# तलाश अपने सपनों की #…13

तड़प ये इश्क की दिल से कभी नहीं जाती

कि जान दे के भी दीवानगी नहीं जाती ,

ना जाने कौन सी  दुनिया है वो मेरे रब्बा

जहाँ से लौट के कोई सलामत नहीं आती…

राधिका के आँखों से आँसू बह रहे थे और उसकी जीने की इच्छा अब समाप्त हो चुकी थी |

हो भी क्यों नही,  जब जन्म देने वाला पिता ही उसका दुश्मन बन जाए तो  फिर उससे  लड़ा भी  नहीं जा सकता है |

इसीलिए उसने सोचा कि जब सारे रास्ते बंद हो गए है तो ज़िन्दगी की हार स्वीकार कर लेना ही उचित होगा |

राधिका इन्ही बातों को मन ही मन सोचते हुए पागलों की भांति तेज़ कदमो से नदी की ओर भागती जा रही थी | उसने दृढ संकल्प ले लिया था कि अभी उस नदी में डूब कर अपनी  जान दे देगी |

तभी रास्ते में संदीप का घर दिख गया | अचानक उसके मन में विचार आया कि संदीप से तो बात नहीं हो सकती | तो कम से कम रेनू को ही बता दिया जाये ताकि मरने की मेरी मज़बूरी के बारे में संदीप को पता चल सके और  इसके लिए वो मुझे माफ़ कर दे |

राधिका घर के दरवाज़े पर पहुँच कर कॉल बेल बजा दी और रेनू के आने का इंतज़ार करने लगी  | थोड़ी देर बाद दरवाज़ा खुला और  रेनू दरवाज़े पर राधिका को ऐसी हालत में सामने देख कर समझ गयी कि मामला सीरियस है |

वह उसे हाथ पकड़ कर घर के अन्दर आने को कहा | लेकिन राधिका मना  करते हुए बोली  …अभी मेरे पास वक़्त नहीं है |

उसने अपने घर की सारी घटना बता दी और कहा कि मेरे पास मोबाइल भी अब नहीं है , जिससे संदीप या तुम लोगों को इसकी जानकारी दे सकूँ |

अब मेरे पास कोई चारा नहीं बचा है  सिवाए इसके कि मैं अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर दूँ |

तुम संदीप को सारी बात बता कर मेरे तरफ से माफ़ी मांग लेना …राधिका आँखों में आँसू लिए रेनू से बस  इतना ही कह सकी और वापस जाने को मुड़ी |

दरवाज़े पर इस तरह रोने  की आवाज़ सुन कर माँ भी दौड़ी – दौड़ी आ गयी और रेनू से सारी बातों को सुन कर उसे  बहुत दुःख हुआ | लेकिन अचानक उसने गुस्से में राधिका को एक थप्पड़ जड़ दिया |

रेनू अवाक माँ के गुस्से को देख रही थी | माँ ने फिर राधिका से कहा …यह हमारा हुक्म है कि तुम घर के अन्दर आ जाओ और वो हाथ पकड़ कर राधिका को घर के अंदर ले आई और फिर प्यार से उसके सिर पर हाथ रख कर कहा …मैं तो तुझे एक मजबूत लड़की समझती थी, लेकिन आज तुम तो कायरों जैसी बात कर रही हो |

यह किसने कहा कि ज़िन्दगी पर सिर्फ तेरा ही हक़ है | तू तो इस घर की बहु पहले ही बन चुकी है, भले ही सामाजिक रस्म अदायगी अभी बाकी है |

मैं तुम्हारे तरफ से पुरे समाज से लडूंगी | आज के ज़माने में औरत इतना कमज़ोर नहीं है | उसे अपनी इच्छा से सिर उठा कर जीने का पूरा अधिकार है |

इतना सुनना था कि राधिका माँ से लिपट गई और कहा…मुझे माफ़ कर दो माँ |

अब मुझे अपनी गलती का एहसास हो रहा है | फिर से जीने की इच्छा भी हो रही है | अब मैं अपने प्यार के लिए लडूंगी और हर परिस्थिति का मुकाबला करुँगी |

बाते करते हुए रात के आठ बज चुके थे और रात का खाना बनना बाकी था |

राधिका अब सामान्य हो चुकी थी | लोग ठीक ही कहते है कि  डूबते को तिनका का सहारा ही काफी होता है |

संदीप की माँ के बातों का राधिका के ऊपर गहरा असर पड़ा और ज़िन्दगी समाप्त करने के बजाए  वह अब परिस्थिति से लड़ने की ठान चुकी थी |

उसने माँ से कहा ….मैं भी खाना बनाने में रेनू  का हाँथ बटाना चाहती हूँ |

राधिका की बात सुन कर माँ बहुत खुश हो गई और राधिका के सिर पर हाथ रख कर कहा …पहले अपना हाथ मुँह धोकर चेहरा तो ठीक कर लो ताकि इस घर की बहु दिख सको |

कुछ दिनों के बाद तो रेनू अपने ससुराल चली जाएगी तो तुम्हे ही तो सारा काम काज संभालना होगा |

राधिका रेनू की तरफ देखि तो वो शरमा कर अपने कमरे में चली गई |

राधिका सब को खाना परोस कर खुद भी रेनू के साथ खाने बैठ गई | बातों बातों में रेनू ने कहा … राधिका, तुम तो बिना बताए घर से निकल आयी हो और तुम्हारे पिता जी को पक्का विश्वास हो गया होगा कि तुम यहाँ चली आयी हो |

हमें तो डर  लग रहा है कि तुम्हारे गुस्सैल पिता हमलोग पर कोई क़ानूनी कार्यवाही ना कर दें | हमें सतर्क रहने की ज़रुरत है |

इस पर माँ  ने कहा …क्यों ना इसकी सहेली सोफ़िया से मदद ली जाए | और रेनू को भी माँ की बात ठीक लगी |

रेनू तो भीतर हो भीतर घबरा ही रही थी, इसलिए तुरंत ही उसने सोफ़िया को फ़ोन लगा दी |

रेनू का नंबर देखते ही सोफ़िया खुश हो गई और उधर से आवाज़ आई ….हेल्लो रेनू., तुम कैसी हो ? इतने दिनों बाद और इतनी रात को कैसे फ़ोन किया ?

रेनू ने कहा …सोफ़िया जी, अभी हमलोग बहुत मुसीबत में पड़ गए है, कृपया मेरी मदद कीजिए |

क्यों, क्या हुआ रेनू  ? मुझे पूरी बात बताओ ….सोफ़िया  आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा |

और रेनू ने विस्तार से राधिका के साथ घटी सारी घटनाओं की जानकारी सोफ़िया को दी | और यह भी बताया कि राधिका हमारे पास ही है |

अच्छा ठीक है, वो तो मेरी बेस्ट फ्रेंड है, ऐसे वक़्त में उसे मदद करना हम सब का कर्त्तव्य है |

मैं अभी तुम्हारे पास आती हूँ और हम सब मिल कर विचार  करेगे कि आगे क्या करना चाहिए | सोफ़िया ने फ़ोन काट कर राधिका के पास जाने की तैयारी करने लगी |

इधर अचानक राधिका को घर से गायब हो जाने के कारण पिता जी बहुत गुस्से में थे और अपनी पत्नी पर चिल्लाते हुए बरस पड़े…यह सब तुम्हारे लाड प्यार का नतीजा है |

कल लड़का वाले राधिका को देखने आने वाले है और इसने मेरी इज्जत प्रतिष्ठा सब कुछ मिटटी में मिला दिया है | मुझे पता है वो कहाँ छुप कर जा बैठी है | मैं उनलोगों को भी सबक सिखा कर रहूँगा |

रात गुज़र रही थी और राधिका की माँ के मन में तरह तरह के बुरे ख्याल आ रहे थे ……वह वेचैनी हो रही थी ….उसे नींद नहीं आ रही थी …..वह  बिस्तर पर लेटे  करवटें  बदल रही थी |

उसके  दिमाग में हलचल मची हुई थी …एक तरफ उसकी  बेटी की ज़िन्दगी का सवाल था  और दूसरी तरफ उसके  पति के अहम और इज्ज़त का सवाल |………….वह निर्णय नहीं कर पा रही थी कि किसे सही कहे  और किसे गलत क्योंकि दोनों ही परिस्थिति में हार उसी की होनी है |

वह बिस्तर पर पड़े हुए सोच रही थी कि अपनी एकलौती बेटी को कितने लाड – दुलार और कितने जतन से पाला है ….कितनी  मन्नतों के बाद ईश्वर ने अपनी कृपा दिखाई है |

आज उसी बच्ची के हम सब दुश्मन बन गए है और मैं चुप चाप तमाशा देखने  के अलावा कुछ नहीं कर सकती हूँ |

पता नहीं कहाँ और किस हालत में होगी, मेरी बच्ची |

राधिका की माँ , बेचारी सिर्फ रोने के अलावा कर भी क्या सकती है | झूठी शान शौकत और खोखले विचारधारा से अब इस घर में उसका भी मन घुटने लगा है |

लेकिन मेरे पैर तो इस घर की दहलीज़ से बंधे हुए है | मैं तो इस घर को छोड़ कर कही जा  भी नहीं सकती | इन्ही सब बातों और ख्यालो में रात गुज़र गई और पडोसी के मुर्गे की बांग से पता चला कि सवेरा हो गया है |

तभी उसने देखा कि  राधिका के पिता  सुबह सुबह कपडे पहन कर घर से बाहर निकल रहे है |

उसने अनुमान लगाया कि ज़रूर ही वे संदीप के घर जा रहे है जहाँ राधिका के होने का अनुमान लगाया जा रहा था |

पता नहीं वे राधिका के साथ कैसा व्यवहार करेंगे | भगवान् राधिका की मदद करना …उसने हाथ उठा कर अपनी  बेटी की सलामती की दुआ मांगी  |

राधिका की माँ का अनुमान बिलकुल सच निकला |  राधिका के पिता घर से निकल कर सीधा  संदीप के घर पहुंचे और कॉल बेल बजा दी |

थोड़ी देर इंतज़ार के बाद संदीप की माँ ने दरवाज़ा खोला तो देखा कि राधिका के पिता राम बलि सिंह सामने खड़े है |

रेनू की माँ ने उन्हें हाथ जोड़ कर प्रणाम किया | लेकिन उन्होंने प्रणाम का ज़बाब नहीं दिया और गुस्से भरे स्वर में  पूछा…राधिका कहाँ है ?

राधिका तो यहाँ नहीं है …माँ ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया |

इतना सुनते ही राधिका के पिता गुस्से से तमतमा उठे और कहा …आपको तो पता ही है कि मैं चाहूँ तो आप सबो के साथ  क्या कर सकता हूँ |

मुझे अच्छी तरह मालुम है कि आप जानती है कि राधिका कहाँ है,  लेकिन आप इसे छुपा रही है |

अभी तो मैं यहाँ से जा रहा हूँ, और मैं एक घंटे तक इंतज़ार करूँगा | अगर वह एक घंटे के भीतर अपने घर खुद चल कर नहीं आयी तो राधिका के अपहरण के इल्जाम में आप सब लोगों को जेल में बंद करा दूँगा |

संदीप की माँ चुपचाप उनकी बातें सुनती रही लेकिन कोई ज़बाब नहीं दिया |

उसके पिता अपनी बात समाप्त कर वहाँ से चल दिए |

तब तक रेनू जाग चुकी थी और दरवाज़े पर हो रही बातों को सुन कर घबरा गई और  माँ के पास आयी और पूछा …क्या हुआ माँ ?

राधिका के पिता उसे ढूंढते हुए यहाँ आये थे,  लेकिन राधिका को यहाँ ना पाकर चले गए …माँ ने कहा |

लेकिन मैंने तो सुना वो गुस्से में हमलोगों को धमकी दे रहे थे | अच्छा हुआ राधिका को रात में ही सोफ़िया जी अपने साथ ले गयी, वर्ना उसको यहाँ पाकर हम सब लोगों की ऐसी की तैसी हो जाती …रेनू ने घबरा कर माँ से कहा |

लेकिन अपने बचाओ के लिए तो कुछ उपाय करना ही होगा ….माँ ने कहा |

ठीक है माँ अभी मैं सोफ़िया जी से बात करती  हूँ और रेनू ने फ़ोन लगा दिया …(क्रमशः)  

इससे पहले की घटना हेतु नीचे link पर click करे..

तलाश अपने सपनों की ….14

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Categories: story

3 replies

  1. The climax of the story appears interesting. Hope the conclusion will be even more entertaining than the earlier part of the story. Good writing.

    Liked by 1 person

  2. Reblogged this on Retiredकलम and commented:

    सबसे कठिन काम है …सबको खुश रखना ,
    सबसे आसान काम है …सबसे खुश रहना ||

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