# महाभारत की बातें #..5

भगवान् परशुराम का परशु

 ऐसा कहा जाता है कि परशुराम  विष्णु के छठे अवतार है | उनका जन्म  त्रेता युग में एक ब्राह्मण ऋषि के यहां हुआ था ।

उनके जन्म के बारे में कहा जाता है कि एक बार महर्षि  भृगु के पुत्र महर्षि  जमदग्नि ने पुत्रेष्टि यज्ञ को किया था |  जिससे  प्रसन्न होकर देवराज  इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी  रेणुका  के गर्भ से इनका जन्म हुआ था |

वे भगवान विष्णु के आवेशावतार हैं । पितामह भृगु  द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार में उनका नाम राम पड़ा | इसलिए  उनके माता पिता उन्हें राम कह कर बुलाते थे |

बाद में जब वे बड़े हुए तब उनके पिता जमदग्नि ने उन्हें हिमालय जाकर भगवान् शिव की अराधना करने को कहा |

पिता की आज्ञा पा कर राम ने ऐसा ही किया | उनके  तप से प्रसन्न होकर भगवान् शिव उन्हें दर्शन दिए और उन्होंने असुरो के नाश का आदेश दिया | राम ने अपना पपराक्रम दिखा कर असुरो का नाश कर दिया |

राम के इस पराक्रम  को देख कर भगवान् शिव खुश हो कर  उन्हें परशु नाम का एक अस्त्र दिया | उस अस्त्र परशु  को धारण कर राम से परशुराम हो गए |

अपने माँ का सिर काट डाला

एक और विचित्र कथा प्रचलित है कि उन्होंने अपनी ही  माँ का सिर काट डाला था | इसके पीछे के कारण जानने के लिए उस घटना को जानना होगा |

एक बार जमदग्नि ऋषि ने अपनी पत्नी  रेणुका को जल लाने के लिए भेजा | उस समय   नदी में चित्र रथ  अप्सराओं के साथ जल क्रीडा  कर रहे थे | यह देख रेणुका कुछ समय के लिए वहीँ रुक गयी और इधर यज्ञ का समय व्यतीत हो गया |

जमदग्नि ऋषि ने अपने  दिव्य दृष्टि से  रेणुका के देर होने का कारण जान लिया और जब  रेणुका लौट कर आई  तो उन्होंने उससे कहा कि तुमने घोर पाप किया है |

 उन्होंने क्रोध वश अपने चारो पुत्रो को बुला कर  माँ  रेणुका का गला काटने  का आदेश दे दिया | लेकिन माता प्रेम के चलते चारो भाइयों में किसी ने भी अपनी माता को नहीं मारा |

उसी समय परशुराम जी वहाँ पहुँच गए तो उनके क्रोधित  पिता जमदग्नि ने उन्हें  अपनी माता और चारो भाइयों का गला कटने का आदेश दिया |

अपने पिता के आदेश का पालन करते हुए वे चारो भाइयों के साथ साथ अपनी माता रेणुका का भी सिर धड़ से अलग कर दिया |

परशुराम द्वारा उनका आदेश मानने पर जमदग्नि प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा | तब परशुराम जी ने वरदान मंगा की उनके चारो भाई और माँ  फिर से जीवित हो जाएँ | और उन्हें इस घटना के बारे में कुछ भी याद ना रहे |

परशुराम की आरम्भिक शिक्षा महर्षि  विश्वामित्र एवं महर्षि  ऋचीक के आश्रम में हुई | उनकी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद  उनको एक दिव्य वैष्णव धनुष मिला  और ब्रह्मर्षि  कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र की प्राप्तिं हुई ।

उसके बाद वे कैलाश पर्वत पर भगवान् शिव के  आश्रम में गए और बहुत सारी विद्याओं के साथ विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया।

तब परशु धारण करने के कारण वे परशुराम कहलाये | उन्हें शिवजी से त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए।

यह पता नहीं कि वे धरती पर कब तक राज किया क्योकि यह मान्यता है कि वे त्रेता और द्वापर युग से ही अमर है | वे आज भी जीवित है उनका उल्लेख रामायण, महाभारत , भगवत पूरण और कल्कि पुराण  में मिलता है |

वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्मद्रोण  व  कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी।

परशुराम – लक्ष्मण संवाद

त्रेता युग में जब भगवान् श्री  राम ने सीता स्वम्बर में भगवान् शिव के धनुष को भंग किया था तो उसकी आवाज़ तीनो लोक में गूंज उठी थी | आवाज़ सुन कर परसुराम जी का ध्यान भंग हुआ और जब उन्होंने अपने  दिव्य दृष्टि से यह पता लगाया कि शिव जी के धनुष को किसी ने तोड़ दिया है तो वे काफी क्रोधित हुए |

वे पवन वेग से चलते हुए जनक पुर के उन स्थल पर पहुंचे जहाँ सारे राजा गन स्वयंबर में इकठ्ठा थे और सभी भगवान् राम की प्रसंसा कर रहे थे ..|

तभी क्रोधित होकर परशराम ने कहा …जिसने भी तोडा है यह धनुष , मेरा फरसा से उसका गर्दन अलग हो जायेगा |

आइये इस संवाद को विस्तार से देखें ..

परशुराम:  

शिवधनुष तोड़ा है जिसने
परम शत्रु है वो मेरा
क्षण भर में ना आया सम्मुख
तो होगा संहार बड़ा

लक्षमण:
सुनकर बोले लक्षमण जी
इतना क्यूं क्रोधित होते
बालकाल में ना जाने
कितने धनुष हम तोड़ चुके

परशुराम:
क्रोधित परशुराम तब बोले
धनुष है ये महादेव का
सम्मुख आये मेरे वो
कृत्य है ये जिसका

लक्षमण:
लक्षमण जी ने हँसकर बोला
हमको सभी धनुष लगते हैं सम
नहीं दोष इसमें रघुवर का
स्पर्श मात्र से हुआ विखंड

परशुराम
भड़क उठे परशुराम तब
बोले दुष्ट है तू मुझसे अन्जान
अपनी इन भुजाओं के बल से
क्षत्रियों से किया धरती को वीरान

नादान हो तुम बालक हो
नहीं जानते हो कुछ भी
देख मेरे फरसे से मैंनें
काटी भुजाएं सहस्रबाहु की



लक्ष्मण
समझते हो बड़ा योद्धा खुद को
क्या फूंक से पर्वत उड़ता है
आपके इस फरसे से मुझको
तनिक भय नहीं लगता है

जान आपको भृगुवंंशी
और देख ये यज्ञोपवीत
सहन कर रहा हूँ मैं
आपके ये कटु तीर

देवता, ब्राह्मिन ,गौ,प्रभूभक्त
रघुकुल में ना करते इन पर वार
हारे तो अपकीर्ति मिलती
जो मारे तो लगता पाप

परशुराम विश्वामित्र से:
उद्दंड, मूर्ख बालक ये
मारा जायेगा हाथों मेरे
समझा लो इसको विश्वामित्र
ना देना फिर कोई दोष मुझे

विश्वामित्र
नादान है बालक अभी
प्रभु आप तो महाज्ञानी हैं
अपराध इसका क्षमा करें
आप गुरु हैं स्वामी हैं

लक्षमण
बोल उठे लक्षमण फिर से
नहीं टकराये कभी सच्चे वीर से
तभी रघुवर श्रीराम ने
शान्त किया लक्षमण को इशारे से

श्रीराम
नहीं जानता आपकी शक्ति
वंचित है आपके प्रभाव से
क्षमा कीजिये प्रभु मुनिवर
बालक है नादान ये

लक्षमण नही है अपराधी
धनुष को मैने तोड़ा है
अपराधी आपका मैं हूँ
कहिये मेरी क्या सज़ा है

परशुराम
शिव का धनुष तोड़कर
ज्ञान हमें ही देता है
कटु वचन बोले छोटा भाई
और तू विनती करता है

युद्ध के लिये ललकारता हूँ
मैं तुझको ए अभिमानी
फरसे से दी है बलि राजाओं की
ना समझ निरा सन्त तू अज्ञानी

श्री राम
हे मुनि, पुराना था धनुष
बस छूते ही टूट गया
ब्राह्मण सन्त और ज्ञानी का
रघुकुल ने सदा आदर है किया

सवाल है युद्ध का अगर
तो सत्य महामुनि सुनें
रण में ललकारे काल गर
रघुवंशी उससे युद्ध करे

सुनकर वचन रघुनाथ के
परशुराम को हुआ भान
बोले प्रभु मुझको क्षमा करें
अनजाने में हुई भूल महान

भीष्म और परशुराम का युद्ध

ऐसा  भी ज़िक्र आता है कि परसुराम जी और भीष्म में भयंकर युद्ध हुआ था | इसका मुख्य  कारण  काशी  नरेश की पुत्री अम्बा का प्रतिशोध  था .| चूँकि  भीष्म ने अम्बा के शादी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था, क्योकि वे आजीवन  ब्रहमचर्य का प्रण कर रखा था |  

अतः अम्बा प्रतिशोध वश  भीष्म को दण्डित करने के लिए सहायत मांगने हेतु बहुत सारे राजाओं के पास गयी |

सारे राजाओं ने भीष्म के ताकत को देखते हुए उसे  मदद को तैयार नहीं हुए | उन्ही में से कुछ राजाओं  ने अम्बा  को भीष्म के गुरु परशुराम के पास मदद मांगने की सलाह दी |

अम्बा अपने दुःख के लेकर परशुराम के पास पहुँची | अम्बा के दुःख से दुखी होकर परशुराम जी  स्वयं  भीष्म के पास पहुंचे और उन्होंने समझाने का प्रयास किया |

जब भीष्म उनकी बात नहीं माने तो  उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिए ललकारा ।

भीष्म और परशुराम जी के बीच घोर युद्ध चल रहा था  जहाँ दोनों एक दूसरे पर अपने-अपने शस्त्रों का प्रयोग करते रहे , जहाँ कभी परशुराम जी मूर्च्छित हो जाते और कभी भीष्म |,

फिर भी, दोनों के बीच २३ दिनों तक घमासान युद्ध चला। किन्तु भीष्म को अपने पिता द्वारा दी हुई इच्छा मृत्यु के वरदान के कारण परशुराम उन्हें हरा न सके।

द्रोणाचार्य को परशुराम ने दिए अस्त्र

एक बार की बात है कि परशुराम अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर रहे थे, तब द्रोणाचार्य उनके पास पहुँचे। किन्तु दुर्भाग्यवश वे तब तक सब कुछ दान कर चुके थे।

तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये कहा। तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र शस्त्र उनके मन्त्रों सहित चाहता हूँ ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो, प्रयोग किया जा सके ।

परशुरामजी ने कहा-“एवमस्तु!” अर्थात् ऐसा ही हो। इससे द्रोणाचार्य  शस्त्र विद्या में निपुण हो गये।

परशुराम के शिष्य कर्ण

परशुराम  कर्ण के भी गुरु थे। उन्होने कर्ण को भी विभिन्न प्रकार की अस्त्र शास्त्र की शिक्षा दी थी और ब्रह्मास्त्र चलाना भी सिखाया था। लेकिन कर्ण एक सूत का पुत्र था, फिर भी यह जानते हुए कि परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही अपनी विधा दान करते हैं |,

तो  कर्ण ने छल करके परशुराम से विधा लेने का प्रयास किया । परशुराम ने उन्हें ब्राह्मण समझ कर बहुत सी विद्यायें सिखायीं |

लेकिन एक दिन जब परशुराम एक वृक्ष के नीचे कर्ण की गोद में सर रख कर सो रहे थे, तब एक कीड़ा  आकर कर्ण के पैर में  काटने लगा | अपने गुरुजी की नींद में कोई अवरोध न आये इसलिये कर्ण कीड़े  को सहता  रहा | कीड़ा  कर्ण के पैर को बुरी तरह काटे जा रहा था, और कुछ समय बाद कटे स्थान से खून बहने लगा।

वो खून बहता हुआ परशुराम के पैरों तक जा पहुँचा । परशुराम की नींद खुल गयी और वे इस खून को तुरन्त पहचान गये कि यह खून तो किसी क्षत्रिय का ही हो सकता है जो इतनी देर तक बगैर उफ़ किये बहता रहा। इसलिए उन्होंने कर्ण से उनका असली परिचय पूछा और यह जान कर कि  वह सूत पुत्र है,  वे काफी क्रोधित हो गए |

उन्होंने श्राप दिया कि युद्ध भूमि  में जब तुम्हे इन विद्याओं की ज़रुरत होगी तो ऐसे वक़्त पर इन्हें भूल जाओगे | इसी कारण अर्जुन से अंतिम लड़ाई के समय अपनी यह विद्या भूल गए और उन्हें अपनी जान गवानी पड़ी |

सतयुग में ब्राह्मणों का कार्य केवल शास्त्रों का पठन-पाठन और यज्ञ करना हुआ करता था। अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा वे अवश्य देते थे, लेकिन स्वयं नहीं चलाते थे, |

क्योंकि क्षत्रिय उनकी रक्षा करते थे और उन्हें स्वयं अस्त्र-शस्त्र चलाने की आवश्यकता नहीं हुआ करती थी। लेकिन परशुराम का युग आने तक बहुत से क्षत्रिय स्वच्छंद हो गये थे। वे मर्यादाओं का पालन नहीं करते थे और ब्राह्मणों का अपमान तक कर देते थे।

उस समय कार्तवीर्य अर्जुन, जिसे सहस्त्र बाहू भी कहा जाता है, का अत्याचार बहुत बढ़ गया था। अपने दम्भ में आकर एक दिन उसने परशुराम के पिता जमदग्नि की हत्या उनके ही आश्रम में कर डाली। उस समय परशुराम बाहर गये थे।

जब वे लौटे तो उन्हें कार्तवीर्य अर्जुन की करतूतों का पता चला। तब से उनको केवल उसी से नहीं बल्कि पूरे क्षत्रिय वर्ग से घृणा हो गयी। तब परशुराम ने शस्त्र धारण करने का निश्चय किया और अत्याचारी क्षत्रियों के भार से पृथ्वी को मुक्त करने का संकल्प किया।

वे अपने इस संकल्प में सफल रहे। उन्होंने न केवल कार्तवीर्य अर्जुन का सपरिवार संहार किया, बल्कि उसके सहायक अन्य क्षत्रियों को भी दण्ड दिया। उनका संघर्ष अयोध्या में शासन करने वाले इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रियों से नहीं हुआ, क्योंकि वे अत्याचार नहीं करते थे।

उन्होंने ब्राह्मण युवकों को शस्त्र धारण करने की प्रेरणा दी और केवल ब्राह्मणों तथा चरित्रवान क्षत्रियों को ही अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दिया करते थे।

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4 replies

  1. Till the date, I did not understand the exact role of Parasuram. I know the story. Ok.Many Avatars have clear vision but not the Parasuram.

    Liked by 1 person

    • you are absolutely correct..
      Bhawan Parshuram are there in Ramayana and Mahabharata both..
      I was also confused, But they have the power to be present any where when situation warranted…
      Just enjoying the story and trying to extract the knowledge.
      Stay connected and stay happy….

      Like

  2. Very timely article. Parshuram Jayanti coincides with Akshaya Tritya which falls on May 14 this year. Parshuram is said to be immortal and it is mentioned in the Puranas that Parshuram is still meditating on the Mount Mandranchal

    Liked by 1 person

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