तुम्हारा इंतज़ार है …2

आज सुबह जब अनामिका  सो कर उठी तो उसका मन यह सोच कर खुश हो रहा था  कि आज तो मामा के यहाँ पटना जाना है और वहाँ एक साल के अंतराल के बाद राजीव को  देख पाऊँगी |

कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब उसे मैं याद नहीं करती | पता नहीं यह क्या हो गाया है मुझे …. अनामिका  नास्ता करते हुए सोच रही थी |

कहीं मैंने  किताबों में पढ़ा था कि इंसान अपना  पहला प्यार भुलाये नहीं भूलता | ऐसा ही कुछ मेरा भी हाल हो गया है….वह नास्ता तो कर रही थी लेकिन उसका  ध्यान कही और था, जिसे माँ को भी महसूस हो रहा था और उसने टोकते हुए कहा ….तुम्हारा ध्यान कहाँ है बेटी |

तुम हमेशा खोई खोई क्यों रहती हो ?

अनामिका ने माँ के बात को टालते हुए कहा …कुछ भी नहीं माँ | मैं बिलकुल ठीक हूँ |

वह नास्ता कर ही रही थी कि पिता जी कि आवाज़ आयी |  ट्रेन का समय हो रहा है और स्टेशन पर गाड़ी सिर्फ पांच मिनट ठहरती है , इसलिए जल्दी तैयार हो जाओ ताकि समय पर स्टेशन पहुँच सके |

जी पिजा जी …, अनामिका जल्दी से नास्ता समाप्त कर पानी पीते हुए कहा |

ट्रेन सही समय पर थी और करीब एक बजे दिन में वे लोग पटना पहुँच गए  |

राजेश्वर सिंह को दरअसल खेती से फुर्सत नहीं था अतः वे अनामिका को यहाँ छोड़ कर तुरंत ही लौटती गाड़ी  से वापस चले आये |

अनामिका  यहाँ आकर बहुत खुश लग रही थी और उसकी नज़रे पडोस  के मकान में राजीव को ढूंढ  रही थी | लेकिन वह कही दिख नहीं रहा था |

जब अनामिका  लंच कर रही थी तो वह  सब से नज़रे बचा कर अपनी ममेरी बहन रश्मि  से पूछ ही  लिया ….राजीव कही नहीं दिख रहा है ?

वो तो आज कल होस्टल में रहते है | उनका  इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया है … रश्मि ने बताया |

इतना सुनना था कि अनामिका  का मन उसे एक नज़र देखने को बेचैन हो उठा |

रश्मि को पहले से ही पता था कि अनामिका के दिल में क्या चल रहा है | इसलिए उसके बेचैन मन को तसल्ली देने के लिए वह बोली …कल हमारे घर पूजा है और उसके परिवार वाले सभी आयेंगे |  शायद राजीव भैया भी कॉलेज से छुट्टी लेकर आयेंगे |

इतना सुनकर अनामिका के मन में  थोड़ी तसल्ली हुई और कल के दिन का बेसब्री से इंतज़ार करने लगी |

लगभग एक साल से अनामिका का यह एक तरफ़ा प्यार चल रहा था और एक साल के बाद आज मिलने का मौका भी मिल रहा था |

उसने तो मन ही मन सोच लिया था कि इस बार हिम्मत जुटा  कर उससे  कह दूंगी कि मैं तुमसे  प्यार करती हूँ और उम्र भर तुम्हारे  साथ रहना चाहती हूँ |

घर पर सत्यनारायण भगवान् की कथा चल रही थी | घर के सभी लोग पूजा में व्यस्त थे और अनामिका के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उसने राजीव को यहाँ  घर की तरफ  आते देखा |

राजीव उसको देख कर मुस्कुराया भी और आकर पूजा में सबों के साथ बैठ गया |

 सब लोग का ध्यान पूजा में था लेकिन अनामिका  बार बार राजीव को ही देखे जा रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि किसी ना किसी को तो इसकी पहल करनी ही पड़ेगी |

पूजा समाप्त होते ही वो राजीव को अकेला पाकर प्रसाद देने के बहाने उसके पास पहुँच गई |

राजीव को प्रसाद  दिया और खुद भी उसी  के पास बैठ कर प्रसाद खाने लगी |

बातों बातों में हिम्मत करके अनामिका ने अपने मन की बात कह दी …राजीव , मैं तुमसे प्यार करती हूँ  क्या तुम भी ….??

राजीव ने  पूरी बात सुनने से पहले ही कहा…तुम पागल हो क्या ? मैं तुमसे प्यार कैसे कर सकता हूँ …तुम कहाँ और मैं कहाँ |  ..तुम एक गाँव में पढने वाली लड़की और बहुत पढ़ोगी तो दसवीं कक्षा तक ही | तुम्हारे गाँव में तो कॉलेज भी नहीं है |

अपने आप को  इस काबिल  मत समझो तुम  | मुझे ज़िन्दगी में बहुत आगे जाना है | इन सब चक्करों में पड़ कर अपनी ज़िन्दगी ख़राब नहीं करनी मुझे |

तुमसे हंस कर दो बातें  क्या कर ली,  तुम तो इसे प्यार समझ बैठी | मैं जैसे तुमसे बात करता हूँ वैसे ही सब से करता हूँ |

अनामिका को जैसे लगा उसके चेहरे पर किसी ने तेजाब फेक दिया हो ……जिसमे उसका चेहरा ही नहीं झुलसा बल्कि सारे अरमान भी झुलस गए है |

उसे समझ में आ गया कि इन्जिनीरिंग कॉलेज में पढने  के बाद राजीव का इरादा बदल गया है |

 वहाँ इसकी पसंद की बहुत सारी ज्यादा पढ़ी लिखी लड़कियां मिल जाएँगी जिसे वह जीवन साथी बनाने की सोच सकता है |

राजीव के इनकार भरी बातें  सुनने के बाद उससे और आगे बात करने की उसकी हिम्मत नहीं हुई |

रात जागते हुए कैसे बीत गई उसे पता नहीं चला |

अगली सुबह अनामिका  उठी तो लगा एक साल पहले से जो सपना देख रही थी वो एक दम से अचानक टूट गई और अनामिका भी बिखर गयी थी उन टूटे हुए सपनो के साथ | भींगा हुआ तकिया भी इसकी पुष्टि कर रही थी |

अब तक तो जिस चीज़ पर वो  हाथ रख देती थी,   माँ – बाप पलक झपकते ही उसे लाकर देते थे लेकिन यह तो प्यार का सौदा था ,एक जिद का सौदा था ..जिसे खुद ही तय करना होगा |

मामा जी आज ही अनामिका को वापस गाँव छोड़ने जा रहे थे | अनामिका उनके साथ गाँव जा तो रही थी  लेकिन एक संकल्प के साथ ,… वह मन ही मन एक संकल्प ले चुकी थी  …यही राजीव एक दिन चल कर उसके पास आएगा और मेरा हाथ मुझसे ही मांगेगा….

ट्रेन अपनी तेज़ गति से गंतव्य स्थान की ओर बढ़ रही थी और अनामिका  आँखे बंद किये अपने संकल्प को बार बार याद कर रही थी |

अनामिका अपने घर जैसे ही पहुँची ,पिताजी उसके पास आये और सिर पर हाथ रखते हुए बोले …तुम्हारा स्कूल का रिजल्ट कल ही निकला है और तुम क्लास में सबसे ज्यादा अंक लाई  हो |

मास्टर साहब तुम्हारी खूब तारीफ कर रहे थे | तुमने तो घर का मान प्रतिष्ठा बढ़ा दिया है बेटी | तुमने बेटी होकर भी लड़कों से ज्यादा अंक प्राप्त किया है |

अनामिका पिता जी के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लिया और कहा …पिता जी आप से एक अनुरोध करना चाहती  हूँ .|

हाँ – हाँ, बोलो बेटी .., क्या कहना चाहती हो ?…राजेश्वर सिंह उसकी ओर देखते हुआ कहा |

पिता जी मैं आगे भी पढाई जारी रखना चाहती हूँ | अपने गाँव में तो कॉलेज नही है इसलिए मुझे पटना के किसी कॉलेज में दाखिला दिलवा दीजिये ….अनामिका अपना  सिर झुकाए पिता जी से अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रही थी |

लेकिन तुम्हे आगे पढाई करने की ज़रुरत क्या है बेटी , कौन सा तुम्हे नौकरी करनी है | घर गृहस्थी का काम सिख लो,  यही तुम्हारे काम आयेंगे ……पिता जी ने उसे समझाते हुए कहा |

नहीं पिता जी,  मुझे आगे पढने की इच्छा है और आप से सहयोग चाहती हूँ …अनामिका विनती भरे लहजे में कहा |

मैंने आज तक तेरी हर इच्छा पूरी की है |  वैसे हमारे पास धन दौलत की कोई कमी नहीं है |

तू तो अपना शादी करके घर बसा ले | तुम्हारे सिवा तो मेरा और कोई नहीं है | तुम्हारी ख़ुशी में ही हमारी ख़ुशी है |

इसीलिए तो कहती हूँ पिताजी, कि मेरी ख़ुशी के लिए मान जाइये ….अनामिका पिता की ओर दयनीय दृष्टी से देखते हुए कहा |

पिता जी बड़ी असमंजस में पड़  गए, और मन ही मन  बोलने लगे …मेरे गाँव की कोई लड़की कॉलेज नहीं गई  और इसीलिए तो यहाँ आज तक कॉलेज नहीं खुला है | शहर पढाई के लिए अकेला कैसे जाने दूँ |

उनकी मनःस्थिति को देख कर अनामिका के मामा  ने कहा …अनामिका चाहे तो मेरे घर पर रह कर कॉलेज की पढाई कर सकती है और वहाँ मन लगाने के लिए इसकी बहन रश्मि भी है | आप निश्चिन्त होकर पटना में दाखिला दिलवा दीजिये |

उनकी बात सुनकर राजेश्वर सिंह अंत में अनामिका की बात मान गए और पटना भेजने के लिए राज़ी हो गए |

पिता जी की सहमती देते ही अनामिका के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | अब उसको लग रहा था  कि  जो संकल्प  उसने लिया है उसे पूरा करने के लिए सही दिशा में कदम बढ़ा चुकी है .. /…(क्रमशः)   

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