होली की फुहारें

हमें  बचपन की  होली बहुत याद आती है क्योकि  बचपन में होली की मस्ती कुछ ज्यादा ही रहती थी | घर में लड़ झगड़ कर नई पीतल वाली  पिचकारी और रंग मंगवाते थे और साथ ही घर की  बहुत सारी हिदायते होती थी  कि होली कैसे खेलना है |

..लेकिन  यह क्या ? , सुबह हुआ नहीं कि दोस्तों की टोली घर के दरवाजे पर,  और सब लोग जोर जोर से चिल्लाने लगे.. अरे भोला ,( मेरे बचपन का नाम)  घर से बाहर निकलो, और बुरा ना मानो होली है जैसे नारे लगने लगे /

और मुझे मज़बूरी में घर से बाहर निकलना पड़ा और फिर हमलोग  जो  हुरदंग मचाते थे वो हम  कैसे भूल सकते है | जब मौका मिलता एक बन्दे को सब मिलकर कीचड़ में पटक देते और देखते देखते ग्रुप के सभी दोस्त कीचड़ से सन जाते और तो और रंग भी चेहरे पर ऐसा लगता कि कोई तीसरा आदमी देख कर पह्चान भी नहीं पाता |

गजब का उत्साह होता था ,हमलोगों के हाफ पैंट वाले दोस्तों के ग्रुप में और बुशर्ट  सभी के इतने फटे की  पूरा बदन झाकता  था |

हमलोग एक ढोलक का जुगाड़ करते और फिर  झाल और ढोलक बजा -बजा कर होलिका गाते हुए बारी बारी से सभी के घर जाते |

जिनके घर के सामने गाना बजाना चलता वो लोग बड़े प्यार से घर का बना हुआ पुआ और गुजिया हमलोगों को खिलते थे |

इस तरह दोपहर तक कार्यक्रम चलता  रहता और  फिर  शरीर से रंग उतारने की  जद्दो- जहद शुरू हो जाती |

सचमुच वो दिन बहुत याद आते है | ना ज़िन्दगी  कि जद्दोजहद …..न चिंता , न फिकर, न  गुस्सा, न नफरत ..सिर्फ प्यार और खुशियों के पल |

और हाँ उस दिन  की  एक घटना को बताना तो भूल ही गया | उन दिनों  मैं नई नई  साईकिल चलाना सीख रहा था,  हालांकि पैर मुश्किल से पैंडल तक पहुचते थे |

हम पांच दोस्तों ने  मिलकर एक साइकिल भाड़े पर लिया,  एक घंटे के पूरे एक आना (सिक्का) भाड़ा दिया था |

बस फिर क्या था हम पाँच दोस्तों के बीच यह तय हुआ कि बारी बारी से एक एक चक्कर लगाएगा और  एक घंटे मजा करेंगे | सबसे पहले राजू गया और एक चक्कर मार कर वापस आ गया | अगली  बारी हमारी आई |

मुझे भी साइकिल पर बैठा कर धक्का देकर छोड़ दिया गया और मैं मुश्किल से पैडल मार पा रहा था, |

तभी कुछ ही दूर आगे गया था कि अचानक सामने से एक बुढा व्यक्ति  जो सिर पर बोझा लिए था, मेरे साइकिल के सामने आ गया |

मैं अपनी साइकिल को संभाल नहीं सका और सीधे उसके पिछवाड़े में टक्कर मार दी |

वो आदमी बोझा लिए उस कच्ची सड़क पर गिर पड़ा | मैं मार खाने के डर से उस व्यक्ति के उठने से पहले साइकिल लेकर भाग चला और किसी तरह दोस्तों के बीच वापस आ गया |

अब अगली बारी  नविन की थी | वो पुरे जोश के साथ साइकिल पर बैठा और किसी  कुशल  चालक की तरह उसकी साइकिल फर्राटे भरने लगी |

लेकिन थोडा आगे बढ़ा ही था कि उस बूढ़े को वह साइकिल आता दिखा,  चेहरे पर होली के  रंग होने के कारण हम सभी एक जैसे ही दिख रहे थे |

उस आदमी ने  दौड़ कर नविन की साइकिल पकड़ ली और उसे पटक दिया और गाली देते हुए पीटने लगा |

लेकिन नविन को कुछ समझ ही नहीं आया कि वो आदमी उसे मार क्यों रहा है | उसका साइकिल चलाने का सारा उत्साह ठंडा हो गया था |   

उसके चेहरे पर तो रंग थे पर चेहरे का रंग उड़ गया था   | वो रोता हुआ चल कर वापस हमलोगों के बीच आया और उसने वो घटना बताई जो उस बूढ़े व्यक्ति ने बिना कुछ गलती के उसकी अच्छी तरह धुनाई कर दी |

मैं सारा माजरा समझ गया, बेचारा नविन हमारी जगह मार खा गया था | मैं  बिलकुल चुप रहा ,क्योंकि इसे राज रखने में हमारी भलाई थी |

वो घटना  जब भी याद आती है, तो मैं बस मुस्कुरा देता हूँ | नविन को इस बलिदान के लिए  अपना पक्का दोस्त मानने लगा, लेकिन वो घटना आज तक राज ही है |

BE HAPPY… BE ACTIVE … BE FOCUSED ….. BE ALIVE,,

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Retired कलम

Published by vermavkv

I am Vijay Kumar Verma, residing in Kolkata, the city of joy. I was a Banker since December 1985 and retired in April 2017 from State Bank of India. After serving the Bank for 32 years as an officer holding different assignments from time to time, now I am currently enjoying the retired life. I would like to fulfil the duty of social service through this platform spreading aware about the health related problems and their remedies. I will also try to entertain my followers through knowledgeable information and motivate them to enjoy better and quality lifestyle. It is my endeavour to keep the post friendly and as informative as I can. I am willing to connect with my friends and followers, through my stories and drawings out of my passion to write and make sketches. I would like to create a trusted and joyful friend circle, and share tales from the past

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