# इंसानियत जिंदा है #

आज सुबह मैं फेसबुक देख रहा था तो एक पोस्ट पर मेरी नज़र रुक गई | यह पोस्ट मेरे फेसबुक दोस्त अनिल जी ने भेजा था |

मैं उस पोस्ट को बार बार पढ़ा,   मुझे अपने आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था |

मैं उसे पढ़ कर इतना प्रभावित हुआ कि उसे अपने ब्लॉग में लिखने से अपने को रोक नहीं सका .. हाँ, यह सच है दोस्तों  कि  इंसानियत जिंदा है |

मैं किस्से कहानियों में पढ़ा करता था कि लोग दूसरों के लिए अपने जीवन का बलिदान किया करते थे, लेकिन वह कहानियाँ हुआ करते थे |

मैं फिल्मो में देखा करता था  कि हीरो दूसरों की जान बचाने  के लिए खुद का बलिदान दे देता था |  उस दृश्य को देख कर हमारे आँखों में आँसू आ जाते थे और सिनेमा हॉल में तालियाँ बजती थी |

मैंने यह भी देखा है कि अपने पति की जान बचाने  की खातिर उनकी पत्नी अपने एक किडनी डोनेट कर देती है |  यह भी बहुत सराहनीये सोच है, जिसमे लोग अपने परिवार की खातिर कुर्बानी देने को तैयार रहते है |

लेकिन अभी जिस घटना के बारे में  मैं जिक्र करने जा रहा हूँ वह उपरोक्त घटनाओं से भिन्न है |

एक बुजुर्ग जिनका नाम नारायण भाऊराव   था  और यह घटना नागपुर की है | उन्होंने किसी अनजान व्यक्ति की जान बचाने  के लिए अपनी जान गवां दी |

उन्होंने कहा था…. मैंने अपनी ज़िन्दगी जी ली है | मेरी उम्र अब ८५ साल की है | इस महिला का पति युवा है और उस पर अपने परिवार की जिम्मेदारी है | इसलिए  मेरा बेड उसे दे दिया जाए |

यह सच है,  नागपुर के वे  बुजुर्ग नारायण भाऊ राव यह आग्रह कर  अस्पताल से घर लौट आये |

उन्हें पता था कि इस स्थिति में यहाँ से घर जाते ही उनकी मौत हो जानी है  | फिर भी वे सोच रहे थे कि उनके बेड दे देने से उस युवक को  जीवन दान मिल सकती है | 

दरअसल वे बुजुर्ग कुछ दिन पहले ही कोरोना से संक्रमित हुए थे | उनका ऑक्सीजन का स्तर  60 तक पहुँच गया था | उन्हें  सांस लेने में काफी परेशानी हो रही थी |

उनकी यह हालत उनकी अपनी बेटी  से देखी नहीं गयी |  इसे देखते हुए उनके दामाद और बेटी ने हॉस्पिटल में  भर्ती कराने हेतु बहुत मसक्कत की तो किसी तरह उन्हें इंदिरा गाँधी  अस्पताल में एक बेड उपलब्ध हुआ |

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हालाँकि उस बुजुर्ग की इलाज़ की प्रक्रिया अभी चल ही रही थी, कि  उसी वक़्त एक महिला अपने ४० साल के पति को अस्पताल में ले कर आयी | उनकी हालत बहुत नाज़ुक बनी हुई थी और तुरंत ट्रीटमेंट की ज़रुरत थी |

लेकिन अस्पताल वाले  उन्हें भर्ती  करने से मना कर दिया क्योंकि उनके पास कोई बेड खाली नहीं था | ऐसे में वह महिला फफक फफक कर रोने लगी | ऐसा मार्मिक दृश्य उस बुजुर्ग से देखा ना गया  और उन्होंने अपना बेड उस युवक को देने का आग्रह  कर दिया | उनकी बातों को सुन कर वहाँ खड़े डॉ और अन्य  लोग  आश्चर्यचकित  हो गए |

लेकिन उनके आग्रह को देख कर अस्पताल प्रशासन ने उन से  एक कागज़ पर लिखवाया …मैं अपना बेड दुसरे मरीज़ के लिए स्वेच्छा से खाली  कर रहा हूँ | श्री नारायण भाऊ राव के स्वीकृति पत्र भरा और अपने घर लौट गए |

अपनी साँसों के लिए संघर्ष करते हुए तीन दिनों के बाद अंततः उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया |

उपरोक्त घटना ने साबित कर दिया है कि  हमारे आस पास इतने उथल पुथल के बावजूद भी कुछ लोग हैं जिनके अन्दर  करुणा और मानवता अभी भी जिंदा है  …और ऐसे लोगों के बदौलत ही यह दुनिया आज भी कायम है |

यह सच है की आज बहुत सारी परेशानियों से हम जूझ रहे है लेकिन अंतत विजय हमारी होगी… मानवता की होगी…. मन में है विश्वास |  

वक़्त वक़्त की बात हेतु नीचे link पर click करे..

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Categories: आज मैंने पढ़ा

7 replies

  1. He has inspired by setting an example. Jio and dusareko jino do. Nice.

    Liked by 1 person

  2. Reblogged this on Retiredकलम and commented:

    No poison can kill a positive thinker, and
    no medicine can save a negative thinker…

    Like

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