# पत्थरों का शहर #…4

उस चाय वाले को समझते देर नहीं लगी कि भाइयों में झगडा हुआ है | इसलिए वह बोला  .. आप सही बोल रहे है …जहाँ दिल नहीं मिलता वहाँ जाने की इच्छा नहीं होती है | छोडिये इन बातों को, आइये इस चूल्हे की आग से अपनी ठंढक को भगाइए | और एक स्टूल राजेश्वर को बैठने के लिए दिया |

धन्यवाद भाई , तुमने इस ठण्ड वाली रात में मुझे बहुत मदद की है |

अरे भाई, इंसान ही तो इंसान के काम आता है …चाय वाले ने कहा |

फिर कुछ देर यूँही बैठे रहने के बाद चाय वाले ने पूछा …आप तो किसान लगते हो , खेती करते हो क्या ?..आप के चेहरे से लगता है कि आप खेती करते है लेकिन  दुखी भी लग रहे है |

मैं किसान ज़रूर हूँ पर खेती से मेरी आमदनी इतनी नहीं हो पाती है कि घर वालों के पेट भर सकूँ | ….इसलिए एक चाय और नास्ते की दुकान खोल रखी है …राजेश्वर बोला |

आप ठीक कह रहे है ..,,पेट भरने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ता है | आपने चाय की दूकान खोली है तो  आप मेरी लाइन के ही निकले …चायवाला हँसते हुए बोला |

लगता है आप पहली बार यहाँ आये है, इसलिए इस रूट की ट्रेन की जानकारी नहीं है …चायवाले ने कहा |

तुम ठीक कह रहे हो …राजेश्वर संक्षिप्त सा उत्तर दिया |

आप कब यहाँ आये थे ….उसने  उत्सुकता से पूछा |

आज ही आया था और आज ही वापस भी जा रहा हूँ …राजेश्वर शांत स्वर में बोला  |

आप तो बोल रहे थे कि आप का अपना छोटा भाई है, फिर इतनी जल्दी क्यों वापस जा रहे है ?..उसने उत्सुकता से पूछा |

जो सपना लेकर आया था वो तो टूट गया तो यहाँ रुकने से क्या फायदा ?..राजेश्वर की आँखों में आंसूं आ गए |

आप का भाई करता क्या है  ? …उसने बात को आगे बढ़ाते हुए पूछा |

वो तो बहुत बड़ा इंजिनियर है, उसके पास  बड़ा बंगला, कार वगैरह सब कुछ है | ..लेकिन लोग ठीक ही कहते है,   कि जब घर, घर ना रह कर वो पत्थर के महल  में तब्दील हो जाए तो  उसमे  रहने वाले लोगों के  दिल भी पत्थर का  हो जाता है  |…..,

मकान के कमरे बेशक  बड़े होते जा रहे है लेकिन लोगों के दिल में जगह छोटी होती जा रही है . .और उनकी मानसिकता और सोच भी |

उनके लिए तो घर–परिवार,  रिश्ते-नातों  की अहमियत नहीं होती है |…वे बस अपनी बीबी- बच्चों में ही खुश रहते है …..राजेश्वर चूल्हे की आग में अपने हाथों  को सेंकता हुआ बोला |  

राजेश्वर की नज़रे चूल्हे से निकलने वाली लौ पर टिक गई….और वह बोले जा रहा था मानो अपने  दिल के गुबार को, शायद शब्दों में व्यक्त करना चाह रहा हो  |

चाय वाले  को उनकी  बात दिल पर लगी और वह उत्सुकता वश बोला ….बड़ा अजीब इत्तेफाक है भाई |  मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है | आज कल ज़माना कितना बदल गया है ?  

भाई, बेटा, भतीजा सब रिश्ते अब केवल  कहने के लिए रह गए है | सच्चाई तो यही है कि पैसे और स्वार्थ के पीछे  हरेक आदमी खून के रिश्तों का भी सौदा करने से नहीं चूक रहा है | वो, न केवल अपना ईमान बेच रहा है, .बल्कि वह मनुष्य से हैवान ही बनता जा रहा है |

अब मेरी ही बात ले लीजिये | बहुत मेहनत  से मैंने अपने बेटे को पढाया – लिखाया था |  उसके पढाई की खातिर मेहनत – मजदूरी की, चाय की दूकान खोली,  बहुत कष्ट उठाये है हमने, और इस तरह उसे पढ़ा लिखा कर बड़ा आदमी बनाया |

आज मेरा बेटा बड़ा आदमी बन गया है,  बैंगलोर में रहता है और अच्छी नौकरी  करता है | सब कुछ है उसके पास ….बड़ा सा बंगला है ……उस बंगले में नौकर -चाकर,  कुत्ते- बिल्ली  कार- स्कूटर सब के लिए जगह है, अगर जगह नहीं है तो सिर्फ हम दोनों माँ – बाप के लिए |

अब देखिये ना, अब मेरी आराम करने की उम्र आयी है तो अपना भाग्य ही रूठ गया | और आज भी हम ठंडी रातों में फटे बिस्तर पर सो रहे है, चाय बेच कर,  लोगों के जूठे प्लेट धोकर गुज़ारा कर रहे है |

हाँ,  इतना संतोष है कि हमने आज तक  किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया है और आज भी मेहनत  मजदूरी कर के पेट भर रहे है ….चाय वाला भी अपने दिल में छुपे दर्द  को व्यक्त कर रहा था | शायद इसी बहाने अपने दिल की बोझ को हल्का करना चाह रहा था |

राजेश्वर उसकी बात  सुन कर काफी दुखी हो गया | …उसके दुःख के आगे अपना दुःख उसे छोटा लगने लगा   और वह मन ही मन बोला…..पता नहीं, क्या हो गया है .आज कल की नयी  पीढ़ी को .

हम अपने ज़माने की बात करें तो हमारे जो संस्कार थे कि अपनी बुजुर्गो की मदद करना, उनकी इज्जत करना,  वो आज के बच्चो में तो है ही नहीं |

आज के बच्चे पाश्चात्य सभ्यता को अपना रहे है और अपने बड़े बुजुर्गों से रिश्ता ही तोड़ ले रहे है | बीबी बच्चे और वो , यही दुनिया रह गई है उसकी | और यहाँ हम चाय बेच कर दोनों प्राणी गुज़ारा करते है | लेकिन आज तक उसके सामने हाथ फ़ैलाने नहीं गया |

हमलोग पुराने विचार के आदमी है, कम पढ़े और गरीब है तो क्या हुआ,  परन्तु हमारे दिल में बड़ी जगह है और हम अपने संस्कारों को भूले नहीं है | लेकिन आज कल की पीढ़ी, संस्कार और रिश्ते नाते सब भूल गई है | लगता है हमलोग की परवरिश में ही कोई कमी रह गई है |

इस तरह  बातो बातों में समय का पता नहीं चला और ट्रेन आने का समय हो गया |

राजेश्वर वहाँ से उठा और  चाय वाले  को धन्यवाद कह कर ट्रेन की टिकट लेने चला गया |

सुबह सुबह करीब आठ बजे  राजेश्वर घर के अंदर दाखिल हुआ |

इतनी जल्दी सुबह -सुबह  कैसे आ गए ..? कौशल्या ने आश्चर्य से पूछा |

हाँ भाग्यवान, उसके घर से रात में ही निकल गया था..राजेश्वर कपडे बदलते हुए बोला |

कौशल्या को समझते देर ना लगी कि बहु ने ज़रूर खुछ खरी -खोटी सुनाई होगी,  इसीलिए गुस्से में उसके घर में ठहरना उचित नहीं समझा |

वो थका हारा आया था इसीलिए उससे इस बारे बे अभी कुछ भी चर्चा करना ठीक नहीं समझा |

मैं अभी आप के लिए नास्ता तैयार करती हूँ ..बोलते हुए कौशल्या किचेन में चली गयी |

नास्ता समाप्त कर राजेश्वर दूकान के लिए निकल गया | दूकान पहुँचा तो कालू ज़ल्दी से सेठ जी के लिए चाय लेकर आ गया |

राजेश्वर चाय पिया और कालू से दुकान का हिसाब किताब मिलाने के बाद बोला ..मैं अभी वकील साहब के पास से आता हूँ | ये बोल कर दूकान से निकल गया |

राम राम वकील साहब …बोलकर राजेश्वर सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गया |

वकील साहब उनको देखते ही बोले..आइये राजेश्वर बाबू …भाई से मिल आये ?

हाँ, वकील साहब,  कल ही गया था और आज आ भी गया …राजेश्वर दुखी मन से बोला |

मैं समझ सकता हूँ आप के मन की पीड़ा को ..वकील साहब सांत्वना देते हुए बोले |

खैर, छोडिये उन सब बातों को और उस नोटिस का ज़बाब बनाइये …राजेश्वर मन को मज़बूत कर बोला |

हाँ हाँ , आप आ गए है तो उस पर चर्चा कर लेते है ..वकील साहब फाइल निकालते  हुए बोले |

इसमें चर्चा करने की ज्यादा गुन्जाईस नहीं हैं | सीधी सी बात है कि उसकी पढाई के लिए जो ज़मीन साहूकार के पास रेहन  रखी हुई है, पहले उस  कर्जे का  भुगतान कर ज़मीन  छुड़वाना पड़ेगा | उसके बाद ही नियमतः बंटवारा की बात हो सकती  है …राजेश्वर को अपने भाई पर गुस्सा बहुत गुस्सा आ रहा था |

ठीक है राजेश्वर बाबु,   हम वैसा जी ज़बाब बना देते है | आप कल आकर कुछ ज़रूरी पेपर पर दस्तखत कर दीजियेगा |

अच्छा ठीक है, तो मैं अभी चलता हूँ | रात में सो नहीं सका था, इसीलिए थोडा आराम करना है …राजेश्वर बोल कर वहाँ से निकल गया |

राजेश्वर लौट कर अपने दुकान आ ही रहा था कि चार पांच लठैत रास्ते में ही घेर लिया |

उन्होंने प्रश्न भरी निगाहों से  उनलोगों को देखा, तो लठैत उसे घूरते हुए बोले ..आप को अभी मेरे सेठ जी ने बुलाया है |

कौन सेठ जी ?…राजेश्वर अनजान लोग को देख कर पूछ बैठा |

वही सेठ जी जिनके पास आपने अपने ज़मीन को रेहन  रखा हुआ है….उसने आँखे दिखाते हुआ बोला |

ठीक है मैं कल मिल लूँगा ..उसने उससे पीछा छुडाने  के ख्याल से कहा |

नहीं, आप को अभी चलना होगा, मुझे निर्देश मिला है कि आप को साथ लेता आऊँ |

राजेश्वर उनलोगों के हांथो बेइज्जत होना नहीं चाहता था ,इसलिए उन लोगों के साथ चलना ही मुनासिब समझा |

वो छाता लेने के लिए अपनी दूकान आया तो साथ में लठैत देख कर कालू ने सेठ जी से पूछ लिया …ये यहाँ किस लिए आये है |

दरअसल ,ये मेरे साहूकार के लोग है और उन्होंने बुलाया है | ऐसी कोई चिंता की बात नहीं है ..राजेश्वर ने  कालू के शक को दूर कर दिया |

थोड़ी देर में राजेश्वर उस साहूकार के पास पहुँच गया | राजेश्वर को सामने पाकर साहूकार धमकी भरे  लहजे में कहा …राजेश्वर,  तुमने पांच साल के लिए मुझसे खेत रेहान रख कर क़र्ज़ लिया था और आज सात साल बीत चुके है | बार बार मोहलत लिए जा रहे हो |

पिछली बार बोला था कि तीन माह के अंदर अपने छोटे भाई से मिलकर मेरा हिसाब बराबर कर दोगे और वो भी समय पार हो गया है |

मैं तुमको इस लिए बुलाया है कि आने वाले दस दिनों के अंदर मेरा सारा बकाया नहीं जमा करते हो तो मैं तुम्हारी खेतों में खड़ी फसल को काट लूँगा और तुम्हारा खेत पर भी कब्ज़ा कर लूँगा | इसे मेरी अंतिम चेतावनी समझो … साहूकार राजेश्वर के सामने गरज रहा था |

राजेश्वर उसकी बातों को सुन रहा था लेकिन कोई ठोस उत्तर देने में असमर्थ था, क्योंकि वो जानता है कि भाई तो पैसा क्या देगा,  वो उल्टे हम से ही पैसा मांग रहा है….क्रमशः  |

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