रिक्शावाला की अजब कहानी …1

दोपहर का समय है और राजेंदर खाना खा कर अपने रिक्शा पर बैठा आराम कर रहा है | थोड़ी  ही देर में वह अपने अतीत में खो जाता है | बीती हुई बातें चलचित्र की तरह दिमाग में एक एक कर आने लगता है |

आज भी याद है उसे, कितनी ख़ुशी हुई थी जब उसका मेट्रिक का रिजल्ट आया था और उसने अच्छे अंको से पास किया था | पुरे गाँव में मिठाइयाँ बांटी गई थी /

उसके बाद, कॉलेज का वह पहला दिन आज तक भी नहीं भुला है | जहाँ अनजान दोस्तों के बीच उसे थोड़ी झिझक भी हो रही थी |

लेकिन बड़ा आदमी बनने की ललक और भविष्य के हसीन सपने उसके उमंगो को परवान चढ़ा रहे थे….. …पर शायद नियति को यह मंज़ूर नहीं था और फिर एक दिन  उसके जीवन में एक भूचाल सा आ गया ..अचानक उसके पिता जी की मौत हो गई | डॉक्टर ने बताया कि उन्हें निमोनिया हो गया था |

परिवार में कोहराम मच गया | और फिर उसके कन्धों पर घर का सारा बोझ आ गया | उसने  कॉलेज की पढाई बीच में ही छोड़ दी और नौकरी की तलाश शुरू कर दी |

बहुत चक्कर लगाए पर बात कहीं भी बनी नहीं |

एक दिन वह यूँही बैठा पेपर में vacancy देख रहा था तभी उसकी नज़र एक विज्ञापन पर पड़ी |

उसमे गार्ड की नौकरी के बारे में विज्ञापन था | उसने ऑफिस का पता नोट किया और दुसरे ही दिन अपने गाँव मुरैना, (दरभंगा) से चल कर पटना पहुँच गया |.

पटना स्थित ऑफिस में enrollment के नाम पर ५०० रूपये वसूले गए |  तीन दिनों के बाद ५०० रुपया और लेकर उसके हाथ में अंततः जोइनिंग लेटर थमा दिया गया | 

लेटर पाकर वह बहुत खुश हुआ था, सोचा कि अब उसके  दुःख दर्द दूर हो जायेंगे  |

जब जोइनिंग लेटर खोल कर देखा तो उसमे वाराणसी का पता दिया हुआ था और वहाँ जाकर ज्वाइन करने की बात थी | उसे बहुत निराशा हुई और उसने ऑफिस वालों से पटना में ही कही जोइनिंग कराने का आग्रह किया |

लेकिन कंपनी वालों ने  मना  कर दिया और साफ़- साफ़ कहा …जाना है तो जाओ, नहीं तो फिर छोड़ दो |

लाचार होकर वह वाराणसी पहुँचा | वहाँ पहुँच कर वह काफी इधर उधर भटका लेकिन इस नाम की कंपनी उसे नहीं मिली तब उसे एहसास  हुआ कि वह ठगी का शिकार हो चूका है |

अब तो उसके सामने कोई चारा नहीं था, सिवाए इसके कि दूसरी नौकरी यही पर ढूंढा जाए |

दो दिनों तक घूम- घूम कर नौकरी ढूंढता रहा लेकिन हर जगह एक ही सवाल….तुम्हारे लिए कोई सिक्यूरिटी लेने वाला है ?

मैं तो दरभंगा के एक छोटे से गाँव का रहने वाला, भला इतने बड़े बनारस शहर में मुझे कौन जानता |

बचे पैसे भी समाप्त हो गए | सरकारी रैन बसेरा में अपना ठिकाना था जहाँ रिक्शे वाले आराम किया करते थे |

चूँकि पैसे ख़तम  हो चुके थे और मैं भूखा प्यासा उस रैन बसेरा में उदास बैठा हुआ था | तभी रघु काका, जिनकी उम्र लगभग ६० साल की रही होगी. मेरे पास आये और पूछा …इस शहर में नए हो ?

मैंने अपनी सारी कहानी सुना दी कि कैसे मैं ठगी का शिकार हुआ हूँ |

शायद मेरी बातों को सुन कर उनको मुझ पर दया आयी और उन्होंने उपनी पोटली खोली जिसमे रोटी और साग था | खुद खाने लगे और मुझे भी दो रोटियां खाने को दी | मैं कल रात से कुछ भी नहीं खाया था, सो मैं जल्दी से वो रोटियां ले ली |

खाने के दौरान उन्होंने कहा …देखो राजू, तुम इस शहर में नए हो और बिना जान पहचान के काम नहीं मिल सकता है | इसलिए मेरी मानो तो मेरी रिक्शा को तुम दिन में चलाओ और उसके बदले मुझे कुछ पैसे दे दिया करना | तुम्हे भी चार पैसे हो जायेंगे |

मुझ बूढ़े को  गर्मी के कारण दिन में  रिक्शा चलाने में परेशानी होती है, इसलिए मैं इसे रात में चलाऊंगा |

मरता क्या ना करता |  पेट की भूख को शांत करने के लिए कोई भी काम तो करना ही पड़ेगा | मैंने  उनकी  सलाह मान ली और रिक्शे वालों की जमात में शामिल हो गया |

अचानक मेरी तन्द्रा टूटी जब रघु काका ने आवाज़ लगाई |

कहाँ खो गए राजू बेटा …रघु काका की आवाज़ सुन कर आँखे खोल कर उनको देखा |

रिक्शा ले कर जाओ …रतन सेठ ने बुलाया है | शायद संकट मोचन मंदिर जाना है उन्हें…. रघु काका ने कहा |

ठीक है काका, मैं अभी जाता हूँ …मैंने कहा और रिक्शा लेकर चल दिया |

एक पढ़ा लिखा और स्मार्ट रिक्शा वाला होने के कारण जमात में अपनी  धाक जम गई और फिर मुझे  काम  की कमी न रही | लगा अब ज़िन्दगी की गाड़ी पटरी पर आ गई है |

इस तरह वह राजेंदर से राजू रिक्शावाला बन चूका था  | पर आज भी उसके मन में एक सवाल टीसता है कि जब रिक्शा ही चलाना था तो पढाई लिखाई क्यों किया |

इस तरह के द्वंद उसके दिमाग में चलता रहता था … आज भी वह यही सब सोच रहा था |

दिन भर रिक्शा चलाने के बाद राजू  काफी थक चूका था |  वह अपने लिए जल्दी जल्दी चार रोटियां बनाई  और खाना खाने बैठ गया |

वह पहला निवाला मुँह में डाला ही था कि उसे पत्नी राजो की याद आ गई |

उसे  अपनी पत्नी  के बारे में सोच कर काफी तकलीफ होने लगा / पुरे छ्ह महीने हो गए ..उसे देखे हुए |  गरीबी के कारण एक मोबाइल भी राजो  को नहीं दिला सका था | हालाँकि वह  चिट्ठी लिख लेती थी और यही  एक ज़रिया था उसका हाल समाचार जानने का |

इस बार सोचा था कि खूब पैसे कमा कर घर जाऊंगा तो एक मोबाइल खरीद कर राजो को दे दूंगा, ताकि जब भी इच्छा हो हमसे जी भर के बातें कर सके |

अभी एक साल पहले ही तो शादी हुआ है, लेकिन अभी गवना नहीं हुआ है | मुझे शादी के तुरंत बाद ही अचानक वाराणसी आना पड़ा | पेट की भूख और रोजी रोटी के चक्कर में अपना देश ही छुट जाता है | यहाँ काम करूँगा तभी तो घर पैसा भेज पाउँगा |

लेकिन इस बार एक विदेशी पर्यटक मिल गयी थी “अंजिला” | रेलवे स्टेशन पर अचानक उससे टकरा गया |

मुझे सवारी  की तलाश थी और उसे एक रिक्शावाले की | विदेशी जान कर सभी रिक्शावाले भाडा बढ़ा चढ़ा कर मांग रहे थे | मैं चुप चाप लोगों के तमाशे देख रहा था कि किस तरह विदेश से आये मेहमान को हमलोग लुटने का प्रयास करते है |

मुझे भीड़ से अकेला अलग बैठा देख कर अचानक वो मेम मेरे पास आयी और  अंग्रेजी में संकट मोचन मंदिर जाने के लिए कहा / मुझे तो इंग्लिश आती थी इसलिए मैं इंग्लिश में जबाब देते हुए बताया कि मंदिर दो किलोमीटर दूर है और मैं सिर्फ ५० रूपये लूँगा |

मुझे अंग्रेजी में बात करता देख वह प्रभावित हो गई और मेरे रिक्शे में बैठ गई |

इतने रिक्शा वालो के बीच  उसने मेरा ही रिक्शा पसंद किया | फिर क्या था एक बार जो रिक्शे पर बैठाया , तो बस उसने मेरे रिक्शे को और मुझे अपने पास ही रख लिया | वो नहीं चाहती थी कि मैं कोई दूसरी सवारी को रिक्शे पर बैठाऊं | मैं दिन भर के जितने भी पैसे मांगता वो तुरंत दे देती |

मुझे भी आराम हो गया था .बस रिक्शा तभी चलाता  जब मेम साहिबा को  कही जाना होता वर्ना उसके  होटल के बाहर ही रिक्शा लगा रहता |

 वो जब से इंडिया आयी थी , मेरे साथ और मेरे रिक्शा पर ही घुमती थी | इसके अनेक कारण थे ..एक तो मैं पढ़ा लिखा था, जवान था और उसकी भाषा इंग्लिश का थोडा थोडा ज्ञान भी था |

मुझे तो उसकी बातों के लगा  कि वो  यहाँ कोई  शोध कर रही है | शायद वाराणसी नगरी पर और  यहाँ के धार्मिक आस्था पर शोध कर रही है | इसीलिए तो रोज़ कभी बाबा विश्वानाथ का मंदिर तो कभी शंकट मोचन मंदिर मेरे रिक्शे पर ही जाती रहती है |

और अपनी  डायरी में कुछ ना कुछ लिखते रहती है …..मुझे तो उसने अपना गाइड ही बना लिया है | बहुत सारी जानकारी मुझसे भी लेती रहती है | मैं तो पिछले दो  साल से वाराणसी नगरी में रिक्शा चला रहा हूँ | अतः बहुत सारी जानकारी आसानी से दे पाता  हूँ  और जो जानकारी मुझे नहीं रहती है,  उसे आस पास के लोगों से पूछ कर उसे बता देता हूँ |  

जैसे जैसे समय गुजरता गया मैं तो उसके  स्वभाव, आकर्षक  चेहरा और उसकी उन्मुक्त हँसी का दीवाना होता चला गया /

उसमे एक अजीब तरह का आकर्षण था , वो तो अब मेरे साथ ही खाना खाती, वाराणसी शहर का भ्रमण और मेरे खाने पिने के अलावा मेरे कपडे वगरह का भी ख्याल रखती है  और अपने दिल की बात भी बताती है / मैं अनायास ही उसकी ओर आकर्षित होता जा रहा था …./ ( क्रमशः )

इससे आगे की कहानी पढने के लिए नीचे दिए link पर click करें …

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Published by vermavkv

I am Vijay Kumar Verma, residing in Kolkata, the city of joy. I was a Banker since December 1985 and retired in April 2017 from State Bank of India. After serving the Bank for 32 years as an officer holding different assignments from time to time, now I am currently enjoying the retired life. I would like to fulfil the duty of social service through this platform spreading aware about the health related problems and their remedies. I will also try to entertain my followers through knowledgeable information and motivate them to enjoy better and quality lifestyle. It is my endeavour to keep the post friendly and as informative as I can. I am willing to connect with my friends and followers, through my stories and drawings out of my passion to write and make sketches. I would like to create a trusted and joyful friend circle, and share tales from the past

2 thoughts on “रिक्शावाला की अजब कहानी …1

  1. Good morning. Nice storyline having all the masala of emotions and romance as the story progresses, I suppose. Keep writing Verma ji.

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