सफलता का रहस्य

और वह समय भी आ गया जब तालियों के गडगडाहट के बीच मेरा नाम पुकारा गया ..स्टेज पर आ कर पुरस्कार स्वरुप ट्राफी ग्रहण करने के लिए |

अवसार था, दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में आयोजित बैंक के पुरस्कार वितरण समारोह का | जिसमे बैंक के मैनेजिंग- डायरेक्टर खुद उपस्थित थे अपने हाथो से पुरस्कार देने के लिए |

अंचल के महाप्रबंधक महोदय, जो कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे …उन्होंने मेरा परिचय देते हुए वहाँ उपस्थित लोगों को बता रहे थे कि यह वही  शख्स है जिनका शुरू के दिनों में इन्सुरेंस व्यवसाय का प्रदर्शन बहुत ही ख़राब था और इसके लिए हमने इन्हें डांट भी लगाई थी |

लेकिन बाद में कुछ जादू सा हुआ और ये महाशय लगातार तीन सालों से इन्सुरांस बिज़नस में टॉप का प्रदर्शन कर रहे है |

आखिर इनकी सफलता का क्या राज़ है या क्या जादू है, आप सब अवश्य जानना चाहेंगे, मैं भी जानना चाहता हूँ  |

तो आइये इन्ही से जानते है, इनके सफलता का राज़ …यह कह कर महाप्रबंधक महोदय ने माइक मेरे हाथो में थमा दिया |

मैं चूँकि  स्टेज पर बोलने से बहुत घबराता था, अतः शुरू में थोड़ी घबराहट सी हुई | फिर मैंने अपने आप को हिम्मत बंधाया और बोलना शुरू किया ….

आदमी किसी भी व्यवसाय में तभी सफल होता है जब उसे बेचने की कला आती हो | वैसे तो हर इन्सान हर समय कुछ ना कुछ बेच रहा होता है | कोई अपना समय, तो कोई अपना स्किल. या अपनी कला, या ज्ञान बेचता है |

अगर  कोई मेरा प्लान स्वीकृत कर देता है या मेरी बातो को मान कर उसे कार्यान्वित करता है तो यह भी एक प्रकार का सेल्स ही है | कहने का मतलब यह कि हर आदमी सेल्स से प्रत्येक्ष  या परोक्ष रूप से जुड़ा हुआ है | फिर भी जाने या अनजाने सेल्स के नाम से ही डरते है |

डर इस बात ही होती है कि मैं इसे कर पाउँगा या नहीं ? या अगर मेरी प्रोडक्ट को किसी ने नहीं खरीदी तो फिर क्या होगा ? तरह तरह के सवाल मन में उभरते है |

आप सब लोग यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि मैंने  बैंक का बिज़नेस को करते हुए बीमा व्यवसाय  में भी कैसे सफलता हासिल की |

आज  मैं उस घटना के बारे बताना चाहूँगा जिसके कारण मैं मोटीवेट हुआ और अंततः इस बीमा बिज़नेस में अपनी सफलता के झंडे गाड़े |

यह उन दिनों की बात है जब मैं कोलकाता के एक शाखा में शाखा प्रबंधक था |

रविवार का दिन, मैं अपने घर पर कमरे में बैठा चाय पी रहा था तभी मुझे एक फ़ोन कॉल आता है …बहुत ही सुरीली आवाज़ में एक महिला पूछ रही थी …. सर,  आप अगले रविवार  को क्या कर रहे है ?

मैंने कहा ….मतलब ?

मेरा मतलब है सर कि हमारी एक कंपनी है जिसमे एक लकी ड्रा  कल ही निकाला गया था | जिसमे आप का भी नाम टेलीफोन नंबर के आधार पर सेलेक्ट किया गया है | जिसमे आप और आपकी धर्म पत्नी को एक गिफ्ट दिया जायेगा,  बस आप को हमारे वेन्यू पर आने का कष्ट  करना होगा | यहाँ शाम ५ बजे का गेट टूगेदर का कार्यक्रम है और इसमें रिफ्रेशमेंट की भी व्यवस्था है |

आप ज़रूर आना पसंद करेगे | मैंने आप का नाम कन्फर्म कर दिया है …क्या मैं सही हूँ ?

अब उस सुरीली आवाज़ की मल्लिका को मना  करते नहीं बना | वो अगर फ्री में ही कुछ देना चाहती है तो मुझे एतराज क्यों होगा | और सन्डे को शाम में घूमना –फिरना और रिफ्रेशमेंट भी फ्री |

इसमें कुछ भी घाटा नज़र नहीं आता,  सो मैंने कन्फर्म कर दिया |

मैं तय शुदा जगह पर और सही समय पर अपनी पत्नी को ले कर पहुँच गया | एक बड़ा सा हॉल और राउंड कांफ्रेंस वाली टेबल लगी हुई थीं और सभी पर एक एक जोड़ा बैठा हुआ था |

सो मुझे भी एक टेबल ऑफर किया गया और बैठते ही पानी और चाय से स्वागत किया गया |

थोड़ी देर में एक स्मार्ट सी एक  18 -20 साल की एक लड़की आकर मेरे सामने बैठ गई और बातों का सिलसिला कुछ इस तरह शुरू हुआ |

आप अपनी पत्नी और बच्चो से बहुत प्यार करते है ?…क्या मैं  सही कह रही हूँ ना सर ?

मैंने कहा ..सही है |

आप खुद को और अपनी परिवार को आर्थिक रूप से सुरक्षित देखना चाहते है…. है ना सर ?

मैंने फिर कहा ….जी हाँ |

इस तरह  उसने वो सभी प्रश्न पूछ डाले जिसका उत्तर वही मिलता जैसा वह चाहती थी | यानि हाँ में ही ज़बाब बनता था |

थोड़ी ही देर में पता चल गया कि वह “इन्सुरेंस – पालिसी” बेच रही थी | मैं भी उसके स्किल का बारीकी से अध्ययन करने लगा | वह अपने “प्रोडक्ट | पालिसी” की सभी विशेषताएं गिनाने  लगी | मैं चुप- चाप सुनता रहा | चूँकि बैंक में मैं भी वही सब कर रहा था…. ,जी हाँ, बैंक में इन्सुरेंस पोलिसी भी बेचा करता था |

फिर करीब आधे घंटे तक बातचीत के बाद वह मेरे काम- काज के बारे में जानना चाही |

जैसे ही मैंने कहा ….मैं बैंक में हूँ और हमलोग भी आप ही की तरह पॉलिसी भी बेचते है |

सुन कर वो थोड़ी सी मायूस दिखी, फिर अगले ही पल अपने को संभाल लिया और पहले जैसी जोश के साथ पॉलिसी के बारे में समझाने लगी |

यह सिलसिला करीब ४५ मिनट तक चला, इस बीच चाय और नास्ता आते रहा |

इतनी देर तक उसकी  बक – बक सुनने के बाद, अब मेरी बारी थी |

मैंने उससे बस इतना पूछा …तुमको पता था कि तुम जो मुझे बतला रही थी मुझे सब पता है और यह भी पता था कि मैं कोई भी पालिसी तुमलोगों से नहीं लेने वाला हूँ | फिर मेरे पीछे इतना समय बर्बाद क्यों किया ?

इसपर उसका ज़बाब सुनकर मैं आश्चर्यचकित   रह गया |

वो बोली. ..सर, मुझे पता था कि आप पालिसी नहीं खरीदेगें | फिर भी मैं अपना काम उसी जोश से कर रही थी ,क्योंकि सेल्स में रिजेक्शन भी आते है उसके लिए मानसिक तौर पर हम सब  तैयार रहते है और इसीलिए मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा  |

फिर भी, क्योकि मैं तुम्हारी बात नहीं मान रहा हूँ…तो तुम्हे गुस्सा या दुःख तो होता ही होगा ?

इस पर उसने जो अपनी  कहानी सुनाई वो सुन कर मैं दंग रह गया |

उसने बताया …मैं घर में अपनी माँ और एक छोटे भाई के साथ एक किराये की मकान में रहती हूँ | कुछ दिनों पूर्व मेरे पिता जी की कैंसर से मृत्यु हो गई थी | उनके बिमारी में सारे पैसे ख़त्म हो गए और मज़बूरी में मुझे नौकरी करनी पड़ी |

मैंने अपना ग्रेजुएशन बीच में ही छोड़ दिया | किसी  भी काम का कोई अनुभव नहीं होने के कारण,  मुझे मज़बूरी में इस प्राइवेट कंपनी में इन्सुरेंस पालिसी बेचने का काम मिला |

शुरू शुरू में तो किसी को भी अपना प्लान दिखाओ तो मना ही कर देता था | मैं रोज सोचती कि यह नौकरी मेरे बस की बात नहीं है | फिर मेरे सहयोगी मुझे हिम्मत देते और तब मैंने सीखी कि इस बिज़नेस के कुछ बेसिक सिद्धांत है… उसका पालन करना होगा |

मैं रोज़ सुबह सात बजे घर से निकल जाती हूँ और पहले ऑफिस में आकर एक घंटे अपने को charged up करती हूँ | हमारे बॉस उस समय हमलोग को मोटिवेट करते है | फिर दिन भर उसी एनर्जी से अपने ग्राहकों को प्लान दिखाती रहती हूँ और अपने मन में सोचती रहती हूँ कि मुझे अपनी बेस्ट परफोर्मेंस देना है |

चाहे कितनी भी रिजेक्शन मिले, मैं अगला ग्राहक में एक नए जोश और उत्साह से लग जाती हूँ | अब तो मुझमे बहुत धैर्य भी आ गया है और समझदारी भी |

उसकी कहानी को सुनकर मैंने  मन में सोचा कि यह छोटी सी लड़की इस जोश और लगन से इस challengable काम को कर सकती है तो मैं अपने बैंक के लिए इन्सुरेंस पालिसी क्यों नहीं बेचने में सफल हो सकता हूँ |

मैं दुसरे दिन से ही उन्ही बेसिक सिद्धांत को फॉलो कर काम  शुरू कर दिया | बस मैं दो चीजों का ख्याल रखता था…रिजेक्शन  से  घबराना नहीं है और  किसी ग्राहक के सामने, चाहे वह कुछ भी बोले अपना धर्य खोना नहीं है |

शुरू में मुझे भी काफी रिजेक्शन  मिले | काफी उलटी सीधी बातें सुननी पड़ी पर मैंने हार नहीं मानी |

एक कहावत है कि “हार के बाद जीत” है ….तो मैंने हार को पीछे छोड़ दिया है और जीत के साथ आप सबों के सामने हाज़िर हूँ इस सुन्दर ट्राफी के साथ |

मेरी बात समाप्त हुई और हॉल तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा ………..

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I am Vijay Kumar Verma, residing in Kolkata, the city of joy. I was a Banker since December 1985 and retired in April 2017 from State Bank of India. After serving the Bank for 32 years as an officer holding different assignments from time to time, now I am currently enjoying the retired life. I would like to fulfil the duty of social service through this platform spreading aware about the health related problems and their remedies. I will also try to entertain my followers through knowledgeable information and motivate them to enjoy better and quality lifestyle. It is my endeavour to keep the post friendly and as informative as I can. I am willing to connect with my friends and followers, through my stories and drawings out of my passion to write and make sketches. I would like to create a trusted and joyful friend circle, and share tales from the past

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