वह सांवली सी लड़की – राम्या

रविवार का दिन था / मैं परिवार वालों के साथ बैठा फिल्म देख रहा था तभी छोटी बेटी , नेहा चिल्लाई ..अरे पापा आपका मोबाइल  बज रहा है /

बेटी मोबाइल देना तो  देखूं ,कौन है ? मैं अलसाए स्वर में बोला /

अच्छा लाती  हूँ पापा …और नेहा फ़ोन हाथ में देकर  चली गई / मोबाइल में कॉल करने वाले का नाम डिस्प्ले हो रहा था / नाम को देख कर मैं चौक उठा / अपनी चोर नज़रे इधर उधर घुमाई / कोई देख तो नहीं रहा है ? जब इत्मीनान हो गया की सब टीवी देखने में व्यस्त है तो धीरे से उठ कर अपने कमरे में आ गया , यह सोच कर कि इत्मीनान से बातें  करेंगे /

जब तक मैं कमरे में पहुँचा तब तक कॉल कट गया था / सोचा चलो इंतज़ार करते है , शायद कॉल करने वाला दोबारा कॉल करे / फिर कुछ  सोच कर वह अपनी नादानी पर हंस पड़ा / अरे , मुझे डरने की क्या बात है ? कॉल करने वाले का नाम  रमाकांत मोबाइल में सेव है / भला रमाकांत नाम पढ़ कर कोई थोड़े ही न समझेगा  कि किसी लड़की का फ़ोन है ..राम्या  का /

वह कॉल का इंतज़ार करता रहा  पर कॉल फिर नहीं  आई / ऐसा दूसरी बार हुआ है ,जब वह इसी नम्बर पर इधर से फ़ोन करता  है तो ..स्विच ऑफ का मेसेज आता / इसका क्या मतलब भला ?  शायद जब भी वह कॉल करती है तो फ़ोन ऑन करती है और फिर उसे स्विच ऑफ  कर देती है /  भला यह क्या चक्कर है ? कहीं पत्नी को पता चल गया तो ..कहेगी ..इ बुढौती में जब बाल बच्चे जवान हो रहे है तो आप पर इश्क करने का भूत सवार हुआ है /

अब उसे कौन समझाए भला कि इश्क का भूत तो राम्या पर सवार हुआ है | और शुरुवात तो उसने की है/ भला मैं उस दिन को कैसे भूल सकता हूँ जब उसने पहली बार फ़ोन किया था / मैं ऑफिस में ज़रूरी फाइलें निबटा रहा था कि मेरी मोबाइल की घंटी बजी / अनजान नम्बर देख कर मैंने कॉल रिसीव नहीं किया /सोचा ,पता नहीं कौन है, , चलो बाद में देखते है / फिर मैं काम में व्यस्त हो गया / पांच मिनट बाद फिर कॉल आया  उसी नम्बर से // अब चुकी काम मैंने निपटा लिए  थे अतः सोचा देखे कौन कॉल कर रहा है /

हेल्लो, मैंने धीरे से कहा /

हेल्लो  उधर से एक मीठी खनकती हुई ज़नानी  आवाज़ आई / लगा जैसे कोयल कूक रही हो / मैं चौक गया और अपनी कुर्सी पर सावधान हो कर बैठ गया /

मैं राम्या  बोल रही हूँ…उधर से आवाज़ आई /

कौन राम्या  ? मैंने अपने दिमाग पर जोर लगाया / मैं  तो किसी राम्या  को नहीं जानता हूँ / कृपया अपना परिचय दें / उधर से एक खनकती हुई हँसी सुनाई दी / मर्दों की यही फितरत होती है प्यार करो और भूल जाओ,  उधर से आवाज़ आई /

क्या ? आप क्या बोले जा रही है / मैं तो आपको जानता भी नहीं हूँ /

जानते तो है श्रीमान प्रशांत जी उर्फ़ शांत जी …पर शायाद भूल गए है / वैसे वक़्त भी तो काफी बीत गया  है / करीब तीस  साल तो हो ही गए होंगे / क्यों मैं ठीक कह रही हूँ न ?

अरे, तुम्हे मेरा नाम कैसे मालूम है ? अब मैं सचमुच घबरा गया था / ललाट पर पसीने की बुँदे दिखने लगी थी / मेरा नाम प्रशांत था लेकिन चूँकि बहुत शांत स्वभाव का था तो लोग मजाक में मुझे शांत कह कर बुलाते थे /

और सुनो मिस्टर शांत …मैं तुम्हारे बारे में बहुत कुछ जानती हूँ कि तुम एक लड़की से प्यार करते थे, उसका चक्कर लगाते थे पर वह तुम्हारी तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखती थी /

मैं सचमुच पानी पानी हो रहा था ./ मैंने लगभग गिडगिडाते हुए कहा …तुम कौन हो ? अब तो अपना परिचय दे दो /

उधर से हंसने की आवाज़ आई / एक बात बताऊँ ? तुम वैसे तो लड़कियों से दूर भागते थे और क्लास में पीछे बैठते थे लेकिन एक दिन हिम्मत कर के लड़कियों के पीछे वाले बेंच पर बैठ गए थे / और गुलशन जो क्लास का दादा था और लड़कियों के पीछे वाले बेंच पर बैठना अपना जन्मजात अधिकार समझता था उसने तुम्हारी किताबें  फेक दी थी और तुम्हे धक्का देकर उस बेंच से भगा दिया था / क्यों याद है न ?

अब मुझे विश्वास हो चला था कि यह लड़की ज़रूर मेरे कॉलेज की कोई सहपाठी है..पर कौन ? उस समय तो हमारी क्लास में पांच लड़कियां ही थी , पर राम्या  नाम तो किसी का नहीं था और न  ही किसी लड़की से मेरा चक्कर ही था (मेरी हिम्मत ही नहीं होती थी किसी लड़की से बात करने की, फिर चक्कर क्या होता )

मैंने ने कहा ..देखिए ..अब आप पहेलियाँ बुझाना बंद कीजिये / प्लीज बताइये कि आप कौन हैं ?

अरे बोला ना , मेरा नाम राम्या  है /

पर राम्या  नाम की कोई लड़की तो मेरे क्लास में नहीं पढ़ती थी /

मैं कब कह रही हूँ कि मैं आपके क्लास में पढ़ती थी /

तो फिर मेरा नाम और मेरे कॉलेज के दिनों के बारे में इतनी सारी बातें कैसे जानती हो /

मैं आपसे एक साल जूनियर थी , कुछ याद आया ?

मैं कुछ याद करने की कोशिश करने लगा /

वह फिर बोली….याद कीजिये / आपके कॉलेज जाने के रास्ते में फारेस्ट डिपार्टमेंट का क्वार्टर था / उसमे एक सांवली सलोनी लेकिन सुन्दर सी लड़की रहती थी / जब भी आप उधर से गुज़रते उस क्वार्टर को निहारते थे कि शायद उस लड़की का दीदार हो जाये / और एक दिन जब आप ने उसे खिड़की पर खड़े देखा तो अपनी नज़रे हटा नहीं पाए और उधर देखते ही  रह गए और एक सिरफिरे साइकिल वाले ने आपको ठोकर मार दिया था /

मुझे लगा किसी ने मुझ पर ठंडा पानी उड़ेल दिया हो / अब याद आ रहा था वो घटना / उस साइकिल एक्सीडेंट में मेरे  बाएं हाथ में हल्का फ्रैक्चर हो गया था और प्लास्टर चढ़वाना पड़ा था /

तो यह लड़की राम्या है जिसका सचमुच में दीवाना था /

हालाँकि मैं बड़ा शरीफ दीवाना था , किसी को पता नहीं चलने देता था कि मैं उस लड़की को चाहता हूँ, पर यार दोस्त को पता चल ही गया था एक्सीडेंट के बाद / और तो और शायद उस लड़की को भी पता चल गया था कि मैं उसे देखने के चक्कर में चोटिल हो गया हूँ / अतः एक दिन वह मुझे देख कर मुस्कुराई थी…शायद हर्जाने के तौर पर /

हमारे समय में किसी लड़की से दो बात कर लेना ही बड़ी बात थी / साथ घूमना – फिरना तो दूर की बात थी / मुझे याद है जब डिबेट में मुझे प्रथम पुरस्कार मिला था तो बहुत सारे लोग मुझे बधाई दे रहे थे / वो भी सामने खड़ी थी बधाई देने के लिए / पर वह तब तक इंतज़ार करती रही जब तक सबलोग वहाँ से चले नहीं गए /

फिर वह पास आयी …बधाई हो सर ,

धन्यवाद / पर सर क्यों बोल रही हो ?

आप मेरे सीनियर है न इसलिए,  और वह खिलखिलाते हुए हँसी और तेज़ क़दमों से गर्ल्स कॉमन रूम की तरफ चली गई / मेरा दोस्तों  को यह  दिखाने . का अरमान  कि  देखो मुझ से भी कोई लड़की बात  करती है,  धरा का धरा रह गया /

फिर बहुत दिनों के बाद उससे सामना हुआ / जूलॉजी प्रैक्टिकल क्लास से मैं निकल रहा था और उसके क्लास के लोग हमलोगों के निकलने का इंतज़ार कर रहे थे / उसके बाद का क्लास उन्ही लोगों का था /

वो कुछ दूर खड़ी थी /

हेल्लो, कैसी हो ? मैंने पूंछा /

ठीक हूँ …उसने छोटा सा ज़बाब दिया / शायद अपने आस पास खड़े साथियों से डर रही थी /

राम्या, कल शाम में ऑडिटोरियम में एक कवि – सम्मलेन का आयोजन किया गया है ..तुम आओगी न ? मेरी भी कविता होगी /

नहीं आ पाऊँगी ..वह बोली /

क्यों भला ? मैंने आश्चर्य से पूछा /,,,     

क्योंकि सारे कवि मुझे बेवकूफ लगते है और सारी कविताएँ बकवास/

मैं जानता था कि  मुझे चिढाने के लिए ऐसा बोल रही है / वह उस कवि  सम्मेलन में कहीं दीखाई नहीं पड़ी थी, तो दुसरे दिन मैंने शिकायत के लहजे में कहा था ..तो तुम्हे कवितायेँ पसंद नहीं है /

किसने कह दिया ? मुझे तो पसंद है और खास कर वो कविता जो तुमने पढ़ी थी ..और उसने मेरी कविता के कुछ पंक्तियों को दुहरा दिया /

मुझे आश्चर्य हुआ / कैसी लड़की है ? ..

मैं पुरानी यादों में खो गया था / तभी उधर से आवाज़ आयी,  बाद में फ़ोन करुँगी और फ़ोन कट गया /

मैं अचंभित , मंत्रमुग्ध और निहाल अपनी जगह पर जड़ बैठा था / फ़ोन तो कट गया था …पर पुरानी बातें दिमाग में घुमने लगी थी /

ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव, घर-परिवार, दोस्त, नाते -रिश्ते और यहाँ तक का सफ़र यानी नौजवान से बुढापे तक का सफ़र सब याद आ रहा था /

उसके बाद तो …रोज़ ही उसके फ़ोन का इंतज़ार रहने लगा… / मैंने उसके नंबर को राम्या  के बदले रमाकांत सेव किया था /

और आज इतने दिनों बाद उसका फ़ोन आया भी तो बात नहीं हो सकी / मैं बस इंतज़ार ही करता रहा और कर भी क्या सकता था/

क्या बात है ? किसके फ़ोन का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हो ? मिसेज़ ने पूछा तो तन्द्रा भंग हुई /

नहीं नहीं, एक दोस्त है रमाकांत, बस उसी का फ़ोन था / फ़ोन कट  गया अतः बात नहीं हो सकी.. मैंने ज़बाब दिया /

एक सप्ताह बाद , रविवार का दिन था और मैं टी वी पर मूवी देख रहा था ..”साढ़ की आँख” / बड़ा मज़ा आ रहा था कि मोबाइल की घंटी बजी / मैंने बिना नंबर देखे कॉल रिसीव किया …हेल्लो,/ फिर अचानक चौक उठा, उधर से राम्या  बोल रही थी /

मिसेज़ ने मुझे घूरते हुए कहा ..क्या बात है ? क्यों चौक गए आप ?

कुछ नहीं , बस यूँ ही  और मैं बाहर बालकनी में आ गया /

हाँ तो मिस्टर शांत, कैसे है आप ?

राम्या, अब तो बता दो कि कहाँ से बोल रही हो ? अभी तुम कहाँ हो ? अरे अपने घर परिवार के बारे में कुछ तो बताओ ? मैंने खुशामदी लहजे में धीरे से कहा /

उधर से हंसने की आवाज़ आई / मैं तो तुम्हारे शहर में ही हूँ / तुम्हारे आस- पास ही / मेरा भी परिवार है ,बच्चे है /

तो क्या हमलोग मिल नहीं सकते ? तुमसे ढेर सारी बातें करना चाहता हूँ / मैंने बच्चो जैसी अधीरता से कहा /

उधर से फिर हंसने की आवाज़ आई / मिस्टर शांत आप अभी भी बिलकुल पहले जैसी बातें कर रहे है …वही अंदाज़…कुछ भी नहीं बदला है /

मैंने गुस्से से अपना मोबाइल ऑफ कर दिया / कुछ ही देर में मोबाइल की घंटी फिर बजी / उसी का फ़ोन था / शायद उसे अंदाज़ हो गया था कि मैं नाराज़ हो गया हूँ / उधर से आवाज़ आयी ..तुम मिलना चाहते हो न मुझसे ?

हाँ, मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ ..मैंने कहा /

ठीक., .कल मिल सकते हो क्या. ? .उधर से आवाज़ आयी /

हाँ हाँ ,..कहाँ और कब मिलना है ? बताओ…मैंने कहा /

शाम को पांच बजे …इको पार्क, गेट नंबर एक के बाहर और इतना कह कर उसने कॉल काट दिया /

और अब मैं कल के पांच बजने का इंतज़ार लगा / समय जैसे पहाड़ लग रहे थे / घडी की सुई मानो आगे बढ़ ही नहीं रही थी /

खैर , दुसरे दिन शाम को चार बजे तैयार हो गया /  नया शर्ट पेंट,  बाल मूंछे अच्छे से सेट करवाया था /

मिसेज़ ने मजाक में कहा …अरे आज तो बड़े सज -संवर रहे हो ..क्या किसी लड़की से मिलने जाना है क्या ?

मेरा कलेजा धक् से कर गया  / इसे कैसे मालूम ? नहीं नहीं ..यह मज़ाक कर रही है /मैंने मन ही मन अपने को समझाया / पर उसके चेहरे की कुटिल मुस्कान देख कर थोड़ी हडबडाहट भी होने लगी / इसे कुछ मालूम तो नहीं ?

खैर ..आधा घंटा पहले ही वहाँ पहुँच कर उसका इंतज़ार करने लगा / समय काटे नहीं कट रहे थे /

कैसी दिखती होगी वो ? क्या बात करेंगे ? सोच कर घबराहट हो रही थी , मानो कोई चोरी करने जा रहा हूँ /

पांच बज गए …साढ़े पांच बज गए  पर वह नहीं आई / मैंने इधर से कॉल लगाया पर हमेशा की तरह स्विच ऑफ  का मेसेज आ रहा था /

मैं दुखी मन से घर लौट गया /

तीन चार दिन बाद फिर उसका फ़ोन आया / मैंने गुस्से में कहा …हेल्लो ./..

मैं जानती हूँ तुम बहुत नाराज़ हो …आई ऍम सॉरी  बाबा,  कान पकड़ कर माफ़ी मांगती हूँ , वह बोले जा रही थी पर मैं खामोश ही रहा /

मैं क्यों नहीं आई ..नहीं पूछोगे ? मेरी मज़बूरी तो समझो / उस दिन मैं तैयार हो कर घर से निकल चुकी थी पर तभी मेरे पतिदेव का फ़ोन आ गया …उनकी तबियत थोड़ी खराब हो गई थी / अतः अपने घर आने की सुचना दे रहे थे / अब तुम्ही बताओ ? मैं कैसे आती ?

मेरा गुस्सा ठंडा हो गया था / मैंने बुझे मन से कहा …कोई बात नहीं , फिर कभी …

बस, अगले सन्डे को मिलते है ..ठीक उसी जगह, इस बार मिस नहीं करुँगी ..प्रोमिस ..

ठीक है , मैंने कहा /

अगले सन्डे को मैं तैयार हो रहा था कि उसका फ़ोन आ गया / पूछ रही थी …आ रहे है ना ?

हाँ हाँ, मैं तो आ रहा हूँ …पर इस बार तुम मिस नहीं करना /

नहीं करुँगी बाबा…उसने हँसते हुए कहा /

मैं जब घर से निकल रहा था तो मिसेस ने फिर टोक दिया / देखो जी ..मुझे तो आप के रंग ढंग ठीक नहीं लग रहे है / पुरे सज-सवंर कर जा रहे हो / किसी लड़की से मिलना है क्या ?

मैं सहम गया / मन में चोर था ही ..सोचा इसे कैसे मालूम ?   

फिर सोचा, बस अँधेरे में तीर चला रही है और मैं घर से निकल गया /

इस बार भी पहले की तरह उसके बताये स्थान पर उसका इंतज़ार करता रहा /समय बीतते रहे पर वह नहीं आयी /

मैं निराश हो गया ..सोचने लगा …कोई मुझे बेवकूफ तो नहीं बना रहा है ?

तभी मैं चौक उठा ..एक अधेड़ लेकिन सुन्दर सी औरत मेरे पास खड़ी थी /

हेल्लो, आप प्रशांत है न ? मैं हूँ राम्या  .. उसने हाथ जोड़ कर प्रणाम किया /

मैं अकबकाया ..यह मुझे कैसे पहचान गई ? बचपन में जिसने मुझे देखा है वह तो पहचान ही नहीं पायेगा / मैंने सोचा था पहले फ़ोन कर मेरा लोकेशन पूछेगी .. फिर मेरे ड्रेस का रंग पूछेगी / पर यह तो सीधे मेरे पास आ गई /

एक और बात खटक रही थी / राम्या  तो थोड़ी सांवली थी …यह तो गोरी है …राम्या  ने कौन सा “फेयर एंड लवली”  इस्तेमाल की है  कि गोरी हो गई है ?

मैंने अविश्वास भरी नज़रों से घूरते हुए पूछा …क्या तुम राम्या ही हो ?

तभी मेरे पीछे से आवाज़ आई …नहीं ये मेरी बहन प्रीती है / मैंने पीछे मुड कर देखा तो चौक गया / काटो तो खून नहीं / पीछे मेरी पत्नी खड़ी थी / वह बोल रही थी,.यह मेरे मामा की लड़की है / पहले ये लोग दिल्ली में रहते थे / अभी इनके पति का ट्रान्सफर पटना हुआ है, तो ये लोग पटना आ गए है / बहुत दिनों से यह आपसे मिलवाने की जिद कर रही थी तो मैं इसे आप से मिलवाने लाई हूँ /

पर.. राम्या,.. फ़ोन ….यह सब क्या चक्कर है ? ..मैंने आश्चर्य से पूछा /

इस पर पत्नी बोली…तुम्हारे सारे चक्कर के बारे में मुझे पता  चल चुका है / बड़े शरीफ बनते हो ..आज घर चलो , बताती हूँ /

अरे अरे, जीजा जी / घबराइए नहीं ..मैं बताती हूँ सारी बात / मैं आपकी साली प्रीति हूँ और आप से बहुत दिनों से मिलना चाह रही थी / तो आज दीदी ने मिलवा दिया..बस ..वह मुस्कुरा रही थी /

पर राम्या  का क्या  चक्कर है  और उसके बारे में इतनी सारी बातें तुम कैसे जानती हो ? मैंने आश्चर्य से पूछा /

अरे जीजी जी, ..वो तो आप के कॉलेज के दिनों की डायरी दीदी के हाथ लग गए थे …  जब वह आप के पुराने बुक सेल्फ  की सफाई कर रही थी / आप की डायरी पढ़ कर ही हमें सारी बातें मालूम हुई थी और हमलोगों ने प्लान बनाया आपको बेवकूफ बनाने का / …अब इतना तो हक़ बनता ही है साली का / वैसे सुनते है कि आप कहानी भी लिखते है …तो कैसी लगी हमारी कहानी ?

ओफ ..तो ये बात है / दोनों ने मिलकर मुझे बेवकूफ बनाया है पर इस पर एक कहानी तो बन ही सकती है /

क्यों दोस्तों …आप की क्या राय है ? कहानी तो ठीक बनी है न ?…   

आज की  यह कहानी मेरे अज़ीज़ दोस्त किशोरी  रमण  द्वारा लिखी गई गई है, आशा है आप सब को पसंद आएगी…

BE HAPPY… BE ACTIVE … BE FOCUSED ….. BE ALIVE,,

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Published by vermavkv

I am Vijay Kumar Verma, residing in Kolkata, the city of joy. I was a Banker since December 1985 and retired in April 2017 from State Bank of India. After serving the Bank for 32 years as an officer holding different assignments from time to time, now I am currently enjoying the retired life. I would like to fulfil the duty of social service through this platform spreading aware about the health related problems and their remedies. I will also try to entertain my followers through knowledgeable information and motivate them to enjoy better and quality lifestyle. It is my endeavour to keep the post friendly and as informative as I can. I am willing to connect with my friends and followers, through my stories and drawings out of my passion to write and make sketches. I would like to create a trusted and joyful friend circle, and share tales from the past

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