दिल और दिमाग ..किसकी सुनूँ ?

आज जब मैं ब्लॉग लिखने बैठा ही था कि मेरे “बिग ब्रदर”  का फ़ोन आ गया | कुछ पारिवारिक बातें  होने लगी |  इसी दौरान मैंने कहा …कुछ फैसले मैं दिल से लेता हूँ और कुछ फैसले दिमाग से |  इतना सुनना था कि उन्होंने अचानक हमसे प्रश्न कर दिया ….  दिल और  दिमाग में क्या फर्क है ?

अचानक इस तरह के प्रश्न पूछे जाने पर मुझे तुरंत कोई ज़बाब नहीं सुझा |  मैं कुछ देर रुक कर , फिर कहा ….दिल का सम्बन्ध भावना  से होता है जबकि दिमाग का तर्क से, हकीकत से | बस इतना बोलकर बात मैंने यही समाप्त कर दी |

लेकिन मेरे मन में विचार उठने लगा कि इस विषय पर गहरे से विचार की जानी चाहिए |

सीता हमें बहुत अच्छी लगती है,अतः  मैं उसके पास रहना चाहता हूँ |   मेरा दिल यह चाहता है लेकिन दूसरी तरफ मेरा  दिमाग इसके  बहुत सारे नकारामक परिणाम को सामने रख देता है और  हमें आगाह करता है कि इससे आप की समाज में बदनामी होगी | और इस द्वंद में जिसकी जीत हुई वो ही घटना में परिवर्तित हो जाता है | मैं ऐसा मानता हूँ |

लोग अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि उनका दिल उन्हें एक ओर ले जाता है और दिमाग दूसरी ओर जाने को कहता है। वैसे  मन का गहरा रिश्ता भावना से होता है | हम आनंद कि अनुभूति पाने के लिए दिल का इस्तेमाल करते है | और  अपने विवेक का इस्तेमाल दिमाग से करते है | वैसे दिल और दिमाग अलग नहीं हैं – एक दुसरे के पूरक ही  हैं ।

इस पर हमारे एक मित्र ने बताया …

हम अपने दिमाग से कुछ चाहते हैं और फिर निकल पड़ते हैं, उसे पाने के लिए। हम पीछा करते हैं, हम संघर्ष करते हैं, हम लड़ते हैं । और किसी तरह हासिल करते है |  कई बार, जब हम अपने दिमाग की “सुनते” हैं, तो यह हमारे मन को पीड़ा देता है ।

मन की अगुआई वाली इच्छाएं आमतौर पर नकारात्मक पैटर्न जैसी परिस्थिति पैदा करती हैं।

अगर आप कुछ चाहते हैं ….किसी भी भौतिक चीज, या व्यक्ति को , तो आपका दिमाग उसे आपको दिलवाने की रेस में लग जायेगा, शायद दिमाग वो रेस जीत भी जाएगा, लेकिन उनकी हार और जीत दोनों  आपके लिए पीड़ा दायक होगी, अगर हार होती है तो न मिलने की पीड़ा और मिल जाती हैं तो खोने के डर की पीड़ा ।

और दिल की अगुआई वाली इच्छाएं ऐसा कोई काम नहीं करती हैं।

दिल की इच्छाएं आप के सबसे “गहरे” हिस्से से आती हैं। वे आपकी आत्मा से आती हैं।

दिल की इच्छा आपको दर्द नहीं पहुंचाती क्योंकि वह दिमाग की तरह “रेस” नहीं लगाती, वो सीधा, सही फैसला सुनाती हैं। आपके लिए जो सही हैं वही फैसला । दिल हमेशा पूरी तरह से पूर्ण होता है और आपकी चेतना से जुड़ा होता है।

जब आप अपने दिमाग को शांत करने और अवचेतन विचारों को उजागर करने में सक्षम होते हैं जो मन की इच्छा उत्पन्न करते हैं, तो आप तेजी से विकसित होते हैं।

दिमाग पर कुछ “प्रेक्टिस” के बाद काबू कर सकते हैं लेकिन दिल को काबू करना नामुमकिन हैं।

दोनों के बीच काफ़ी अंतर हैं, चलिए एक प्रयोग करके कोशिश करते हैं।

अपनी आंखें बंद करके 3 बार गहरी सांस ले,

जैसे ही आप सांस लेते हैं, अपने दिल की जगह पर अपना ध्यान केंद्रित करें और अपनी छाती के केंद्र में एक प्रकाश पुंज चमकते हुए देखें।

जैसे ही आप अपने दिल पर ध्यान केंद्रित करे, एक सवाल इससे पूछें: “मेरा दिल क्या चाहता है?”

अपने दिमाग को उस सवाल के लिए “उकसाएं” मत। दिमाग काफ़ी उछल कूद करेगा, बस इसे इस मामले से बाहर निकाल दे । फिर आएगा आपके दिल से जवाब । वो एक मिनट में आ सकता है या इसमें एक सप्ताह लग सकता है। लेकिन अंततः आपका दिल जवाब देगा।

जब जवाब मिलेगा तब खुद ही अपने दिमाग से आप दिल और दिमाग के बीच का अंतर जान सकेंगे ।

हम जिसे दिमाग कहते हैं, वह सोचने की प्रक्रिया है,  इसके तार्किक आयाम है । इस तार्किक आयाम को ही बुद्धि कहते हैं। और  मन का गहरा भावनात्मक  आयाम हृदय या दिल कहलाता है।

हम जब कोई भी फ़ैसला लेते हैं, या  किसी नतीजे पर पहुंचते हैं तो उससे पहले हमारे दिमाग में द्वंद  चल रहा होता है- सहज बोध, दिल  और तार्किक दिमाग के बीच. इस द्वंद  में जिसकी जीत होती है, हमारा नतीजा उसी से प्रभावित होता है. |


यह सही है कि सोच का संबंध दिमाग से और भावों का संबंध दिल से होता है | अगर हम  पूरी सजगता और गंभीरता से इस पर गौर करें तो पाएँगे कि आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही महसूस करते हैं । पर यह भी सच है कि आप जैसा महसूस करते हैं, वैसा ही सोचते हैं । यही कारण है कि भाव व विचार दोनों ही हमारे मानसिक शरीर के अंग है।

अगर कोई मुझे अच्छा लगता  है तो उसके लिए मधुर भाव पैदा होते है ,वही दूसरी ओर कोई हमें अच्छा नहीं  लगता है तो उसके प्रति कटु भाव पैदा होते है |

अधिकतर  लोगों के अनुभव में विचार भावों की तरह गहन नहीं होते। मिसाल के लिए, आप जितनी तेज़ी  से गुस्सा होते हैं, उतनी तेज़ी से सोचते नहीं हैं। अगर उतनी तेजी से सोचते तो गुस्सा करते ही नहीं | विचार और भाव अलग नहीं हैं ।

नब्बे प्रतिशत लोग केवल भाव पैदा कर सकते है क्योंकि उन्होंने दूसरी दिशा में कभी पर्याप्त काम नहीं किया। पर कई लोग ऐसे होते भी हैं जिनकी सोच बहुत गहरी होती है। उनके पास बहुत अधिक भाव नहीं होते, परंतु वे बहुत गहरी सोच रखते हैं । जिसे समझदार  व्यक्ति भी कह सकते है|

अगर हम  ये सोचने है कि हम  तार्किकता से फ़ैसले लेते रहे हैं तो यह सही नहीं है क्योंकि वैज्ञानिक शोध पुष्टि करते हैं कि दिमाग में सहज बोध वाला हिस्सा कहीं ज़्यादा शक्तिशाली होता है.और  हम अधिकतर फैसला दिल से ही करते है | बाद में दिमाग उसे तर्क देकर सही ठहराने की कोशिश करता है |

हम लोग अपने दिमाग के एक  हिस्से के बारे में जानते हैं. यह समस्या को सुलझाने का विशेषज्ञ है लेकिन यह धीमे काम करता है. इसे काम करने के लिए बड़ी ऊर्जा की ज़रूरत होती है, यह दिमाग है |.

अब इसे समझने के लिए एक उदाहरण से  समझा जा सकता है. टहलते वक़्त आपसे किसी ने कोई जटिल सवाल पूछ लिया तो सबसे पहले हम रुक जाते हैं क्योंकि सजग और चौकस दिमाग एक साथ दो काम कर ही नहीं सकते.|

लेकिन इसके अलावा दिमाग में एक दूसरा हिस्सा भी होता है. जो अपने भावना  से काम करता है. यह तेज़ भी होता है और ऑटोमेटिक भी काम करता है.|  यह शक्तिशाली है, लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर नज़र नहीं आता. हालांकि यह इतना शक्तिशाली होता है कि हम जो भी काम करते हैं, सोचते हैं या मानते हैं, सबमें इसकी अहम भूमिका होती है, सच,  दिल का पलड़ा हमेशा भारी होता है |.

वैसे ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण फैसले  लेते समय दिल और  दिमाग का संतुलन रखना बहुत ज़रूरी होता है | ज़रूरी नहीं कि हमेशा दिमाग ही सही हो या हमेशा दिल ही |

आज की परिस्थिति पर विचार करें तो हम पाते है कि आदमी मशीन बनता जा रहा है | उसके लिए भौतिक सुखों की प्राप्ति, पैसा, अच्छे पद, मान – सम्मान ज्यादा मायने रखता है,  न कि मानसिक शांति और प्राकृत सौन्दर्य बोध या फिर प्यार -मोहब्बत |

तो इसका साफ़ मतलब निकलता है कि आदमी दिल से खिसक कर दिमाग की तरफ जा रहा है यानी दिमाग की ज्यादा सुनता है और  दिल की कम |

सब मिला कर देखा जाये तो …जो हम शांति और प्रेम से ज़िन्दगी जीते है …यानी दिल के अनुसार जो  क्षण जीते है वही  अपना और खरा होता है …बाकि कमाए गए दौलत – शोहरत तो क्षणिक होता है और हम जब इस दुनिया से जायेंगे तो इन  सब को छोड़ कर ही जायेंगे यानी वह कहने को अपना है पर असल में अपना नहीं है |

वैसे दिल और दिमाग की रस्सा-कस्सी तो चलती रहेगी तब तक,… जब तक शरीर जिंदा है | बस…एक तालमेल बैठा कर चलना है ताकि ज़िन्दगी में शांति और संतोष भी मिले और भौतिक सुख सुख सुविधा भी |

आप का क्या विचार है ?  मैंने ठीक कहा ना ..अपने विचार कमेंट के माध्यम से ज़रूर दे ….  

इससे पहले की घटना जानने हेतु नीचे दिए link को click करें…

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