तांगेवाले से मसाला किंग तक का सफ़र

अपने परिश्रम और लगन से सफलता के नए मापदंड स्थापित करने वाले मसालों के मशहूर  कारोबारी, और पद्मभूषण से सम्मानित श्री धर्मपाल गुलाटी जी का  निधन ९८ साल की उम्र में दिनांक  3 दिसम्बर २०२० को हो गया।

उनकी ज़िन्दगी की कहानी बेहद दिलचस्प है  | एक ज़माने में तांगा चला कर अपने परिवार का भरण पोषण करने से लेकर मसाला किंग के नाम से मशहूर उनका जीवन सफ़र संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक है |

यही कारण है कि आज उनके निधन पर हम सब शोकाकुल हो कर उन्हें सच्ची श्रधान्ज़ली अर्पित कर रहे है |

कहते है कि समय बड़ा बलवान होता है, क्योकि जब वक़्त का पहिया  घूमता है तो राजा  को रंक और रंक को राजा  बनते देर नहीं लगती |

 ऐसी ही जीवन का सफ़र एक तांगा चलाने वाले की है  | वक़्त ने जब करवट  ली तो देखते ही देखते वो तांगा वाला मुकद्दर का सिकंदर बन गया  और उनकी ज़िन्दगी की कहानी हम सबों  के लिए प्रेरणाश्रोत और एक मिसाल बन  गया है |

भारत के विभाजन के पहले उनके पिता जी की मसालों की अच्छी कारोबार  सियाल कोट में थी, लेकिन भारत विभाजन के बाद उनका परिवार वहाँ से भाग कर अमृतसर में रिफुस्ज़ी कैंप में शरण लिया और कुछ दिनों के बाद फिर काम काज के चक्कर में दिल्ली के चांदनी चौक में अपना आशियाना बनाया |

 बीच में ही छोड़ी स्कूल

महाशय धर्मपाल गुलाटी (Dharampal Gulati) का जन्म 27 मार्च 1923 में पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था। 1933 में 5 वी कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने पढाई छोड़ दी क्योकि उन्हें पढाई में दिल कम और पतंगबाजी और कबूतर बाजी में ज्यादा लगता था | इसके अलावा उन्हें  पहलवानी का भी शौक था |

लेकिन  वे बचपन से ही बड़ा आदमी बनने का ख्वाब देखा करते थे क्योकि बचपन में अपने पिता से बड़े लोगों के जीवन यात्रा की कहानियाँ सुना करते  थे |

 पढाई में मन ना लगता देख पिता जी ने लकड़ी के दुकान में  नौकरी लगवा दी | इसके अलावा उन्होंने साबुन का कारोबार भी किया और दूसरी  नौकरी भी की, और  इस दौरान कपड़े, चावल आदि का भी कारोबार किया लेकिन कोई कारोबार नहीं चल सका |

इसी बीच  18 वर्ष की आयु में उनका विवाह लीलावती से हो गया | अब उनकी  जिम्मेवारी बढ़ गई तो फिर अंत में उन्होने अपने पारिवारिक मसालों का कारोबार में ही लग गए और फिर उसी में रम गए |

पाकिस्तान से शुरू हुआ कारोबार

महाशियां दी हट्टी (एमडीएच) देश में मसालों का बड़ा ब्रांड है। वह मसालों के मैन्युफैक्चर, डिस्ट्रिब्यूटर और एक्सपोर्टर हैं।

जैसा कि सभी जानते है कि एमडीएच ब्रांड  की स्थापना साल 1919 में सियालकोट (पाकिस्तान) में उनके पिता महाशय चुन्नी लाल ने की थी। लेकिन भारत के बंटवारा के बाद अपनी ज़मीन और  धंधे को छोड़ कर सियाल कोट से भाग कर परिवार के साथ  अमृतसर के रिफुज़ी कैंप में शरण  ली |

उसके बाद धर्मपाल गुलाटी ने  काम धंधे  की तलाश में दिल्ली आ गए |  उस समय उनके पॉकेट में सिर्फ १५०० रूपये थे |

विभाजन के बाद आए भारत- 1500 रुपये थे जेब में, चलाते थे टांगा


उनकी ज़िन्दगी के सफ़र की कहानी काफी संघर्षपूर्ण है | जब देश का बंटवारा किया गया तो वह सियाल कोट से  भारत चले  आये और 27 सितम्बर 1947 को वह दिल्ली पहुँचे। उन दिनों उनके जेब में महज 1500 रुपये ही थे।

इन पैसों से उन्होंने 650 रुपये का टांगा खरीद लिया। जिसे वह न्यू दिल्ली स्टेशन से लेकर कुतब रोड और उसके आस पास के इलाकों में चलाते थे | लेकिन  मन में पारिवारिक व्यवसाय (मसाला) को प्रारंभ करने का जूनून ख़त्म नहीं हुआ था। 

अपने पिता के कारोबार को आगे बढ़ाने के बारे में सोचते रहे । और एक दिन व्यवसाय को प्रारम्भ करने के लिए छोटे लकड़ी के एक खोके ख़रीद कर उन्होंने इस व्यवसाय को प्रारम्भ किया।

करोल बाग में ली दुकान

उन्होंने बाद में करोल बाग के अजमल खां रोड पर ‘महाशियां दी हट्टी ऑफ सियालकोट (डेगी मिर्च वाले)’ के नाम से दुकान खोल ली।  आज जो मसालों  का जो साम्राज्य स्थापित हुआ है वह इसी छोटी सी दूकान से ही शुरू की गई  थी |  

इसके बाद उन्हें कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा । आज महाशियां दी हट्टी (एमडीएच) देश में मसालों का बड़ा ब्रांड है। वह मसालों के मैन्युफैक्चर, डिस्ट्रिब्यूटर और एक्सपोर्टर हैं।

आज के दिनों में उनके मसाले १०० से अधिक देशों में एक्सपोर्ट किया जाता है | और उनके व्यवसाय का  सालाना टर्न ओवर 2000 करोड़ रूपये से अधिक का है  जो अपने आप में एक मिसाल है |

वे खुद तो पांचवी तक ही पढाई की, लेकिन उनके नेतृत्व में  काफी पढ़े लिखे लोग काम करते थे | उनका मानना  था कि किसी भी व्यावसायिक सफलता के लिए गुडविल.,  इमानदारी और मेहनत  का होना अतिअवाश्यक है |

पद्मभूषण से हो चुके हैं सम्मानित

कारोबार के अलावा इन्होने चैरिटी के काम भी बहुत सारे करते थे | उन्होंने “महाशय चुन्नी लाल चैरिटेबल ट्रस्ट”  खोल रखा है जिसके तहत गरीबों के बच्चो के लिए स्कूल  और हॉस्पिटल भी खोल रखी थी |

फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिटके तहत  मसाला उद्योग को नयी उचाईयों पर ले जाने के लिए और समाज में विभिन्न  धरमार्थ कार्यो में योगदान देने के लिए  उन्हें राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद  ने पिछले साल पद्मभूषण से सम्मानित किया था।

जब तक वे जिंदा रहे समाज की भलाई के लिए काम करते रहे | आज वो हमारे बीच  नहीं है पर उनके सुझाए रास्ते और उनके उसूल  हमारे सामने है जो हमारी युवा पीढ़ी को आगे भी मार्ग दर्शन करती रहेगी |

हम सबों की प्रार्थना है कि ईश्वर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें व परिवार को दुख सहने की शक्ति प्रदान करें।

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Published by vermavkv

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13 thoughts on “तांगेवाले से मसाला किंग तक का सफ़र

  1. Dhararmpal Gulati is an example of inspiration. His contribution to the society
    is a lot for which Government of India has given Padmabhusan award .My homages to the departed soul.

    Liked by 1 person

  2. Real karmyogi and self made masala king without any proper education. His success was due to his passion and hard work to achieve something big in life despite his lack of education and difficult circumstances in which he was brought up.

    Liked by 1 person

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