी स्वयं अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली ।

उन्हीं दिनों यदुवंशी राजा शूरसेन की पोषित कन्या कुन्ती जब सयानी हुई तो पिता ने उसे घर आये हुये महात्माओं की  सेवा में लगा दिया।

पिता के अतिथिगृह में जितने भी साधु-महात्मा, ऋषि-मुनि आदि आते,  कुन्ती उनकी सेवा मन लगा कर किया करती थी ।

एक बार उनके यहाँ दुर्वासा ऋषि आ पहुँचे ।  कुन्ती ने उनकी भी मन लगा कर सेवा की। कुन्ती की सेवा से वे प्रसन्न हो गए और उन्होंने कहा …, पुत्री,  मैं तुम्हारी सेवा से अत्यन्त प्रसन्न हुआ हूँ | अतः तुझे एक ऐसा मन्त्र देता हूँ जिसके प्रयोग से तू जिस देवता का स्मरण करेगी वह तत्काल तेरे समक्ष प्रकट हो कर तेरी मनोकामना पूर्ण करेगा।

इस प्रकार दुर्वासा ऋषि कुन्ती को वह मन्त्र प्रदान कर के चले गये।

एक दिन कुन्ती को  ऋषि की दी हुई उस मन्त्र की सत्यता की जाँच करने  की इच्छा हुई | उसने एकान्त स्थान पर बैठ कर उस मन्त्र का जाप करते हुये सूर्यदेव का स्मरण किया । उसी क्षण सूर्यदेव वहाँ  प्रकट हो गए और बोले…., देवी, तुमने मेरा स्मरण किया है |  मुझे बताओ कि तुम मुझ से किस वस्तु की अभिलाषा करती हो।

मैं तुम्हारी अभिलाषा अवश्य पूर्ण करूँगा। इस पर कुन्ती ने कहा,… हे देव. मुझे आपसे किसी भी प्रकार की अभिलाषा नहीं है । मैंने तो केवल मन्त्र की सत्यता परखने के लिये ही आप का स्मरण किया है।

कुन्ती के इन वचनों को सुन कर सूर्यदेव बोले,… हे कुन्ती,  मेरा यहाँ आना व्यर्थ नहीं जा सकता । इसलिए मैं तुम्हें एक अत्यन्त पराक्रमी तथा दानशील पुत्र प्रदान करता हूँ । इतना कह कर सूर्यदेव अन्तर्ध्यान हो गये।

कुन्ती ने लज्जावश इस  बात की चर्चा  किसी से भी नहीं की । नियत समय आने पर उसके गर्भ से कवच-कुण्डल धारण किये हुये एक पुत्र उत्पन्न हुआ।  कुन्ती ने गुप्त रूप से उसे एक मंजूषा में रख कर रात्रि बेला में गंगा में बहा दिया।

वह बालक बहता हुआ उस स्थान पर पहुँचा जहाँ पर धृतराष्ट्र का सारथी अधिरथ अपने घोड़ों  को गंगा नदी में जल पिला रहा था। उसकी दृष्टि कवच-कुण्डल धारी शिशु पर पड़ी। अधिरथ निःसन्तान था इसलिये उसने बालक को देखते ही अपने छाती से लगा लिया और ख़ुशी ख़ुशी घर ले जाकर आ गए |

उनकी पत्नी और वे  उसे अपने पुत्र के जैसा लालन पालन करने लगे  | उस बालक के कान अति सुन्दर थे इसलिये उसका नाम कर्ण रखा गया।

अपनी कुमार अवास्था से ही कर्ण की रुचि अपने पिता अधिरथ के समान रथ चलाने में  नहीं थी , बल्कि वे युद्धकला सीखना चाहते थे । अपनी इच्छा को पूरी करने के लिए कर्ण अपने पिता अधिरथ के साथ आचार्य द्रोणाचार्य से मिले, जो कि उस समय युद्धकला के सर्वश्रेष्ठ आचार्यों में से एक थे।

द्रोणाचार्य उस समय कुरु राजकुमारों को शिक्षा दिया करते थे। उन्होने कर्ण को शिक्षा देने से मना कर दिया, क्योंकि कर्ण एक रथ हाँकने वाले का पुत्र था और द्रोणाचार्य केवल क्षत्रियों को ही शिक्षा दिया करते थे।

द्रोणाचार्य की असहमति  के कारण कर्ण बहुत दुखी हुए ,क्योकि वे किसी हाल में  एक योद्धा बनना चाहते थे |

इसलिए उन्होंने  श्री परशुराम जी से सम्पर्क किया, जो केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा दिया करते थे।  कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से शिक्षा का आग्रह किया। परशुराम ने कर्ण को ब्राहमण समझ कर उनका आग्रह स्वीकार कर लिया | उन्होंने  कर्ण को अपने समान ही युद्धकला और धनुर्विद्या में निपुण किया।

कर्ण की शिक्षा जब  अपने अंतिम चरण पर थी। तो एक दोपहर  गुरु परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। कुछ देर बाद कहीं से एक बिच्छु आया और कर्ण की दूसरी जंघा पर काट कर घाव बनाने लगा। कर्ण बिल्कुल भी नहीं चाहता था कि उसके गुरु के विश्राम में कोई बाधा उत्पन्न हो। इसीलिए उसने उस बिच्छू को हटाकर दूर नहीं फेका |

वह बिच्छू अपने डंक से कर्ण को भयंकर पीड़ा देता रहा, किन्तु कर्ण ने अपने गुरु के विश्राम में खलल नहीं आने दिया।

कुछ देर बाद जब गुरु परशुराम की निद्रा टूटी और उन्होंने देखा कि एक बिच्छु के काटने के कारण कर्ण की जांघ से बहुत रक्त बह रहा है ।

उन्होंने कहा कि केवल किसी क्षत्रिय में ही इतनी सहनशीलता हो सकती है कि वह बिच्छु का डंक सह ले, ना कि किसी ब्राह्मण में |  अतः परशुराम ने कर्ण से उसकी सत्ययता जाननी चाही |

कर्ण ने माफ़ी मांगते हुए सारी बातें सच सच बता दी |

इस पर परसुराम ने झूठ बोल कर शिक्षा ग्रहण करने के कारण उसे शाप दिया कि – “जब कर्ण को जिस समय उनकी दी हुई शिक्षा की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, उसी समय  वह उस विद्या की भूल जायेगा और सीखी हुई  विद्या उसके काम नहीं आएगा |


जब कर्ण ने क्षमा याचना करते हुए अपने गुरु परशुराम से कहा.. .हे गुरु, मुझे स्वयं भी ये पता नहीं है कि मैं  किस वंश से हूँ | कर्ण ने हाथ जोड़ कर यह भी कहा कि मेरे  स्थान पर यदि कोई और शिष्य  होता तो वो भी यही करता ।

यद्यपि कर्ण को क्रोधवश शाप देने पर परशुराम को बहुत ग्लानि हुई, किन्तु वे अपना शाप वापस नहीं ले सकते थे।

तब उन्होंने कर्ण को अपना ‘विजय’ नामक धनुष प्रदान किया  और उसे ये आशीर्वाद भी दिया कि वे दुनिया में उसकी वीरता के लिए याद किया जायेगा |

परशुराम के आश्रम से जाने के पश्चात कर्ण कुछ समय तक जंगलों में भटकता रहा । इस दौरान वह ‘शब्दभेदी’ विद्या सीख रहा था । एक दिन अभ्यास के दौरान उसने एक गाय के बछड़े को कोई वनीय पशु समझ लिया और उस पर शब्दभेदी बाण चला दिया |

बछडा़ वहीँ  मारा गया। तब उस गाय के स्वामी ब्राह्मण ने कर्ण को शाप दे  दिया कि- “जिस प्रकार उसने एक असहाय पशु को मारा है, वैसे ही एक दिन वह भी मारा जाएगा | जब वह सबसे अधिक असहाय होगा और जब उसका सारा ध्यान अपने शत्रु से कहीं अलग किसी और काम पर होगा।”

वैसे तो   कर्ण  के पिता सूर्य और माता कुंती थी, पर चूँकि उनका पालन एक रथ चलाने वाले अधिरथ ने किया था , इसलिए वो सूतपुत्र कहलाएं |  इसी कारण उन्हें वो सम्मान नहीं मिला, जिसके वो हकदार थे ।

एक बार तो स्वयंवर के दौरान द्रौपदी ने  भरी सभा में कर्ण को एक सूत पुत्र कहकर अपमानीत भी किया था। फिर भी चीरहरण के दौरान द्रौपदी को कर्ण से सहायता की  उम्मीद थी , लेकिन कर्ण ने अपने अपमान को याद कर वहाँ  द्रौपदी की कोई सहायता नहीं की।

जब कुंती को पता चला कि कर्ण उसी का पुत्र है तो महाभारत से पहले  कुंती कर्ण के पास गई और उससे पांडवों  का साथ देने का आग्रह करने लगी । कर्ण को मालूम था कि कुंती मेरी मां है ।

कुंती के लाख समझाने पर भी कर्ण उनका आग्रह  स्वीकार नहीं कर सका | उन्होंने कहा कि जिनके साथ मैंने अब तक का अपना सारा जीवन बिताया और उसे साथ देने का वचन दिया है , उसके साथ मैं विश्‍वासघात नहीं कर सकता।

तब कुंती ने कहा … क्या तुम अपने भाइयों का वध करोगे  ?  इस बात पर  कर्ण बड़ी ही दुविधा की स्थिति में पड़  गए |

फिर भी उन्होंने वचन दिया, …’माते, तुम जानती हो कि कर्ण के यहां याचक बनकर आया कोई भी खाली हाथ नहीं जाता है |  अत: मैं तुम्हें वचन देता हूं कि तुम्हारे  पाँचो पुत्र  जिंदा रहेगा |  मैं अर्जुन  को छोड़कर  अपने अन्य भाइयों पर शस्त्र नहीं उठाऊंगा । अगर अर्जुन मेरे हाथो मारा जायेगा तो तुम्हारा पाँचवा बेटा मैं तुम्हारे पास आ जाऊंगा |

 उन्होंने महाभारत युद्ध के दौरान युधिष्ठिर नकुल और सहदेव को बंदी बना लिया था, लेकिन  फिर उन्हें  आजाद कर दिया और अपने वचन का पालन किया |

कर्ण वध

महाभारत युद्ध के सत्रहवें दिन  अन्तत: वह घड़ी आ ही गई, जब कर्ण और अर्जुन आमने-सामने आ गए । इस शानदार संग्राम में दोनों ही बराबर थे । कर्ण के पास  उसके गुरु परशुराम द्वारा विजय नामक धनुष  भेंट स्वरूप दिया गया था, जिसका प्रतिरूप स्वयं विश्वकर्मा ने बनाया था। 

दुर्योधन के निवेदन पर पाण्डवों के मामा शल्य कर्ण के सारथी बनने के लिए तैयार हुए। क्योंकि अर्जुन के सारथी स्वयं श्रीकृष्ण थे और कर्ण किसी भी मामले में अर्जुन से कम ना हो इसके लिए शल्य से सारथी बनने का निवेदन किया था । 

महाराज शल्य में वे सभी गुण विद्यमान थे, जो एक योग्य सारथी में होने चाहिए। अर्जुन तथा कर्ण के मध्य हो रहे युद्ध की यह भी विशेषता थी कि जब अर्जुन के बाण कर्ण के रथ पर लगते तो उसका रथ कई गज पीछे खिसक जाता, किन्तु जब कर्ण के बाण अर्जुन के रथ पर लगते तो उसका रथ केवल कुछ ही बालिश्त (हथेली जितनी दूरी) दूर खिसकता।

इस पर श्रीकृष्ण ने कर्ण की प्रशंसा की। चकित होकर अर्जुन ने कर्ण की इस प्रशंसा का कारण पूछा, क्योंकि उसके बाण रथ को पीछे खिसकाने में अधिक प्रभावशाली थे। 

तब श्रीकृष्ण ने कहा कि- “कर्ण के रथ पर केवल कर्ण और शल्य का भार है, किन्तु अर्जुन तुम्हारे रथ पर तो स्वयं तुम, मैं और वीर हनुमान भी विराजमान हैं, और तब भी कर्ण ने इस  रथ को कुछ बालिश्त पीछे खिसका दिया।“

युद्ध में कर्ण ने कई बार अर्जुन के धनुष की प्रत्यंचा काट दी, किन्तु हर बार अर्जुन पलक झपकते ही धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा लेता। इसके लिए कर्ण अर्जुन की प्रशंसा करता है और शल्य से कहता है कि- “वह अब समझा कि क्यों अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहा जाता है।“ 

अर्जुन और कर्ण के बीच  भयानक युद्ध चल रहा था तभी कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया…

तब कर्ण अपने रथ के पहिए को निकालने के लिए नीचे उतरा और अर्जुन से निवेदन किया कि वह युद्ध के नियमों का पालन करते हुए कुछ देर के लिए उस पर बाण चलाना बंद कर दे।” 

तब श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं- “कर्ण को कोई अधिकार नहीं है कि वह अब युद्ध नियमों और धर्म की बात करे, जबकि स्वयं उसने भी अभिमन्यु के वध के समय किसी भी युद्ध नियम और धर्म का पालन नहीं किया था।”

उन्होंने आगे कहा कि “तब उसका धर्म कहाँ गया था, जब उसने दिव्य-जन्मा द्रौपदी को पूरी कुरु राजसभा के समक्ष वैश्या कहा था। द्युत-क्रीड़ा भवन में उसका धर्म कहाँ गया था। इसलिए अब उसे कोई अधिकार नहीं  कि  वह किसी धर्म या युद्ध नियम की बात करे ।”

उन्होंने अर्जुन से कहा … “अभी कर्ण असहाय है, इसलिए वह उसका वध करे।” 

श्रीकृष्ण कहते हैं … हे अर्जुन,  यदि तुमने इस निर्णायक मोड़ पर अभी कर्ण को नहीं मारा तो संभवतः पाण्डव उसे कभी भी नहीं मार सकेंगे और यह युद्ध कभी भी नहीं जीता जा सकेगा।

उनकी बातों को सुन कर कर्ण को यह एघ्सास एहसास हो गया कि  निःसस्त्र अवस्था में होने पर भी अर्जुन प्रहार करना चाहता है |

तो उसने अपने दैवीय अस्त्रों को प्राप्त करने के लिए मंत्र से उनका आह्वान किया, लेकिन परशुराम  के शाप के कारण  वह मंत्र भूल गया  |

तभी अर्जुब एक दैवीय अस्त्र का उपयोग करते हुए कर्ण का सिर धड़ से अलग कर दिया । कर्ण के शरीर के भूमि पर गिरने के बाद एक ज्योति कर्ण के शरीर से निकली और सूर्य में समाहित हो गई।

इस तरह हम देखते हैं कि युद्ध के पहले से ही कर्ण और कृष्ण के बीच छद्मयुद्ध चलता रहा था। वो कृष्ण ही थे जिन्होंने ऐन वक्त पर नीति के तहत ही कर्ण को यह बताया था कि कुंती तुम्हारी मां है।

लेकिन युधिष्‍ठिर और अर्जुन को इस बात का ज्ञात नहीं था कि कर्ण हमारा बड़ा भाई है। यदि युधिष्ठिर को यह पता चलता कि कर्ण मेरा बड़ा भाई है तो वह राजपाट की लड़ाई नहीं लड़ते बल्कि कर्ण को ही राजा बनाने की लड़ाई लड़ते।

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Categories: story

8 replies

  1. Interesting story. Karna life at a glance.

    Liked by 1 person

  2. Karna is a tragic hero and a complex character of Mahabhara. You have described his story in a very realistic manner.

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