# नमक हराम #….1

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राजेश्वर दनदनाता हुआ वकील साहब के चैम्बर में घुस गया | वैसे उसकी वकील साहब से पुरानी जान पहचान थी| वकील साहब किसी केस के फाइल में उलझे हुए थे | अचानक राजेश्वर को सामने देख कर वो बोले …,बहुत दिनों बाद इधर आये राजेश्वर जी, कोई ज़रूरी काम है क्या ?

राजेश्वर की कचहरी के परिसर में ही चाय और नास्ते की दूकान थी और वकील साहब अपने स्टाफ और मुवक्किल के  लिए चाय एंड नास्ता उन्ही  की दूकान से मंगाते थे | राजेश्वर ईमानदार और कुछ पढ़ा भी लिखा था और ग्राहक को कैसे संतुस्ट किया जाए वो भली भांति  जानता था | इसलिए उसके दूकान पर तो भीड़ लगी रहती थी |

हाँ वकील साहब, मुझे आप से एक बहुत ज़रूरी बात करनी है | आज राजेश्वर परेशान दिख रहा था, धुप में काला  हुआ चेहरा और दाढ़ी बढ़ी हुई थी और उसके हाथ में एक फाइल जिसमे ज़मीन  जायदाद के कागजात थे | साफ़ पता चल रहा था कि वह काफी परेशानी में है |

राजेश्वर की फाइल देख कर वकील साहब को समझते देर नहीं लगी कि ज़मीन जायदाद का लफड़ा है |

मुझे अपने छोटे भाई से लफड़ा हो गया है | मुझे उसके  फ्लैट की रजिस्ट्री रुकवानी है |  मैंने तो उसकी पढाई के लिए कर्ज ले रखा है और उसके लिए पुस्तैनी खेत को गिरवी रख दिया था | सोचा था कि  उसकी नौकरी  लगेगी तो छुड़ा लेंगे .,लेकिन उस  ज़मीन  को छुड़ाने के बजाये वो अपनी पत्नी के नाम से दूसरा फ्लैट ले रहा है | और पूछने पर कहता है कि लोन ले कर खरीद रहे है | और वो चाहता है कि अपनी बची हुई थोड़ी सी खेत में उसके आधे हिस्से को बेच कर पैसे भी दूँ | ऐसा नहीं होगा ..मैं  जीते जी बंटवारा नहीं होने दूंगा |

वकील साहब आज पहली बार राजेश्वर को इतने  गुस्सा करते हुए देख रहे थे |

वकील साहब ने कहा ..शांत हो जाइए राजेश्वर जी और बोलिए चाय लेंगे या ठंडा | उन्होंने  टेबल पर रखी घंटी बजाई और शोमू काका दौड़े चले आये और बोले ..क्या हुकम है सरकार | शोमू  काका वकील साहब के यहाँ चपरासी है लेकिन चालीस साल पुराना रिश्ता है इनका | कहते है कि वकील साहब को अपने गोद में खेलाया है | पहले घर का काम सँभालते थे और अब वकील साहब का चपरासी बन ऑफिस का काम सँभालते है | वकील साहब भी उनको उचित मान – सम्मान देते है |

काका जल्दी से दो कप चाय ले आइये और आप भी पी लीजियेगा |..वकील साहब, राजेश्वर जी को शांत करना चाह  रहे थे | शोमू काका दोनों के लिए चाय और पानी लाकर सामने टेबल पर रख दिया |

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लीजिये राजेश्वर जी चाय पीजिये …वकील साहब उनकी फाइल देखते  हुए बोले |

वो चाय तो पी रहे थे  लेकिन चेहरे  से लग रहा था कि उनके दिमाग में तरह तरह के प्रश्न उठ रहे है | तभी वकील साहब ने कहा ..राजेश्वर बाबु,  मुझे एक सप्ताह का समय दीजिये, ताकि इस  केस के बारे में बिस्तृत जानकारी प्राप्त कर कर सकूँ और फिर आप को इसमें उचित सलाह दे सकूँ |

राजेश्वर … अपने कुर्सी से उठा और प्रणाम करके अपने  दूकान पर जा कर बैठ गया | दुकान में हालाँकि भीड़ काफी  थी लेकिन उसका स्टाफ कालू राम बहुत ईमानदार  और अनुभवी था  इसलिए कुछ समय दूकान छोड़ कर जाने के बाबजूद उसके ग्राहकों  को कोई शिकायत नहीं होती थी |

राजेश्वर दुकान पर माथा पकड़ कर बैठे हुए थे, तभी उनका लंगोटिया यार मोहन बाबु आ गए |

सामने बैठते हुए पूछा ..वकील बाबू से मिल आये ? क्या बोला उन्होंने ?

अगले सप्ताह बुलाया है ..राजेश्वर संक्षिप्त सा उत्तर दिया |

मैं तो कहता हूँ कि इस मुद्दे पर  गाँव में पंचायती करा दो | तब ही दिनेश की अक्ल  ठिकाने आएगी |

राजेश्वर बोला कुछ नहीं, बल्कि अपने ग्राहकों को सँभालने में लग गया | मोहन बाबु उनका मूड देख कर अपनी दूकान की ओर चल दिए | उनकी भी अपनी  कुछ दुरी पर  एक  मिठाई की दूकान थी |

अजीब दुनिया है,  जो भी मिलता है सिर्फ लड़ाई- झगडे की ही बात करता है | कोई यह नहीं कहता … चलो हम तुम दोनों भाइयों में सुलह करवाने का प्रयास करते है, राजेश्वर मन ही मन बडबडा रहा था |

रात को थका हारा जब घर पहुँचा तो खाना लगा कर कौशल्या सामने ही बैठ गई और वो भी पूछ बैठी ..वकील बाबू क्या बोले ?

सात दिन बाद बुलाया है .. संक्षिप्त सा जबाब दिया और लोटा का पानी लेकर मुँह धोने चला गया |

राजेश्वर खाना खा रहा था और कौशल्या उसके सामने  अपने देवर दिनेश बाबू को कोस  रही थी | जब हम शादी करके इस घर में आये थे तो देवर जी पंन्द्रह साल के थे  | अपना बच्चा जैसा उनको हमलोग मानते थे | उनकी हर फरमाईस पूरी करते थे | आज बीबी के आते ही कैसे बदल गया है कि हमलोग के पास अब आता  भी नहीं है |

दुनिया जहान  का क्या है,  परिवार के झगडा में तो पराये तो मजा लेते ही है ….वो सामने बैठ कर बकर बकर किये जा रही थी और राजेश्वर खाना का एक दो निवाला बड़ी मुश्किल निगल पाया और फिर उठ कर हाथ धोने चले गए |

खाना खाने के बाद आँगन में बिछे खाट  पर लेट कर आँखे बंद कर सोचने लगा | उसे अब हर वो बात  याद आने लगे जो दो भाइयों के बीच  पिछले बीस साल में  बीती थी |

बाबु जी और माता जी दोनों उस ट्रेन हादसे का शिकार  हो गए थे, जब हम सिर्फ १५ साल और दिनेश  १० साल का था | कारीसाथ रेलवे स्टेशन के पास ट्रेन पटरी से उतर कर पुल से गिर कर नदी के पानी में डूब गई थी  और उस बोगी का एक भी आदमी नहीं बच पाया था । बाबु जी इलाहाबाद जा रहे थे एक conference attend करने के लिए |

डॉक्टर जो थे, होमियोपैथी के बड़े नामी गिरामी डॉक्टर | अपना खुद का क्लिनिक और समाज में इज्जत प्रतिष्ठा थी  हालाँकि पैसा जोगा कर रखना नहीं जानते थे । बस जो भी मदद मांगने आता, दे दिया करते और कभी कोई हिसाब किताब नहीं रखा| इसीलिए तो माँ बाबूजी के मरने के बाद घर में कुछ भी पैसे नहीं बचे थे|

उसने उतनी छोटी उम्र में ही  दुनियादारी सिख ली थी | पैसो की तंगी  की वजह से उसने  तो पढाई  छोड़ ही दी लेकिन उसने  छोटे भाई को पढ़ाना  जारी रखा ताकि उसका  भाई बड़ा इंजिनियर बने | इसलिए  जो थोड़ी खेत थी उससे खाने भर का अनाज पैदा हो जाता था और बाकि का खर्च सब्जी का ठेला लगा कर पूरा करता था | राजेश्वर बिस्तर पर पड़े – पड़े  सोच रहा था |   

अनायास ही उसके आँखों से आंसूं बहने लगे …भाई को पढ़ाने  के लिए उसने अपनी पढाई छोड़ दी | ठेला लगा कर सब्जी बेचा |उसके भाई के बदन पर कपडे कम ना पड़े इसलिए उसने  कभी खुद अंग भर कपड़ा नहीं पहना | हमेशा सोचता था, मुझे तो गाँव में ही रहना है, कोई कॉलेज थोड़े ही जाना है | हम दोनों प्राणी खुद आधा पेट खा कर गुज़ारा कर लेते पर उसके पढाई के लिए पैसे की कमी नहीं होने देते थे |

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वो इतना कैसे बदल सकता है भला | उसके ऐसे व्यवहार के बारे में सोच कर ही आँखे नम हो जाती है |

लेकिन अब अपने मन को कड़ा  कर लूँगा,  रोने से काम नहीं चलेगा | ज़िन्दगी में अब तक संघर्ष तो किया ही है, आगे भी करूँगा लेकिन उसे सबक ज़रूर सिखाऊंगा | चार दिन से बीबी आयी है तो वो अब सब कुछ हो गई है और हमलोग अपने बच्चे के सामान स्नेह और प्यार दिया उसकी कोई कीमत ही नहीं है |

बहुत हो गया, अब मैं मोह ममता को  त्याग कर उससे लडूंगा | और अपने जीते जी खेतों के टुकड़े नहीं होने दूंगा  | सोचते सोचते जाने कब आँखे  लग गई और आँगन में ही खाट पर सोता रहा |

उसकी पत्नी कौशल्या उसे ज़गाना  उचित नहीं समझा,  चिंता – फिकर से बहुत कम ही सो पाते है | उसके बदन पर बस एक  चादर डाल कर वो भी अंदर कमरे में सोने चली गयी |

सुबह उठा तो राजेश्वर का सिर कुछ भारी लग रहा था और जब हाथ मुँह धो कर आया तो चाय देते हुए कौशल्या  ने टोका …तुम्हारी आँखे सूझी हुई है चेहरा भी मुरझाया हुआ है |  अपनी सेहत  का ख्याल रखो | आजकल देख ही रहे हो,  कोई किसी की मदद  करने वाला नहीं है | अगर लड़ना है तो पहले शरीर को ठीक रखना होगा | और हाँ,  आज तो वकील बाबू ने भी समय दिया है | जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं नास्ता लगा देती हूँ.. बोल कर कौशल्या  रसोई घर में चली गई |.

ठीक है भाग्यवान,  आज वकील साहेब के पास जाकर उनसे सलाह  मशवीरा  करता हूँ |

सुबह सुबह राजेश्वर तैयार होकर पहले दूकान पर गया और फिर अपने स्टाफ कालू राम को दूकान संभला कर खुद वकील के पास चला गया ।

आइए राजेश्वर जी ..वकील साहेब उसे देखते ही बोले |

सच तो यह है कि वकील साहब  राजेश्वर को बहुत मानते थे | वो दोनों बचपन में एक साथ एक ही स्कूल में जो पढ़े थे | ये अलग बात है कि राजेश्वर बीच में ही पढाई छोड़ कर खेती में लग गया और ..इन्होने पढाई ज़ारी राखी |

वकील साहेब ने बात की शुरुवात की  और बोले …मैंने आप के सारे पेपर्स देख लिए है | इसके अनुसार.. , आप सिर्फ दो भाई है |  माँ बाप रेल हादसे में गुज़र गए जब आप दोनों छोटे थे | आप ने आठ क्लास तक पढ़ा है लेकिन आपने भाई को पढ़ा कर इंजिनियर बनाया है |

उसको पढ़ने के  लिए आपने काफी कस्ट  उठाये है,  यहाँ तक कि आप ने आधी खेत गिरवी रख दी और घर खर्च  चलान्रे के लिए चाय की दूकान खोल रखी है |

इसके अलावा भी कुछ कहना है ?…उन्होंने फिर पूछा |

नहीं वकील साहब | आप तो मेरे बचपन के दोस्त हो | आप से भला क्या छिपा है…राजेश्वर  बोलते बोलते रोने लगा |

वकील साहेब ने  कंधे पर हाथ रख कर हिम्मत दिलाया  और कहा .., अभी ज़िन्दगी बाकी है राजेश्वर |

क्या ,इतनी जल्दी हार मान लोगे ?

तुम चाहते हो कि भाई ने जो माँगा है वो ना दे कर उसके ही फ्लैट पर स्टे लगाया जाये | क्या तुम यही चाहते हो ? ….वकील साहब राजेश्वर को देख रहे थे |

हाँ हाँ , ..राजेश्वर जल्दी से बोला |

हम स्टे ले सकते है,  भाई के प्रॉपर्टी में हिस्सा भी मांग सकते है |

लेकिन ..ज़रा सोचो. .तुमने जो स्नेह प्यार दिया, खून पसीना एक किया वो तो वापस नहीं मिलेगा |

तुमने उसके लिए जो ज़िन्दगी खर्च की है वो भी वापस नहीं मिलेगा |

और मुझे लगता है इन सब चीजों के सामने उस एक फ्लैट की कीमत शुन्य  है राजेश्वर…वकील साहब बड़े भावुक हो कर समझा रहे थे |

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दूसरी बात, भाई की नियत में खोट आ गई और वो पत्नी के कहने पर अलग रास्ते पर चल पड़ा  | और तुम भी उसी जैसा सोच रख कर  लड़ोगे,  तो उसमे और तुममे  फर्क ही क्या रहा  |  

समाज में जो तुम्हारी साख है, और तुम्हारी इमानदारी की दुहाई  देते है लोग | वो सब मिटटी में मिल जाएगा |

और हाँ, उससे भी बड़ी बात… इस कोर्ट कचहरी के चक्कर में वर्षो बीत  जायेंगे | और फैसला आने तक  पता चलेगा  कि बचा खुचा घर भी बिक गया | क्योंकि केस लड़ने में तो पैसा खर्च होगा ही  |

अब फैसला तुम्हारे हाथ में है | मैं तो तुम्हारा दोस्त हूँ, तुमसे पैसा भी नहीं ले सकता | लेकिन मेरी बातों पर गौर  ज़रूर करना  ..वकील साहेब उनकी पीठ पर हाथ रखते हुए बोले |

राजेश्वर को लगा कि जैसे उसे जोर का चक्कर आ गया हो, वह कुछ देर शांत बैठा रहा और फिर वकील साहब को नमस्कार कर वहाँ से चल दिया |

आज दूकान बंद करने में कुछ देर हो गई थी | उसने घडी देखा तो रात के आठ बज रहे थे | लेकिन दूकान से आने के बाद कुछ थकान सी महसूस हो रही थी | थकान शारीरिक परिश्रम के कारण नहीं थी, बल्कि मानसिक तनाव के कारण  था  |

राजेश्वर हाथ मुँह धोकर आँगन में पड़े खाट पर बैठा ही था कि  कौशल्या  देवी थाली में खाना लेकर आ गई और हाथ के पंखे से हवा देते हुए खाना खिलाने लगी |

आज वकील साहब के पास गए थे ..कौशल्या  पूंछ बैठी |

हाँ, गया था …राजेश्वर  ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया |

क्या कहा वकील साहब ने …..कौशल्या पूरी बात जानना चाहती थी |

उन्होंने कहा … तुम तो दिलदार थे वो भिखारी निकला |

अब भी तुम दिलदार ही बने रहो ..उसे  भिखारी ही रहने दो….

इसका क्या मतलब…कौशल्या  गुस्सा होते हुए पूछी |

हमलोग को थोडा इंतज़ार करना चाहिए, भाग्यवान | शायद उसे अपनी गलती का एहसास हो जाए |

मुझे तो नहीं लगता कि ऐसा होगा,  क्योकि उसके पीछे उसकी औरत का हाथ है | वो कभी नहीं चाहेगी कि  हम सब फिर से एक हो जाएँ ….कौशल्या  अपनी आशंका व्यक्त कर रही थी |

चलो ,ठीक है अंतिम निर्णय लेने के पहिले  थोडा विचार करते है …राजेश्वर बोलते हुए गाँव के चौपाल की ओर चल दिया | ताकि वहाँ भी अपने दोस्तों से इस पर चर्चा कर सके और उनकी राय ले सके …(क्रमशः )

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