खुशियों के आँसू ..

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राजेश अपने ऑफिस में बैठा  बचपन के दोस्त रतन के साथ चाय पी रहा था और गप्पे मार रहा था | आज करीब एक वर्ष के बाद दोनों का मिलना हो रहा था |

वैसे तो बचपन से दोनों साथ पढाई की थी और पूरा बचपन साथ ही बीता था |

राजेश के माता पिता तो बचपन में ही दुनिया छोड़ गए थे | लेकिन रतन के माता पिता राजेश को भी अपने बेटे की तरह समझते थे |

बड़ा होने पर दोनों के रास्ते अलग अलग हो गए | जहाँ राजेश एक बड़ा बिल्डर बन गया तो दूसरी तरफ रतन ने अपनी स्टील की  फैक्ट्री खोल ली थी |

दोनों अपने कामों में इतना मशगुल रहते है कि आज एक  वर्षो के बाद मिलना हो रहा था  | हालाँकि अब दोनों अलग अलग शहरों में रहते है |

रतन आज भी यहाँ आया तो था अपने काम के सिलसिले में ही | उसने बातों बातों में राजेश को बताया कि  तुम्हारे शहर में ही एक ऑफिस खोलने का विचार है |

कल ही पेपर में छपे एक इश्तेहार में  कैरोटा नामक जगह में एक मकान के नीलामी का समाचार छपा था | किसी ने बताया था कि वह जगह बहुत अच्छी है और ऑफिस खोलने के लिए उपयुक्त भी |

इतना बोलते हुए उसने पपेर में छपी  विज्ञापन को राजेश को दिखलाते हुए कहा …तुम तो  खुद भी एक बिल्डर हो इसलिए तुमसे अच्छी राय और कौन दे सकता है |

राजेश की नज़र जैसे ही उस पेपर पर पड़ी तो वह चौक गया | उस पेपर में छपे फोटो को देख कर  पहचान गया | यह तो वही बाबूजी है |

अचानक उसके दिमाग में बचपन की यादें ताज़ा हो गयी / पांच साल का राजू मंदिर के सीढियों पर बैठा भीख मांग रहा था |

चेहरे से मासूमियत झलक रही थी और ठण्ड के कारण ठिठुर भी रहा था | लेकिन पेट की आग को शांत करने के लिए तो भीख माँगना ही पड़ेगा |

उसी समय  सेठ  ताराचंद जी अपनी पत्नी को साथ लिए मंदिर की सीढियों पर चढ़ रहे थे ताकि बनारस के विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ के दर्शन कर सके |

अचानक उनकी पत्नी की नज़र भोले भाले राजू पर पड़ी |  ठण्ड से ठिठुरता मासूम  को देख कर उनको दया आ गयी | उनका भी बेटा इसी के उम्र का है, और इसी के जैसा मासूम भी |

राजू के पास आकर सेठानी ठिठक गई और प्यार से पूछा …तुम्हारा क्या नाम है और तुम यहाँ भीख क्यों मांग रहे हो ? तुम तो किसी अच्छे घर के लगते हो |

प्रश्नों की  बौछार को सुनकर वह नन्हा सा बालक थोड़ी देर के लिए तो घबरा ही गया |

फिर थोडा रूक कर कहा…मेरे माता पिता अब इस दुनिया में नहीं है | वे छः माह पहले गंगास्नान के दिन गंगा नदी में डूब कर मर गए |

घर पर मेरे चाचा मुझे बहुत पिटते थे इसलिए घर से भाग कर यही मंदिर में रहता हूँ | मुझे बहुत भूख लगी है कुछ पैसे दे दो  ना |

उसकी बातों को सुनकर सेठानी को दया आ गई और उसने अपने पर्स से कुछ पैसे निकाल कर देने लगी, तभी सेठ जी ने मना  करते हुए कहा ….हो सकता है यह बच्चा झूठ बोल रहा हो |

ऐसे बच्चे लोग चोरी – चमारी करते है और पैसा मिलने पर ड्रग्स और नशा का सेवन करते है | इन सब बच्चो के पीछे पूरा गैंग होता है |

लेकिन सेठानी को राजू के मासूमियत पर दया आ रही थी | उन्होंने अपने गले से लॉकेट उतार कर राजू को पहनाते हुए कहा …तुम इसे हमेशा अपने साथ रखना | यह तुम्हे हर मुसीबतों से बचाएगा |

सेठ जी को भी बच्चे पर दया आ गयी और सेठानी के कहने पर उन्होंने बच्चे को किसी अनाथालय  में भर्ती  कराने का फैसला किया |

वे भगवान् भोलेनाथ के पूजा अर्चना के बाद बच्चे को लेकर वहाँ से कुछ दूर स्थित एक अनाथालय में पहुँचे | इस अनाथालय से उनका पुराना रिश्ता था |

वे जब भी  बनारस आते तो यहाँ आकर कुछ ना कुछ डोनेशन देकर जाते थे |

जैसे ही वहाँ के संचालक की नज़र सेठ जी पर पड़ी, वे उनके स्वागत में उनके पास आये और आदर के साथ उन्हें अपने ऑफिस में ले गए |

सेठ जी ने कहा …मैं आप को एक जिम्मेवारी सौपना चाहता हूँ | मैं तो यहाँ कभी कभी ही आता हूँ क्योकि हमारा ठिकाना  यहाँ से बहुत दूर जो है |

आप इसकी पूरी परवरिश अपने बच्चे जैसा  करें और इसे पढने  लिखने की पूरा व्यवस्था करें |

मैं बीच बीच में कुछ पैसे भेज दिया करूंगा | इस मासूम बच्चे की ज़िन्दगी सवंर जाए  तो समझूंगा कि मेरी चारो धाम की  तीर्थ यात्रा पूरी हुई |

राजू के गले में लॉकेट पड़ते  ही सचमुच कमाल हो गया था | धीरे धीरे कर के उसकी सारी परेशानियां ख़त्म हो रही थी |

तभी रतन की आवाज़ कानों में पड़ी तो उसकी तन्द्रा भंग हुई और उसने रतन की ओर देखा |

रतन बोला.. अरे, कहाँ खो गए मेरे यार | मैं कितनी देर से उस मकान के बारे में तुम्हारे सलाह की प्रतीक्षा कर रहा हूँ |

अचानक राजेश की आँखों में आँसू आ गए  | उसने अपनी आँखों पर रुमाल रखते हुए रतन से कहा …अब तुम यह मकान नहीं ले सकते मेरे भाई |

यह मकान उसी सेठ की है जिनके बारे में अक्सर तुमसे जिक्र किया करता था | मैं तो उनकी कितनी तलाश करता रहा , लेकिन आज तुम्हारे कारण मेरी खोज पूरी हुई |

क्या कह रहे हो तुम ?  यही वो सेठ है जिन्होंने तुम्हारी पढाई लिखाई और रहने का पूरा खर्चा उठाया था ?

हाँ भाई हाँ …, ये लोग मेरे माता पिता तुल्य है ….रतन  की ओर देखते हुए राजेश ने  कहा |

लेकिन ऐसी क्या बात हो गयी कि उनका यह मकान नीलाम हो रहा है, मुझे पता लगाना होगा |

खैर जो भी हो, कल ही नीलामी का दिन तय है | हमलोग को वहाँ  समय पर पहुँच जाना होगा …राजेश ने कहा |

सच्चाई तो यही  है कि यह संसार प्रकृति के नियमों के अधीन है और परिवर्तन एक अटल सत्य है |

एक समय था कि सेठ जी लोगों को खुले दिल से सहायता किया करते थे क्योंकि उनके पास सामर्थ था |

लेकिन वक़्त ने करवट क्या बदली कि आज उनका मकान  ही नीलम नहीं हो रहा है बल्कि जीवन भर की कमाई  इज्जत और प्रतिष्ठा सब कुछ नीलामी हो रहा है |

एक दिन माँ जी अपने बेटे के साथ मंदिर जा रही थी  तभी उनके कार का एक्सीडेंट हो गया |

बाबूजी उन दोनों के इलाज़ में अपनी सारी जमा पूंजी खर्च कर दिए, परन्तु उन दोनों को बचा नहीं पाए | इलाज के खर्चे के लिए मकान भी गिरवी रखना पड़ा |

और अब हालात ऐसे हो गए कि कल ही मकान की नीलामी होने वाली है | मकान छुड़ाना तो दूर की बात हो गयी, खाने के भी लाले पड़ गए है |

सुबह सुबह राजेश तैयार हुआ और सबसे पहले अपने घर में बने मंदिर में जाकर माथा टेका |

हाथ जोड़ कर भगवान् से बोला….हे भगवन, आज मैं इस काबिल हो गया हूँ कि अपने पिता तुल्य सेठ जी का मुसीबत के समय उनका सहारा बन सकूँ | मुझे इतनी शक्ति देना प्रभु

और उसके बाद वह अपने दोस्त रतन के साथ घर से रवाना हो गया | करोंटा यहाँ से कुछ ही दूर था ..इसलिए शीघ्र ही वे दोनों वहाँ पहुँच गए |

नीलामी के स्थल पर पहुँचा तो देखा ….सारी  तैयारियां हो चुकी है | कुर्सी टेबल सजी हुई है और सभी सम्बंधित लोग पहुँचे हुए है |

तभी एक किनारे बैठे सेठ जी की ओर राजेश की नज़र गयी | पहले तो उन्हें वह पहचान ही नहीं पाया ..बिलकुल  बुड्ढे हो चुके थे और  शरीर से भी काफी दुर्बल लग रहे थे |

सचमुच बुढ़ापा बहुत दुखदाई होता है | खास कर जब उसका सब कुछ लुट चूका हो |

जवान बेटा को खोया और साथ ही साथ बुढ़ापे का सहारा  पत्नी भी भगवान् को प्यारी हो गई |

तभी नीलामी की कार्यवाही शुरू हो गई और बोली 25 लाख से शुरू हुई | अंत में राजेश ने सबसे ज्यादा बोली ५० लाख की लगा कर नीलामी अपने नाम कर लिया |

इस पर रतन ने  टोका और राजेश को रोकते हुए कहा …इतना ज्यादा बोली लगाने की क्या ज़रुरत है ? इतने पैसों में इससे अच्छी मकान  इस इलाके में मिल जायेगा |

नहीं मेरे दोस्त / इस मकान को दूसरा कोई भी नहीं ले सकता है क्योकि इस घर से  मेरे बाबु जी की यादें जुडी हुई है | मेरी माँ जी की रूह  बसती है |

अगर इससे भी ज्यादा रूपये देने की ज़रुरत पड़ती तो भी मैं पीछे नहीं हटता |

आज मैं जो कुछ भी हूँ , जितना भी धन दौलत है,  सब बाबूजी की बदौलत है |

वर्ना मैं तो एक भिखारी ही था जो मंदिर की सीढियों पर बैठ कर भीख माँगा करता था |

इन्होने ही मुझे नयी ज़िन्दगी दी है और इतना कह कर वह अपने कुर्सी से उठा और सीधे बाबूजी के पास पहुँचा |

उनके  पैर छू कर प्रणाम किया और बोला …बाबू जी उठिए ..अपने घर चलें |.

सेठ जी अपने बूढी आँखों से लगी चश्मा साफ़ करते हुए कहा … तुम कौन हो नौजवान और किस घर की बात कर रहे हो ?… अपना घर तो आज नीलाम हो गया |

कल से हमारा ठिकाना मंदिर  होगा जहाँ लोगों से भीख मांगकर अपना पेट पालना होगा |

इतना सुनते ही राजेश की आँखों में आंसूं आ गए | उसने बाबु जी के पैर पकड़ का कहा …आपका ठिकाना मंदिर नहीं होगा बाबु जी,..

. क्योकि आज से पच्चीस साल पहले एक मंदिर से भीख मांगते बच्चे को वहाँ से निकाल कर सहारा दिया था ,,,उसे एक नयी ज़िन्दगी दी थी |

आज वही लड़का अब आपको सहारा देगा और एक नयी ज़िन्दगी देगा |

उसने अपने गले से लॉकेट निकाल कर बाबू जी के गले में पहना दिया |

बाबूजी लॉकेट देख कर तुरंत पहचान गए और राजेश से लिपट कर बोले  …राजू , तू कहाँ था इतने दिन |

आज यहाँ आकर इस बूढ़े को तूने नयी ज़िन्दगी दे दी |

वो राजेश को एक टक  देखे जा रहे थे …उनके आँखों से झर झर आँसू बह रहे थे …खुशियों के आँसू. |

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6 thoughts on “खुशियों के आँसू ..

  1. आओ ले चलें इश्क को वहाँ तकजहाँ फिर से कोई कहानी बने जहाँ फिर कोई गालिब नज्म़ पढे फिर कोई मीरा दिवानी बने !!

    Liked by 1 person

    1. वाह बहुत खूब प्यारे /
      फिर से कोई कहानी बने …ये तो ठीक है …लेकिन मेरी कहानी भी पढ़े …//
      बहुत बहुर धन्यवाद डिअर…

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