तलाश अपने सपनों की …15

अँधेरा क्या छाता है

परछाइयां भी दगा दे जाती है

टूटता है विश्वास तो

चनक सी सीने में होती है

यूँ तो पोछ लेते हैं आँसुओं को

पर, वह ज़ख्म तो सदा हरी होती है …

जब राधिका के बहुत कोशिश के बाबजूद  भी माँ अपने घर छोड़ने को राज़ी नहीं हुई तो अंत में हार कर राधिका ने कहा …आप सब लोगों की परेशानियों की जड़  मैं ही हूँ , इसलिए मुझे ही पिता जी के पास लौट जाना चाहिए |

इतना सुनना था कि माँ ने राधिका की तरफ गुस्से से देखा और कहा …तुम्हारी इस तरह की बातें हमलोग को कमज़ोर बना देती है |

एक बात कान खोल कर सुन लो, मरना तो एक दिन सबको है | लेकिन जितना दिन भी जिएं, सिर उठा कर अपनी मर्ज़ी और ख़ुशी से जिएं, वर्ना जिंदा तो जानवर भी रहतें है |

मैं तो तुम्हारे साथ इसलिए जाना  नहीं चाहती थी कि मेरे कारण तुम मुसीबत में ना पड़ जाओ ….माँ ने भावुक हो कर कहा |

इस पर सोफ़िया ने कहा ….नहीं माँ,  हमलोग अपने वकील से बात कर कानून के तहत अपनी सुरक्षा के उपाय करेंगे | वैसे भी दो दिनों में संदीप भी आ जायेगा, फिर हमलोग आगे की रणनीति बनायेंगे |

बातों बातों में काफी समय निकल चूका था और आशंका थी कि राधिका के पिता थाने में इत्तला कर चुके होंगे, इसलिए राधिका को लेकर ज़ल्द ही यहाँ से निकलना चाहिए …रेनू ने कहा |

और तुरंत ही सभी लोग सोफ़िया के साथ कार में बैठ कर उसके घर की ओर चल दिए |

सोफ़िया का घर तो बहुत बड़ा था और सबलोगों के आ जाने से उसका घर एक बड़ा परिवार की तरह हो गया और वह बहुत खुश नज़र आ रही थी |

सोफ़िया के साथ रेनू और राधिका मिल कर ब्रेकफास्ट तैयार किया और सबलोग एक साथ डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाने लगे और गप्पे मारने लगे |

माँ ने  कहा …इसी तरह मिलकर सभी लोग रहे तो एक भरा पूरा परिवार में रहने का अपना अलग ही आनंद है |

भगवान् ने चाहा तो ज़ल्द ही सब ठीक तो जायेगा और मेरी  बचपन की सहेली राधिका को दुल्हन के रूप में हम लोग देख सकेंगे …सोफ़िया ने राधिका को छेड़ते हुए कहा |

तभी  किसी ने घर का कॉल बेल बजा दिया | अचानक सबके चेहरे से हँसी गायब हो गयी |

आशंका थी कि राधिका के पिता यहाँ पुलिस को लेकर आये होंगे | सभी एक दुसरे का चेहरा देखने लगे | फिर हिम्मत कर के सोफ़िया ने जाकर दरवाज़ा खोला तो राहत की सांस ली, … सामने उसके वकील साहब खड़े थे |

सोफ़िया ने वकील साहब को  ड्राइंग रूम  में सोफे पर बैठाया और अन्दर जाकर  बोली….घबराने  की कोई बात नहीं है,  मेरे वकील साहब आये है |

चलो ,ज़ल्दी नास्ता समाप्त कर वकील साहब के पास सलाह मशवीरा के लिए चलते है |

थोड़ी ही देर में, सोफ़िया चाय लाकर वकील साहब को दी और सभी लोग आकर उनके सामने बैठ गए |

सोफ़िया ने सभी लोगों का परिचय कराया और फिर पूछा …अगर राधिका के पिता पुलिस  में अपनी बेटी के अपहरण का मामला बना कर हमलोगों को फँसा दिया तो उससे कैसे बच सकते है |

मैं आपलोगों को बताना  चाहता हूँ कि आप किसी तरह की  चिंता ना करें |  यहाँ के सिटी एस पी से मेरी जान पहचान है | उनके रहने से कोई भी थानेदार या पुलिस किसी के दबाब में आकर हमलोगों पर अनुचित कार्यवाही नहीं कर सकती …वकील साहब ने वहाँ उपस्थित लोगों की हिम्मत बढाई |

तभी सोफ़िया ने कहा ….फिर भी आप थाना में जा कर यह सुनिश्चित कर लें कि कही राधिका के पिता ने वहाँ हमलोगों के खिलाफ कोई शिकायत तो दर्ज नहीं करा दी  है |

ठीक है सोफ़िया जी , मैं यहाँ से सीधा थाना जाकर पता करता हूँ और जैसा होगा आपको फ़ोन पर सूचित कर दूंगा …इतना कह कर वकील साहब चल दिए |

दूसरी तरफ राधिका के पिता राम बलि सिंह बहुत गुस्से में नज़र आ रहे थे | उन्हें गुस्सा इस बात का था कि राधिका के कारण समाज में उनकी काफी बदनामी हो रही थी |

आज ही के दिन लड़के वाले राधिका को देखने वाले थे, लेकिन उनलोगों को मज़बूरी में बहाना बना कर मना करना पड़ा कि राधिका  बीमार है और किसी तरह आज का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा | लेकिन कब तक उनसे बहाना बनाते रहेंगे |

 वे गुस्से में अपने आप से बातें करते हुए कमरे में टहल रहे थे |

अचानक उनके मन में विचार आया कि क्यों नहीं बेटी के अपहरण का आरोप लगा कर संदीप के परिवार वालों पर FIR कर दिया जाये |

हो सकता है, पुलिस के डर से राधिका अपने घर आने को मजबूर हो जाये |  फिर तो  देर ना करते हुए वे  थाने में आकर संदीप के परिवार वालों के विरूद्ध FIR  दर्ज करवा ही दी |

वकील साहब जब थाने पहुंचे  तब तक राधिका के पिता थाने से निकल चुके थे |

जब वकील साहेब ने थानेदार  साहब से पूछा …क्या कोई राधिका के अपहरण की  शिकायत दर्ज की गई है ?

ज़बाब में थानेदार ने कहा …अभी अभी तो राम बलि सिंह राधिका के अपहरण का FIR लिखा कर गए है |

FIR में नामज़द कौन है …वकील साहब  ने पूछा |

आप उसकी नक़ल निकलवा लें और खुद ही देंखे किन लोगों का नाम है |

वकील साहब तुरंत नक़ल निकलवा ली और बारीकी से उसका अध्ययन किया तो पाया कि संदीप और उसके परिवार के सभी सदस्यों के नाम है |

वकील साहब ने थानेदार से कहा …थानेदार साहब संदीप तो मुंबई में है , फिर उसे नामजद कैसे बनाया गया |

और रही बात अपहरण की तो मैं आप को बता दूँ कि राधिका खुद ही बालिग है और अपनी मर्जी से घर छोड़ दी है, क्योंकि उसके पिता राधिका के मर्ज़ी के खिलाफ उसकी  शादी करना चाहते थे |

ज़बाब में थानेदार ने कहा ….देखिये यह तो तहकीकात का मामला है और FIR की कॉपी के साथ उनका ज़बाब और राधिका के बालिग होने का प्रमाण पत्र के साथ यहाँ  थाने में जमा कराएँ | उसके बाद हम तहकीकात करेंगे |

वकील साहब थाना में बैठे बैठे ही सिफिया को फ़ोन लगा कर सारी बातों की जानकारी दे दी और कहा….  FIR की नक़ल निकाल  लिया हूँ | आप ज़रूरी कागजात तैयार कर लीजिये मैं कल ही आकर इस FIR का ज़बाब तैयार कर लेता हूँ |

इधर संदीप छुट्टी स्वीकृत नहीं होने से काफी दुखी था | एक तरफ राधिका के प्रति उसका स्नेह और दूसरी तरफ नौकरी | फैसला लेना आसान नहीं था |

फिर भी उसका दिल कह रहा था …नौकरी तो फिर भी दूसरी मिल जाएगी लेकिन राधिका का त्याग करना तो मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है |

संदीप इन सब बातों को सोचता हुआ मुंबई रेलवे स्टेशन पहुँच गया,  क्योकि अभी ना तो प्लेन का टिकट और ना ही ट्रेन का रिजर्वेशन मिल पा रहा था | फिर भी घर तो किसी भी तरह पहुँचना ही था | वह बिना रिजर्वेशन के ही सफ़र करने का फैसला कर चूका था | हालाँकि संदीप को पता है कि इस सफ़र में परेशानी तो बहुत होगी लेकिन जो परेशानी राधिका को इस समय झेलनी पड़ रही है उसके मुकाबले तो कुछ भी नहीं  |

स्टेशन पहुँच कर संदीप सबसे पहले टिकट टिकट लेने हेतु  टिकट काउंटर की ओर गया तो पाया कि करंट बुकिंग में बहुत लम्बी लाइन है | ज्यादातर लोग मजदूर वर्ग के थे जो लाइन में खड़े होकर धक्का मुक्की कर रहे थे |

इसे देख कर संदीप को  हवाई जहाज की वो पहली  यात्रा याद आ गई, कितना शकुन भरा था  | हवाई  सफ़र का अलग ही आनंद है | लेकिन अभी यहाँ की समस्या से कैसे निपटा जाये वो खड़े हो कर यही सोच रहा था |

संदीप ने सोचा ….इतने दिनों से लेबर मजदूर के साथ काम कर रहा हूँ और उनसे काम कैसे लिया जाये उससे मैं भली भांति वाकिफ हूँ | तो क्यों ना वही नुस्खा यहाँ भी आजमाया जाए |

 उसने एक मजदूर भाई को पटाया और उसे अपने साथ साथ उसका भी टिकट लेने का निवेदन किया | यह सच है,  परदेश में अपने जिला ज़वार का कोई मिल जाता है तो उससे अपनापन हो ही जाता है और उसी का फायदा उठा कर संदीप ने अपना टिकट बिना परेशानी के ले सका |

जब ट्रेन जैसे ही प्लेटफार्म पर पहुँची तो लोग ट्रेन में चढ़ने के लिए दौड़ पड़े |

सीट पर कब्ज़ा करने के लिए सब लोग धक्का मुक्की कर रहे थे | साधारण बोगी होने के कारण अफरा तफरी सा माहौल हो गया |

संदीप  कुछ देर तक यूँही खड़ा देखता रहा | उसकी हिम्मत नहीं हो  रही थी कि वह बोगी में चढ़े  क्योकि बहुत सारे लोग गेट को जाम कर रखा था  |

कुछ देर के बाद जब अफरा – तफरी कम हुई तो वह ट्रेन में किसी तरह घुस सका |

बोगी के भीतर खचाखच भीड़ थी,  जितने लोग सीट पर बैठे थे उससे ज्यादा लोग खड़े थे |

संदीप वहाँ खड़ा खड़ा सोच रहा था कि इतनी दूर की यात्रा कैसे कर पायेगा ,  तभी उसके कानो में पहचानी सी आवाज़ पड़ी …भाई साहब इधर आ जाइये| आप के लिए मैंने सीट रोक रखी  है |

उसने पलट कर देखा और खुश हो गया | आवाज़ देने वाला और कोई नहीं बल्कि  वही आदमी था जिसने उसका टिकट कटाया था  |

संदीप  अपनी सीट पर बैठा और भगवान् के साथ साथ उसे भी धन्यवाद दिया | और फिर उसके साथ बातचीत  करते हुए रास्ता कैसे कट गया पता ही नहीं चला ….(क्रमशः)

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Published by vermavkv

I am Vijay Kumar Verma, residing in Kolkata, the city of joy. I was a Banker since December 1985 and retired in April 2017 from State Bank of India. After serving the Bank for 32 years as an officer holding different assignments from time to time, now I am currently enjoying the retired life. I would like to fulfil the duty of social service through this platform spreading aware about the health related problems and their remedies. I will also try to entertain my followers through knowledgeable information and motivate them to enjoy better and quality lifestyle. It is my endeavour to keep the post friendly and as informative as I can. I am willing to connect with my friends and followers, through my stories and drawings out of my passion to write and make sketches. I would like to create a trusted and joyful friend circle, and share tales from the past

3 thoughts on “तलाश अपने सपनों की …15

  1. The story moving ahead nicely though I thought it had reached its climax. Anyhow, the ending seems to be near with the final plot interestingly poised. Good going Vermaji.

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  2. The story moving ahead nicely though I thought it had reached its climax. Anyhow, the ending seems to be near with the final plot interestingly poised. Good going Vermaji.

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