चुप चुप रहते हो…

कभी कभी इंसान न टूटता है ना बिखरता है… बस थक जाता है , कभी खुद से, कभी किस्मत से, और कभी अपनों से / एक वक़्त ऐसा भी आता है ,कि वक़्त ही उसका एहसास कराता है / उस वक़्त जो एक दर्द भीतर कहीं बाकी रह जाता है ,बस ज़िन्दगी भर वही दर्द हमें सही राह दिखाती है / मैं भी कुछ दिनों पूर्व ऐसी ही स्तिथि से गुजर रहा था, वक़्त मेरा भी नासाज़ था। और रिटायरमेंट के बाद पहली बार अपनी भावनाओं को कागज़ पर अंकित किया….

 चुप चुप रहते हो …अब कोई सवाल क्यों  नहीं करते,

मेरे रूठने  पर …अब बबाल क्यों नहीं करते …

माना कि रिटायरमेंट में खालीपन आ जाता है

अपनी अधूरी शौक का …इंतजाम क्यों नही करते

ज़िन्दगी  में ना जाने कितने ही काम है अधूरे

उन्हें पूरा करने का …फरमान क्यों नहीं करते

यह सच है  शरीर से तो कमजोर हो गए तुम

दिल में जो जूनून  है …उसे इस्तेमाल क्यों  नहीं करते

ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है.. विजय ,

इस खूबसूरती का एहसास क्यों नहीं करते …

चुप चुप रहते हो …कोई सवाल क्यूँ नहीं करते…

मेरे रूठने पर ..अब बबाल क्यों नहीं करते ,,,

….विजय वर्मा ……

BE HAPPY… BE ACTIVE … BE FOCUSED ….. BE ALIVE,,

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