# ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है #…22

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न जाने ये ज़िन्दगी क्यों हर पल

एक नया इम्तिहान लेती है …,

लूट लेती है फिर ये हमसे खुशियाँ हमारी

और हमें जीने का एक सबक देती है ….

सुमन बेड पर बेहोश पड़ी थी और डॉक्टर साहब भी अभी अभी आये थे और अपने स्टाफ को उसे पानी चढाने का निर्देश देकर गए थे | अभी भी उसे पूरी तरह होश आने में करीब दो घंटे का समय लगने की सम्भावना थी…|

सुमन भी अजीब लड़की है, दुनिया के लोगो की परवाह करती है और अपने शरीर  पर तनिक भी ध्यान नहीं देती,  सिर्फ काम के पीछे पागल रहती है | इसी कारण तो आज इतना बड़ा ऑपरेशन कराना  पड़ा है ..रामवती  मन ही मन सोच रही थी |

सुमन के बदन में फिर थोड़ी हरकत हुई तो रामवती दौड़ कर उसके पास गई | सुमन  आँखे खोल कर अपने चारो ओर देखा | तभी रामवती ने  इशारे से पूछा…अब कैसा लग रहा है, सुमन  | सुमन  कुछ  बोलना चाह रही थी  लेकिन उसके गले से आवाज़ नहीं निकल पा रही थी |

उसी समय डॉक्टर साहब  सुमन को इंजेक्शन देने के लिए आ गए,  उन्होंने सुमन की स्थिति देखी और बोले कि लगता है इनकी आवाज़ चली गयी है, इसलिए इनके गले से आवाज़ नहीं निकल पा रही है |

सुमन को पूरी तरह होश आ चूका था और वो डॉक्टर की बातें साफ़ साफ़ सुन रही थी | यह जान कर उसको बहुत दुःख हो रहा था कि अब वो कभी बोल नहीं पायेगी | वो अपनी आँखे बंद कर इस तकलीफ को बर्दास्त करने की कोशिश करने लगी |

डॉक्टर साहब  रामवती की तरफ देखते हुए आगे कहा …यह सब  इनके शरीर में फैले ज़हर के कारण ही हुआ है और हाँ एक बात और बताना है  कि इनके  बच्चादानी में भी इन्फेक्शन हो गया था | इसी कारण इनके बच्चादानी को भी निकालना  पड़ा है |

अब ये कभी भी माँ नहीं बन सकती ..इतना सुनना था कि सुमन जैसे अंदर से टूट ही गई | वो रामवती को पकड़ कर  रोने लगी ..उसके आँखों से आँसू  बह रहे थे |

उसकी ऐसी मानसिक स्थिति को देख कर रामवती भी अपने आँसू  रोक नहीं पा रही थी. | यह पीड़ा किसी औरत के लिए असहनीय होती ही है कि उसे बाँझ बन कर ज़िन्दगी जीना पड़े | सुमन को लग रहा था कि अब जीवन में कोई ख़ुशी नहीं बची है, और अब उसका जीवन ही बेकार हो गया है |

उसकी भावनाओ को समझते हुए रामवती उसके माथे पर हाथ रख कर दिलासा दे रही थी | और रघु भी पास खड़ा सब देख रहा था | उसके आँखों के आँसुओं को रघु पोछते हुए कहा..हिम्मत से काम लो सुमन | हमलोग सभी तुम्हारे साथ है |

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रघु सुमन को दिलासा तो दे रहा था लेकिन साथ ही साथ सोच रहा था …, यह मुझसे इतना प्यार करती है कि   मेरे लिए उसने शादी के सभी ऑफर को ठुकरा दिया था …… और एक मैं हूँ, कि रामवती के कारण उससे झूठ बोल कर उससे बचने का प्रयास करता रहा हूँ |

 लेकिन अब तो सुमन को सब कुछ. पता चल चूका  है | पता नहीं, ऐसी स्थिति में अब मैं सुमन  का सामना कैसे कर पाउँगा |

रामवती रघु को देखते हुए बोली…तुम क्या सोच रहे हो ? अब तो सुमन को होश आ  चूका है | तुम जल्दी से चाय ले आओ तो  सुमन को पिलायेंगे और हम सब  भी पियेंगे | डॉक्टर साहब ने कहा है …अब चाय दे सकते है  |

ठीक है,  अभी मैं चाय लेकर आता हूँ….बोलकर रघु बाहर निकल गया |

सुमन एक टक रामवती को देखे जा रही थी और उसके आँसू जैसे थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे |

रामवती भी बहुत भावुक होकर उसे हिम्मत दे रही थी लेकिन मन ही मन सोच रही थी ….यह सही है कि सुमन  ने रघु की जान तो बचाई ही है और मेरा भी ज़िन्दगी उसी के सहयोग के कारण बची है | इस तरह देखा जाए तो हमदोनो की ज़िन्दगी उसी की  देन है और उसके बदले में हमलोगों से अगर थोड़े  अधिकार की उम्मीद वो रखती है, तो इसमें गलत ही क्या है .. उसका हक़ तो  बनता ही  है |

मैं अपना सब कुछ और यहाँ तक कि राजू को भी उसे  सौप दूंगी ताकि उसे ज़िन्दगी में किसी चीज़ की कमी महसूस ना हो | इतना तो बलिदान मुझे देना ही होगा. | इन्ही सब बातों में रामवती खोई हुई थी, तभी रघु चाय लेकर आ गया |

रामवती धीरे धीरे सुमन को बड़े प्यार से चाय पिला रही थी | तभी सुमन इशारे से बोली कि  तुम सब भी चाय पी लो |

ठीक है सुमन,  हमलोग भी चाय ले लेते है | रामवती  उठकर चाय कप में डाला  और  रघु को देने के बाद खुद भी लेकर तीनो चाय पीने लगे | सुमन भी पहले से अब सामान्य हो रही थी |

रात के दस बज रहे थे और तभी विकास घर से सुमन के लिए खिचड़ी ले कर आ गया |

रामवती विकास को देख कर आश्चर्य से बोली …तुम्हे कैसे पता चला कि अभी सुमन को खिचड़ी खाने को डॉक्टर ने बोला है |

मुझे रघु भैया फ़ोन पर सब बात बता दिए थे …विकास  खिचड़ी का डिब्बा टेबल रखते हुए बोला |

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और राजू तुमलोग को तंग तो नहीं कर रहा है ….रामवती उत्सुकता से पूछी |

नहीं, वो हमलोग के साथ खूब अच्छा से रहता है, टाइम से खाना खा लेता है और आराम से सो जाता है | वो बिलकुल तंग नहीं करता है |

सुमन राजू के बारे में सुन कर खुश हो रही थी और इशारे से बोली कि कल उसे लेते आना, देखने का मन कर रहा  है |

हाँ विकास, कल उसे भी लेते आना, सुमन का मन बहल जायेगा ..रामवती विकास को बोल रही थी |

रामवती सुमन को पकड़ कर तकिये के सहारे बेड पर बैठा दी, ताकि वो आराम से खाना खा सके | और

खिचड़ी  अपने हाथों से सुमन को बड़े प्यार से खिला रही थी |

उसी समय सेठ जी भी आ गए, .उन्होंने साथ में लाये हुए फलों को टेबल पर रखते हुए सुमन से पूछा-..अब कैसी तबियत है सुमन ?

सुमन सेठ जी को देख कर धीरे से मुस्कुरा दी |

सेठ जी को सुमन के नहीं बोलने पर आश्चर्य हो रहा था | तभी रघु ने धीरे से सेठ जी को बताया कि ,सुमन की आवाज़ चली गई है | डॉक्टर ने कहा है कि अब वो बोल नहीं सकती है |

सेठ जी सुमन को बड़े प्यार से देखा और बोले….सुमन, तुम दुखी मत होना | मैं बड़ा से बड़ा  डॉक्टर से तुम्हारा इलाज  करवाऊंगा  और जैसे भी हो तुम्हारी आवाज़ को वापस लाने में सफल होऊंगा | सेठ जी उसके सिर पर हाथ रख कर दिलासा दे रहे थे |

फिर सेठ जी रघु की ओर देख कर बोले …..शायद चार दिनों बाद सुमन को  यहाँ से छुट्टी मिल जाएगी और मैं अब तक का सारा बिल का पेमेंट कर दिया है और ये कुछ पैसे तुम रख लो और सुमन को जिस चीज़ की ज़रुरत हो तो लाकर देते रहना और अच्छी तरह सेवा करना ताकि सुमन जल्द ठीक हो जाये |

मैं गला के डॉक्टर से संपर्क करने की कोशिश करता हूँ ..सेठ जी बोल कर जाने लगे |

विकास  सेठ जी को उनकी  गाड़ी तक छोड़ने चला गया  |.

तभी रघु रामवती की ओर देखते हुए बोला ..अब तो सुमन की हालत कुछ बेहतर है इसलिए आज रात को मैं यहाँ रहता हूँ और  तुम विकास के साथ घर चली जाओ | राजू को भी तो संभालना होगा |

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नहीं जी,  सुमन के साथ एक औरत को यहाँ रहना ज़रूरी है. इसलिए मैं यहाँ रहती हूँ |  तुम घर चले जाओ | तुम भी तो दो दिनों से सो नहीं सके हो | तुम्हे  थोडा आराम मिल जायेगा | तुम सुबह फिर आ जाना …रामवती उसे समझा कर बोली |

ठीक है रामवती, तुम अपना भी ख्याल रखना | तभी, सुमन रघु को इशारे से बुला के कुछ फल ले जाने का इशारा किया.  और इशारे से ही बोली ….राजू और तुम सब के लिए है |

उदास और बेआवाज़ सुमन के चेहरे को देख कर रघु का दिल रो गया और आँखों में आँसू आने से पहले ही  वह मुँह फेर लिया और कमरे से बाहर निकल गया |

सुमन समझ गई कि मेरी ऐसी स्थिति के कारण  रघु बहुत परेशान है | लेकिन जो नियति है उसे बदला कैसे जा सकता है | हमारी  ज़िन्दगी तो शुरू से ही संघर्षपूर्ण रही है | अब भगवान् और कितनी परीक्षा लेगा, पता  नहीं … ..वो आँखे बंद कर सोच रही थी |

चार दिन, देखते देखते किसी तरह कट गए और आज हॉस्पिटल में  कष्ट से भरी चार दिन बिताने के बाद घर जाने की खबर से सुमन खुश थी | डॉक्टर साहब ने आज घर जाने की अनुमति  दे दी थी |

सुमन तो  सुबह से  ही से तैयार बैठी थी कि कब गाड़ी आये और उसे इस हॉस्पिटल से छुटकारा मिले |

तभी रामवती  रघु से बोली ….मैं पहले फ्लैट में जाती हूँ | सात  दिनों से बंद घर बहुत गन्दा हो गया होगा, उसे साफ़ – सफाई करती हूँ और खाने – पिने का भी इंतज़ाम करना होगा |

ठीक है सुमन, अभी तो ऑफिस की गाड़ी आ रही है | तुम  उसी से चली जाओ और हमलोग हॉस्पिटल से अम्बुलेंस लेकर आ जायेंगे  |.

आज ज़िन्दगी में पहली बार सुमन अम्बुलेंस में बैठ रही थी, लेकिन उसे ख़ुशी थी कि वो घर जा रही थी …कुछ समय से लिये अपना दुःख दर्द  भूल चुकी थी……………(क्रमशः ) |  

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इससे आगे की घटना जानने हेतु नीचे दिए link को click करें…

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